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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023

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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।

 परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।। 

आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |

 पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।। 

इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह तरह से कब लिखले रहले हमार दादा (दयादी के दादा), जेके हमहन 'बाबा' कहीं आ सगरो गाँव हरिहर बाबा कहै। हरिहर उनकर नाँव रहल आ ना जानी काहें ऊ अपने के हरिहर त्रिपाठी न लिखि के पं. हरिहर प्रसाद शर्मा लिखें एही नाँव से छपल ओनकी किताब 'शिक्षा अक्षरावली' के सुरूए में ई चार पाँती के परिचय पढ़ि पढ़ि के लरिकाई में हम बहुत खुश होखीं। बकिन अब बड़ भइले पर जइसे बाबा के नाँव के घालमेल खटकेला, वइसे एह कवितौ क ढेरन घालमेल खटकैला। सबसे ढेर त ई कि नाँव बा गाँव के 'सम्मौपुर' आ बाबा ओके सुधारै संवारै में कइ दिहले 'शंभूपुर' भला पुस्तन से चलि आयल नउऔं कवनो सुधार के चीज होला.... बाकी बाबा के का! ऊ तौ अपनो नउँवा सुधार दिहले त गटए क काहे ना सुधरतें? हैं, ई बात अपनी जगह बा कि उनकर सुधारल एको नाँव ना मनलस गाँव-'सम्मौपुर' त एको जुबान में 'शंभूपुर' ना भयल आ हरिहर शर्मा त नहिंए भयल। ऊ हरिहर त्रिपाठी भी ना रह गयल हो गइल 'हरिहर बाबा' माने कि बनल नाँव, न बिगड़ल नाँव, बस हो गयल बाबा के बदलल नाँव ... इहै अहवाल आजु हमरे पूरे गाँव के बा... ई. बदलत बा... सायतन बनावै के कोसिस में... लेकिन बनत बा नाँय... सायतन वइसे बिगड़तौ बा नाय... बकिन एही बनै- बिगर के बीच में जइसन बदलत बा... वइसनी तस्वीर हमरा मन में आवति बा।

शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र । परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।। आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील | पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।

हमार गाँव नान्ह के बा- पहिले के घरन में तीनि घर ठाकुर तीनो जमींदार, तोनिए घर ब्राह्मण, पाँच घर कोइरी (मौर्य), तीनि घर कहाँर (गौड़), सात घर बरई (चौरसिया) •आ एक घर तेली अउर एकै घर धुनिया... बस! तेलो अकेलै रहलै पल्टू भइया... नावल्द हो गइल। ओनके एगो घरै भर रहल-न खेत, न बारी, न मेहरी लड़का... तबौ जब कमाय जाँय त घार-धार रोवैं... एही आ अइसने आँसुन में बसेला 'हमार गाँव' । कुलि बदलाव के बादौ ई ना बदलत बा... आ जब ले ई बा, तबले बनल रही 'हमार गाँव' पल्टू भइया के बड़ी सुन्नर मेहरारू रहलि... हम सुनली कि ओनसे राखत ना बनल । मारि के भगाइ दिहल ओके। एइसने गैंड्जर्रा हम देखले रहली पल्टू भइया के ऊखि चूसत जात के हम लड़िकन जो एक्कौ चेंफ थूक दौहल जाय उनके छोटे-से दुआरे पर, तौ सैकड़न गारी देंय, बकिन एइसे बीत गइलि उनकर आखिरी समय में वही बड़के ठाकुर के घरे रहलें औ ओनके मरले पर ठाकुर साहब ओनकर घरोही कब्जिआय के बेचि दिहलें। ताक में त रहल एगो दुसरको ठाकुर, जेकरे घरे के सटले रहलि ऊ घरोही, बकिन भयल उहै- "जेकर लाठी, ओकर भइँस... " ।

एक घर धुनिया अब दू घर भयल बा आ कऊ गो लड़िका फड़िका इहाँ से दुबई लेकमात बाटै एनके पुरखन के उहे ठाकुर के पूर्वज बसवले रहलें आ अजुऔ ओह घर के दबल सिकुड़ल हालत देखि के बसावल गयल इतिहास समझ में आवेला ठकुरन- बघनन के अलावा गाँव में सब लोग परजा होलें। त बसवले के बाद धुनिया भी परजा । लेकिन दुसरे धरम के ई करें का? त तय भयल कि पंचाइत होखे या गाँव के कवनो आयोजन होखे त सबके बुलावा देवे के काम इनकर याने परजा, लेकिन संस्कृति के लवछेवरौ में ना.....मरनी-करनी - बिआह जइसन काम परोजन के बुलावा त नाऊ-कहाँरे दीहैं। ई बकिन होली खेलेली उन्हन के साधे हमन। होलिका में पाती डालै ओकर लइका जाँय सबके साथे । बदलाव त ई कुलि बंदे कइ दिहलस एही तरे उनके मुहर्रम पर रोज ढोल- तासात हमने बजावल जाव। जब मुहर्रम के दाहा मियाँ सेरवावै बदे निकल आ रहमतिया चाची, रसीदन बकरीदन भइया, गफूर चाचा छाती पीट-पीट के रौवें त ना जानी काहें हमहूँ रोवै लगीं। गाँव के तमाम लइका त दाहामियाँ (ताजिया) के ओंइछले के करने जीयत रह, अइसन विस्वास उन्हन के मतारी बाप के रहल सायत हमहूँ ओइछायल हुई। सेरवावै जाये के पहिली रात दाहा मियाँ पूरे गाँव के परिक्रमा करें। हमन उठावल-ढोवल जाय। बड़ा मजा आवै सुकून मिलै आ बीच-बीच में खड़ा कड़के उनकर मौलवी कउनो किताब पढ़ें। हम बाभनौ के दुआरे ऊ पाठ होय। हमके एतने याद बा कि जब पढ़ते-पढ़त मौलवी साहब बोलें- 'मात मियाँ हुसैन', तब चलि पड़े के रहें । याने हिन्दू गाँव में एगो मुसलमान के साथ अइसन मेल रहल, ओकरे घरे या ओकर छुअल खइले के अलावा कउनो भेद ना रहल। बाकी जब मस्जिद गिरलि ह, तब के बाद न जनी काहें ताज़िया बंद हो गइलें, कउनो मौलवी बतउलैं कि ताजिया निकारब तोहार काम ना बा, शीया-सुत्री के कवनो भेद बताय दिहलें, लेकिन हमें अंदर से लगाला कि बात ई ना बा असलो अब ओकरे लइकन के मेल-जोल ओइसन ना लटकत गाँव के लइकन के साथे, जइसन पहिले रहल। वइसे रोज साँझी के कबड्डी वगैरह के लइकन के खेल, पचंइयाँ (नाग पंचमी) के खेल- कुस्ती कुलि बंद हो गयल बा... त मेल जोल के अवसरो ना रहि गयल। अब त होलिका भी बसंतपंचमी के ना गड़तै... होली नकचइले पर शिवराति वगैरह के गाड़ि के बस जलाय दिहल जाला। ऊ हुड़दंग मस्ती ना होति । चिल्ला-चिल्ला के भटजी लोगन के 'कबीर' ना बोलात खिचड़ी (मकर संक्रांति) के हापुड़ (हॉकी के गवई रूप) ना खेलाति, दिन-दिन भर याने लइकन के मेल-जोल कुलि आसंग बंद हो गइलें एक-एक कइके बकिन तबौ रसीदन बकरीदन भइया के लइकन के एस कटाव अलगै आ अजब बा- अब ओन्हन के निकार बगल के गाँव बड़ेपुर इसहाकपुर की तरफ हो गइल बा, जवन मुस्लिम गाँव बाटें। गजब इहौ वा कि एह बदलाव के खबर भी हमरे गाँव के ना बा...।

ई अकेल- अकेल घरन के अलावा बाकी सबन में बढ़ोत्तरी भइल बा। तीन घर कहाँर

अब छह घर भयल बाटै जबकि नौ घर हो सकत रहलें, लेकिन सम्मिलित परिवार के बिस्वास अबहिंन एकदम खतम ना भयल बा। ठाकुर लोग तीन के चार हो गइलें। हमरे होस से बहुत पहिले, जबकि हमरी पीढ़ी में एक ठाकुर के सात भाई साधे रहत बाटें, नाहीं तौ ग्यारह घर हो जाते। हम बभनन में औसतन बढ़ोत्तरी ज्यादै भइल बा छह घर, एसे ज्यादा अबहिंन हो ना सकतें ओहू में हम त चार भाइन में अकेले भइली याने कुलि बढ़त सिर्फ दुइए घर के बा। कोइरी पाँच से तेरह आ बरई सात से सतरह होके रेकॉर्ड बनवले बाटै... लेकिन यह माँ घर कम बढ़ल हउएँ, चूल्ह ज्यादा बढ़ल हुई। हर जाति के खान- पान पहिले एकै रहेकाजे परोजने लगबै ना करे कि ई घर चूल्ह अलग बार्टी कोइरी- बरई में ई खान-पान बँटत बदलत रहे कब केहू तीन-चार के भात-भोज एक में त कर्बो दुसरे तीन-चार के । बिरादरी बाहर भी होखें। पंचायत जुटै बिरादरी के गलत बात - व्यवहार वाले के डाँड़ (जुर्माना) लागो । ऊ भरै भी आ फेरो बिरादरी में आ जाय। पंचाइत कहाँर लोगन के बड़ी मजबूत आ व्यवस्थित रहे। रिखई काका पंचाइत में पदाधिकारी रहें-बड़ चिटकन हमैं ऊ तनिको अच्छा ना लगें बकिन एक दिन जब राति के कवनो गँवई जमावड़ा में ऊ एगो गीत गवल "प्यार करे ऊ जेकरी जेब में माल बारे बलमू... ऊ का करि परेम जे कंगाल बारे बलमू..." त हम ओनपर लोभाय गइलीं। बाद में जनलों कि पद पंचायत के साथ ऊ गाव के कला सिखले रहलें। फिर त धीरे-धीरे ओनके भित्तर के मनई बहुतै देखायल आ हमैं बड़ सरघा भइल ओनपर। बस, रिखई काका के ना चलै त सुराजी काकी पर... काकी लड़ै में एइसन पास कि सबके पस्त कर देय जोड़ी में मिलें पट्टीदारिन परकल्ली भौजी, एही से सुराजी काकी के झगड़ा होखे ई जोड़ी मशहूर रहलि गाँव में। लेकिन परकल्ली का खाय के पार पठतीं सुराजी से...? रिखई काका के मरले के बाद सुराजी के लकवा मार गयल। तबै ऊ पाधुर भइलीं। पतोह बेटवन के अधीन जब चुपचाप बइल रहें अपने दुआरे त बहुतै दयनीय लगें। ऊ मरि गइलीं आ परकल्ली अपने लायक बेटवना के साथे दिल्ली रहैलीं- करिहाँव-गोड़े से लाचार, बाकी अपने स्तर में राजै भोगति बार्टी। 

त कराने के भात भोज बड़ा कठोर रहै आ हरदम तीनो घर के साधे रहै। ठाकुर लोगन में एकदम बंद रहे। सिर्फ बड़के ठाकुर, जे दू घर हो गइलैं, साधे रहें। बाकी दूनो में एक के कथा बड़ी अजीब वा। बड़का भाई सूर (दास) रहलें सूरे काका पूरे तौहद पर रुतबा... हर बात पर नजर बहुत प्रतिष्ठित। उनके मरला पर गाँव के कच्चा-बच्चा तक माटी अगोरलस, पहुँचवलस, पोखरा में सैकड़न मूँड़ साथ नहइलन... एइसन विदाई केहू के मिलत अपने गाँव में हम ना देखली...हम्मै त ऊ 'भवरवा गोल' (उभरत उमिर के लइकन के समूह) के 'इंजीयर' कहैं- बिना देखले, खाली सुनि के

एह चौहद्दी में खाली मनइयै ना रहतै, देवता- दानी, भूत-परेत भी रहे... रउआ के गाँवे के ओनहूं सबसे मिलाइब बहुत जरूरी बा....

हमार गाँव नान्हमुट के भले होखो, एकर प्रतीक बहुत बड़ बा- 'डीह बाबा' ... एगो बहुत बड़ पीपर के पेड़ एकदम गोल छतनार एतना ऊँच कि आठ-दस किलोमीटर लामे से भी देखाला- "मोरे डीह बाबा के रूप बड़ा आला पिया, दूर से देखाला पिया ना..." । ओतना लामे से लोग अँगुरी उठाइ के देखावें देखा उहै गोलका पीपर लउकत बा न। उहे वा सम्मौपुर। हमन बचपन में कर्त्ता भी जायल जाव, त लखत रहल जाय कि डीह बाबा लउकत हठएँ कि ना... कब हमहन बदे ऊ पीपर के पेड़ ना रहल- 'डीह बाबा' रहलें । कुलि पढ़ले-लिखने के बादौ ऊ आजौ डीह बाबा बाटै सायतन 'डीह' के मतलब होला- 'ऊँचा स्थान आ सगरो गाँव के मने में 'डोह बाबा' के स्थान सबसे ऊँच बा- जब गाँव के एकमात्र नास्तिक मोरे मन में बा त सबके मन मे जरूरै बा । केहू के घरे कवनो भी शुभ काम होखो, जब ले डीह बाबा के थाने कथा ना सुनि लेई, पूरा ना हो सकत। पढ़ि-लिख के हमरे मन में सवाल आवेला कि डीह के थाने ठाकुर बाबा के पूजा के का मतलब? लेकिन ई लोक आ बेद एह द्वंद्व से परे बा। दूनो देवतन में अहम् के कवनों - टकराहट ना वा।

कहल जाला कि डीह बाबा 'हमार गाँव' क रखवार बाटै हर आफत बिपत से रच्छा कर लें। ओनके भरोसे पूरा गाँव सुख से सुतऽला- 'सोर्वै सुख तुलसी भरोसो एक राम के...'। हमन पढ़ि-लिख के एह भरोसन पर से भरोसा (बिस्वास ) गँवाइ दिहलीं। कबौं लगाला कि बड़ नुकसान कइ लिहलों आपन । तब कतौं, केहू में, केथुओं में भरोसा त रहल - अब तौ कुछू रही ना गयल... अब सुनीला कि 'डीह बाबा' बुढ़ाय गयल बाटै- पिपरे के पेड़वाँ अब बहुत पुरान हो गयल वा- छोज गयल बा। लामे से लउकेला अबौ, किन परछाई जइसन ओनकर पूजा खाली अत्तवार मंगर के दिने होले। जब जानै लायक भइलीं, त पुछले पर पता लगल कि बाकी पाँच दिन डीह बाबा अपनी ससुरारी रहे हैं, जवन सात-आठ किलोमीटर पच्छू वा । ई ससुरारि बड़ पियारि होखे ले न! देवतन तक ले होखे ले विष्णु भगवान आ शंकर बाबा त समुरिए में रहबै करे लें- 'हर: हिमालये शेते, हरिः शेते तु सागरे त डीह बाबा त भला हप्ता में दू दिन आइयो जालें जब देवतन के ई हाल बा, त मनइन के ससुरारि पियारि होखै त कवन बेजाहिं? खूब चिट्ठी लिखले हईं हम लरिकाई में सबकर, जवना में बाप-महतारी अपने बेटवन से ओरहन दिआवैं कि "पालि-पोसि के बड़ा हम कइलीं, आ अब पइसा ससुरारी भेजत बाटा?" बाबा कहले बाटें- "ससुरारि पियारी भई जब ते रिपु रूप कुटुंब भये तब ते..." ।

डीह बाबा के कुछ लपर झपर के कहानी गाँव के 'काली माई' के साथे भी जानल जाला खूब साफ ना पता, पर बा कुछ याने देवतन भी यह प्रकृति से छूटल ना बाटें। डीह बाबा के पुजले के बाद पूरक रूप में काली माई के थाने भी दीया बारल जाय। चलै के ताकत ना रहे, त ओनके नाँव से ओहरे मुँह कइ के एगो दीया बारि के डीहै बाबा किन से धराय जाव वइसे डीह के थाने से काली माई के थान बस दू-तीन सौ परग पुरुष और बा। काली माई किहन भी कवनो पाकड़ जइसन एगो पेड़ रहल। ओके गिरल हम देखले बाटीं। अब त एगो नीम के छतनार पेड़ बा बड़से काली माई के बास निमिऐ में मानल बा । कुलि आफति बिपति से डीह बाबा बचावैं, त हारी बेमारी से बचावै के जिम्मा काली माई के हारी बेमारी से बचावै बदे एगो गाँव मध्ये के पूजा पहिले होखै चइत के नवरातर में तीनो घर पंडित शंकर बाबा, डीह बाबा आ काली माई के थाने आठ दिन दुर्गापाठ करें - हमार घर शंकर तर करै- हमहूँ पाठ बँचले हई कऊ साल नवएँ दिन काली माई के तरे हवन होखे। हर घर के ठाकुर बाभन आहुति देवै बइठें पूरा गाँव जुटै सब चन्दा देय बीच में मुख्य आहुति वाला रहें लखन काका ।

काली के चउरा एकदम चमटोल के मोहाने पर बा सायत चमारों के बदे देवी के

उहाँ प्रतिष्ठित कयल गयल होय। चमार अउरो कवनो देवता के लगे ना अवतैं। बस, डीह बाबा कहाँ चउतरा से निचवें तनी हटि के आपन पूजा ऊजा कइ लेलें । हम खसी काटत देखले हई उहाँ चमारन के तनी सा लामे कइसे ई मांसाहारी पूजा भी बरदास हो जाले- अजब अजब परत बा हमरी व्यवस्था में चमरन के घरे सत्यनारायण के कथा पंडित लोग करावे लैं, बकिन माटी के बर्तन में परसाद-पानी खुदै लैके जालें परसादे (चूरन) के आँटा हमार माई जाँता में पीसै परसाद बनाइ के देय आ कथा कइ के उहै ठाकुर जी के चढ़ाई के हम आई तब ऊ लोग बाकी परसाद बाँटे खाँय बिआह ओनकर पंडित लोग ना करवतैं।

डीह आ काली माई त गाँव के उत्तर आ पूरब बाटें गउँए में शंकर जी के स्थान बा। एगो बरिआर पिपरे के तरे पथरे के पिण्डी रखल रहल पहिले इनार बा वहीं पीपर गिरले के होस आवाला हमैं बहुत बाद में पूरा गाँव से बटोरिया कइके ईंटा गिरल बकिन मूँडी बरोबर दीवार ना बन पवले कि बंद हो गयल। पइसा ना जुटल होखी। यहर 20- 25 साल भवल, एगो फंट्स किसिम के साधू गाँव में आयल अउर कुलि काम त ओकर अँरिया जइसन रहल, बकिन ललकारि के मन्दिर बनवाय दिहलै छोट के मन्दिर बा त चुनमुनवाँ, किन कउनो साज-सँभार ना नियमित पूजा-पाठ ना। ढंढ मंद पड़ल बा । सिवराति जइसन मौका पर गाँव के कुलि औरत जल देवै आवैलीं। बेलपत्र चढ़ा ला बकिन अइसने अवसर के अलावा चौपट पड़ल रहा ला- एगौ दियवौ ना बराति उहाँ। बड़े अच्छे. जगो पर बा- गाँव के मोहाना बा। वहीं एगो पम्पिंग सेट आ चक्की बा। नीक एक मंडई बा दू गो देवतन अउरी बाटें गांव के सटलै पच्छु पोखरा के किनारे बाटी 'मरी माई'। नउएं से साफ बा कि मरले के देवी पता नहीं अउर गाँवन में होनों कि नाहीं । मृतक के घंट बन्हाला ओमें। पहिले एगो टेढ़ छोटे क पेड़ रहल आमे कै। वही में बन्हाय ऊ आन्ही में गिरि गयल । अब घंट वही के बगले वाले पैड़े में बन्हाला एस तरे से मरी माई खतमै हो गइलों अब । आज के पोढ़ो त जनवे ना करो। बाकी हम त उहाँ कराही- वराही चढ़त भी देखले हई एकरे अलावा सादी बिआहे के बाद मउरी के दिने मेहरारू टीकै ऊकै भी ली उहाँ अब न जनी कहाँ टिकात होई। यह बदे उनकर एगो अउरो नाँव बा- महामाई। एतने के अलावा कुछू ना वा मरीमाई के पँचवाँ आ अंतिम थान बा- सत्ती माई सबसे लामे- पच्छु-दक्खिन के कोने पे कब मनौती- ओनौती के अलावा नियमित पूजा उनहूँ के हम ना देखल होत- सायतन लाने के नाते उहाँ कौनो पेड़ौ पालव नाहीं । हमरे होस में एगो डिबुली रहल - अइन खेतन के बीच्चे । उहाँ के खेतन के 'सत्ती तर के खेत' कहल जाव हमें याद वा कि वह डिबुली पर पक्का चौतरा बनववल हरदेव बरई । कमाई ओनके बंबई के रहल औ भूत-प्रेत के बाघा से बहुतै हैरान रहलें कवनो ओझा सोझा बतवलैं वह थाने के बनवावे के आ उहाँ पूजा करावे के ऊ ओतना पक्का चकबंदी में देवस्थान के नाम से अब चकआउट भयल बा आ केहू ओके जोततो ना बा- एइसन परताप देवतन- दानिन के, नहीं तो आजु तौ रस्ता चकरोड तक केहू ना छोड़त बा। शंकरजी के नाँव पाँच बिस्सा जमीन छूटल बा ओकर पतै ना कि जे जोतत बा, कुछू देला लेला कि ना। आ देवो करे, त के के ? जब मंदिर के कौनो साजै-संभार ना, त जमीन के परापत के होय का? ती जे जोतत वा ते खात बा।

हमरे गाँव देवी-देवतन त जोर जमा कुलि पाँचै बार्टें, बाकी भूत-प्रेत सैकड़न हउऐं- अनगिनत । देवतन बोलवलेव पर ना अवतैं, इन्हन बिन बोलवले पछिअवले-दबोचले रहलें। आ सबसे ढेर बराने (चौरसिया लोगन), कहराने (गोंड़ लोगन) के लोगन के सतावै हैं । हमहन के बचपन एही सैतानन चुरइनिन के कहानी सुनत, ओनसे डेरात बीतल सबसे ढेर एइसन कहानी नैका काकी से हम सुनले हई- जोन्हरी अगोरत के मचाने पे बइठि के बहर पानी बरसत रहो, एहर ऊ एतने गों से सुनावैं कि पानी निबुलसे प जब मचान से उतरल जाव, त इहै लगे कि अबै कौनो भूत टाँग पकरि के खींच लेई । कँपते जायल जाव घरे। फिर उहै कुलि सपनो में आवें ज्यादा निकार पच्छुएँ रहल खेलै ओलै बदे आ वह सबसे ढेर भूत-प्रेत बतावल गइलें सबसे नगीचे गाँव के सटले- एगो ताड़े के पेड़ रहे। ओह पर के 'तरवा वाला सबसे लागुन सैतान रहै सूरुज डुबले के बाद वहर अकेले जाये में बड़े-बड़न के फाटै आजु ताड़ ना बा । इहौ बुढ़ाय उढ़ाय गयल वा (कम पकड़ाला केहूके), तब संस्कार एइसन जमल बा कि राति में चाहे जब ओहर जा, कुलि भौतिकवाद- नास्तिकता के बादौ, एक बेर याद त सिहराई देले।

तमाम तमाम एतने देवता-भूतन के अलावा दू गो अउर 'परापत परान' बाटै हमरे गाँव में न देवता, न भूत। बस, बीचे के मामला... ई. दू गो साँप बाटै बाकी नाग पंचमी के पूजल ऊजल भी ना जातैं। एन्हें केहू देखलेव सायत होय... बकी सुनाल हर साल, अब के पता नहीं, लेकिन 30-35 साल पहिले ले सुनायें साल में एक बेर- बरसात सुरू भइले के हेर-फेर याने जेठ-असाढ़ में एह साँप के साँप ना, 'करइत' कहल जाला- उहै जवन शिवप्रसाद सिंह के 'करैता' (अलग अलग वैतरणी) में करैत' उनका ला...। गाँव के उत्तर ससना वाला उनकल बोलल त बरसात होखी आ पइजावा पर वाला, गाँव के दक्खिन के उनकल बोलल, त बरसात ना होखी। इन्हें 'करइतवा बाबा' कहल जाय। अब के लइकन के त 'करइत' का 'पइजावा' भी पता ना होई । पहिले ईंटा बनावल पकावल जाय कबौं काल के त ओके 'पइजावा' कहल जाय आजु के भट्ठा समझि लें। होलिका वाली डिबुली से पच्छू एगो पथरीली अस डिबुली पहिले रहल पड़जावा के जगह.... . चकबंदी के बाद फेंकि फाँक के सम्म कइ गइल... अब वह पड़े नहरी के नाली जाति बा। ससना वाले 'करइत' के कवनो जगह तय ना बा... बस ससना भर में कहीं से बोलै... हमें लगा ला कि बरसात पर ऊ जमाने के खेती निर्भर रहै, त ओके लेके बहुत कुलि बिस्वास- अंधविस्वास के रूप में उम्मीद आस्था बनाय नवले रहल मनई के मन। बरसात बदे एगो पूजा होय मैनपुर में 'कराह चढ़ब' कहाय टोटका हमरहू गाँव में होय-हम लइकन लोटीं आ सब बल्टिन के पानी फेंके लोटल गावल जाय नारा की नाई- 'मेघा-मेघा पानी दे, नहीं त आपन नानी दे' का, कि यह कुलि से पानी बरसी...।

चेचक के लेके भी एइसे अंधविस्वास बा । अबहिंन हमरे गाँव में चेचक ना, 'माता माई' निकरैली- बड़की, दुलरुवी, छोटकी...। सबके घरे पइसा ओंइछल जाला। धारि दीहल जाले । सप्ताह भर जुड़वाय गइले तक बाल बनावै, तेल-मसाला आ मांस मछरी खाये से परहेज कयल जाला। लेकिन अब कुछ-कुछ घरे दवा भी होवे लगल बा । पहिले जवन माली (देवी के भक्त, पूजक) आवत रहल, पूरा गाँव के एक साथ बैठाइ के आधी रात के पूजा निकारा करत रहल, ऊ कुलि लगभग बंद हो गयल था। चेचक (माता माई) से मरले के अनुपात त सुन्ना (शून्य) फीसदी हो गयल बा...।

बंद त हो गयल कुलि सांस्कृतिक आयोजन भी... सबसे अधिक मनसायन होखे फगुई (होली) में घरजनवाँ (हर घर से एक) लइका जायँ आ डेढ़ महीना लगातार रोज ऊखिन (गने) के पाति बटोरि के होलिका रखें। गाँव के दखिन होलिका के ऊँच एक थान रहे। एतनी पतई रखै के होड़ रहे गाँवन में कि जब दहन के राती के जरें, त केकर लवरि (लपटे) सबसे उप्पर ले गइलि हमरे गाँव के सबके उप्पर जाय- इहै हर गाँव माने अपने- अपने बदे- 'अपने-अपने युग में सबको, भायी अपनी-अपनी हाला ज्यादा सङहा (खर- पतवार) इकट्ठा करै के फेर में गाँव के मंडई ओसार, खटिया, लकड़ी, सरपत वगैरह उठाइ के डालि जाय। ई अबौ होत बा, बकिन तब 'फन' रहे, अब पॉलिटिक्स आ अदावत बस होत बा- पहिले 'सामान' डारल जाय, अब 'फलान' के सामान डारल जाले। जब होलिका जैरै त मर्द लोग तीसी झोंकर के ले जालेँ आ घरे में टाँग देलें- काहें, मालूम ना मर्दन के लवटि अइले के बाद कुलि मेहरारू जालों परिकरमा करैली घरे के हर अदमी के बुकवा से मिंजले रहैली आ सबकर लीछी कपड़ा में बाँध के ले जालों। होलिका में फेंकि देलीं। जइसे होलिका जरले के जरल संवत् के जरले बितले के प्रतीक बा, वही तरे से सायत इहौ संकेत बा कि साल भरे के महल देहीं से छोड़ाइ के जराय जाले... 1 दुसरे दिने सबेरे से दुपहर ले माटी-पानी से होली होखो पूरे गाँव के देवर भौजाइन में- रसीद बो भौजी त हमहन के खेतन-सिवानिन तक दौराय के चभौरे। उहै सबसे ढेर कबीर (गारी भरल गीत-कविता) के निसाना बनै। कबीर त पूरे महीना बोलाय जब से होलिका में पाती डारि के आवल जाय। दुपहर के बाद रंग-अबीर के होरी खेलाय सब अपने- अपने पद हक वालन से पसंद वालन से निपटें कुछ-कुछ परेम-वरेम के भी चक्कर छुपछुपाय के चलै नजर बचाइ के कपारे में सुक्खल रंग डारि देत तनी गाले पर मलि देत हम देखले हई आ कइसे कहीं कि कइले ना बाटी...? लेकिन सामूहिक होली त होखे साथे । बड़के ठाकुर के दुआरे हंडन कराहिन परातिन रंग घोराय बल्टिन में लेके घूमें... फगुआ गावत- "होरी खेलें रघुबीरा अवध में होरी खेलें रघुबीरा..." इहै लीडिंग (अगुवाई वाला) फगुआ रहे। फिर त 'राति दहिया ललन मोरि खाइ गइलें ना'.. 'जीयै से खेलै फाग लाल मनमोहना... जइसन केतना फगुआ गवाय... आ हर घर के दरवाजन पै कबीर बोलाय, बुजुर्ग लोग बोले- एक से एक भद्द, बकिन वह साँझ सब मंजूर रहै- पद हक के कउनो बाति ना। गाँव के सरगना लोग भीतर जाइ के बड़े सलीके से पिचकारी से रंग डारि के आवैं- मेहरारू अंगने में पहिरि ओढ़ि के बइठि जायें... आ सीनियर मेहरारू भी रंग डारें घोरि के रखले रहे... ई काफिला ठाकुर साहेब के घरे से उठे, त वही हरिहर बाबा के घरे जाय। उहाँ गाना बजाना के बड़हर आयोजन रहै- हारमोनियम, सितार, ढोलक... बाबा खुर्द बजावै। बड़ नीक गावें। खूब पान खाय, भाँग के गोला रोजै लेय... 

उहाँ देर तक गाना-बजाना होय। हर तरह के होली के गीत होखें- चौपाल, डेढ़ताल, छिटका उलरुआ... सुरूआत सादे भक्तिमय से होखे 'नटवर नागर नंदा, भजो रे मन गोविन्द...' हर चौताल के बाद चलती धुन में उलरुवा के चलन रहो- 'बिछिलाई गई गोरी खड़ी अंगना... बछिलाई गई... केथुआ के बाजूबंदा, केथुआ के कंगना केथुआ के चोली कसै जोवना... बिछिलाई गई...। चाँदी के बाजूबंदा, सोने के कंगना... रेसम क चोली कसै जोबना..." - फिर एके उतारै फार तक के बखान अब एगो डेढ़ तालो के बानगी देख लीहल जाव...

"मोरि उचटल नींद सेजरिया होऽ, रहि न जाय मुरली सुनि के वही वृंदावन की कुंज गलिन में भइलिन भेंट दिदरिया हो/ पूछें स्याम कहाँ जावू राधिका दहिनी आँखि पुतरिया हो/ रहि न जाइ मुरली सुनि के"....  

दूसर बड़ मनसायन सावन में होखै 'चला खेलि आई सावन में कजरिया, बदरिया घेरी आइल ननदी'... महीना भर कजरी होय हर घर से राति राति के, दिन-दिन के पिहिक सुनाय आ भर दिन मन रस में भीजल रहो उछरत रहो- 'एक दिन अवतेया बालम अपनी ससुरारि में, सावन की बहार में ना..'। लइकन बदे पीढ़ा मचिया के छोटे-छोटे झुलुआ त घरे-घरे परै- हम दलानी में मचिया पे खूब झुल्ली, छोटे रहलें के नाते सबही झुलावै।। खैर, घरन के अलावा पचंइया (नाग पंचमी) के समय हफ्तन झूला परै मजबूत नीबिन के पेड़े पर केवाड़ी के पल्ला के डारिन में मोट रसरी से बाहल जाला। पाँच-पाँच, छह-छह मेहरारू एक बेर में बइठें आ दू जवान दूनों सिरे से पेंग मारै- 'पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें। वहर रसीली कजरिन के चहक, साथै एतनी मेहरारू के नकचे से महक आ झलुआ के हिलोर... पेंग मारै वाले के हाथ-गोड़ कुछ बहकि जाय, त कवन अजूबा... मोरो कऊ बेर बहकल बा... पै झूला से उतरल कि ऊ बहकबो उतरि जाव- बहुत दिन ले वह लड़की मेहरारू से आँखि ना मिलाय जाय, अस सरम आवै... झलुआ वाली औरतन एक ओर गावैं, त नीचे इंतजार में बइठल झुण्ड ड्योढ़ी भरै- "झूला परल बाय बेलवा की डारी पिया, झूलैं त्रिपुरारी पिया ना..." जइसन से सुरू होके 'हमके पटने से चुनरी मँगा दा पिया, मेलवा घुमा दा पिया ना...! से होत उहाँ तक पहुँचो- कि बीरन अइलैं अनवइयवा, सवनवाँ में ना जइबै ननदी...। अब त केहू के दुआरे नींबी के न एतना जबर पेड़नै रहि गयल, न एतनी इच्छा आ उछाहे कि ई कुलि होखो झूला संस्कृति खतम हो गइल।

कजरी गावै के मरदन के अलगै तरह होय समानांतर संस्कृति । चार युवक खड़ा होखें- दू-दू जने पाँच परग दे आमने-सामने...आ चुटकी बजा-बजा के एक दूसरे के सामने लटकि के, एक दूसरे के गोंठि के उछर के गावल जाय एके दुरि के गावै वाली कजरी कहें- 'राजा इलासेन के लड़की सिवकुमारी रहली, कुदरत के बलिहारी रहलीं ना'.... अक्सर ई कथात्मक होखें । केहू के दुआरे आयोजन होखे ओकरो ओर से खान-पान होखें, पान-बीड़ी तम्बाकू के इंतजाम होखे... आ देर राति तक लोग दुरि-दुरि कजरी गावें। यह के प्रमुख रहलें रामदुलार परकल्ली भउजी के बड़का बेटवा प्रकृति से कलाकार आ एही लिए घरे बदे आवारा बदनाम, बाकी गाँव-पुर में सरनाम रामदुलार के हम अपने गाँव के भलमनइन में दूसरे नम्बर पर रखब पहिले नम्बर पर रामराज (मौर्य) काका । बड़ा कारण ई कि दूनो जने के कब हम केहू के उत्ती मध्यी में परत ना पवली दुलार त सुनिउ लेंय केहू जदी केहू के बुराई करै, रामराज काका त सुनबो ना करै । इस्कूले में कुछ चोरावत पकराइ के हेडमास्टर (तपेश्वर सिंह) के दुई चार मुंगरी (मारि) खाइके दुलार पढ़ाई छोड़ि दिहलें नाहीं तौ उनकर कलाकार मौज गयल होत। तब ऊ खूब गीत लिखें। उप्पर के दूरै वाली 'कजरी' (इलासेन की लड़की) उनहीं के लिखल बा। आशु कवि भी रहलें। हमरे दुआरे आयोजन होत बा त खड़े-खड़े पास- - पड़ोसिन के नाँव मिलाई के, ताजा घटनन बातिन के जोरि जोरि के कजरी गावै लगे-

तनिका रमपति के बलावा ओनके बीड़ी एक पिआवा नोहर कहूँ कि सौदा ना देबे उधारे के कुछ इज्जत करा दुआरे कै....ना.....

आ सब हँस-हँस के लहालोट। अइसन जोड़-तोड़ कइ के कविता बनावै वाला हमसे पहली वाली पीढ़ी में राम लोचन चौरसिया भी रहलें तमाम कविता आ रामायण के लाइन त हमें लोचन भइया से सुनि के याद भइल बा...।

अइसन लोचन भइया हर 'हमार गाँव' में होले, बकिन 'दुलार' एकाध गाँव में होलें। घास काटत-काटत गीत बनि जाय खोजि के हमें सुनावें आ पूछें भइया कड़ी बइठत बान, सबद सही बाटै न?' सुधार करावें। ओनके तमाम गीतन के हम पहिला श्रोता होई। किन घास वहीं रहि जाय। पढ़ाई रहलि होति धोरी, आ घर के तनिकौ सहयोग रहल होत, त दुलार अच्छा शायर, अच्छा गवैया भयल होतें।

इहै हालि ओनके मेहररुओं के भइल। नयी दुलहिन रहली आ केहू के बरात पहुँचावै। गइली डीह बाबा के तर बस, वहीं नाचि देहली-नींक नाचै। बस, उहाँ निलायक - बेसरम के खिताब पाइ गइली। सब प्यार आ चिढ़ावे के मिलल जुलल भाव से दुलार के 'पाँडे' कहैत फिर दुलार वो अपने आप 'पँड़ाइन' हो गइलीं। घरे वाले गृहस्थी भाव से सहिऐ। रहले दुलार ओके सहल, बकिन पेंडुइनियाँ ना सहलिन। ऊ अलगाव गइल। अब तक के हमरे देखले में ई 'अद्भुत' अलगा भयल कि पति मतारी बाप-भाइन के साथे- आ पत्नी अकेलवे अलगे। भरसाय चलाके खात रहत हई आजु भी पैड़ाइन दुलार त मरि गइलें। ऊ अबहिंन अलगे बार्टी, वसै। तब दुलार कब-कब पेंड़ाइनि में खाये आइ जायें- सायतन जब ओकरे लगे घरी छन रहे के मन होखे। अब लड़का भी कब माई के साथे खाय लेला । पँड़ाइनि के ई सुभाव आ व्यवहार 'यूनिक' वा 'हमार गाँव' के इतिहास में एक अलगा अउर बा इहाँ बतावै लायक नैका काकी (जवन भूतन वाली कहनियाँ सुनावें) चार बेटवन पतोहन आ कइव पोतन-पोतिन के रहतेव अकेले बनवनी-खइनी आ उहो मरले की बेला में ऊ श्लोक वा न, कि 'दस बच्चा पैदा कइके गदही के भार ढोवे के परा ला' ।

पचंइया के अवसर पर, कजरी के अलावा कूड़ी कुदै (लम्बी-ऊँची कूद) आ कुस्ती लड़े आ कबड्डी खेलै के परम्परा रहै। एकदम सबेरे से दुप्पहर ले होखै- जइसे खिचड़ी (मकर संक्रांति) के दिने दिन भर हापुड़। हापुड़ त लड़कै खेलैं वही बदे जाड़ा में वो दिन सबेरे के नहाब भी खलै ना लाई चिउरा आ गट्टा-रेवड़ा खाइके चलि दीहल जाव खेलै... बकिन पचइयां के दिने त पूरा गाँव जुटै बड़ा बुजुर्ग लोग फैसला करें। कउड़िया- घुस्स खेलावें- एक कौड़ी फेंकल जाय आ ओके ली आवै के होय। गाँव भरे के लइकन मेंदू दल बनाय जाय... क छोरी के छोरा, पटकी के पटका होय... कि पुछले- कहले मान के ना... देंह सगरो थुराय जाय...।

फगुई आ पचइयां के बिच्चे वो गाँव मध्ये की पूजा के बाद के दू महीना बैसाख- जेठ, चइती के फसलिन के दाँवै ओसावै क मौसम रहै जब आठ-दस जने के देवरी साथे चलै त बातचीत, कभी हँसी-ठहाका, त कभी एकाध गीत-गउज भी सामूहिक संस्कृति के उजागर करो। राति के खरिहान में सूतै सब जाय। अँजोरिया राति में पड़री पर गुदरी बिछाइ के आसमान के नीचे सुत्तै के सुख... आहा...

इहै समय रहे ऊख बोआये कै... जेकर ऊख बोआय, बीसन जने मिलि के बौवैं.... आ सब राती के ओनके घरे खाय- 'उखभोज' कहाय एही तरे धाने के पहिली रोपनी के दिने धनभोज होखे...। बकिन हमरे बदे सबसे मनभावन होखै सादी बिआह जवन कि वही समय बैसाख जेठ में होला। एहलिए कि नौटंकी आवै। तंबू तनै तख्ता लगें। आराति के अमर सिंह राठौर, लैला मजनूं शीरीफरहाद, श्रीमती मंजरी, गरीब की दुनिया, सुल्ताना डाकू ... जइसन नाटक देखल जाय। दुपहरिया के बरदौर (बैलन वाला घर) में जाके खेलल जाय। घरे में से कजरौटा, ओठलाली, बिन्दी, टिकुली, सारी बिलाउज, दीवट के उप्पर के करिखा... वगैरह लेके मेकअप होखै... कबौं कुछ बड़ लोग देखहू आइ जायें। फिर जब बैसाख जेठ के बाद असाढ़-सावन के बोवनी रोपनी हो जाय आ एकर थकान पचइयां के हिलोर में मिटाय जाय, तब विजय दसमी आवै। रामलीला त हमरे गाँव में ना होय- अगली बगले ना होय, बकिन हमहन देखे जायल जाव ठेकवाँ बजारे में उहाँ दरभंगा थियेटरी आवै चार आना, आठ आना टिकट रहे। राति भर देखल जाय त रामलीला (नवरात्र) बितले पर जब मेला लगै दसमी के, त ओमन से नौटंकी वाली किताब चोरावल जाया चोरावल एहलिए कि पइसा जवन मिलै तवने के तौ मिठाई आ रसेदार पकौड़ी खाय जायल जाय, बकिन नौटंकी के भूत एइसन रहे कि किताब चोरवहीं के पड़े। चोरावै के नायाब तरीका रहै, जवन बताइब ना.. वही किताबिन से याद कइके नौटंकी संपन्न होखै..... आ उहें बीज आजु रंग-समीक्षा लिखावत बा- कइ ना पउलों, त लिखबै सही बजारे में रामलीला अजुऔ होले, बकिन ऊ रामलीला कम, लीला अधिक होले- कहाँ-कहाँ से नामी गरामी लोग बोलावल जालें । फिल्मी गाना आ मिमिक्री होखे लें... खर्च खूब होला- सायत प्राप्ति भी होत होय...।

शादिन में नौटंकी जेतनै मजा बिआह होत के मण्डप में भी आवै एक ओर वेदमंत्र आ दुसरी ओर मेहरारू के झुण्ड गीत गाँव- 'गावत गीत सबै मिलिकै अस बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं' वाला नजारा लड़िका के पूजा-स्वागत होत बा मंडप में आ बाहर मेहरारू गावति बाट- 'दुलहा हौ छिनारी के जनमल, अगुआ हौ लँडगँहुआ हो...'। पहुनन के खात के जवन गीत गावल जाला, ओके 'गारी' कहल जाला। माई हमार हमरे गाँव के सबसे बड़े गवइया रहै- मँड़वा जगावै के मंगल गीत आ देवी पूजा के पचरा से लेके हर मौसमी गीत आ गारी तक... सब में पास सबसे आगे गावै आ अलगे सुनाय ओकर आवाज...। ओकरे गवले बिना न केहू के कवनो परोजन पूर होखै, न ओकरे भंडारा में रहले बिना केहू के परोजन के खानपान संपन्न होखे केतना जने जनिन के हम देखले हई हाथ पकरि के माई के भंडारा में ले जात आ भंडारा सौंपि के कहत काकी, आजी, मइया, भौजी, दुलहिनिया... अब इज्जत तोरे हाथे आ केहू के इज्जत कब गइल ना...। एक काम अउर बड़ा तेज करै- लइका होआवै वाला... गाँव में अबहिंन भी 'दाई' सबके ना अवतीं । हमरी पीढ़ी से लेके अब तक के जेतना लोग गाँव में बाटें, 80% लोग हमरी मइए के हाथे पर गिरत आयल हठए दुनिया में... त हम इहो कहब कि माई के मरले पर सब वइसे उरिन भयल-लगल सवही के माई मरलि ह।

पचइया के पहिले ई कुलि; आ ओकरे बाद दसमी से मेलन के शुरुआत बिजय दसमी के मेलवे में ठेकवों में 'राम-रावण युद्ध' आ कगजे के बनल खूब बड़ा के रावन- दहन होखो... अब ई मेला में ऊ चाव ना होत... पहिले त ई मिलै- जुलै (मेल-जोल से 'मेला') बदे भी होय- लइकन मेहरारू के मनसायन अब त सब सबके हरदमै मिल लेत बा- बाइक से गयल एक घंटा में बहिन-चैनन से मिलि के, नानी मामिन से मिलिके फूआ- मीसिन से मिलि के चलि आयल... तब वाली तीन-तीन दिन के पहुनई अब ना होति..... 

त वइसन पूरे गाँव के साथे गपबाजी आ गवनई भी ना होत पूरा गाँव सबके नात-हितन के चीन्है। गवहिया के सबसे पहिले जेही खेत-खेताड़ी से देखि लेय, पैलगी- चिरंजू राम- रहारी करत ओके लिआय के घरे आवै आ दाना-पानी करावै घरे केहू रहे, न रहे- तब ले आधा गाँव जुटि जाय...।

दसमी से सुरू होखै कुआर से, त माघ ले चलै मेला... गोविन साहब के मेला आ धनुषयज्ञ के ढेर मान जान रहो बाकी होखेँ त बहुत दसमी के बादै दीवाली आवै ले- 'दिया देवारी' कहल जाला। हमरे गाँव में कार्तिक के अमउसा के ना होत 'देवारी'- कवनो बड़ असगुन भयल होखी पूरे गाँव बदे, बकिन केहू के मालूम ना ऊ...। त देवारी होखैले ग्यारह दिन बाद उजियारि एकादसी के जइसे सगरो 'जुठवन' (दिठवन)- पहिले दिने ऊख उखाड़े चुहै के दिन होले ऊ साम भुलइले मान के ना बा... चनरमा के टहाटह अँजोरिया... चारों ओर से लहलहाति दीयन के ज्योति दूनो के संगति आ कंट्रास्ट से बनत नयनाभिराम सम (शम्मा आ चाँदनी के सम)... आ सबके हाथ में ऊख... चूसत चूसत सब सबके दुआरे जाव.. अपने बड़कन के सब पैलगी करै- गोड़े परै... अस चहल-पहल, सौहार्द के समय... कि बखत ठहरि जाय। बूढ़-बूढ़ लोग जब अपने बड़कन के लगे जाके गोड़ धेरै त एह संस्कृति के समने माथा अपने आपै सरघा से झुकि जाय...।

बकिन हमरे गाँव में एगो खास त्योहार अउर होखै- 'जन्माष्टमी' के पचईया के बाद भादो में एकर चर्चा अन्त में एहलिए कि ई एक परिवार करै उहै हरिहर बाबा के परिवार न्योतल जाव पूरा गाँव... लगभग पूरा दिहात... बगले के गाँवन इन्नी (इरनी), तम्मरपुर (तम्बर पुर ), मैनपुर के मानिन्द लोग सजि-धजि के आवैं- एकम से आठम तक रोज साँझी के खूब गाना-बजाना होय बाबा प्रमुख रहैं- वइसे तम्मर पुर के काली चरन पंडित भी अच्छा गवइया बजवइया रहें। खूब महफिल जमै जात के रोज परसाद बँटे यह में ऊ बड़का ठाकुर भी आवैं, बकिन परसाद बँटे के ठीक पहिले चलि जायें- खाब खड़बा ना, बाबा ओनकर पूजा-पाठ छोड़ि दिहलें, त ऊ परसाद काहें खायें, कइसे खाँय...? बकिन कृष्ण-जनम के समारोह के कइसे छोड़ें- ई विरोधाभास भी लोभाय जाला हमके 'हमार गाँव' कै...। जहिया कृष्ण जी जनमैं- अष्टमी के पूरा गाँव खाय- बड़ा भोज होय...। हरिहर बाबा के चचेरा भतीजा हमार भागीरथी काका, कृष्ण के माई बनें ऊ सउरी (सूतिका गृह में रहें खर के कृष्ण के कोरी में लेके बइठें- ओन्हें पियावै के नाटक करें। छट्टी-बरही मनावल जाय हमार माई खूब मजाक करै वह हप्ता भर ओनसे- देवर- भौजी के रिस्ता जवन रहे...बड़ मजा आवै। हमहन जन्माष्टमी के अगोरल जाय- पंजीरी के याद अबहिंन मन हुलसाय जाले- 'जबहीं सुरति आवति वा सुख का..... • मुँह में एहू समय पानी आ गयल बा... 

1969-70 में आइल चकबंदी गाँव के बदले में मूल्यहीनता के चरम प ले जाये में, सबसे बड़ी भूमिका निबहल। गाँव भर के उपयोगी जमीन हड़पै के अनैतिकता स्थापित हो गइल रहल, अब जे जेकर पवलै दाव में, हड़पै लगल...। गाँव के त बतिए छोड़ा, सगे भाई तक के ना छोड़लस केहू केहू याने केहू...। जे भी सग दू भाई रहल-दू चक कटै के रहल ओकर सरकार अलगाय देहलै । सब आपस में तय कइलै एक भाई के नार्वे कम मालियत वाला- याने लामे के चक, आ एक भाई के नावें गोइड़े के चक... गोइड़े याने जहाँ तरकारी जोन्हरी-ऊखिरहरि कुलि हो सकै... आ लामे याने कियारी- धाने के खेत- बरसात के भरोसे धान होओ... आ बड़ी मेहनत करा, त कहीं से पानी वानी देके कुछ गोहूं पैदा कर लेया...। कइलस सब इहै राय कइके कि बाद में दूनो जनी के नाँव दूनो में कइ जाई। बकिन कइलस केहू ना एक्को चिरई के पूत ना कइलस आ लामे के चक वही भाई के नावें कटवलस सब, जवन भाई परदेस रहल या छोट रहल, बेकार रहल, कमजोर रहल... जे अलगाय ना बा, ओकर भरम भरल बा- बकिन कब ले? त फाँक खेत में सरकार ना कइलस, बड़ मन में कइ दिहलस । मन में त मनुष्य मात्र के ई कुलि रहने करै ला- स्वार्थ, लोभ, मोह, छल, प्रपंच... ई आजादी के बाद के विकास या विकास के नावें बनत योजना बस, खोलि दिहलस यह कुलि भावन के, जवने के कि पारंपरिक रीति-रिवाज, संस्कृति दबवले-छिपवले रहलि- आदर्शपरक बनाय दिहले रहल...। वह व्यवस्था के वर्जनामूलक कहल जाला, लेकिन स्वच्छंदतामूलक में आजु ई जवन होत बा, तवने के आगे तुलना करै के ढंग से सोचल जाय कि कवन अधिक मानवीय बा- आखिर मनुष्य जब मनुष्य ना रहि जात बा त कुलि खेत बारी रहिके का करी...। पूरा गाँव बइठल रहल आ एगो बूढ़ आदमी हाथ उठाइके कहलस- साहब (ए. सी. ओ.), तीनो पेड़ आम हमार लगावल बा... जबकि पूरा गाँव जानत रहल कि ई सोलहो आना गलत बा- खाली क पेड़ एकरे खेते में निकरि आयल याने जहाँ पेड़ रहल, ओह मनई के कास्तकारी निकल गइल... आ ऊ डकरे झूठ बोलि गयल याने कुछ ना बचल- कौनो लाजि न सरम... न कौनो डर सिर्फ आपन फायदा- चाहे कवनो कीमत पर...। एकरे आगे अब ओकर चर्चा का कि केतना घूस के दिहले आ केतना मुकदमा कइसे कइसे चलल...।

चक कटले के आ कोऑपरेटिव के फायदा एह रूप में बहुत साफ बा कि सबके घरे अनाज पहिले से पाँच गुना अधिक होत बा। अब सब दूनो बेला खाना खात बा चिकनी चुपड़ी भी... पहिले त नौ महिना एक बेला रसदाना होय... बकिन आदमी अस अक्खड़ होय कि बरघ-भैंसा के पकरि गिराय देयँ... अब चिकनी-चुपड़ी सबकै छेरिऔ ना पकरि पइहैं। याने आराम बढ़ल, ताकत घटल। समृद्धि बढ़ल, मूल्य मंरल...। एह समृद्धि में चकबंदी से बड़ा योगदान वा वो नहर के, जवन चक कटले के दू-तीन साल बाद आइल | केकरे खेते से होके जाय, केकर बचै... के लेके खूब उठापटक, परै पटावे के कारवार चलल... आ बड़के ठाकुर के घर के एगो लड़का से कइसन का हो गयल नहर योजना वालन से कि ओनके टू चकन के पेट फारत (बीचे से काटत) निकलल... कुलि कइ के हारि गइलैं- इहाँ तक कि खोदब रोकि दिहले आ पुलिस आइल बाकी नहर बदलल ना। हाँ, तब ले ओनकर एक लड़का नेतागीरी में निकरि गइलें, जेनके कइला से नहर में गयल खेतन के मुआवजा दू बेर मिलल सबके ई बात दूसर बा कि ऊ सबसे परसेंटेज भी लिहलें। अपने गाँव-पुर के छोटे-मोटे लोगन तक से पैसा ले लेब आ पैसा लेवें के पीछे पड़ गइले के ओनकर वृत्ति ना होति- तनी दरिया दिल आ उदार होर्ते, त अपने व्यक्तित्व, दिमाग आ सऊर से बहुत आगे जा सकत रहलें...!

अब उहै नहर वरदान भइल बा। अब यही साल सगरो सूखा पड़ल वा, वकिन वही नहरी के भरोसे हमरे गाँव में सबके पूरा धान भइल ह। कवौ पानी ना आवे त भारी फेर परि जाला ।

एकरे आगे के विकास- बदलाव करनी के कर्ता पद पर हमार पीढ़ी बइठल कुछ खास बचल त ना रहल करें बदे- सबकर आपन आपन चक हो गइल- रोज के डाँड़ा- मेंड़ी खतम भइल। एक्कै साथे एक सिवान में बोवले के सामूहिकता खतम भइल । निजता बढ़ल। खेती के मशीन ट्रैक्टर, पंपिंग सेट, दाँवै ओसावै आ अब त कटहू वाली- आ गइले से भी सब मिलिके जवन सबके साथे काम करै, ऊ सहकारिता ना रहि गइल....

पहिले की संस्कृति - सामाजिकता सामूहिकता के सामने अब कुछ ना रहि गयल बा-

कहै - बतावै लायक । न नाच, न गान, न साहित्य, न कला, न ज्ञान, न विज्ञान। भर्तृहरि के सबदन में "साहित्य-संगीत-कला विहीनः, साक्षात्..." वाला जीवन बा... । केहू कौनो बतावै लायक काम ना करत बा... हमरे गाँव क एक लइका बी ए पढ़ के मुम्बई में आ गइल। हम कुछ प्लेटफार्म दिआवे क भी कोशिश कइली ओहर त सफल ना भयल, शादी जरूर क लेहलस घर से संबंध न रह गयल, संघर्ष करत है। एगो हमार चचेरा पोता पढ़े में त फिसड्डी बाकिर गावत अच्छा है। सुनले त ना हई (हमसे बोलबै ना करत), सुनीला लोगन से कि कैसेट बनत ह मोर हार्दिक शुभेच्छा ओकरे साथे... व्यावसायिक इस्तेमाल त मंदिरौ के होत बा। मगर

कुलि सरकारी योजना आइल सड़क भी बनि गयल लेकिन कवनो पब्लिक या सरकारी वाहन ना चले, जवना के बहुत जरूरत बा बजारे जाये बढ़े मेहरारू - लइकन के केहू के सायकल मोटर सायकल के सहारा ना मिलै त चलि के जाये होला।

सब अपनी खातिर अपने में मगन बा...। हाँ, खास ई कि काजे परोजन अब भले हलुआई आवत बाटें, बकिन बड़ी से बड़ी बरात के गाँव के लइकन खिआय-पियाय के फिटफाट कइ देनै कुलि जूटि जानें...। दहेज के कवनो बड़ी समस्या ना बा । सामान्य लेन-देन बा- औकात भर... छोट के गाँव बड़ परोजन में डटि जाला आ जहाँ बरात जाले, उहाँ भी टूटि पराला कत छोट ना... बड़ परि जाला...।

सब अपने-अपने रोजी-रोटी में लगल बा ई बेजाहाँ ना बा, बस पेट-तन के उप्पर कवनो मानुषिक काम ना होत बा। बाबा कहले बाटै मातु पिता बालकन्ह बोलावैं, उदर भरै, सोइ कर्म सिखावैं...

इहै एकदम खरा उतर गयल बा। एहीलिए दुसरे के फटे में टाँग दिहल या फारब काफी खतम हो गयल बा।

जइसे जमाना से उम्मीद बा कि आजादी के बाद कुलि अपनहीं पाइ लेवै के व्यक्तिगत प्रवृत्ति अपने चरम के बाद एक दिन भौतिकपरस्ती से थकि के लौटी त आपन तलास करी- 'आदमी' के खोजी, वइसे हम अपनहूँ गाँव से उम्मीद काहें ना करों कि एक दिन लवटी सब आ पहिले जइसन मिलि के गाई बजाई, नाची कुद्दी... तब ई फिर से 'हमार गाँव' हो जाई, जवन आजु पिछले तीस साल से बदलत बदलत 'हमार हमार गाँव' हो

गयल बा...।


अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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