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भागल जात बा गाँव

31 October 2023

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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश

के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार

गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी चौहद्दी के सिवाने पर बा।

अब देखी न हमार गउवा अपनी जगाहिए पर बा, बाकी जब हमार जनम भइल त गोरखपुर

जिला में रहल। देश आजाद भइल त देउरिया जिला में चलि गइल। मुलायम सिंह जी

जगले त एके पडरौना जिला में हाँकि दिहले आ जब मायावती जगली त एके कुशीनगर

में धकिया दिहली । अँगरेज वहादुर के राज में केहू ढेर मनबढ़ हो जा त उनके जिला बाहर

क दोहल जाव। ऊ कानून अब्बो चलेले, अब एके कवन कनून कहल जाई कि हमार

गाँव अँगुरियो भरि नाहीं सरकल आ जिला पर जिला बदलत गइल। एगो अजगत अउर

बा हमार गाँव भगवान बुद्ध के निरवान दियावे वाला कुशीनगर से सटले बा पाँचे कोस

पर ऊहो जगहि वा जहाँ भगवान महावीर के निरवान भइल रहल। एइसन महापुरुषवन

के जनम दिहले वाली जगहि नाहीं भइल, त अपनी कोरा में एह लोगन के सुतावे वाली

जगहि त बटले वा बुद्ध के जमाना में जवन हिरण्यवती नदी कुशीनगर से सर्टि के बहत

रहलि ऊ चैंवर होके रहि गइल बा आ अब त चँवरवो चारू ओर से भरात आवत बा।

एही तरे विकास होत रही त कुछुए सालि में एह नदी के नाँव इतिहास के किताब में रहि

जाई। सन् 1950 ई. के आसपास कसया में एक जने मुख्तार जागल रहलें गरीब घर

के रहलें मुख्तारी से पइसा बहुत कमइलें सैकड़न एकड़ जमीन के मालिक हो गइलें।

कइसे भइलें ई त ऊहे जानें, बाकिर अपने पौरुष के बड़ाई करत-करत कहें कि 'हम जवने

जमिनिया पर पेसाव क देई लें ऊ हमार हो जाले।' उनके पावर भरल जेवानी पर आइल

त इतिहास में अमर होखे के एगो उपाइ सोचलें। कहीं से पता चलल कि तुलसीदास के

पैदाइश मझौली राज से उत्तर पश्चिम कोने तैतीस कोस पर एगो गाँव में भइल रहल। अब

जवन हवाई अड्डा वा ओसे सटले गाँव बा 'मदारी पट्टी', जवने में मदारी एक्को नइखे,

दुवे लोग भरि गाँव बाड़े। ईहो संजोग देखल जाव कि कुसीनगर से सटले एगो गाँव बा

बिसुनपुरा जवने में कई घर पाठक लोग वा विसुनपुरा से सटले हिरण्यवती बहत बाड़ी,

भले चँवरे रहि गइल होखे, जब एगो पावरवाला, पइसा वाला आदमी चाहे त विदवान

लोग इतिहास बनइवे करी इतिहास ई बनल कि तुलसीदास के बाप आतमाराम दूबे मदारी पट्टी के रहलें । ओही जा तुलसीदास के जनम भइल रहल। उनके बियाह विसुनपुरा में पाठक किहाँ भइल रहल। रतनावली अपना भाई के साथे नइहरे चलि गइली । तुलसीदास बउराइल ससुरारी विसुनपुरा चलि दिहलें। ससुरारी की पहिले बढ़ियाइल हिरण्यवती बहत रहली। नाव- बेड़ा नाहीं पवलें, त मुर्दा पर चढ़ि के पार उतरलें, आ कोठा से लटकत साँप के पोंछ पकड़ के उप्पर चढ़ि गइलें । एतना इतिहास काफी रहल। मुख्तार साहेब कसया से उत्तर पच्छिम खाली जमीन पर तुलसीपुर बना दिहलें। कई सालि ले मेला लागल। रसलिल्ला नौटंकी भइल। बाद में मुख्तार साहेब आ उनके हितमिन्तर के मकान बनि गइल । तुलसीदास से जुड़ल इतिहास इतिहास के अन्हरकी कोठरी में चलि गइल। एह तरे हमार गाँव हिन्दी के महाकवि के जनमधरती आ ससुरार के सिवान होत होत रहि गइल।

हम कवने के आपन गाँव कहीं? पुरखालोग बसल कुरमौटा मँगुरही में हमर जनम भइल कुरमौटा मँगुरही में कुरमौटा से सटल पूरब शाहपुर में नेवासा मिलल त बबुआ (बाबुजी के हम बबुआ कहीं) माई के साथे शाहपुर में रहे लगलीं। अब तमाम जगह परिचय में शाहपुरे लिखा गइल बा। एह दूनू गाँव के नाँव जवार मधार में जुड़वाँ भाइन लेखा 'शाहपुर कुरमौटा' कहल जाला । जुड़वाँ भाइन के सुभाव एक्के लेखा होला, बाकिर एह गाँवन के सुभाव में फरक बा हमार जवन तन-मन बनल बा ओपर दूनो के हक बरबरे बा। दूनू हमार गाँव हवे। मँगुरही के सिवान में खेत-बारी बा, बाकिर ओके आपन गाँव कहे लायक कुछ नइखे।

जब हमन के गाँव में केहू इतिहास से जोरि के कवनो बात करेला, त कहेला कि 'अड्डा' आइल त हम दस बरिस के रहनी, चाहे हमर जनम अड्डा अइले से पहिले भइल रहे। ओनइस सौ ओन्तालीस में दुसरका विश्वयुद्ध शुरू भइल। ओही समे हवाई अड्डा बनल रहे। ओह में मजूरी करे वाला लोग एक पइसा रोज पावे। तकीम खाँ बतावेलें कि एक पइसा में पूरा । परिवार के खाए भरि के तरकारी भाजी मिल जात रहे। एक अदिमी के खाए भरि के अनाज तरकारी दूनो हो जा

शाहपुर - कुरमौटा सटले गाँव सुभाव में फरक। दूनू गाँव में एक्को घर छत्री नइखे। एसे सामंती अत्याचार के गुंजाइश नाहीं रहल बाकि कुरमौटा में सुकुल पट्टी में दू जने पढ़वइया निकरि गइलें एक जने हाईस्कूल पास कके दरोगा बनि गइलें। उनसे छोट भाई वकील हो गइलें गोरखपुर में जवन बड़े भाई रहलें ऊ तनि मनबढ़ रहलें। एक भाई दरोगा आ एक भाई वकील पावर के नशा जमींदार से मिलि के शाहपुर कुरमौटा के मालगुजारी वसूल करे के ठीका लिहलें। जमींदार लमहरे के रहेवाला। उन्हू के आसानी ही गइल । सिपाही करिन्दा के खरच बचे लागल ई ठीका जिमदार साल भरि जवन चाहें तवन लोग से असूल करें। साल के साल असल जिमदार के मालगुजारी पहुँचा दें। कुरमौटा में बभनइया ढेर रहल। केतनो जिमदार बनें, पटिदार रोबदाब कम्मे मानें। जिमीदार भइले के सज्जो सुख असूले खातिर एक्के गाँव रहि गइल - शाहपुर एह गाँव में बरई, धोबी, चमार, गोंड़, सुरमी, जोलहा, लोहार, बढ़ई एही के बसगित। खेतिहर सब मेहनत क के जीए खाए वाला। जिमिदार भइले के फैदा ई रहल कि पुलिस थाना, कचहरी सब उनहीं के असूल तसील जवन होखे तवन त होखबे करे, केहू के दुआरे लगहर भंइसि लडके ओके खोलवा के मँगा लें। चालीस पचास जवने मन करे दे दें, चाहे न दें। केहू के दुआरे नीबि के पेड़ रहे, कटवा के मँगा लें। जब उनके खेत में बावग होखे त शाहपुर के सज्जो हर एक्के साधे नघा जाँ कहो बेगारी में उनके खेत में सोहनी होखे त शाहपुर के हर घर से एक अदिमी पकड़ लिहल जा। दिन भर सोहनी कइले पर रहर के घुघुनी पनपियाव मिले। मजूरी के सवाले नाहीं रहल। बेगारी रहे जिमिदार के एक दिन लंगड़ तेली पकड़ा गइलें सोहनी करे खातिर दुपहर भइल आ भूख से नाचे लगलें त जिमिदार के सुना के केहू से कहलें- 'ए फलाने, हमरी घरे जा के कहि द कि हमार मलिकाइन आपन सेनुर धो लें, आजु एही बेगारी में हमार जान जाई।'

ऊ त जिमिदारी के ठीका लिहलें रहलें, जवन करें, तौन कम्मे रहे। उनही के देखा देखी कुरमौटा के दूसर बामन लोग शाहपुर वालन के आपन परजा समझे। हमन पंच जब शाहपुर में आके रहे लगनीं तब एइसन बात सुनात रहे कि कुरमौटहा लोग शाहपुर के आपन साउन मानेलें। शाहपुरहा लोग कुरमौटा के खाजु (खाए वाला चीज) ह लोग चरहा ह लोग एह गाँव के लोग थाना पुलिस कोट कचहरी से बहुत डेरात रहे अब्बो अउर गाँव के मुकाबला में जियादा डेराला कुरमौटा के सरहंग बाभन लोग के देखा-देखी ओह गाँव के दुसरको जाति के लोग शहपुरहन के सतवले में पाछे नाहीं रहें। शाहपुर वाला लाल पगरी देखते भागि के लुका जाए वाला मानल जात रहलें। कुरमौटा वाला चढ़बाँक

जइसे सब कुछ बदलेला, ईहो बदलल । जिमिदारी टूटे के सुगबुगाहट आजादी की लड़ाई में समाइल रहे। एक ओर देश आजाद भइल दुसरका और सुराज के बेयारि बहले से थाना पुलिस के डर भय कम होखे लागल ठीका जिमिदार के भाई दरोगा के दरोगई छूटि गइल। उनके वकील भाई अपराधिन के वकालत कइले आ ओकनी के हथियार छिपवले के जुरुम में धरा गइलें। ओही अपराधियन से अपने दरोगा भाई के दमाद के मरवा दिहलें। ओहर दुसरका गोल वकील साहब के लाठी से मारि के मुवा दीहल ठोका जिमिदार की छाती में कैंसर भइल। बड़हन घाव से पीब की साथै कौरा निकाड़ि के फेंके के परे । जब ठीका जिमिदार के जुलुम जोर पर रहे, ओही समे हमन के परिवार कुरमौटा से शाहपुर आके बसल। शाहपुर के लोग पहिले त ईहे बुझल कि कुरमौटवा बाभन अब गँउवे में आ के बसि गइल। अउर आफति हो जाई । बाकिर बबुआ के बेवहार एइसन रहल कि थोरही दिन में शाहपुर वालन का बुझाए लागल कि ठीका जिमिदार के अत्याचार से छोड़ावे वाला ईहे होइहें। एगो बिरधा चेता मुसमाति निसंतान रहली ठीका जिमिदार चहलें कि उनके खेत-बारी जिमिदारी की नावे हो जाव त हम लिखा लीं। ओहर चेता मुसमात सोतल सुकुल के आपन वारिस बना के सब जरजाजात उनके नावें लिखि दिहली अब ठीका जिमिदार से सीतल के सोझे लोहा लागि गइल। कई-कई वेर बाहर से उठइत बोला के ठीका जिमिदार उनके मुलवावे के कोसिस कइले सीतल हर बेरि बचल चलि जाँ हर बेरि शाहपुर के लोग उनसे अवरू नेह छोह करे लागे। ओही समे हम कसया के पराइमरी स्कूल में पढ़े जाए लगनों एक दिन जिमिदार से रुपया लेके बबुआ के मुआवे कातिर दस बारे जेवान कसयावाला मुख्तार के नाव लेके घर से बोला के ले गइलें आ मुवा के छोड़ि दिहलें । कातिक पुर्नवासी के राति रहल। मारि लाठी के परल रहे। राति भरि खेत में परल लासि में छीपल परान बचि गइल। बबुवा एक महीना कसया के अस्पताल में परल रहलें। ओही समे हमरी भाई से केहू कहल कि जिमिदार केहू से कहत रहलें हा कि बित्ता भरि के लइका अकेल्ले एतना दूरि पढ़े जाला, ओके मुवाके इनारे में फेंकवां देवि, जब सीतल निसंतान हो जइहें त अपनही मरि जइहें बबुआ अस्पताले में ई बाति सुनलें आ कहले, जे के राम नाहीं मरिहें, ओके केहू नाहीं मारि पाई। जब एतना रुपया खरच क के हमार काकाजी (जिमिदार) हमके नाहीं मुवा पवलें, त हमरा बेटा के कइसे मुवा पइहें? बबुआ के राम पर भरोसा हमार पढ़ाई छोड़वले के रस्ता में आ गइल। हमहूँ बचि गइनीं, बबुवो बचि गइलें आ हमार पढ़इयो बचि गइल। नाहीं बचली हमार माई ऊ परसोति के जर में बिना दवाई के मरि गइली ।

एह तरे शाहपुर के मिजाज बदलल, बाकी आजु ले कुरमौटा के मरखाह सुभाव शाहपुर के लोग के मन में जियतार बनल बा जब हम शाहपुर गाँव के जाने- चीन्हे लगनों त जवन लोग तपल रहे ओमें चउधुरी अहिर रहलें उनके नवें रहल चठधुरी गाँव के बिच्चे रस्ता पर उनके घर रहल जिमिदार आवे त उनकिए दुआरे पर बइठि के गाँव भरि पर हुकुम चलावे। अलीस हसन खाँव जिमिदार के खास अदिमी रहलें उनके बेटा समसुदीन हमरे साथ पढ़ें। बाद में कलकत्ता कमाए लगलें। उनके मेहरारू बूढ़ ससुर के खइले पियले के तकलीफ देबे लागलि त अली हसन खाँव दाना-पानी तैयागि दिहलें। कई दिन बादि जब उनके सम्मउरिया लोग समुझावे गइल त कहलें- 'हमार पतोहि कहलसि कि ई हरदम भुखइले रहेला। एके का खियाई? सूअर खियाई का कि एकर पेट भरो?" ओही दिन से हम दानापानी छोड़ि दिहनीं । नाहीं मनलें, भुखाइल पियासल जान तेयागि दिहलें। उनके भाई अल्ली खाँ सोझबक रहलें खेत-बारी में अझुराइल रहें। एक जने सुभकरन हजाम रहलें, जे जिमिदार के आगे-पीछे लपटियाइल रहें। रंग उनकर गोर रहल। आन गाँव के कई जने उनहू के चाभन समुझि के पैलग्गी करें। उनके घुर्तई के ई हालि रहे कि एक बेर डीह बान्हे खातिर सिवराज सोखा बोलावल गइलें सवा महिना रहि के डीह बन्हलें गाँव भरि से भेर लागल (चन्दा असूल भइल) जब हिसाब भइल त सुभकरन बतवलें कि पचास रुपया के सुक्खल मरिचा खरच भइल बा सोखा के खइले में। ओह समे सुक्खल मरिचा तीन चारि रुपयो सेर बिकात रहल। गाँव के लोग अचरच में परि गइल कि एक अदिमी सवा महित्रा में बारह तेरह सेर सुक्खल मरिचा कइसे खाई? बाकी हिसाब सुभकरन के रहल, केकर हिम्मति कि टोके!

एक जने मिसिर रहलें आज़ादी अइले पर गाँव सभा बनल त परधान हो गइलें।

उनसे पहिले बासदेव सुकुल शाहपुर के मुखिया रहलें, सबसे ढेर खेत उनहीं के रहल।

पोढ़ बैल राखें । खेती डटि के करें। पइसा मीसि के खरच करें। दुसरका बियाह कइलें त

एइसन लछिमी पवलें कि ऊ सब धन के थाह लगा दिहली बुढ़ौती में एगो बेटा भइल।

नाव धराइल सिपाही! राजकुँवर लेखा पोसल गइलें। बचपने से दारू के चस्का लागल।

माई बाप के मुवते खेत बेचले, घर बेचेले। अब आन किहाँ खा के जीये ले। जहाँ दारू

मिलि जा, परल रहेले। आजादी भइले पर ढोढ़ा बाबा परधान भइलें उनके नियाव सेर

डेढ़ सेर चाउर-पिसान पर विकाए वाला रहल। उनके पाँच बेटा भइलें बड़का जने के

पढ़ावल चहलें त ऊ कहले-'हम भीख माँग के खाइबि, बाकी पढ़े नाहीं जाइबि।' ऊ आपन

वचन निवहले पढ़े नाहीं गइले त नहिए गइलें। जेवान होखे लगले बियाह कइसे होखे?

एक बहिन के बदला देके बिहार के एक घर में बियाह भइल। उनहू के पाँच बेटा भइलें |

पढ़ाई के नाँव पर बाप के धरम निवहले ओमें एक जने बिजली मिस्त्री होके काम चलावेले ।

दुसरका सबसे सुनर सोगहग रहल दिल्ली कमाए गइल। सालभर बादि लवटत रहे त कवनो

ठग कुछ खिया के रुपया पइसा कपड़ा लत्ता ले लिहलें । तबे से दस बारे बरिस हो

गइल, पगलइले बा । तिसरका बंबई जा के कबो कुछ कमाला, कबो कहीं जा के चउथका

आ पंचवा मजूरी क के जीएलें खालें। खेत रेहन परल बा । परधान के एक लइका बउराह

रहल। मरि गइल। दुसरका आ तिसरका कलकत्ता के राहि धइलें। चटकल में खटि के

एक जने कुछ कमडलें । दुसरकी बहिन की बदले उनके विवाह भइल। उनसे छोट के केहू

कइसे पूछे। ऊ बैंगलादेस से उजरल एगो मेहरारू कीनि ले अइलें । ऊ गाँव में रहि के खेती

करावे ले। बाल बच्चा नइखे मिसिरजी कलकत्ते में कुछ करेलें। साल में एक बेर चइत

में आवेलें हजार रुपया सोखड़ती में खरच क के लवटे लें। ओह लोग के एक पटिदार

पंडिता पवृत रहलें परथमा ले नाहीं पहुँचलें। संकलप कराके सीधा बिटोरे लगलें। बियाहे

बिना नाहीं खे पाइल त कलकत्ता जाके एगो बँगला देस वाली मेहरारू कीनि ले अइलें  ऊ आइलि त ओकरे साथ एगो बेटा रहे। कुछ दिन ले कहाइल कि ओकरी बहिन के बेटा ह। बादि में खुलल कि ओही के है। पंडीजी के मेहरियो मिलल, लइकवो मिलल ऊ बारे तेरह बरिस के भइल त बिहार के कवनो अइसने बाभन अपनी बेटी से ओकर बियाह क दिहलसि । ओकरा दू गो लड़का-लड़कनी भइल। अब ऊ पगला के घूमत बा। कहेला कि पंडितवा हमरी मउगी के रखले बा । अब सुनाता कि अजोध्या में कवनो महंथ के चेला हो गइल बा । ऊहो आगे महंथ हो जाई एक जने मिसिर के पाँच बेटा बड़का जने के बियाह भइल । एगो बेटा भइल। ओकरे बाद ऊ नपत्ता हो गइले कबो-कबो सुनाला कि जियत बाटें। उनसे छोट कचहरी धइलें। बियाह ना होखे वाला रहल ना भइल। भउजी से दू बेटा । तिसरका चउथका कि पंचवाँ के, के पूछे। भागि के कोइलरी पहुँचले एक जने का जने का भइलें गाँव में आके कहले कि जे बीस हजार रुपया जमा करो ओके कोइलरी में नोकरी लगा देबि । आठ दस जने खेत बेचि बेचि जमा कइलें सबके रुपया ले के ऊ कोइलरी गइलें। ओकरे बादि नपत्ता । छव बरिस बादि उपरइलें विसबिस हजार जमा करे वाला लोग इहाँ से कोइलरी ले धावत धावत कुछ असूल कइलें कुछ हारि- पाछि के बइठ गइलें। लोग कहेला कि ओहू में एक दू जने के बियाह बँगला देसिए भइल बा। लोग बतावेला कि पाँचो भाई के नाँव से एतना सरकारी करजा बा कि भराय त रोंआ- आ बिका जाय। बाकी ऊ मानेले कि सरकारी करजा बैकूफ लोग भरेलें । ग्रामदेवता वाला ढबरु मास्टर ओही खानदान के बेथाह रुपया बँक में। एक्के गो बेटी रहल। रुपया खरच न होखे, एसे अइसन बियाह कइलें, जवन न चले लाएक रहल न चलल लइकनी भाई- बाप की करेजा पर बुढ़ाति बा। उनके एक भाई बंगलादेस वाली के पंडिते जी हउवें। एक जने के कहो नाही मिललि। छोटका जने मास्टर हो गइलें उनके बाल बच्चा भइलें कसया में रहेलें। जबले गाँव में रहलें, तबले झोला छाप डकटरी करें। सूई सब के लगावें। अपनहू दवाई खात रहें। अब सुनात बा कि कवनो एइसन बेमारी भइल बा कि बड़को डाकडर लोग नइखे बुझि पावत। एक जने ई मानत रहलें कि जवान ओही के कहल जा सकेला, जे गाँव जवार के कवनो जवान लइकनी के न छोड़े। जवानी बितले पर जटाजूट बढ़ा के रेलगाड़िए के घर दुआर बना लिहले बाड़ें। शाहपुर कुरमौटा के बाभन लोग के कथा-कहानी हमरा उपन्यास आ सैकड़न कहनियन में भरल परल बा।

कुरमौटा में पहिलका परधान 'बाबू' कहात रहलें। उनके बाप से साठि बिगहा खेत रहल। गरज परले पर रेहन लिखि दें। सरकार एगो कानून बनवलसि कि रेहन लेबे वाला तीन साल ले खेत जोति ले त असल मालिक मोकदमा करें कि तीन साल में करजा पटि गइल, त खेत उनके वापस मिलि जा। बस जेतना खेत रेहन रहल सब पटान के मोकदमा कायम क के छोड़ा लें। एक्के बेटा। बचपने से उनके मोटाए खातिर शराब आ कलिया खियावल गइल । उनके देहि फउसत गइल। शराब आ गोस मछरी के चस्का में गाँव के मनबढ़ा दिन रात साधे रहे लगलें। हर बार परधान ऊहे होखें। जब जनता सरकार बनल आ छोटकी कहाए वाली जातिन के नौजवान जगलें, तब ऊ हटलें। बुढ़ापा में आन्हर भइलें आ दुर्गति भोगि के मुवलें । छव बेटा एक जने ससुरारी में नेवासा पा के ओही जा रहत बाड़ें। बाकी सब बाप के राहि धइले चलि रहल बा । पटिदारी में पढ़ल लिखल सहते नाहीं रहल। नवकी पीढ़ी के लइका पढ़े लगले सँ। हाई इस्कूल से आगे गइल नाहीं सँपरल गरग बंस के नाव पर बियहवा दहेज ले के होत रहेला एक्का-दुक्का जवन लड़का गाँव छोड़ि के बहरा निकड़ि गइलें कुछ पढ़-लिखि लिहलें । जे गाँव में रहि गइल ओकर जोगाड़ कसया कचहरी में लागल | शाहपुर कुरमौटा मिला के बीसन जने कचहरी में मुंसोगिरी करेलें। कुछ लोग कचहरी के दलाली करे ले। कुछ लोग नेता नेतुल्ली के पीछे-पीछे घूमि के जीयत खात वा । कुछ लोग ठिकदारन के आगे-पाछे झूलत बा। पढ़िलिखि के पैंट पैजामा पहिरल सीखि लिहले के बाद खेती कइले में लाज लागत बा। दिन भरि कसया, पड़रौना में अकासविरतिए के भरोसा बा।

दूनो गाँवे जवन छोट जतिहा कुली मजूर बनि के कलकत्ता, बंबई निकड़ि गइलें ओकर कारवार ठिका गइल। कुरमौटा में मंगल अहिर रहलें। उनके नमस्ते क दिहनीं त बड़ा पछतइलें। हमके समुझावे लगलें कि उनके नमस्ते कइले में पाप लागी । उनहू के आ हमहू के। हम पुछनीं काहें पाप लागी बाबा? ऊ कहले 'रवाँ बराभन हई आ रउरी लग्गे विद्या के तिसरकी आँखि बा हमहीं रउवा के परनाम करब।' उनके पाँच छव बेटा। सब बंबई जाके कमाइल लोग। ओह लोगन के लइको ओही जा काम-काज कइलें से एक दू घर के लोग कलकत्ता के चटकल में काम के के घर दुआर के हालत सुधारि लीहल । अब जूटमिल (चटकल) वत्र भइले से कुछ लोग लवटि के गाँवे आ गइल । कोइलरी में जे जे गइल ओहू के घर के दसा सुधरि गइल । दूनो गाँव में मजूरी करे वालन के बढ़ती होत गइल । बभनई करेवालन के हालि बेहाल होत चलि गइल तब्बो ई हालि बा कि केतनो दलिद्दर हो जासु, बाभन के लड़का हवे, त झुठहीं सही, सान देखइबे करिहें। कुरमौटा के एगो हरिजन जूनियर इंजिनियर हो गइल। जब पहिले बेर मोटरसाइकिल से गाँवे आइल त कुछ जने बाभन मिलि के पिटाई के दिहल लोग अब कई जने ओकरे पाछे घूमेलें । अब ऊ गाँव में कम्मे आवेला कुरमौटा में एक घर बसफोर डोम बा। भभूती डोम जबले जीयत रहलें, केहू से नाहीं दवें। कई गाँव में उनके जिमिदारी रहल। जिमिदारी माने जवने गाँव में सूप दउरी बना के दिहले के अधिकार रहल, साँझ के फेरी लगवले के अधिकार रहल, बियाह में डाल देवे के अधिकार रहल, मुअले पर घाटे पर ले आगि ले जाए के अधिकार रहल, ऊ सब उनके जिमिदारी कहा। आन जिमिदारी के गाँव दुसरे गाँव के डोम के हाथे रेहन ध दें। जब ले रेहन लेवे वाला के कर्जा लौटा नाहीं दें, तबले ओह गाँव में ऊहे फेरी लगावे, सूप दउरी दे डाल दे, आणि दे। हमन के लड़का रहनीं त कई बेर भभूती कहें 'आप सब हमरी जिमिदारी में बसल बानीं। उनके बेटा, नाती सब बा न तब केहू पढ़ले लिखले के विषय में सोचल, न अब सोचत बा। बाँस के काम कइल आ सूअर चरावल ईहे काम बा। अब्बो केहू न ओह लोगन के छूवेला, न ऊ लोग केहू के छूवेला । दिन भरि में जवन कमाला लोग, साँझिके शराब में गड़प एतना दिन हो गइल देश के अजाद भइले, एतना बतफरोसी भइल गरीबी रेखा से निच्चे रहेवालन के उप्पर उठावे के, बाकि डोम परिवार जहाँ के तहाँ बनल रहल, जस के तस शाहपुर में एक घर मेहतर रहल। अब दू-तीनि घर भइल बा। कुसीनगर में बर्मी बुद्ध मंदिर में काम कइले स, आ अब त इंटर कालेज, डिग्री कालेज में सफाई करमचारी बनले से एह लोग के दसा कुछु सुधरल बा। शराब एहू लोगन के सब कमाई घोपोंछि के बहा देला शाहपुर के भग्गू चमार चौकीदार रहलें उनके बेटा पराइमरी स्कूल के मास्टर भइलें । साँझ के देसी दारू के आदति रहल। मेहरारू के लइकनी होखे से दुसरका वियाह कइलें। ओसे बेटा भइल। बाप के देखा-देखी पढ़ले में मन त नाहीं लागल, बाकिर बाप के देखा-देखी दारू के चसका लागि गइल। जेवान हो गइल बा। बिआह त लइका रहे, तब्बे भ गइल। अब ओहू के लइका बाड़े से ओकर एक्के काम है, दिन भरि साँझ के दारू खातिर पइसा जुटावल घर के अनाज डेहरी के डेहरी बेचि के पी जाला, घर वालन के तब पता लागेला, जब उप्पर से पेहान खोलले पर डेहरी खाली मिलेला मास्टर रिटायर हो गइलें। पिंसिन पावेलें, ओहू में से मारि-पोटि के कुछ छोरि लेला, बेटा के सुख एह तरे भोगत बाड़े। चमटोली के लइका प्राइमरी स्कूल में पढ़े जालें, अनाज ले आवे खातिर । जब सोहनी- रोपनी के कार लागेला, त मजूरी करेलें पूरा चमटोली में एगो लइका बीएससी एजी पास कइले बा गाँव में हरिजन घर ढेर भइले के नाते परधान के सीट हरिजन खातिर सुरक्षित हो गइल बा । दू बेर से एक जने हरिजन परधान बाड़ें कसेया में दर्जी के कार करेलें। राति के टुन होके आवेलें खा-पी के सुति रहेलें। बिहान के उठेलें खा-पी के सियाई करे चालि जालें । कहे के पढ़ले बाड़े बाकिर कागतपत्तर एक जने कचहरी के मुंसी देखेलें। ऊ उपपरधान हवें । हरिजन बहुल गाँव भइले से अउर गाँवन के मुकबले शाहपुर के लगभग चारिगुत्रा सरकारी धन मिलेला ऊ कहाँ खरच होला, गाँव में केहू नाहीं जानेला, न जानल-पूछल चाहेला सरकारी जोजना के जेतना लतियावल जा सकेला, एह गाँव में लतियावल जाला। कई बेर कोसिस कइल गइल कि कुछ होखे। हरिजन परधान से पहिले सरल खाँव परधान रहलें । स्कूटर मरमति के मित्री रहलें। परधान भइलें कुछ कइल चाहें। राय दीहल गइल कि गाँव में शौचालय बनावे खातिर सरकारी सहायता बहुत मिलत बा। एक घर से तीन सौ रुपया जमा होखे त अठारह सौ रुपया सरकार से मिली। फ्लश पैखाना बनि जाई। दू तीन जने के छोड़ि के केहू तइयार नाहीं भइल बाभनो लोग के समुझावल गइल कि तीन सौ रुपया खर्च कइले पर बेटी पतोही खेत में बइठले से बचि जइहें । केहू का नाहीं सुनाइल परसाल गोबर गैस बनावे के काम शुरू करावल गइल । देखादेखी सात आठ घरे पनि गइल चालू आजु ले एक्को नाहीं भइल। सरकार से एक गोबर गैस पर तेइस सौ रुपया अनुदान मिलल सब लोग ले लोहल पता लगवावल गइल कि काहे चालू नइखे होत, त पता चलल कि जेकरा एगो बाँड़ि बकरियो नइखे ओहू किहाँ गोबर गैस प्लांट लग गइल बा। जबकि ओही घरे लागि सकेला, जहाँ चारि-पाँच चउवा गाई भैइसि बैल- कुछ होखें। एक साल हो गइल चालू काहे नाहीं भइल, एकर जबाब देवे वाला केहू अधिकारी कर्मचारी नइखे एही एक नमूना से जानि लेवे के चाहीं कि सरकारी रुपया आ सरकारी जोजना के कवन हालि गाँवन में हो रहल बा। प्राइमरी स्कूल बा ओमें अनाज बँटइले के दिने मास्टर लड़का लोग के देखल जा सकेला कवनो जापानी संस्था एगो स्कूल के भवन बनावे के एक लाख रुपया दिहलसि । पचास रुपया महिना पर पढ़ावे वाला एक जने मास्टर बनववलें । ओही साल से छत चूए लागल रोज सबेरे अँगरेजी माध्यम के स्कूलन के कई गो गाड़ी आवेलिन। नीला हाफपैंट उज्जर कमीज आ टाई बन्हले लइका अँगरेजी पढ़े जालें । कम से कम एक सौ रुपया महिना फीसि

राजनेति के ई हाल बा कि कुल्ही पाल्टी के दू चारि कारकर्ता मिलि जइहें। कचहरी आ कस्बा में दिन भरि खरचा पानी के जोगाड़ में घूमेवाला लोग चमटोली में बसपा, तेलीपट्टी में भाजपा, बभनपट्टी में जब जइसन लहि जा मियाँपट्टी में समाजवादी पार्टी। दू चारि जने कँगरेस के नाव पर माँगे खाए वाला हरदम मिलि जइहें कुछु जने एइसन हवें कि जवने पार्टी के जलूस आवेला ओही की साथे घूमि घूमि के नारा लगावे लागेलें । वरई पट्टी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कुछ नवहा मिलि जइहें। बरई पट्टी के एक जने आजादी अइले से पहिले बंबई जाके गोदी में कुल्ली हो गइलें। बाद में अपने जेठ का बेटा के साथ लगवा दिहलें। उनके एक बेटा गाँव में रहि के खेती करे लागल। उनका आठ- दस लड़का-लड़कनी भइलें ओही लोगन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक बनवलें मजेदार बात ई बा कि ओही लोगन में कुछ जने शिवसेना के सदस्य हो गइल. बाड़े। ओह लोगन के ई मालूमे नइखे कि बंबई में शिवसेना बनल रहे, ओही लोगन के बाप-दादा के बंबई से भगावे खातिर अब सेना वाला लोग लठिधर के पदवी पावत जात बाड़ें। शिवसेना से लोग ओसही डेराए लागल बा, जइसे स्वयंसेवक लोग से। कवनो पार्टी के केहू स्थाई मेम्बर नइखे जब जहाँ सुतार लागे, कुछ असूलि ले लें।

जोलहा धुनिया, दूतीन घर शेख पठान राजनेति में जाहिर नाहीं होलें। महजिद में जवन बता दीहल जाव कहे करेलें बगल में पिपरहिया गाँव में अरब जाए के बीसा पासपोर्ट के कई जने ठिकदार हो गइल बानें अरबी मदरसा चलेला। कई जने अरब आवत जात रहेलें। शाहपुर आ कुरमौटा गाँव से पाँच सात लोग अरब में बा एक जने कर्जा लेके चालीस हजार में अरब गइलें हवाई अड्डा पर जाँच में पता चलल कि बीसा पासपोर्ट फरजी बा ओइजा से लवटा दिहल गइलें। ऊ दलाल खोजलहू से नाहीं मिलल दोबारा कर्जा काढ़ि के सही दलाल के घइलें तब पहुँचि पवलें खजूर तुरले के, बकरी चरवले के काम मिलल । बाद में मिस्त्री के मिलल अब ठीक ठाक कमात बाड़ें। एक जने प्राइमरी स्कूल के मास्टर रहलें । पहिले पैदल चलें, फेर साइकिल पर चढ़ें। जब से मुट्ठी भरि दाढ़ी रखले, घन बढ़े लागल। अब मोटर साइकिल पर चढ़लें। गाँव के बहरा कोठा बनवा लिहले बानें शाहपुर कुरमौटा में आजु ले कब्बो जाति धरम के लेके कवनो झगरा बवाल नाहीं भइल बा। हम लइका रहनीं त मियाइन सेनुर लगावें, चइत में नवमी पूजें, सावन में काली माई की थाने पनढरका करें। ताजिया धरा त मुसलमान से जियादा हिन्दू लोग गदका, फरी खेलें आ झारी गावें । तजिया पहनाम होखे चले तहसनहुसेन के पायक हिन्दू-मुसलमान सब बने। कई हिन्दू मेहरारू रोजा भाखें। जब मनौती पूरन होखे त रोजा रहें । तजिया भिनसहरे चौक पर से उठे त हिन्दू लोग में कई जने के दुआर पर धइल जाव। ओकर पूजा सरबत, सीधा आ रुपया चढ़ा के होखे हमरी दुआर पर अब्बो साढ़े तीन बजे भिनसहरा तजिया आवेला| एहर महजिद में कुछ रुपया बाहर से आवे लगल बा पुरनकी के अब नया जनम हो गइल बा। अब अजान खातिर लाउडस्पीकर आ गइल बा। एक जने अजान देवे वाला मौलवी रहेलें । हिन्दू लोग काली माई, बरम बाबा आ हर इनार पर दू चार गो पत्थल के शिवजी पूजेला कब्बो केहू के धरम करम केहू के रहता में नाहीं आवेला ।

पुरनका जमाना में जाड़ा के दिन में कउड़ा तापत आ गरमी में कालीथान, बरमथाने जुटि के बतकुच्चनि होखे ओमें उजियार सेख के पंडिताई के चरचा कई बेर होखे भइल ई कि एक जने के बियाह हेतिमपुर में बरियार बाभन किहाँ लागल। बरात में केहू पढ़ल लिखल नाहीं रहे। डेराइल लोग कि बेटिहा ओर से बड़े-बड़े पंडित बाड़ें। शाहपुर में सब के सब कठबाभन, संस्कृत का, कवनो भाषा के ककहरो से भेंट नाहीं उजियार सेख एक जिमिदार के हथुवान रहलें। उनके उज्जर दाढ़ी लमहीं से फहरात रहे । ऊ हाथी पर बइठ के रोजे बभनन के दुआरपूजा करावें। जब बेटहा लोग पंडित के लेके सोच में परि गइलें त उजियार चच्चा कहलें, दुआर पूजा हम सम्हारि लेइबि, बाकी ओकरी बाद हमके मति खोजिहऽ जा । लोग मानि गइल । दुआरपूजा खातिर बरात चढ़ल त चाचा हाथी पर अपने चेला के बइठा दिहलें। मिर्जइ पंडितन वाली पहिरवे करें एगो बड़हन पगरी बान्हि लिहलें । दुआरपूजा होखे लागल। ओहर कई जने पंडित लोग रहल जब मंतर इसलोक खतम होखे लागल त उजियार चचा डपटि के बोललें 'असुद्धम् किम वक्तव्यम्?' इनके भेस देखि के आ डपटल सुनि के बेटिहा कोर के पंडित लोग घबड़ा गइल। तबले दुलहा उठि परलें । बेटिहा लोग चिहा गइल, बरात में बड़का भारी पंडित आइल बा । ओहर चच्चा हाथी ले के गाँवे लवटि गइलें । दुसरका दिन शिष्टाचार सभा में बेटिहा लोग अदकले रहल। काल्हि वाला पंडित जी के नाहीं देखि के पूछल लोग त जबाब मिलल कि उहाँ का एक जगह रहे के फुर्सत कहाँ बा? एही तरे कबो पराहू काका के बल के बखान होखे कि कइसे जेठ की महिना में सरेहे में फुदगुद्दी चिरई के उड़ावत- उड़ावत थका के पकड़ लिहलें । अन्हरिया राति में एह गाँव के बरम बाबा आ ओह गाँव के बरम बाबा में चिक्का कबड्डी के आँखी देखल हालि केहू सुनावे। केहू ई बतावे कि कइसे बन्हू पांड़े मेहरारू बनि के ढोढ़ा तेली से बियाह कइलें आ सुहागराति शुरू भइले कि पहिलहीं उनके घरभरि के गहना गुरिया ले के बहरा जाए के बदले भागि गइलें साल में कई बेर आल्हा गावे वाला नेटुअवा लोग आवें । केहू कि दुआरे पर राति भरि आल्हा जमके। साल में कई बेर बिदेसिया के नाच आवे दू राति कई-कई गाँव के नचदेखवा जुटें।

अब ई सब सपना के संपति हो गइल बा। अब डेढ सौ घर के गाँव में पनरह बीस घरे टीवी लागल बा। विजुली राति के एगारह बजे आवेला । कई घरे टीवी देखे खातिर बैटरी किना गइल बा । बिजुली अइले पर शाहपुर कुरमौटा के टीवी देखे वाला रेखियाउठान जेवान में अपने गाँव के तार जोरले आ आन गाँव के तार ट्रान्सफार्मर से कटले के होड़ लागेला । अब दूनू गाँव के ट्रान्सफार्मर अलगे-अलगे लागि गइल बा । नवका झंझटि फोन से होला। दस पनरह घरे फोन लागल बा । कलकत्ता बंबई कमाए वाला लोग घर से बतियावल करेलें। अब एगो पीसीओ गँउवे में खुलि गइल बा । दूनू गाँव के फोन एक्के खम्हा से जुटल बा। जब केहू के खराब होला त खम्भा पर चढ़ि के आपन तार जोरि लेला, दुसरका के खोलि देला झगरा के बचावे! फोन के लाइन मैन दूनू पाल्टी से असूल- तसील करत रहेलें। पहिले जब हमरिए घरे फोन रहल त कलकत्ता बंबई कमाए वालन के फोन आवे। राति विराति कब्बो घंटी बजे उठावल जा, ओहर से आवें- 'पाँव लागों हम फलाने बोलत बानीं बंबई से तनि हमरी मलिकइनिया के बोलवा देई' बोलावल जाव। मलिकाइन लोग आवे। कई बेरि फोनवे पर गारी पानी, रोवल गावल सब होखे लागे। समुझावे के परे कि तोहरी रोवले में ओहर सैकड़न रुपया खरच हो जाई । एक दिन एगो मेहरारू के फोन आइल। ओकर मरद बंबई से कइले रहल बातचीत होखे लागल गारी- पानी कुछ भइल। मउगी एहर से कहलसि 'तहरी माई के भतार खोजे गइल रहनीं।' जब बतिया के घरे जाए लागल त पुछाइल कि काहें अपने मरद से एइसन बाति कहले ह। हँस के कहलसि, 'मलेछवा पूछत रहल कि परसों कहाँ गइल रहले? अब हम का कहीं ?" कहि के हँसत चलि गइलि एक परिवार के लोग बंबई में बढ़ईगिरी करेलें एगो टेप रिकार्डर घरे दिहले बा लोगे। ऊ रातिदिन चालू रहेला तब्बे बन्द होला, जब बिजली चलि जाला । बिजली रहले पर रातिदिन बिहार वाला कैसेट बाजत रहेला गाना जियादे 'चुम्मा दिहले जइहs' वाला एहर एगो नवका गाना आइल वा जवने में पार्वती जी शंकर जी से कहेली- 'ए गणेश के पापा, अब हम तहरा के भाँगि नाहीं पीसवि' रोज नाहीं त दुसरे तिसरे आपस में चंदा लगा के कसया से विडियो आवेला राति राति भरि सिनेमा देखल जाला। कुछ लोग त कहेलें कि कई राति अइसन फिलिम देखल देखावल जाला जवने में नंगा मरद मेहरारू के कुलि खेला होला। फगुवा के दिने दस बारह बकरी खसी, तीस-चालिस मुरगा- मुरगी आ सौ डेढ़ सौ बोतल दारू खरच हो जाला। एह में बभनन के हिस्सा केहू से कम नाहीं होला । फगुवा गावे वाला खोजले नाहीं मिलेलें । दूतीनि जने अधबुढ़ ढोल झालि लेके 'सदा अनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी हो' गावत गाँव में एक फेरा घूमि लेला लोग। जेवान लोग टुन होके ढिमलाइल रहेलें। आपन सब जजात बेचि के पियले के बाद सिपाही दुआरे दुआरे नाचत रहेलें। एक टू चुक्कड़ पा जालें त नाच में तेजी आ जाला । केहू चढ़ा देला त कबीर गावे लागेलें ।

एकदम नवका लइकन के रहन-सहन के बानगी दू घटना से ले लीं एगो गोंड़ के लइका चउदे पनरे बरिस के होई। नौ दरजा में पढ़ेला एगो कमकर के लड़की के बियाह तय भइल। ऊ कहे कि बियाह एसे हम करबि । केहू के समुझावल नाहीं मानल। लड़की के बराति आइल त कोठा पर चढ़के ओकरी अँगना में कूदे जात रहे कि हम माड़ों में से ओके लेके भागबि एकदम फिलिम वाला मामला जब गाँव भरि के लोग लाठी लेके तइयार भइल तब बियाह होखे पावल दुसरका करवाई। गाँव की एक लइकनी के ससुर नोकरी से रिटायर भइलें त एक डेढ़ लाख रुपया पवलें ओकरी एगो बहिन के बेटा मौसी किहाँ बहुत आवे जाए लागल । लोग बूझल कि मौसी के मोह छोह में आवत बा। एक दिन अपने मौसियाउत भाई के शहर से ई कहि के लिया आइल कि तहार माई बेमार बाड़ी। तहके बोलवली है। एहर ई गोरखपुर से एक ठो चिक्क बोलवले रहल। ओकरी साथै मिलि के अपने मौसियाउत भाई के बोटी बोटी काटि के खेते में गाड़ि दिहलसि । महिना भरि बादि अपने मौसा के कहिलसि कि तहरे बेटा के अपहरन भइल बा डेढ़ लाख रुपेया हम के देब उनके बोला देखि मौसा तइयार हो गइलें। ऊ कहलसि कि फलाने बजार में परसों रुपेया लेके अइहs | तहार बेटा मिलि जाई मौसा चुप्पे जा के थाना पर बता दिहलें। सादा कपड़ा में पुलिस फरके-फरके घूमत रहे लइका के लपत्ता भइले के रपट लिखइले रहल। बजारे में जब ऊ लइका मौसा से रुपया लेबे आइल, त पुलिस ओके पकड़ लिहलसि । थाना में ले जा के पुछाइल तब कबूल कइलसि कि ओके त मुवा दिहल गइल बा। सिपाहिन के ले जाके ऊ जगहि देखवलसि । खोनि के देखाइल, सरल गलल हाड़-मासु मिलल ऊ लइका जेल में बा। बंबइया फिलिम ए तरे लइकन के कपारे पर चढ़ि गइल बा । रुपया चाहीं; जइसे मिले। न भगवान के डर बा, न कानून के।

हमरे गाँव में हर घर में एगो बड़हन कहानी छिपल बा। हम गउवे के लिखि रहल

वार्नी, बाकिर अवहिन बहुत कुछ छूटि गइल बा। गाँवे के लोग सोझबक कहेलें, बाकिर

अब हालि ई बा कि जेतने गाँव के लोग के समुझले के कोसिस करों, ओतने ऊ आगे

चढ़ि जात बाड़ें। ग्रामदेवता में जवने लड़का 'हरखनरायन' के रूप में गढ़नी, ऊ अब कचहरी

में वकालत कम, दलाली जियादे करेला 'विकल्प' उपन्यास में गाँव में इमर्जेन्सी आ विकास

के कथा बनवले बानीं । जवन चारि जवानन के गाँव में बदलाव खातिर आगे बढ़वनों, असल

में ओह में से तीनि गो कचहरी में नकली स्टांप के धंधा करे लगले से एगो कैन्सर से

मारि गइल। जबले जीयल गाँव के आफति बनल रहल। दू गो छापा में पकड़ा गइलें हैं।

कुछ दिन जेहल में रहि के अब मुँह पिटावत बाड़ें से गाँव में चारू ओर दोकानि खुलि

गइल बाड़ी चाट-पकौड़ी समोसा वाली दोकानि। एगो पेड़ा बनावे वाली दोकानि। दिन

भरि कई ठेला कसया से खाए पीए वाला चीजु ले आवलें आ नाजसे भरि के लौटेलें ।

चमटोली में दारू कई घरे विकाला। कबो कबो पुलिस वाला दू चारि जने के पकड़ के

ले जालें । दू चारि दिन हवालात में राखि के, सौ दू सौ असूलि के छोड़ि देलें। तेली टोला

में कई जने साइकिलि पर कपड़ा के गठरी लादि के गाँव-गाँव घूमि के बेचेलें ओमें एक

जने एतना मेहनती आ भगिमान बाड़ें कि अँसवे छव लाख के खेत एक जने नेवसहा बाभन

से बैना करवले ह। चमटोली में कई मेहरारू स्वरोजगार जोजना में रुपेया लेके बिसाती

के सामान गाँव-गाँव घूमि के बेचेली ओह में सबसे जियादा कमाए वाली जवन हई ऊ

फैसन के समान लेके घर-घर बेचेली। एक दिन हमरही दुआर पर ऊ अपनी बिरादरी की

एगो लइकनी के हाथ 'फेयर एंड लवली' क्रीम बेचत रहली। ऊ तीस रुपया मँगली ।

लइकनियाँ कुछ मोल भाव कइल चहलसि । ऊ कहली अच्छा ले आवs तो के पाँच रुपेया

छोड़ि देत बानीं टीवी में देखेले न, ऊहे लगवले से हिरोइन एइसन सुन्नर भइल जाला।

जब ऊ बेचि के चलि गइली त लड़कनिया के हाथे से क्रीम ले के एक जने हम के देखवलें ।

तनीएसा निकालि के देखे के कहलें। हम अँगुरी पर लेके देखनीं । ऊ क्रीम पीयर त रहे,

बाकिर असल नाहीं रहे। बुझात रहे कि चुत्रा चाहे खड़िया खूब मेही पौसि के पीयर रंग

मिलावल बा आ कवनो सस्ता महकउवा सेंट मिला दीहल बा। हम ओकर कागज देखन

आ ट्यूब पर लिखल पढ़नी त असली फेयर एंड लवली वाली सब बाति ओही लिखावट

में ओही लेखा ओही रंग में, ओही फोटो के साथे छापल रहल। ओह लइकनी के हाथे

में क्रीम लौटा के उनके देखनी ने हम से देखे के कहले रहलें । लइकनिया चलि गइलि त बतवलें कि गोरखपुर में पांडे हाता में कई ठो एइसन दोकानि बाड़ी सँ जहाँ ई क्रीम चारि रुपेया में बिकाला। एक बेर हमहूँ एकरी साधे गइल रहनी, तब एकर भेद जानि पवनीं । एक दू सालि से मजूर लोग धान-गेहूँ के कटिया देवरी आसानी से नइखे करत । आन गाँव के एक जने पंडीजी आपन दू बिगहा खेत बैनामा क के बारह लाख में कंबाइन मसीन ले आइल बाड़ें। अब कटिया ओही से होत बा ऊ मसीन खेतवे में गेहूँ काटि के बोरा में भरि देतिया आ भूसा उड़ा देति बा केहू बैल राखते नइखे कि भूसा के जरूरत परो । एह साल धनवो ओही से कटाइल है। धान के गाँठ एक बित्ता उप्पर से काटि के ऊ मसीन छोड़ि दे ले। ओके काटे खातिर एक जने ट्रेक्टर वाला एगो दूसर मसीन ले अइले हैं। ओ से डाँठ काटि के खेत जोतले के दाम रुपया कट्ठा असूल करत बाड़ें। कंबाइन मसीन वाला पंडीजी दिन भरि लुंगी बन्हले घूमत रहें। अब सफारी पहिरि के हीरोहोंडा पर बइठिके उड़ें। अब एह गाँव में फूस के छानि छप्पर नाहीं रहि गइल बा छोट-बड़ सब घर कोठा पिटा गइल बा । जवरा पर हजामत बनावे वाला, जवरा पर कपड़ा धोवे वाला, जवरा पर लोहा के कार करेवाला नगद लेके करेलें। ओह लोग के लइका शहर में कामकाज खोजत बाड़ें। खइले बिना केहू नइखे मरत, बाकिर झोला छाप डाक्डर लोग बोखार पेटगड़ी में हजार पाँच सौ असूलि लेत बाड़ें। नवका लोग दतुवन नइखें करत दतुवन फेंक के बुरुश पर पेप्सिडेंट लगाके रगरत बा। भागल जात वा गाँव, लवटि के पाछे नइखे ताकत। 

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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