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चम्पा परधान

8 January 2024

2 देखल गइल 2

'गजब हो गइल भाई ! अब का होई। का कइल जाव ?' अपनही में बुदबुदात परधान जी कहलें। उनका अन्दाज नाहीं रहल कि केहू उनके बात सुनत बा।

'का गजब भइल हो ? कवन उलटनि हो गइल ? कवने फिकिर में परि गइल बाड़ऽ?' पाछे तकलें परधान जी उनके भाई पूछत रहलें। भाई के देखि के तनि चिहुकलें बाकि तुरंते सम्हरि के कहलें 'ई उल्टनिए न ह। आजु ले परधानी अपने घर में रहलि ह, अब सुनात बा कि आपन गाँव महिला कोटा में चलि गइल। अब एह गाँव के परधान मरद होइबे ना करिहें। कइसे का होई ?'

भाई रहलें त जेठ बाकि परधान के लेहाज एइसन करें कि बुझा ऊहे जेठ हवें। 'बहुत फिकिर के बात नइखे। चलऽ अब्बे बीडीओ साहब से पूछि लीहल जाव। ऊ कवनो उपाइ बतइबे करिहें। परधान जी भाई के बात मानि के तुरंते तइयार हो गइलें। जल्दी दू चारि कवर खा-पी के दूनू भाई बलाक का ओर चलि दिहलें।

बिडिओ साहब भेंटा गइलें। देखते हँसि के पुछलें 'का बात ह परधान जी। दूनू भाई कवने जात्रा पर निकड़ल बानीं जाँ ?'

परधान जी कहलें 'जाए दीं साहेब! आप लोग एक से एक झंझट लगावल करीले। अब बताई कि हमार गाँव महिला कोटा में चलि जाई त परधानी कइसे रहि जाई हमरी लग्गे ! कुछ करीं जेसे परधानी बचल रहे। कुछ ले-दे के कोटवा कवनो अउरी गाँव में बदलवा देईं।'

बिडिओ मुस्कइलें । कहलें 'आपके मेहरारू बने के के कहतबा। अरे घर में केहू मेहरारू नइखे ? उनहीं के खड़ा करा दीं। ऊहे परधान हो जइहें। परधानी आपे कइल जाई उनका खाली जहाँ आप बतावल जाई ओइजा दसखत क देवे के रही।'

परधान जी फिकिर में परि गइलें। कहलें 'मेहरारू त बाड़ी बाकिर दसखत कइसे करिहें। उनके त करिया अच्छर मँइसि बरब्बर।' 

कौनो बात नइखे। दू चार दिन में दसखत करे भरि के सिखा दीहल जाई। आप जाके अजुए से उनके आपन नाव लिखे भरि के सिखा देई। अबहिन परचा भरले में टाइम बा। तबले उहाँ का दसखत कइले में पक्का हो जाइबि। परधानी आपे के घर में रहि जाई। कवनो नोकसान नाहीं होखी, न कौनो झंझट होई।'

मिसिराइन के मनवले में परधान जी के बड़ी मेहनत करे के परल। कौनो लेखा दसखत करे के सीखि लिहली। परचा भरा गइल। ओहि दिन पता चलल कि मस्टराइनो खड़ा होत बाड़ी। हरिजन पट्टी के परबतियो परचा भरले बा। अठरियो केहू भरि सकेला। तब का होई ?

बिडिओ साहेब कहलें 'भरे दीं। जे चाहे ओके परचा भरे दीं। चुनाव करावल त हमन के कार बा न ! जइसे जइसे कहल जा, आप करत जाई। परधानी आपे के घर में रही। रूपया पइसा त बहुत खरच भइल। अजान पानी ढेर लागि गइल। दउरत-दउरत गोड़ खिया गइलि बाकिर बिडिओ साहेब के बात साँच भइल। परधानी मिसिर बाबा के घरहीं में रहि गइल। फरक एतने परल कि पहिले फुलेना मिसिर परधान के नाँव चलत रहे, अब चम्पा देवी परधान कहाए लगली। सब कुछ पहिलही जइसे होखे लागल। जब-जब जहाँ-जहाँ मिसिर जी कहें, तब-तब तहाँ-तहाँ मलिकाइनि आपन नाव लिखि दें। जब कहीं जाए के होखे परधान जी

परधानपति बनि के चलि जां। कवनो-कवनो कार एइसन होखे जौन जानल चाहें चम्पा देवी। एक बेर पूछि परली-'हरिजन पट्टी के मकान बनेवाली रहलो सँ, का भइल ?' मिसिर जी मुसुकी मारे लगलें। प्रधान पुछली 'कहो बोलत नइखीं ? बताई न, का भइल ? जेकरा घर-दुआर नइखे ओकरे खातिर पक्का घर बनवावे के रूपया आइल रहल। हमसे दसखतियो करावल गइल रहल। सुनात बा कि रूपेयवा निकड़ियो गइल। बाकी घर त केहू के ना बनल !'

मिसिर जी सपनो में ना सोचले रहलें कि उनके गऊ एइसन मिलिकाइन कबो एह लेखा जबान चलइहें। बड़ा रीसि बरल बाकी कौनो लेखा रीसि नेवारि के एतने कहलें 'जाए द, तहरा एहकुलि बात से का लेवे देवे के बा ? चुपचाप देखत रहऽ आ आपन कार करते रहऽ।'

अपने मालिक के आँखि-में-आँखि डारि दिहली चम्पा परधान। कहलीं-'हम त आपन कार करते बानीं। बाकी हमार कार अब ईहो हो गइल बा कि गाँव के नोक-बाउर देखीं। हम त कब्बो रउवाँ से जबान नाहीं खोलत रहनीं। सुनात बा कि हरिजन पट्टी वाला मकान के सब रूपया हम निकालि के खा लिहले बानीं। अब एइसन अकलंक लागि रहल बा, त आपसे पुछबो नाहीं करीं जाके पता लगाई कि गाँव-जवार में एह बात पर केतना थू-थू हो रहल बा हमार आ आपके !'

मिसिर जी जामा से बाहर हो गइलें। बुझाइल कि औखए से परधान के भसम क दीहें। बाकिर लचार रहलें। बात साँच रहे। बिना खेतीबारी जरजमीन के हरिजनन के मकान बनावे खातिर पहिलका किस्त बाँटे खातिर जवन रूपया निकरल रहल ऊ सब खरच हो गइल रहल। बिडियो साहेब बतवले रहलें कि अगला किस्त वाला जवन धन निकरी ओमें से कुछ बाँटि दीहल जाई। बाकिर मेहरारू के जाति! जंतने सोचें ओतने रीसि बरत जा। जब नाहीं खेपाइल त उठि के बहरा चलि गइलें। एहर-ओहर मेलछत रहलें। तब्बो चैन नाहीं परल त बलाके के राहि धइलें। अब विडियो साहेब से सब बाति बतावे के परी। ऊहे कौनो उपाइ बतइहैं।

एहर चम्पा परधान मालिक के लच्छन देखि के बेकल हो गइली। गनीमत

एतने रहल कि उनके खाना खिया दिहले रहली, तब ई बतकही भइल ना त भुखइले

रहली बाकि चम्पा परधान अपने नाहीं खइली। एगो लइका के भेजि के मस्टराइन के बोलववली। मस्टराइन अइली त उनके आदर से बइठवली। ओइसे त परधानी के चुनाव हारि गइले के बाद से मस्टराइन बहुत रिसियाइल रहली एह घर से, बाकिर उनकर कुलि रोसि मिसिर पर रहल। ई बाति जइसे सभे जानत रहल ओइसे मस्टराइनियो जानत रहली कि चम्पा देवी के कवनों दोस नइखे। ऊ त मिसिर के हाथे के कठपुतरी हईं। ऊ जइसे चाहेलें, ओइसे नचावेलें। अपने मिसराइन भलमनई

हईं। एही से चम्पा परधान के बोलउवा सुनि के मस्टराइन उनके घरे आ गइलो। चम्पा परधान पुछली- 'ए मस्टराइन तु हूँ कुछ सुनलू ह हरिजन पट्टी के मकान के बारे में ? हम त बड़ा खराब बात सुननीं हैं। एही से तहके बोलववनीं हैं। तनि हमके कुछ बतावऽ गाँव के रंगढंग।'

मस्टराइन कहली-'दीदी राउर सुभाव त गाँव भरि के लोग जानेला, बाकिर रउवा मालिक के केहू जो निम्मन कहित! आप कहीं त रउवा हम एइसन बहुत कुछ बता सकीलें जवने के आप सपना में ना सोचले होखब! बाकिर जबान देई कि हमार बात सुनि के आप मलिकार से नाहीं कहल जाई। उहाँ का जानि जाइबि कि सब बात हम आपके बतवनीं हैं त गाँव में हमार जीयल काल हो जाई।'

चम्पा परधान कहली 'देखऽ मस्टराइन, हमके दीदी कहेलू त भरोसा राखऽ दीदी तहार कवनो नोकसान नाहीं होखे दीहैं। हमसे सब बात साफ-साफ

बतावऽ।' 

मस्टराइन बहुत दिन से चाहत रहली कि केहू एइसन मिलत जेसे परधनवा के कुलि कुकुरम कहती। आजु मौका देखि के उनके सुरसती अछोधार होके बरिसे लगली। कहली- 'दीदी रउवाँ अभय दे तानीं त सुनीं। जब सुनल नीक ना लागी त हमके टोकि देबि। हम चुपा जाइबि।'

चम्पा परधान कहली-'तू कहऽ, हम सब कुछ सुनल चाहत बानीं। हमरो जीउ उप्पर-झाँपर सुनत-सुनत पाकि गइल बा। आजु तू कुलि उदिया-गुदिया हमके निधारि के बतावऽ।'

मस्टराइन गहिर साँस खिंचली आ कहली 'लेई जब सुनले चाहत बानीं त सुनीं। का का सुनबि ? परसाल जवन हई राउर नवका बंगला बनल तवन जनलीं कौने पइसा से बनल ?'

चम्पा पुछली-'कवने पइसा से बनल ? हम कइसे जनतीं! अब बतावऽ। ईहे कुलि जाने खातिर न बोलवनीं हैं तहके।'

'गाँव भरि में कुलि रस्ता भरवावे के, पकिया ईंटा से खड़ंजा करावे के आ बरसात के पानी बहे खातिर नारी बनवावे के जवन पइसा आइल रहल ओसे राउर बँगला बनल। बिना एक्को छेव माटी भरवले सब सड़क भरल देखावल गइल। एक बोरा सिरमिट में सोरह बोरा बालू मिला के सेम ईंटा से नारी बनली कुलि। रउवाँ एक बेर गाँव में निकड़ि के अपनी आँखि से देखि लेई कि एक्के बरसात में सब खड़ंजा धौंस गइल। जगहि-जगहि गड़हा बनि गइल आ कुल्ही नारी सि के बइठि गइल। जाँवा पानी नाहीं लागत रहे ओहू जा पानी लागे लागत। नारी आ खड़ंजा बनले से गाँव के रस्ता अउर नरक हो गइल। कहत-कहत मस्टराइन हाँफे लगली।

चम्पा परधान के थूक सरकि गइल। उठि के पानी ले अइली आ मस्टराइन के पिए के दिहली। जब मस्टराइन पानी पी भइली तब उनके हाथ पकड़ि के कहली-'कहऽ, आगे कहऽ, हमके सब बात बतावऽ।'

मस्टराइन बहुत उदास हो गइली। कहली 'हम रउवाँ से केतना केतना कहीं ? केकर-केकर बीपत कहीं ? रउवाँ जानत बानी न कि आरती केतना सुखी रहली आ केतना विपत में परि गइल रहली। जबले उनके मरद रहलें तबले आरती केकरा के का नाहीं देत रहली। एक से एक धनी-मानी लोग के कुछ न कुछ देते रहली। गरीब गुरबन के हारी-बेमारी में आरती एक्के गोड़े ठाढ़ रहें। जे जवन माँगे तवन देबे खातिर आरती धधाइल रहें। जइसे भगवान उनके दिहले रहलें ओइसहीं ऊ दूनू हाथे बाँटत रहली बाकिर मरद के एइसन बेरामी धइलसि कि एकहक पइसा ओरा गइल। तब्बो परान नाहीं बाचल।' 

उनके आँखि मुनते दूनू बेटा बहेंगवा होके बाँट बखरा क लिहलें आ जुआ-सराब में रहल-बचल खेतबारी बिलवा के बिलल्ला हो गइलें। जवन आरती दूध के कुल्ला करत रहली के दाना-दाना के मोहाल हो गइली। लोग कहल कि सरकार से विधवा पिसिन मिलि जाई त जीए भरि के अलम हो जाई। हमहूँ पता लगवनों आ आरती से कहनीं कि परधान जी से कहऽ। बहुत दिन ले आरती लाजे कठुआइल रहली। जब नाहीं खेपाइल त परधान जी से कहली। महिन्नन दउरवले के बाद परधान जी कहलें कि दफतर में पाँच सौ रूपया घूस लागी तब विधवा पिनसिन बनी। आरती के लग्गे एगो निसनू पछेला रहल। ओके बेचि के परधान जी के दिहली। ओकरी बाद लगली परधान जी के गोड़धरिया करे। साल भरि बीति गइल। परधान जी देस-दुनिया के बाति बतावत-बतावत उनके जीउ नेकुआइन क दिहलें। थाकि के एक दिन दुआरी पर बइठि के रोवत रहली। ओहर से उपपरधान जात रहलें। आरती के आछोधार रोवल देखि के पुछलें कि का भइल ! काहे एह तरे जीउ देत बाड़ी ?'

आरती आपन सब बात बतवली। परधान के पाँच सौ रूपया दिहले के बात बतवली। उपपरधान कहलें कि ऊ दफतर में जा के पता लगइहें आ पिनसिन जरूर निकड़वा दीहें। तीन चारि महिन्ना कहो आरती के दउरवलें। एक दिन कहलें कि दफतर में तहार दरखास गइले नइखे। जवन रूपया तू दिहले रहलू ऊ परधान का जने के के दिहले बाड़ें। अबसे कवनो जोगाड़ क के पाँच सौ जुटावऽ आ हमके द त हम दफतर में देके तहार पिनसिन निकड़वा देइबि।'

'तब ? तब का भइल ! निकड़ल आरती के पिनसिन ?' बेहाल होके चम्पा परधान पुछली।

मस्टराइन के आँखि छलछला गइल। अँचरा से लोर पोंछत कहली- 'मिलल रहित विधवा पिनसिन त आरती सलफास खाके जान दिहले रहती?' कहि के मस्टराइन सुसुके लगली। चम्पा परधान की दूनू आँखि से आँसु के धार बहि चलल। बहुत देरी ले दूनू जनी चुपचाप टिसुना बहावत बइठल रहली। मस्टराइन कहली-'दोदी, अब चले द हमके। कहाँ ले सुनबू अपने मालिक के करतब ! बाकिर हम एक्के बात कहबि। भगवान आप लोग के सब कुछ दिहले बाड़ें। धन, धरम, घर-दुआर, लोग लइका। एतना सुन्नर राउर बेटा बाड़े कि जहाँ खड़ा हो जालें उहाँ उजियार हो जाला। बाकिर हम त मन ही मने डेरात रहीले कि बाप के पाप बेटा पर परी त बेटा कइसे सही सलामत रहि पइहें।' 

चम्पा के करेजा में धक्का लागल। उनका बुझाइल कि सहर में पढ़वाला उनके एकलौता बेटा पर बाप के पाप के पहाड़ टूटि के गिरि परल बा। चम्पा परधान का ईहो होस नाहीं रहि गइल कि मस्टराइन उठि के जात बाड़ी त उनके दू टुम बतिया के चौकठे ले बिदा क देती।

मस्टराइन चलि गइली तब्बो चम्पा ओही जगह बइठले रहि गइली। अपने

बेटा के कुसल छेम खातिर देवी-देवता मनावे लगती। उनका बुझाइल कि आरती के

छपटात परान परधान के बंस नास करे के फाँड़ बान्हि लिहले बाड़ें। जीव साँसत

में परि गइल। बुझाइल कि बेटा कौनो आफति में परि गइल बा। एहर-ओहर तकली,

केहू एइसन ना लउकल जे उनके बाबू के हालचाल बतावे। रोवाइन परान हो गइल।

तब्बे मन परि गइल कि फोन से त तुरन्ते हाल-चालि मिलि जाई। भागल दुआर पर

गइली। जवने कोठरी में फोन रहल ओमें ताला लागत रहल। खुललो रहित त उनका

फोन मिलावे कहाँ आवेला। का करें ? तबले पिण्टू लडकि गइलें। बोला के पुछली

'ए बेटा, कहाँ जात बाड़ऽ ?'

पिन्टू कहलें 'काकी, बजारे जात बानीं।'

चम्पा कहली-'बाबू तनो हमके पीसीओ तक ले ले चला। बाबू के फोन

करेके बा।' पिण्टू साथे ले के गाँव के बहरा गइली। सोहन पुछलें-'कहीं काकी, कइसे आप आ गइनों। हमहीं के बोलवा लिहले रहितीं। बताई कवन सेवा करी।' चम्पा कहली, तनी हमरे बाबू से बाति करवा द। हमार जीव बहुत घबड़ात ह।' सोहन पुछलें-'बाबू के नम्बर ले आइल बानीं ?' चम्पा त बाबू के नम्बर जनते नाहीं रहली। कहली 'ए बचवा, हम त जनते नइखों उनके नम्बर काहऽ।' सोहन कहलें 'रहीं हम देखऽतानी। हमरी डैरी में लिखल होखी। जल्दी-जल्दी अपनी डैरी में से अंकुर के फोन नम्बर खोजि के मिला दिहलें। ओहर से उनके आवाज सुनि के कहलें 'अंकुर बाबू! हम गाँवे से सोहन बोलत बानीं। ल अपनी माई से बतिया ल।'

चम्पा फोन मुहें लगे ले जाके बोलली 'बाबू ?' ओहर से बाबू कुछ बोलें ओकरे पहिलहीं पुक्का फारि के रो दिहली। बाबू ओहर से हलो-हलो करें आ महतारी रोवत जासु। सोहन उनकी हाथ से फोन ले के कहलें 'तहार माई का जने काहें बहुत घबड़ाइल बाड़ी। तहार हालचाल ठीक बा न?' ओहर से जबाब आइल 'हमार हालचाल ठीक बा, पहिले तू हमरी माई से बाति करावऽ। कुछ जानत बाड़ ? काहें रोवति बा? हमरे घर सब ठीक बा न ?' सोहन कहलें 'बाबू अबहिन त काकी से कौनो बातिए ना हो पावल। ल काकी चुपा गइली। उनसे बतियावऽ।' 

चम्पा हाथे में फोन पकड़ि के करेजा दीढ़ कइली आ फोने में बोलली- 'बबुवा तू नीके-सुखे बाड़ऽ न ?' अंकुर घबड़ा के पुछलें 'हम त ठीके बानीं, पहिले तें ई बताउ कि रोवत काहें बाड़े। घरे सभे ठीक बा न ? आ तें पीसीओ पर काहें अइले ह ? बाबूजी कहाँ बाड़े ? घर के फोन बिगड़ल बा का ?'

चम्पा तबले अपना के सम्हारि लिहले रहली। कहली 'सभे ठीक, बा बच्चा। घर के फोन ठीके बा। तहार बाबू जी कहीं गइल बाड़ें। कोठरिया में ताला लागल बा। हमरे जी बहुत घबड़ात रहल ह। बुझाइल ह कि हमरी लइकवा के कुछु हो गइल बा। एही से अफना के एइजा चलि अइनीं हैं। तू ठीक बाडऽ न ?'

अंकुर बिगड़लें। कहलें 'ते एह लेखा घबड़ा जइबे त कइसे काम चली माई ? अब त तें गाँव के परधान हो गइल बाड़े।'

'आरे बचवा ऊहे त हमरे जीव के काल हो गइल बा। तू आवऽ त हम आपन बिपत कहीं। एइजा त केहू हमार सुने वाला नइखे।'

अंकुर कहलें- 'कौनो बात नइखे। जइसे जइसे बाबूजी कहें ओइसे करत चलु। हम दस बारे दिन बाद आइबि। जो घरे जो। हम साँझि के घरे फोन करबि।' चम्पा पिण्ट्र के साथे घरे लवटलो। बाबू से बतिया के उनके जीव में तीहा भड़ल। बाकिर साँझि होत होत गाँव भरि में खबर फइलि गइल कि चम्पा परधान बहुत घबड़ाइल सोहन के पीसीओ पर गइली ह आ फोने पर रोवे लगली ह। एतने नाहीं, कहे वाला ईहो बतावे लगलें कि ओकरी पहिले मस्टराइन चम्पा परधान किहाँ गइल रहली आ दूनू जनी में बहुत लमहर बतकही भइल।

चम्पा बाबू से बतिया के जीव हलुक क लिहले रहली बाकिर आरती के मरले के एकहक बाति उनकी हिरदे में नाचत रहे। बेर-बेर उनका ईहे कचोटे कि क कौनो लेखा जानि पवले रहिती कि आरती के साथे एतना धोखा हो रहल बा, तब कवनो उपाहि कइले रहती। बेचारी दाना दाना के तरसि के मरलि। एतना सोचते चम्पा की करेजा में हूक उठलि। बुझाइल कि आरती के पाप में उनहू के हिस्सा बरोबरे बा।

'ए काकी ! बड़का बाबूजी पूछऽतानी कि आजु चाह नाहीं मिली का ?' छोटकी के ई बात सुनि के चम्पा होस में अइली। कहली 'ए बेटी। हमार जीव नीक नइखे। आजु तूहीं चाह बना के बड़का बाबूजी के दे आवऽ। अपनो के बना लीहऽ आ दुआर पर खदेरन बाड़े, उनहू खातिर बना लीहऽ।'

छोटकी चाह बना के बड़का बाबू जी के देवे गइलि त ऊ पुछलें 'का रे छोटकी अंकुर की माई के जीव नीक नइखे का ?' 

छोटकी बतवलसि-'हँ बड़का बाबू जी ! काकी के जीव ठीक नइखे। उनके मुँह सुक्खल बा। आँखियो लाल भइल बा। बुझाता कि बहुत रोवल बाड़ी।'

बड़का बाबूजी घबड़ा गइले। चाह फरके ध के छोटकी से कहलें- 'तनी जा के पूछि आव कि भइल का बा ? कौनो दर दवाई के जरूरत होखो त अब्बे जा के ले आईं।'

छोटकी जाके काकी से कहलसि कि बड़का बाबू जी पुछऽतानीं कि कौनो दवाई ले आवे के होखे त उहाँ का ले आईं। चम्पा कहली 'कहि द कौनो दवाई के जरूरत नइखें। जीव नइखें खराब। हमार मन खराब बा। ओकर दवाई कहाँ मिली !' छोटकी अचकचाइल खड़ा रहि गइलि। ऊ कइसे बूझो कि मन आ जीव फरके-फरके होला ? कुटु सोचि के ऊ बड़का बाबू जी की लग्गे जा के कहलसि-'बड़का बाऊजी। काकी के मन बथत बा।'

छोटकी के बात सुनि के बड़ा बाबूजी हॉस परलें। बड़का बाबूजी के के हँसल सुनि के चम्पा सोचे लगली कि का जने छोटकी उहाँ से जाके का कहलसि ह। काकी के मन बथत बा। सुनि के चम्पा मुस्काए लगली। छन भरि में चेहरा से मुस्कान बिला गइल। कहली-'ए छोटको, चाह पीलऽ आ आजु खैका तुहईं बना द। हमार मन नइखे करत।' छोटकी काकी के एतना माने ले कि उनके कौनो बाति नाहीं टारे ले। ओही समें से ऊ चौका चूल्हा सम्हारे लागलि।

चम्पा परधान अपने मन के केतनो काबू में कइल चाहें ओ पर कवनो जोर नाहीं चले। अपनी कोठरी में ओठोंग के लगली अकास-पताल के जरि-पुलुई मेरावे। अपने पति के एकहक बाति मन परे त करेजा में लवरि बरि जा। जहिया से इनकी घरे अइली तहिए से इनके मनबढ़ सुभाव के खोंच उनके मन पर लागल सुरू हो गइल। गौना भइल त पढ़त रहलें। महतारी लइकइए में गुजरि गइल रहली। बाप दूसर बियाह नाहीं कइलें। दूनू भाई के पोसलें। उनकर महतारी लइकन के आजी से अधिक माई बनि के पोसली। बड़का जने तनि जिउगर रहलें त ओही लेखा गम्होर सुभाव रहल बाकिर छोटका जने रहले बरहो बाट। आजी के एक्को बात नाहीं मानें। कब्बो कब्बो रिसिया त उनके नटई दाबे लागें। गौने अइले पर ऊ एक दम्मे बूढ़ खुइलन हो गइल रहली। चम्पा के देखि के उनके जियरा जुड़ा गइल। देखते कहली 'ल ए बहुरिया, सम्हारऽ आपन राजपाट, आ अपने रामलछुमन के।' कबो कबो हँसि हौस के बतावें कि तहार दुलहा केतना केतना हमके परसान करें। माई की मुवला की बादि के इनकर कुल्हि खिस्सा बूढ़ा बतावें। बड़कू तनि सोझिया रहलें। पढ़े नाहीं। खेती-बारी में खूब अखड़ि के डटल रहें। बियाहे के उमिर बीति गइल। बात में जब कामकाज सम्हरल आ धन बढ़िआए लागल त कई जने बेटिहा अइलें। ऊ कहले अब एह उमिर में हम का बियाह करीं। छोटका भाई पढ़त-लिखत बा। अब ओही के बियाह कइल जाई। बंस त चलबे करो।

सिनेमा को लेखा चम्पा की आँखि के सामने सब बात खुले लागल। जब गवने अइली त पढ़त रहलें उनके दुलहा। बाप-भाई जेतने माने लोग ओतने ऊ मनबढ़ होत गइले। जब सहर से घरे आवें त जाए के नाव नाहीं लें। चम्पा लाज के मारे गड़ि-गड़ि जाँ कि लोग का कही। ईहे न कही कि मेहरी के मुँह देखि के पढ़ल-लिखल भुलवा दिहले बा। चम्पा बहुत-बहुत समुझावें। चिरौरी-मिनती करें तब पढ़े जाँ। दसे दिन में फेर लवटि आवें। सहर में रहले के जवन खरचा घर के मालिक लोग दें ओक आधे महिना में उड़ा के चम्पा से रूपया माँगें। जबले नइहर से ले आइल रूपया पइसा रहल तबले देत रहली। जब ओरा गइल ता गहना-गुरिया बेचि के देवे लगली। जब कहें कि हम कहाँ से ले आई रूपया-पइसा त मुँह फुला के बइठि जाँ। चम्पा इहे सोचत रहली कि अच्छा चलऽ, पढ़ि-लिखि लीहें कवनो नौकरी-चकरी पा जइहें त गहना गुरिया फेरू बनि जाई। पढ़ाई के कौना ओर नाहीं लागत रहे। गौना भइल त बारे में रहलें। ओमे पास भइलें त बीए पढ़लें। ओकरे बाद एमें पढ़लें। ओहू पर नोकरी नाहीं भेंटाइल त मेहरी के दोस लगावें तेंहीं एइसन कुलच्छन बाड़े कि नोकरी नइखे मिलत। सब कुछ सहत चलि अइली। आजी मरली ओकरे साल भरि बाद उनके बाप चलि गइलें। बड़कू जने कहलें कि घरे रहऽ दूनू भाई मिलि के खेती सम्हारल जाव। चम्पा काँपि गइली ओह साल के इनके कुलि बात मन परले पर। एक बरिस ले गाँव में खेती करत करावत में एतना उतपाति कइलें कि जीयल मुहाल हो गइल। ओकरे बाद इनके तकदीर एइसन खुलल कि परधानी के चुनाव आइल। इनके खड़ा करा के लोग जिता दीहल। सहर में नोकरी नाहीं पवले के कुलि कसर ई परधान होक निकाड़े लगलें। एक ओर धन बढ़े लागल दूसरे ओर इनके मान बढ़े लागल। चम्पा अपने अंकुर के पालत-पोसत जिनगी के सुख में बूड़े उतिराए लगली।

करवट बदलते जइसे करेजा में काँट करकि गइल। अब जब परधान हो गइल बाड़ी आ आजु एके दिन में मस्टराइन से बाति कइले पर इनके धन आ मान के कुछ कारन जानि पवली ह त पछिली बातिन के अरथ परत-परत उघरि रहल बा।

'ए काकी, छोटका बाबू जी बोलावत बानें। अंकुर भइया के फोन आइल बा।' छोटकी के बात सुनि के चम्पा एह छन में लवटि अइलीं। कहली 'जो कहि दे ऊहे बतियावें। हम नाहीं आइबि।' छोटकी बहरा जाके कहलसि 'काक्री कहऽताड़ी कि तुहई बतिया ल ऊ नाहीं अइहें।' सुनते जोर से चिल्ला के कहले-'कहा कि अंकुर उनही के बोलावत बा। कहत बाड़ें कि माई का जने काहें रोवति रहुए। ओही से बात करावऽ।'

पति के चिघरल सुनि के चम्पा उठली। कोठरी से बाहर निकड़ि के बेटा

के फोन सुने पहुँचली। बोलली-'का बाबू ! का कहत बाड्ड ?' अंकुर कहलें-'माई, अब तें ई बताउ कि काहें रोवति रहुए। जबले रोवले के कारन नाहीं बतइबे तबले हमरा चैन ना परी।'

माई कनखिए से तकली, अंकुर के बाप कोठरी के बहरा खड़ा रहलें। बेटा से जवन बतियइती कुलि बाति सुनि लेतें। फोन में कहली 'बाबू तू फिकिर जनि करऽ। जब अइबऽ तब कुलि बाति बताइबि। एह बेरा कुछ जनि पूछऽ।' फोन घ दिहली आ छोटकी से कहली 'जा बेटी, दूनू जने के परोसि के खिया द। तुहू खालऽ आ बहरा खेदनो के खिया दीहऽ।' कहि के फेरू अपनी कोठरी में चलि गइली।

तिसरे दिन हरिजनपट्टी के बिना घर दुआर वाली मेहरारू चम्पा परधान की लग्गे आ गइली सँ। पुछली 'कहऽ लोग का बात ह ?'

फेकनी के माई कहलसि 'दुलहिन आप परधान हो गइनीं। अब हमन के भाग फरिया जाई। सुनात बा कि हमन के घर बनवावे के रुपिया सरकार किहाँ सेआइल बा। बनवा दीहल जाव त हमनों के जाड़ापाला में लुकइले के अलम हो जाई।'

चम्पा समुझि गइली कि मस्टराइन एह बाति के खोलले होइहें। एक लेखा उनका ठीके लागल कि अब उनके मन पर परल पहाड़ एइसन बोझा कम हो जाई। जब बात फइल जाई त चोरी से कुलि धन हजम के लिहले कऽ कोसिस नकाम हो जाई। एह बेरा चम्पा की निगाह में अपने मरद से बड़हन चोर केहू नाहीं रहल।

हरिजन पट्टी के मकान बनववले के सपना अब चम्पा परधान की जिनगी के आपन सपना बने लागल। फिकिर एही बात के रहल कि उनका पढ़े-लिखे अइबे नाहीं करेला आ जेसे सबसे जियादा मदद के भरोसा रहल उनही से लड़ाई लड़े के बा। आगे सब कुछ अन्हारे लागत रहल कि अन्हरिया में दिजुली एइसन मस्टराइन के खेयाल आइल। आपने बोली मद्धिम क के फेकनी की माई से कहली-'तहनपाँच के घर त एह बेरी बनबे करी।' सुनि के ऊ लोग अपने अपने घरे गइली आ चम्पा मन में नया जोस महसूस करे लगली। धीरे-धीरे घर के काम-काज में उनके मन लागि गइल। उप्पर से सब काम-काज पहिले की लेखा करे लगली बाकिर चम्पा के मन में जवन किरौना घुसरि गइल रहल ऊ छने छन बढ़ लागल। उनका बुझाए लागल कि आजु ले चम्पा जवन चम्पा रहली ह उनके चोला भरि पुरनका रहि गइल बा। उनके भित्तर के सबकुछ बद‌ल गइल बा।

दुपहर में खा के ओठंगली तबले मस्टराइन आ गइलो। उनके देखि के चम्पा हुलसि के बोलवली। अपने पंलग पर बइठवली आ कहली 'मस्टराइन । हम बहुत कुछ ऊँच-नीच सोचत रहनी हैं। जबसे तहसे बात भइल हमार मने बदलि गइल बा। एक बेर त ई सोचत बानीं कि परधानी के चरखा उठा के फेकि देई बाकिर फेरू सोचत बानीं कि ओही चोरन के हाथ में फेरू सब कुछ चलि जाई। गाँव के बेसहारा हरिजन विधवा ओही लेखा बिना घर-दुआर के बिना खइले-पियले मूवत रहिहें सँ। सबसे गाहिर घाव हमरे मन पर ई लागल बा कि हमार अंकुर के का हो जाई जो पाप के कमाई के एक्को दाना हमरे घर में आई।'

मस्टराइन कहली 'दीदी आप एतना जीउ छोट जनि करों। महतारी बाप के पाप बेटा-बेटी के खाला बाकिर रउवा एइसन धर्मात्मा महतारी के बेटा हठवें अंकुर बाबू, रॉवा ले टेढ़ नाहीं होखी।'

'लेकिन हम करों का, ई त बतावंड हम बेपढ़ल लिखल आदिमी। कवनो तरे एह बेरी नाव लिखे के सिखनी हैं। पंचाइत के कौनो कैदा-कानून जनते नइखीं। जे कुलि बात समुझा के राहि देखावेवाला मालिक बा ओकरी मरजी से चलले में पापे पाप बा, त तुहई बतवाऽ हम का करों।' चम्पा रोआइन परान क के कहली। मस्टराइन कहली-'नीपढ़ भइले से जीउ काहें थोर करत बानी। आप कहत बानी न कि भित्तर से मन बदलि गइल बा। एकर फैदा ई होई कि अन्याय अत्याचार से जुझले के ताकत बढ़त जाई। पढ़े-लिखे के हम सिखाइबि। आप के दू महिना में हम अइसन बना देबि कि हिन्दी के किताब पढ़े लागीं। ओकरे बाद जेतने पढ़‌बि ओतने उघार होत जाई आगे के दुनिया। रहि गइल पंचाइत के कैदा-कानून जनले के बाति, त ऊहो धीरे-धीरे सब समुझत जाइबि। असल बात बा ईमान के। आप अपने ईमान पर कायम रहल जाई त सब कुछ ठीक हो जाई।

'अब तहरे भरोसा बा।' कहि के चम्पा मस्टराइन के आँखि में तकली। मस्टराइन कहली 'दीदी आप हमरे जिनगी के हालि त जनते बानीं।' हमार माई-बाप गरीब नाहीं रहलें। चहतें त लाख दू लाख दे के हमार निम्मन बियाह क दिहले रहनें। बाकिर हमरे पियककड़ भाई खातिर धन जुटवले कि फेर में हमार बियाह एगो एइसन जलुवा से क दिहल लोग जवन न मरदे रहल, न मेहररूए रहल। 

मरद के कपड़ा पहिरि के मरद एइसन लउकत रहल। बेटा के मोह में आन्हर हमार बाप जब नाहीं तब गुनगुनात रहें-

बिन मारे मुदई मरे, ठाढ़े ऊँखि बिकाय ।

तीनो टरे बलाय ।। बिना व्याहे बेटी मरे,

लइका रहनी तबे से ई सुनत रहनीं। ओह समें एकर अरथ नाहीं बुझात रहल। जब हम नाहीं मुवनीं त पइसा बचावे खातिर हमार कसाई बाप ओइसन बियाह क दिहलसि। हम ओकर बलाइ रहनी। हमसे छुटकारा पावे खातिर हमार आल्हर जिनगी नरक क दिहलसि। कहत कहत मस्टराइन भोंकार पारि के रोवे लगली। थोरका देर में बहरा लोग का कही एकर खंयाल भइल त मुँह बन्द क लिहली बाकि आँसु के गगरी ढरकल बन्द नाहीं होखे। सगरी देहिं से रोवत सिसुकत मस्टराइन के अँकवारी में लेके चम्पा देरी ले सुहुरावत रहली। कवनो तरे मस्टराइन के रोवाई बन भइल, आँसु के गगरी ढरकल बन भइल त चम्पा अपनहीं उठि के पानी ले अइली। कहली 'ल पानी पीयऽ, उठि के मुँह घोवड। आ पहिला जिनगी के नरक मन पारि के रोवले से का फैदा। चलऽ आगे देखल जाव।' मस्टराइन पानी पियली। उठि के मुँह धोवली। अँचरा से हाथ मुँह पोछि

के जब पलंग पर अइली त चम्पा का बुझाइल कि मस्टराइन के मुँह बहुते सुत्रर

हो गइल बा। जइसे करिया बदरी में से बहरिया के चनरमा मुस्काला ओही लेख

मुस्का के मस्टराइन कहली 'जाए दीं दीदी! जब मन परेला त करेज्जा में लुक्क

बरि जाला। बाकिर हमार सत्त हमरा साथै रहल आ भगवान के भरोसा रहल। ओही

समें माई-बाप के मरजी के नकारि के अपनी पढ़ाई पर हमरा भरोसा बढ़ि गइल।

हाईस्कूल त हम पास रहबे कइनों, इण्टर के फारम भरनीं। जिनगी में अन्हरिया जेतने

बढ़त गइल हमार पढ़ाई के जिद ओतने हमके रोसनी से भरत गइल। आपन मरद

कहाए वाला जलुवा से सफ्फा कहि दिहनीं कि गलतियो से हमार नाव कबो लेऽ

त नटई दाबि देबि। ऊ एह लाएक रहबे नाहीं कइल कि मरदवाली जरूरत ओकरा

होखे। हम जिद क लिहनीं कि जवन माई-बाप हमके एह नरक में बोरि दिहले बा,

ओह लोग के दुआर पर कब्बो झाँकहू ना जाइबि। आ नहिए गइनीं। एक बात जरूर

कहबि कि हमार सासु कुछ कुछ हमार दुख बूझे लगली। हमरी पढ़ाई-लिखाई में

मदद त का करती, बाकिर आवे जाए में रोक नाहीं लगावें आ पइसो-रूपया के मदद

करें। ससुर पइसा के गोबरउरा रहलें। हमरे बाप की लेखा उनहू के पइसवे सबसे

बड़हन धन बुझा। हमरा त ईहो बुझाला कि अपने बेटउवा के ऊ डाकटरन से

देखवले रहतें, कुछ दवाई भी करवले रहतें, त हो सकेला ऊ जलुवा कुछ आदिमी बनल रहित। पइसा खातिर जे अपने बेटा के नाहीं भइल, ऊ पतोहि के का होई। बाकिर ओह विपत्ति में हमार सासु साथ दिहली। जब हम बोए पास हो गइनीं तब प्रिंसिपल हमार मदद कइलें। हमके बीटीसी के टरेनिंग करवा दिहलें, ओकरे बाद हम मस्टराइन हो गइनों।

कहत-कहत मस्टराइन के चेहरा दमके लागल। चम्पा का बुझाइल कि जइसे एक मेहरारू पर छछात दुर्गा माई के किरपा हो गइल होखे। एकरे पहिले चम्पा मस्टराइन के ओही नजर से देखत रहली जवने नजर से उनके गाँव के अवरू कुलि देखें सों आ बतकुचनी मेहरारू कुलि देखें सों। ओकनी लग्गे मस्टराइन के रचित्तर बखने के पोथी-पतरा हरदम खुलले रहे। चम्पा ओही लेखा उनके जाने। जब ऊ परधानी के चुनाव में खाड़ हो गइली तब उनकी खिलाफ बोले वालन के बहुत मसाला मिले लागल। एक बेर अंकुर के बाबूजी कहलें, 'अंकुर के माई, तहरा कौनो फिकिर नाहीं करे के बा। मस्टरइनिया एइसन ािर मेहरारू तहके चुनाव में

कब्बों नाहीं हरा पाई।' ओहि दिन चम्पा का बुझाइल कि गाँव भरि के अवर्रा आ छिनरा कुलि मस्टराइन की खिलाफ एसे बोलेलें कि ओह लोग के लासा ओकर देहि छुइयो नाहीं पावेला। चम्पा कहली 'बइठऽ, अब्बे आवत बानीं।' मस्टराइन बुझली कि पिछुवारे से लवटल चाहत बाड़ी। थोरके देर में चम्पा दू गिलास चाह ले के आ गइली। एगो मस्टराइन के हाथे में थम्हवली। कहली 'चाह पोऽ। हम तहार बात अगहूँ सुनल

चाहत बानी।' मस्टराइन हँसली। चाह थामत कहली 'दीदी। आपके हमरी कहानी में रस मिलत बा त हम जरूर जरी से लेके पुलुई ले सब बाति बताइबि। रठवाँ से हिरदे खोलि के कहत बानीं कि जब हम परधानी के चुनाव हारि गइनीं त हमरा बुझाइल कि हमार सबसे बड़का दुसमन रउरहीं बानीं। बाकिर अब राउर सुभाव जब नियरे से देखत बानीं तब कहे के मन करत बा कि रउरे एइसन उज्जर मन के कंहू मेहरारू एह गाँव-जवार में नइखे। अब गाँव के गरीब-गुरबा के हक के लड़ाई हम आप मिलि के लड़ल जाई।' कहि के मस्टराइन फेरू एक बेरी जोन्ही एइसन भुकभुकात हँसी हँसे लगली त चम्पा के जीव हरियरा गइल। कहली- 'हमहूँ के पढ़ावऽ तब न हम तहार साथ देवे लायक हो पाइबि।'

मस्टराइन कहली- 'का दीदी, आपो अनेति कर रहल बानीं। हम चारि जियादा पढ़ले से आप से अधिका हो गइल बानी का ? बाकिर आप पढ़े के फाँड् बान्हि लेहीं त हम बिहाने से पढ़ाई सुरू करा देबि ।' 

अंकुर के बाबूजी जानि-बूझि के मेहरारू से अझराइल छोड़ि दिहलें। मन में पलान बनावे लगलें कि जब इनके रीसि बुता जाई तब इनके कौनो तीर्थ घुमाइबि आ इनके मन बदलि देबि। आखिर हई त हमार मेहरिये न। जइहें कहाँ ? केतनो चिरई उड़ी अकास, दाना बा धरती के पास। कहियो के सुनल कबितई सुमिरि के मुसुकाए लगलें। बिडियो से कहि दिहलें 'अबहिन घोड़ी भड़कलि बा। कुछ दिन घुमा के सोझ क लेई, तब आगे विकास के कार करावल जाई।'

बिडियो मानि गइलें। उनकी समने सगरे बलाक के चरउरी रहल। एह गाँव के नम्बर बादे में सही। एह लेखा बात बेहवार करे लगलें कि जइसे उनका अब परधानी से आ गाँव के कवनो बात से कुछऊ लेबे-देबे के होखबे न करे। केहू कौनो बात कहे त कहि दें जा मरदे पाछे देखल जाई। अबहिन हम दुसरे कार में अनुराइल बानीं। लोग लवटि जाइल करे।

अंकुर अइलें त घर में उजास हो गइल। चम्पा उनके देखते धधा के कोरा में दाबि लिहली। लगली उनके हाथ-मुँह-पीठि सुहुरा सुहुरा के देखे। चम्पा जब अंकुर के अँकवारी से अलगे क के देखली त खुसी कि मारे हिहा गइली। कहली 'अरे हमार बबुनवा एतना बड़हन हो गइल ! अब त कुछुए दिन में बापो से बड़ हो जाई।'

माई के हँसत देखि के अंकुर के मन के बोझा उतरि गइल। कहलें- 'का माई, अबहिन केतना दिन भइल तोरी लग्गे से गइले। इतने दिन में हम केतना बढ़ि गइल बानीं ! बाकिर एक बात बा। ओहि दिन फोने पर तोर रोवल सुनि के हमार जिउ झुरा गइल रहे। इंतहान नाहीं रहित त हम पढ़ाई-लिखाई छोड़ि के ओहि दिनवे तोरी लग्गे आ गइल रहतीं। आजु तोके खुस देखि के हमरा बड़ी खुसी होति बा।'

बेटा के बात सुनि के चम्पा की मुँहे पर पहिली इयादि के छाहीं उतरि आइल, बाकिर तुरन्ते ओके हटा के कहलो 'जब तहके राजी खुसी देखि लिहनी त हमार कुलि दुख-बलाई भागि गइल।'

अंकुर के नहइले-खइले ले चम्पा का अउर कौनो बाति नाहीं लउकल। जब खा-पी के किताब ले के अंकुर बँगला में जाए लगलें तब अचक्के जइसे चम्पा के जीउ सकपका गइल। डंग बढ़ा के बेटा के कुर्ता के छोर पकड़ि लिहली। अंकुर पाछे घुमि के तकलें। पुछले 'का माई ? कुछ कहत बाड़े ?' सवाल पुछले कि सथहीं अंकुर खेयाल कइलें कि थेरके देर पहिले माई के दमकत चेहरा अचक्के मुरझाइल कहें लागत बा ? घूमि के माईं के दूनू हाथ अपने हाथ में लेके पुछलें- 'का माई ? का कहत बाड़े ? आ तोर मुँहवा झुराइल कहें लागत बा ?' चम्पा हँसि परली। कहली- 'नाहीं रे, कुछ नाहीं भइल बा। तह से एकठो बात कहल चाहत बानीं। तू नवका-बँगला में जनि जा। एही घर में अराम करऽ। हमरी कोठरी में चलऽ पलानी में रहऽ।'

'काहें माई ?' अंकुर भकुवाइल पूछे लगलें। चम्पा सोच में परि गइली। लइकवा से का बताई कि काहें नवका बंगला में गइले से रोकत बानीं। अंकुर फेरू पुछलें-'काहें माई ! नौका बँगला में का भइल बा ?'

'भइल कुछ नइखे । हमरा पता चलल ह कि गाँव के गरीब लोग के घर बनवावे वाला पइसा से ऊ बँगला बनल बा। तू हमार एकलौता बंस बाड़ऽ। हमार मन गवाही नइखे देत कि हम तहके ओमें जाए देईं। तू सही-सलामत रहऽ। पढ़ि-लिखि लेबऽ, कवनो नोकरी-चकरी पा जइबऽ त कई गो बँगला बनवा लीहऽ।'

अंकुर माई के मोह के बुझलें। कहलें 'तें कहत बाड़े त हम ओमें नाहीं जाइबि। बाकिर पहिली बात त ई कि एह बेबुनियाद बात के पता तोरा कइसे चलल कि गाँव के गरीबन की पइसा से बनल बा ? दूसर बात ई कि मानि ले एइसन भइलो होखे, त का हमरी जाते बँगलवा भहरा के गिरि जाई। सहर में जा के देखु जौने नेता किहाँ भूजल भाँगि नाहीं रहे ऊ कुलि एमपी एमेले मंत्री होते करोड़न के कोठी बंगला बनववले बाड़े सो। ओह कुलि के का बिगड़ि जात बा ? तें कहत बाड़े त हम आजु का, ओह बंगला में कब्बो नाहीं जाइबि।'

खेदन से कहि अंकुर दलानी में खटिया बिछवा के ओही पर ओठगि के हाथे में के किताब बाँचे लगलें।

पढ़त-पढ़त तनी सा आँखि भरमलि तबले माई भित्तर से निकड़ि के बोलवलसि- 'बाबू...।' चिहुकि के अंकुर उठि गइलें। खड़ा होके पुछलें 'का माई ! का कहत बाड़े आ हई तोरी हाथे में किताब कइसन ह ? अंकुर किताब माई कि हाथे से लेके देखे लगलें। माई के चेहरा फेरू खुशी से दमके लागल। कहली-'हम एगो कहानी पढ़ल चाहत बानों बाकिर एकहक अच्छर मिला के पढ़ले में देरी लागत बा। तू पढ़ि के सुना द।' अंकुर खुशी आ अचरज से भरि गइलें। चहकत पुछलें 'माई, ते पढ़े कबसे लगले ? का बाबू जी पढ़वले हैं ? कहिया सिखले ह, का का पढ़ले बाड़े ?' धधाइल बेटा सवाल पर सवाल करे लागल। 

चम्पा भित्तर जाके मचिया ले अइली। बेटा के खटिया पर बइठा के अपने मचिया पर बइठि के कुलि बाति बता ले गइली। कइसे उनके बाबू जी दसखत करे के सिखवलें, कइसे परचा भराइल, कइसे परधान भइले के बाद हरिजनपट्टी के गरीबन के घर बनवावे वाला धन के निकाड़े के बात भइल, कइसे बाबू जी से झगरा-टंटा भइल, कइसे मस्टराइन से भेंट भइल, कइसे उनसे पढ़े के सिखलीं। सब बात बता के कहली-'जहिया तहरी बाप से हमार पहिली लड़ाई भइल ओहि दिने से हमार नया जनम भइल, ईहे बूझि ल। ओहि दिने हम पीसीओ पर जाके तहसे बतियावल चहनीं आ तहार बोली सुनि के रोवाई आवे लागल। इहे बूझि जा कि तीन महिन्ना हो गइल ओही दिन से आजुले तहरी बाबू जी से हमरा भरि मुँह बात नाहीं भइल।'

अंकुर अपनी माई के बदलल रूप देखि के जेतनने चिहइलें, ओतने खुस भइलें। हाथे के किताब प्रेमचंद के लिखल रहे। ओसे 'बड़े घर की बेटी' कहानी पढ़ि के माई के सुनावे लगलें। कहानी खतम होखहीं वाली रहलि कि अंकुर के बाबू जी आ गइलें। अंकुर उनके पाँव लगलें। ऊ असिरबाद दिहलें। चम्पा की ओर तिरछे ताकि के टिभोली मरलें' आजु काल बड़ा पढ़ाई होत बा हो ?' अउरी टेढ़िया के जबाब दिहलें 'कवन अचरज बा ? आजकाल मस्टरइनिया के चेलिनि हो गइल बाड़ी। ऊ जवन-जवन न करावे! नया-नया परधान भइल बाड़ी आ मसटरइनिया भइलि बा इनके गुरूआइन। देखत चलऽ आगे का का होता ?'

अंकुर कहलें- 'बाबू जी, विद्या जेही सिखावे ऊहे गुरू होला। आ माई त कहति रहलि कि बाबुए जी सबसे पहिले दसखत करे के सिखवलें। अंकुर के बात पर एक बेर अउर टेढ़ जवाब दिहलें उनके बाबू जी। 'ई हे न हमसे बड़हन गलती हो गइल बच्चा ! हम त इनके परधान बनवनीं कि परधानी घरही में रहि जाव। एही से दसखत करे के सिखवनी। ई कहाँ जानि पवनी कि परधान हो के हमार बिलारि हमहीं से मेऊँ मेऊँ करे लागी। ई कुलि परपंच ओही मस्टरइनिया के ह। बाकिर देखि लेबि हम ओहू के। अबहिन त चुपाइल बानीं।' कहि के गुरगुरात घर की भित्तर चलि गइलें।

माई कहली- 'जबसे हरिजन पट्टी के मकान बनावे वाला रूपया कि बारे में पुछनी, तब से इनके इहे हालि बा। मस्टराइन से ऐसे फिरंट बाड़े कि ऊहे हमके बतवली कि गाँव के विकास में लागे खातिर आइल धन के कवने लेखा बंदरबाँट होत रहल ह। तू पूछत रहलऽ हमरे उदास भइले के कारन, तूहीं बतावऽ जवन घर गाँव में इज्जतदार मानल जाला ओही घर में एतना अनेति होखे त उदास काहें ना होखीं हम ? अब तू सेयान हो गइल बाड़ऽ। पूछऽ अपने बाप से कि गरीब लोग के नून-रोटी आ कपारे पर के छाँह छोरि के ई का करिहें ? भगवान कथि के कमी रखले बाड़े ?

अंकुर अबहिन एतना सेयान नाहीं भइल रहलें कि बाप के बात काटें भा उसकी समना खड़ा होके उनसे सफाई माँगें। बीए में पढ़त रहलें। सहर में रहले से समझदार होत रहले। माई के धरम-ईमान उनका बहुत नीक लागत रहे, बाकिर माई-बाबूजी के बीच चलेवाली तनातनी से झंझट में परि गइलें। कुछ नाहीं बुझाइल त किताब में से जवन कहानी पढ़त रहें, ओही के आखिरी हिस्सा पढ़ि के माई के सुनावे लगलें। कहानी पदि भइलें त देखलें, माई आँखि पोंछत रहली। कइलें-माई, तहरो हालि त कुछ कुछ ओही बड़े घर की बेटी से मिलत-जुलत बा। फरक एतने बा कि तहार लड़ाई अपनिए में बा।

माई का बोले, बूझि नाहीं पवली त चुप रहि गइली। अंकुर किताब के उलटत-पलटल रहले। उनके निगाह परल, 'पंच परमेश्वर' कहानी पर। कहलें 'माई आउ एगो कहानी हम अपने मन से तोके सुनावत बानों।' कहानी पढ़ि भइलें त चम्पा फफकि परली। चुप करवलें त चुपइली आ बेटा के हाथ पकड़ि के कहली- 'एह कहानी के आपने बाबू जी के पढ़वा द बेटा। उनके ई बता द कि पंच भइले के आ परधान भइले के का मतलब होला।' माई के बात सुनि के अंकुर का बुझाइल कि बाबू जी से कहानी पढ़े के कहल ठीक रही। पढ़ि लीहें त सचहूँ अनेति से बचि जइहें आ माई की साथे उनके झगरा झंझट ओरा जाई। किताब लिहले बाबू

जी कि लग्गे पहुँचि गइलें। किताब देखि के पुछलें 'ई का है ?' अंकुर कहलें-'प्रेमचंद के किताब ह। हम चाहत बानी कि एहमें एगो कहानी बा 'पंच परमेश्वर' एके आप पढ़ि लेतीं त बहुते नीक होइत।'

रीसिन मातल मिसिर जी किताब बेटा कि हाथे से ले के घुमा के फेकि दिहलें। कहलें 'ई कुलि जा के अपनी माई के पढ़ावऽ। हम पढ़ले बानीं। हम जानत बानी कि जिनगी किताब पढ़ि के नाहीं चलावल जा सकेला, लिखवइया का जानि, जिनगी का ह ?'

अंकुर किताब उठवलें आ चोखा एइसन मुँह बनवले माई की लग्गे चलि गइले। ऊ भित्तर से देखते रहली कि बाप बेटा के बिच्चे का भइल। किताब लेके कहली-'आपन लड़ाई अपनहीं लड़े के परी। तू जाके आपन पढ़ाई-लिखाई करऽ।'

अंकुर बाप-माई की लड़ाई में नाहीं परलें। उनका बुझाइल कि बड़का बाबूजी बाबूजी के बहुत मानें। बाकिर कब्बो दूनो जने में कौनो गम्हीर बातचीत नाहीं भइल रहल। जब अंकुर माई के कुलि बात जानि गइलें तब बड़का बाबू जी चुप्प लगवलें त बाबू जी से कहलें कि बाबूजी के समुझाईं। घर में पहिले बेर जबान खोललें। कहलें 'बच्चा ! ऊ हमार छोट भाई हवें। बाकि हम उनहीं के बड़ मानी लें। ऊ दुनिया जहान के चाल-चलन जाने-बूझेलें। हम उनके का समुझाईं ? तू पढ़ल-लिखल बाड़ऽ, तुहई समुझावऽ।'

अंकुर उदास हो गइलें। उनका बुझाइल कि घर के झगरा छोड़वले के कषनो उपाइ नइखे रहि गइल। उनके पढ़ाई-लिखाई एह मामला में कौनो काम के नईखे। माई बेटा के मुँह ताके लगली। आँखि भरि आइल। चुप्पे उठि के भित्तर चलि गइली।

दूसरे दिन अंकुर फेरू पुछलें 'कहते माई त हम चलि जइतीं।' माई कहलीं-'तनि हमार घाव कुछ भरि जा, त चलि जइहऽ।' अंकुर का कहें, कुछ समुझि नाहीं पवलें। माई के कहले पर रहि गइलें आ माई के पढ़ावे में जुटि गइलें। जब-जब फुरसत में माई के पावें उनसे कुछ न कुछ पढ़े के भा लिखे के कहें। बेटा के बाति महतारी के बहुते नीक लागे। अउरी जोर लगा के चम्पा पढ़े आ लिखे लगली। अंकुर जाए लगलें त कहलें माई, एहबेर हम तोरा खातिर बहुत निम्मन-निम्मन किताब ले आइबि।'

मस्टराइन अइली त चम्पा लिखत रहली। देखि के मस्टराइन चिहा गइली। कहली- 'दीदी, आप एतना सुन्नर अच्छर बनावे लगनीं। राउर लिखल देखि के केहू कहिए नाहीं सकेला कि नवकी पढ़वइया हई।' चम्पा कहली 'अंकुर जबले रहलें दिन भरि लिखववते रहें! अब हमार दू गुरू हो गइलें, एक गुरू तू हऊ, एक गुरू हमार बेटा।'

मस्टराइन कहली- 'अब हमके गुरू कहल जाई त हम आइल गइल होड़ि देबि। हई लेई पंचाइत के नवका किताब आपे खातिर ले आइल बानीं।' चम्पा कहली 'ओ आवड, पढ़ि लेइबि, बाकिर अपने से पढ़ि के केतना बूझबि।'

मस्टराइन मुस्का के कहली 'जब सचहूँ के परधानी कइल चाहत बानीं, त पढ़ही के परी, समुझहू के परी आ ओही लेखा करहू के परी।' कहि के मस्टराइन चम्पा के अंकवारी में भरि के दाबि लिहली। चम्पा का बुझाइल कि उनके देहिं दरकि गइल। कहली-'का मस्टराइन, तू त एड्सन जोर से दबा दिहलू जइसे जेवानी की नसा में मातल मरद मेहरारू के पा गइल होखे।' मस्टराइन मुरझाइल मुस्कान के बिच्चे से कहली-'कहाँ दीदी, हमरी जिनगी में एइसन मरद कहाँ भेटाइल कबो ? पापी बाप जवने जलुवा से बियहि दिहलसि ओकर हालि आपसे बतइबे कइनीं। मरद लोग त एक से एक ललचावत रहेलें, बाकि पढ़ले-लिखले से हम एतना त बुझिए गइल बानों कि एहतरे के लालच से कइसे बाचल जाव। जब केहू एहतरे के चाल करे ला त हम माई से सुनल एगो कहाउति घोखे लगीलें-'का तू बकुला देखावऽ दोठि, केतने जाल रगरि गइल पीठि।'

चम्पा मस्टराइन के आँखि में तकली। मस्टराइन के आँखि मुस्काए लागल। कहली- 'का दीदी! हमरे बात के बिसवास नइखे होत न ?'

'बिसवास काहे नइखे होत! बाकिर हम जानल चाहत बानीं कि का कवनों मरद तहके एइसन मिलबे नाहीं कइल जेके देखि के तहार जीव ललचा जा ?' कहि के चम्पा मस्टराइन की आँखि में आपन आँखि डारि दिहली।

मस्टराइन लजा गइली। कहली 'लरिकाई में एइसन कई बेर भइल। जवने लइका तनि धेयान से देखि ले, ऊहे आपन लागे लागे। बियाह के उमिरि भइल त का भइल बतवलही बानीं। ओह जलुवा के देखि के जीउ एइसन घिनाइल कि का बताई। ओह नरक से निकड़ि के जब अपने पैर पर खड़ा होखे के कोसिस करे लगनीं त जहाँ-जहाँ केहू से कवनो काम परे बुझा कि तब्बे होई जब हम मरद लोग के मन के साथ पुरवत चलीं। बाकिर विपत्ति आदिमी के बहुत कुछ सिखा देला। हमहूँ कौनो लेखा आपन राहि बनावत चलि अइनीं।'

चम्पा कहली - 'देखऽ मसटराइन, हमके रमायन मति सुनावऽ। हम पुछनीं हऽ कि केहू मरद का कब्बो नाहीं लउकल जेके देखि के तहार जोड ललचा गइल होखे ?'

नइखे।'

मस्टराइन लजा के कहली 'लउकल, बाकिर आप से बतावे लायक

चम्पा कहली-'का हमार सवति बनल चाहत बाडू ?'

मस्टराइन कहली- 'का दीदी ? अब ईहे रहि गइल बा ?'

चम्पा कहली-'तब हमसे बतवले में कवन हरज बा ?'

मस्टराइन उदास हो गइली। कहली 'दीदी एह गाँव के केहू एइसनो मरद बा जेकर निगाह हमरी देहिं पर ना होखे ? हम कइसे अपना के बचाई लें, हमहीं जानत बानीं।'

चम्पा घुड़कली 'फेरू उहें रमायन। हम जवन पूछत बानीं तवन बतावऽ। अच्छा, का अंकुर के बापो कब्बो कुछ कहेलें ?' 

मस्टराइन कहली- 'जाए दीं दीदी। ऊ कुल छोड़ीं। अंकुर के बाबूजी अब हमके मुदई बूझत बानीं, बाकिर कवनो जबाना रहे कि ऊहाँ का भँवरा बनल चहनीं।'

मस्टराइन देखली कि चम्पा के मुखड़ा मलिन हो गइल। तुरते झूठ बोल दिहली 'ना दीदी। एह बात पर तनिको विसवास जनि करीं। ई बात हम मजाक में कहनी हैं। आप अइसन मेहरारू पा के कवन अभागा होखी जे हमरी एइसन की पाछे दउरी ? हम हँसी करे खातिर रउवा से झूठ बोलि दिहनी हैं।' मस्टराइन कहे के कहि दिहली बाकि मन में आइल कि साँच-साँच बता के इनकी घर में आगि लगा देईं। मिसिर से बदला लिहले के निम्मन मौका मिलि रहल बा। बाकिर चम्पा के मोह-ममता की आगे उनकी मरद से बदला लिहले के भाव दबि गइल।

मस्टराइन कहली- 'बिसवास मानी दीदी, अंकुर के बाबू जी वाली बात झूठ ह। उहाँ के भला हमरी ओर तकबो काहें करबि।'

चम्पा मरद के सुभाव ना जानें, एतना अबोध नइखी। हौंस के कहली- 'का साँच ह, का झूठ अब तुहईं जनबू, ऊ जनिहैं। हम त तहरा से ई जानल चाहत बानीं कि घर बसावे के मन करेला कि नाही ? आखिर कबले अकेल्ले मजा करबू ?'

चम्पा के हँसत आँखि मस्टराइन के गुदुरा दिहली। कहली 'दीदी, जेवानी के आगि त विपत्ति से लड़त में अपने बरलि आ अपने बुता गइलि। अब राखिए बचल बा। अब राखी सहेजे खातिर बियाह का करीं ? बाकि कबो कबो सोची लें कि बूढ़ हो जाइबि त केहू आगे-पाछे नाहीं रहि जाई। हारी-बेमारी में केहू एक लोटा पानियो देबे वाला नाहीं रही त का होई !'

'एही से त कहऽ तानीं कि अबहिन तहार जेवानी बुताइल नइखे। अबहिन बियाह करे के सोचऽ त कई जने तहरी आगे-पाछे झूले लगिहें। कहऽ त हमहीं तहरे खातिर दुलहा खोजीं।' कहि के चम्पा मस्टराइन के गाले पर चिकोटी काटि

लिहली। मस्टराइन लाल भभूका हो गइली। चम्पा का बुझा गयल कि जरूर मस्टराइन कि मन के केहू बसल बा। कुल जुगुति लगा के पूछे लगली। मस्टराइन बाति बदलि दिहली। कहली- 'हरिजन पट्टी वालन के मकनिया के का होता, बताईं ? चम्पा कहली 'ओकर जवन होई तवन होई। एह बेरा जवन पूछत बानी

तवन बतावऽ। कहऽ त हम खोजी तहार बर !' मस्टराइन कहली-' अधेड़ उमिरि में बर मिली ? बर बरनाठ आ झरनाठ तीनि गो होला। अब हमके मिलबो करी त झरनाठे न मिली। अब जिनगी के कवन रस रहि गइल बा कि बर खोजल जाव ?' 

चम्पा कहली- 'जिनगी में रस उमिरि पर आवेला सही ह, बाकिर अबहिन तहार उमिरि चालीस से अधिका त नइखे न ? अबहिन रसगर बटले बाडू। जब रस गारे वाला भेटा जाई त कचहिन होखे लागी, कवन फेर में बाडू ! अच्छा, अब हम जोगाड़ लगाइबि तहरी बियाहे के।'

'ठीक बा, जइसन राउर मरजी। बाकिर हमसे उबिया के जीव नइखों न छोड़ावन चाहत कि कवनो लेखा आँखि को अन्हे जाउ ।' कहि के मस्टराइन हौंस परली। मस्टराइन का एह गाँव में एक्के मरद एइसन लउकले जेकरी आँखि में कबो कवनो पाप नाहीं लउकल। आजु ले कब्बो ऊ मनई उनकी ओर भा कवनों लड़की-मेहरी का ओर मन मलिन क के नाहीं तकलसि। अचक्के मस्टराइन की मुँहे

से निकड़ि गइल- 'अंकुर के बड़का बाबूजी के बियाह काहे नाहीं भइल ?' सवाल सुनते चम्पा के आँखि चमकि गइल आ मस्टराइन लजा गइली। चम्पा कहली- 'हमरिए घरे आइल चाहत बाडू ? ऊहो हमार जेठानि बनि के?' मस्टराइन घिघियाए लगली 'ना दीदी एइसन कवनो बात नइखे। कहाँ राउर घर आ कहाँ हम ! हम त एइसहीं पूछि परनीं हैं।'

चम्पा कहली- 'हम बहुत नइखीं जानत, वाकिर अंकुर के बाबूजी एकबेर बतवले रहलें कि बियाह के उमिरि बोति गइले के बाद जब एकाध जने बरदेखुवा अइलें त भइया जी कहि दिहनीं कि अब हमार बियाह का होई । छोटकू के बियाह होई। उनहीं से बंस चलि जाई। ओकरी बादि एकर चरचो कबो केहू नाहीं कइल। बिना बियाह के रहि गइनों उहां के, बाकिर कब्बो उहाँ के आँखि हम कवनो मेहरारू कावर उठत नाहीं देखले बानीं।'

मस्टराइन कहली- 'ईहे हमहूँ कहल चाहत बानीं। आप त भरल-पुरल सोहागवाली बानीं। जल्दी कंहू के हिम्मत ताके के करबे नाहीं करी। हम त बिना छाँह के बानीं, जेही के देखीं कहे आँखों में आँखि घुसेरि के सरबस लूटि लिहल चाहेला। एगो अंकुर के बड़का बाबूजी अइसन मरद बानीं जेकरे निगाह में आजु ले हमरा कौनो खोट कब्बो नाहीं लउकल। उहाँ के निगाह में औरत जात के छोट कइले के कौनो कोसिस नहीं लउकेला।'

चम्पा चुप रहि के सोचे लगली। उनके मन में मस्टराइन आ अंकुर के बड़का बाबूजी के जोड़ी के खेयाल उजियार होखे लागल।

ठीक त रही, बाकिर उहाँ का हमार भसुर ठहरनीं। हम कइसे बाति चलाई। अंकुर के बाप त सुनते जरे बरे लगिहें। तब के बा जे बाति उघारो। चम्पा के मन के भाव आँखिन में झलके लागल। मस्टराइन पढ़ि लिहली उनके मन के बाति 

तनीएसा लजइली। कहली का दीदी का अकास-पताल सोचे लगनीं। चले दी जइसन चलि रहल बा।'

'चलते बा। हम कुछु चहबो करों त का हो जाई ! कहि के चम्पा मुस्काए लगली।

मस्टराइन से कहली- 'सचहूँ बनि जा।'

मस्टराइन कहली-'हमरी चहले का होई ? आप बोडिओ से कहि देई त हो सकेला कुछ बात बने।'

मस्टराइन के देखि के बीडिओ साहेब चहकलें 'का मस्टराइन का हाल बा ? चुनाव हरले से उदास नइखू न भइल ? अगले बेर फेरू लड़िहऽ। देखल जाई!'

मस्टराइन कहली- 'अगले बेर के बात अगले बेर देखल जाई। अबहिन त चम्पा परधान आपसे भेंट कइल चाहत बाड़ी। बताई आप चलबि कि उनही के बोलाई ?'

बीडिओ चिहुकि गइलें। कहले 'उनके मलिकार त भेंट करते रहेलें हमसे। ऊ काहें भेंट कइल चाहत बाड़ी ?'

मस्टराइन कहली 'कौनो बाति बा तब्बे न हमके भेजनी ह। बताई, चलबि कि उनही के लिया आईं।'

बीडियो डायरी उलटि पलटि के कहले 'परधानजी से कहि दीहऽ बढ़िया दावत के इंतजाम करें, हमहीं चलि आइबि।'

मस्टराइन कहली-'अरे बड़का घर ह। जब चलबि त बिना दावत के नाहीं न लौटे दीहें।'

दिहली। बीडियो दू दिन बाद आवे के कहलें। मस्टराइन लवटि के चम्पा से बता

'त बताई कहिया चलबि !'

साँझि के मिसिर जी लवटलें। भित्तर से चाह आइल त गिलास उठा के

फकि दिहलें। छी मानुख छो मानुख करत एहर से ओहर डोलत रहलें। राति के खाए के बिज्जे भइल त चिघरि परलें 'हमरा भूखि नइखे।'

अंकुर के बड़का बाबूजी सँझहीं से भाई के हालि देखत रहलें। चाह के गिलास फेकल देखलें, एन्त्रे-ओन्ने फोफियात घूमत देखलें। कुछ नाहीं कहलें। जब खाए कि बात पर चिघरल सुनलें त कहलें 'का ह हो ? बउराइन बाड़ ? भूखि नइखे त मति खा, चिघरत काहें बाड़ऽ ?'

'देखऽ भइया, अब मस्टरनिया के आवल-जाइल एह घर में एतना बढ़ि गइल बा कि हमसे बरदास नइखे हो पावत।' कहि के रोसि में आपन दूगू हाथ मीसे लगलें। भइया कहलें 'मस्टराइन दुलहिन के पढ़ावत बाड़ी ई त बहुत नीमत बात बा भाई, तहरा काहें बाउर लागत बा ?'

'ऊ पढ़ावति बा कि हमरे घर में जहर बोवति बा, जनलऽ ह ? आजु हमसे बीडिओ साहेब कहत रहले हैं कि नौकी परधान जी के सनेसा ले के मस्टरइनिया उनके बोलावे गइल रहलि ह। अब तहार दुलहिन हमसे बात नाहीं करिहें सोझे बीडियो आ कलट्टर से बतियइहें ! दू दिन बाद बीडियो परधान जी से मिले अपने घरे अइहें। बतावऽ, कवन इज्जति रहि जाई ?' कहत-कहत रीसि के मारे अंकुर के बाबू जी रोवाइन मुँह बना के चुपा गइलें।

उनके भइया समुझवलें 'देखऽ तू त पढ़ल लिखल बाड़ऽ जबाना बदलत बा तेकरे साथे चले के सीखऽ। जब दुलहिन के परधान बनावे चललऽ तब्बे न ऊँच-नीच सोचल चाहत रहे। अब जब ऊ परधान बनि गइली, पढ़ल-लिखल सुरू क दिहली, गाँव के लोग से उनके दुखसुख के बाति सुने-समुझे लगली, त तुहईं चुपा जा। देखऽ कि कइसन परधानी करत बाड़ी। आ हम त सुनत बानी कि गाँव के लोग दुलहिन से बहुत खुश बा। हम त ईहो सुनत बानी कि हरिजनपट्टी के बेघरवालन के घर बनावे के पइसा आइल, खरच हो गइल आ ओकनी के एक्को घर नाहीं बनल। गाँव के लोग मुहाँमुहीं बतियावत बा कि नवकी परधान अब कौनो अनेति नाहीं होखे दोहें। त हम त ईहे कहबि कि जवन हो रहल बा, ओके होखे द। जाके खैका खालऽ। बीडिओ की अइले से तहार इज्जति नाहीं जाई।'

चम्पा परधान भैया जी के एतना बात कब्बो नाहीं सुनले रहली। उनका बुझाइल कि बेपढ़ल-लिखल इहाँ का अपने पदुआ भाई के मोकाबिला में बहुत समझदार बानीं। पढ़ाई-लिखाई भरभट्ट करेला का ?'

बहुत गुनत-मथत रहलो चम्पा परधान। मन में आवे कि नइखन खात त छोड़ि दीं। भुखइहें त अपने खइहें। नहिंयो खइहें त एक दिन में परान नाहीं निकहि जाई। एइसन सोचत अपनिए भित्तर से धिरिकार उठे लागल। मरद भुखाइल सूति जाई आ तू कुछऊ नाहीं करबू ! बहुत सोचा-बिचारी कि बाद चम्पा छोटकी के बोला के कहलों कि बड़का बाबूजी के बोला ले आउ।' छोटकी जाके कहलसि-'छोटका बाबूजी, काकी बोलावत बाड़ी, ओहर भइया कुलि बात देखत-सुनत रहलें। कहलें देखऽ अब तू निपट नंगई पर मति उतरि आवऽ। दुलहिन के बात धेयान से सुनऽ। जा खालऽ, आ ठंढा दिमाग से कुलि बात फरियावऽ। हम त अज्ञानी हईं बाकिर गाँव के लोग के मन में का चलि रहल बा, एकर हालि तहरा से ढेर हम जानी लें। गाँव के लोग दुलहिन के नौका परधान मानि लिहले बा। अब उनके परघानी करे के मौका दे द। पहिले चला, खाइल जाव।'

पहिलका परधान भइया के बात सुनि के फेर में परि गइले। भइया के एतना बोलल ऊ कब्बों नाहीं सुनले रहलें। सबसे अचरज के बाति ई बुझाइल कि ऊ अपने गाँव के मन आजु ले नाहीं जानि पवलें आ हरदम चुपाइल रहे वाला भइया गाँव के लोग के मन के बात एतना गहिरे ले जाके बूझि लिहलें। छन भरि खातिर उनका बुझाइल कि चम्पा उनके मेहरारू हई बाकि ऊहो उनसे जियादे गाँव कि लोग से तालमेल बना लिहले बाड़ी। एक ओर उनके भित्तर के आदिमी सुगबुगात रहल कि असल बाति त ऊहे ह जवन भइया कहत बाड़े। तब ? तब का मेहरारू से हारि मानि ले ? भित्तर के मर्द फोफिआइल 'एइसन नाहीं हो सकेला।'

कुछ कहें तबले भइया उनकी कान्हे पर हाथ ध दिहलें। कहलें- 'उठऽ, चलऽ खा लीहल जाव।' चुपचाप उठले आ भाई के साथे जाके ठहरी पर बइठि गइलें। छोटकी दूनू जने कि आगे थरिया सरका दिहलसि।

खा लिहलें त रीसि कुछ कम भइल बाकिर रहि रहि के भित्तर के मर्द फों-फो करे लागे। मन करे कि एह मेहरारू के नटई दाबि देईं। ओहू से पहिले ओह मस्टरइनिया के मूड़ी काटल जरूरी बा। मन जेतने फुफकारे ओतने भइया के बाति सोचि के मुरझा जाय। अद्धी राति ले नीनि के पते नाहीं। उठि के टहरे लगलें। देखत का बाड़े कि अंकुर के माई केवाड़ी के पल्ला पकड़ि के खाड़ बाड़ी। एकर मतलब ई हो नाहीं सुतल बाड़ी। तब ? चम्पा के नेह-छोह मन परल त कूलि रीसि ओसहीं बुता गइल जइसे जरत भरसाई में पानी परि गइल होखे। ओही मोह के डोरी पकड़ि के उनकी भित्तर के चोटाइल मरद आ मानुस दूनो एक्के साथे जागि उठलें। केवाड़ी की लग्गे जाके चम्पा के बांहि धइलें। ऊहो लपटा गइली। दूनू जने भित्तर गइलें केवाड़ी बन्न हो गइल।

ओहर केवाड़ी बन्न भइल, एहर बड़का भइया खटिया पर उठि के बइठलें। बुझाइल कि उनकी छाती पर चढ़ल भारी बोझा उतरि गइल। घर में दुइए परानी बाड़े स, आ जब लड़ाई-झगरा करे लागेले स त उनके मन फिकिर से भरि जाला। आँखि बन क के परल रहेलें आ भगवान से मनावत रहेलें कि दूनो परानी में मेल-मिलाप बनल रहो। जब जीउ निचिन्त भइल खेयाल करे लगलें कि एहर एकनी के झगरा के जरि मस्टराइनिया हो गइल बा। दुलहिन के बात मानीं त मस्टराइन उनके पढ़े-लिखे के सिखावत बाड़ी आ पंचाइत के कामकाज में मदद करत बाड़ी। मस्टराइन उनका एइसन नाहीं बुझाली कि केहू के घर बिगड़िहें। ऊ बेचारी अपनी मेहनत के बलबूता पर अपनी जिनगी के नाव खे रहलि बा। एक से एक अवर्रा अकेल मेहरारू जानि के ओकरे पाछे परल रहेलें बाकिर आजू ले कब्बो नइखे सुनाइल कि मस्टराइनिया केहू के पुट्टा पर हाथ धरे दिहले होखे। फेरू तुरन्ते राम-राम करें लगलें ई सोचि के कि आन मेहरारू के बारे में नीक बाउर कुछऊ सोचल ठीक नाहीं है।

घर में दूनू परानी एइसन सुतलें कि कुछ होस नाहीं रहि गइल। मुरगा के बोली सुनि के चम्पा जगली त देहीं के पोर-पोर दुखात रहल। न एइसन सुख बहुत दिन से मिलल रहल, न एइसन उंचाई लागलि रहलि। अंकुर के बाबूजी के गुदगुदा के जगवली। जब क जागि गइलें त कहली 'अरे भिनसार हो गइल। उठल जाई? आ रतिया का हो गइल रहे। बुझात रहे जइसे कौना दुसमन से बदला निकारत होखीं।' कहि के लजा गइली।

'इतनी घरी त तुहई हमार दुसमन भइल बाडू।'

जबाब में उनको आँखि में आँखि डारि के चम्पा कहली 'बनीं मति। मस्टराइन त रउरी पसन के मेहरारू हई।'

एह बेर तनिएसा लजइलें मिसिर आ कहलें 'तहसे कुछ कहले बा का मस्टरइनिया ? जरूर कहले होई। जब तहार गुरूवाइन बनलि बा त कवनो कसरि काहें छोड़ी ?'

चम्पा कहली-'मेहरारू एह कुलि बाति के बिना कहलहू जानि जालीं। ओइसे केहू जेवान अदिमी अकेल मेहरारू के देखि के झपटे त एमें अचरज कवन बा ? उनकी पाछे त गाँव भरि के छुटहा परल रहेले।'

अंकुर के बाबूजी चम्पा के दूनू हाथ अपने हाथे में लेके कहलें 'एतना दिन से साथे बाडू कबो एइसन सिकाइत पवले बाडू हमरी देहीं से ? बाकिर एक बात तहसे कहबि। जब ऊ परधान के सिकाइति करे लागलि त हम सोचनीं कि एक बेर हमरी जांघे कि निच्चे आ जाई त कम से कम हमरी खिलाफ मुँह त नाहीं खोली। इहे सोचि के एक बेर कोसिस कइनीं बाकिर ऊ छटकि गइलि।'

चम्पा हौंस परली। कहली नाहीं छटकल रहति तब त ओके हमार सवति बना लेतीं न ? ईहे मरद लोग के मरदाइ ह।' 

कहलें- 'देखऽ, कारन हम सोझ सोझ बता दिहनीं। अब जवन चाइऽ अरथ लगावऽ। कहीं एइसन त नइखे कि ओही के बदला मस्टरइनिया हमसे लेति बा।'

चम्पा कहली- 'नाहीं अइसन कौनो बाति नइखे। ओह बेचारी के दुर्गति जइसन बा, ओइसन भगवान मुदइयो के न करें। बाप अइसन पापी रहल कि पइसा बचावे खातिर एगो जलुवा से बियहि दिहलसि। क त एकरिए एइसन रहलि के अपनी मेहनत के बलबूता पर ओह नरक से निकड़ि के मस्टराइन बनि गइलि। ऊ केहू के सिकाइति नाहीं करेली। एक दिन बात-बात में उनकी मुँह से निकड़ि गइल कि सगरे गाँव में एगो अंकुर के बड़का बाबूजी एइसन बाड़े जिनकी निगाह में कौनो खोट नइखे। ओही बेरि हम पूछि बइठनों कि अंकुर के बाबूओ जी कबो कुछ कहलें, हँसि के रहि गइली। अच्छा एक बात बताईं। भइया जी आप से दुइए साल जेठ न हई। अबहिन त उहाँ क बियाह कइए सकीलें।'

मिसिर हसि परलें। कहलें 'मस्टराइन से भइया के बियाह करावे के विचार बा का ?'

चम्पा कहली- 'हमार बिचार होखबो करे त का होई ? भइया जी के मन के थाह मिलि जाइत त कुछ सोचलो जाइत।' चम्पा देखली कि उनके मालिक के मन फेरू बिगड़ही वाला बा। तुरन्ते बात बद‌ल के कहली 'देखीं। महित्रन बादि त ढंग से भेंटाइल बानीं। मस्टराइन के बात छोड़ों। आप से कहे के ई बा कि हमके आपन दुसमन जनि समझीं। परधानी कइले के हमरा कौनो सौख नइखे। जइसे आप करत रहनों ओइसहीं करत रहीं परधानी। जहाँ कहबि तहाँ हम दसखत करबि। खाली एक्के अरदास हमार बा कि गाँव के गरीब लोग के जिनगी जीए लायक बनावे खातिर जवन रूपया-पइसा सरकार से मिलत बा, ओके ओही कार में लगाई। ओमे से एक्को पइसा अपनी घर पर खर्च कइल हराम मानि के चलीं। गरीबन के आह अपनी आ हमरी एकलौता बेटा कि कपारे पर मति गिरे दीं।' कहत कहत चम्पा बिलखि परली।

मिसिर कहलें- 'देखऽ, एइसन बात नइखे कि हमहीं सब पइसा रूपया खा लिहले बानीं। बलाक के छोट से छोट करमचारी से ले के परमुख आ छोट बड़ नेतानेतकुल्ली सबके निगाह पंचाइत में आवे वाला रूपया पर लागल रहेला। सब गिद्ध लेखा नोचल चाहेला। कहाँ ले तू गरीबन के हक दियइबू।'

चम्पा कहली- 'देखीं। आप हमार बाति मानि के हमार साथ देई। आपन ईमान-धरम बनल रही त हम एह गाँव के धन लुटले से बचा लेबि। आ आप से ईहो कहत बानीं कि साल भरि में एइसन नाहीं क पाइबि तब ओइसन करे के तेयार हो जाइबि। चाहे परधानी ओह लोग की कपारे पर पटकि देबि। बस साल भरि हमार साथ देई।'

चम्पा की बात में आ कहले के ढंग में एतना जोर रहल कि ओसे इनकार कइले के हिम्मत जनावरो नाहीं करित, ऊ त उनके आपन पति रहलें। कहले-'अच्छा चलऽ। अब जइसन चहबू ओइसने होई।' चम्पा ओनके बहरा ठेलत कहली- 'जाईं, दुआर पर जाईं।' मुसकात मिसिर दुआरे चलि गइलें।

बिहान भइल। चम्पा सब कामकाज क के छोटको के भेजि के मस्टराइन के बोलववली। मस्टराइन अइली त कहली 'आजु चाह तुहई बनावऽ।'

मस्टराइन चाह बना भइली त चम्पा कहली- 'पहिले दुआर पर चाह दे आवऽ।' मस्टराइन चिहा गइली। कहली 'का कहऽतानी दीदी। हम चाह लेके जाईं । अंकुर के बाबू जी हमके देखते जरि बुतइहें।'

चम्पा कहली- 'आ अंकुर के बड़का बाबूजी का करिहें ?'

मस्टराइन लाल भभुक्का हो गइली। चम्पा की बरिआई कइले पर मस्टराइन चाह लेके दुआरे गइली। खेदन के चाह थमा के ओहर गइली जहाँ दूनू भाई बइठल रहलें। मस्टराइन चाह के गिलास उनके थमा के बड़का बाबूजी की लग्गे गइली। बड़का बाबूजी चिहा के देखलें। मस्टराइन की हाथे से चाह के गिलास थामत में छन भरि खातिर उनके निगाह उनकी चेहरा पर ठहरल। ओह में का रहल के जाने? मस्टराइन उनके हाथे में चाह के गिलास थमा के पिछउड़े लवटि परली। अंकुर के बाबूजी कब्बो अपने भइया के चेहरा देखें, कब्बो घर की ओर जात मस्टराइन के चाल देखें। भित्तर केवाड़ी पकड़ि के खाड़ चम्पा सबकी ओर ताकत रहली। उनकी मन में कौनो बिनती चलत रहल, जवने के सुने वाला केहू कहीं होई त भगवाने होइहें।

मस्टराइन भित्तर अइली। उनके साँस उखरल रहल। चम्पा कहली- 'ले आवऽ चाह हमहूँ के दे द आ अपनहू पीयऽ।' मस्टराइन चाह ढारे लगली त चम्पा का बुझाइल कि एह समे इनकी आँखि से आँखि मिलावल ठीक नइखे। तबले दुआरे पर छोटकी लउकलि। चम्पा लपकि के केवाड़ी कि लग्ले गइली आ जोर से बोलावे लगली-'ए छोटकी एहर आठ। 

छोटकी के चाह देके चम्पा मस्टराइन से कहलिन 'आजुए से हमके आ छोटकी के एक घण्टा रोज पढ़ावल सुरू करऽ।' मस्टराइन सकारि के मुँह हिलवलीं। चम्पा कहलीं 'मुँहवो से बोलऽ। अब हमन के मुँह आ हाथ दूनू खोले के परी। हमहन के दिन बहुरे वाला बा।

देस के उँचको पंचाइति कहति बा कि मेहरारू लोग के हर चुनाव में आधा हिस्सा मिले के चाहीं। बाकिर कवनो पार्टी सचहूँ मन से नइखे चाहति। मेहरारून के पंचपरधान बनले के संजोग आइल बा बाकिर सभे चाहत बा कि परधानी करे परधानपति। मेहरारू परधान खाली आपन नाँव टीपत रहें। मरद लोग के मरदाइ एही में बा कि हमन के हाथमुँह बन्हइले रहे।

एइसने अन्हरिया में राहि खोजे चलल बाड़ी चम्पा परधान। उनके साथे चलति बाड़ी जनमदुखिया मस्टराइन। एह लोग के धीरज केतना दूर ले साथे चली? एह लोग के मन में जवन जोति जरति बा ओके बुतावे वाला चारू ओर से डैना फरफरावत बाड़ें। बाकिर रउवाँ सभे जानते बानीं कि अन्हरिया में घात करे वाला चाहे जेतना बलवान होखें सचाई क रोसनी में ओह लोगन के बलबूता कवनो काम के नाहीं रहि जाला।

डॉ॰ रामदेव शुक्ल के अउरी किताब

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लेख
सुग्गी
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कथाकार आशुतोष मिसिर के जेकरे हाथे भोजपुरी गद्य के सुभाव बचल बा।
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सुग्गी

6 January 2024
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सुग्गी अइली-सुग्गी अइली' कहत गाँव के लइका दउरल आके ईया के घेरि लिहलें सं। बूढ़ा के चेहरा अँजोर हो गइल। पूछली 'कहाँ बाड़ी रे ? कइसे आवत बाड़ी ?' रेक्सा पर आवत बाड़ी, गँउवे के रेक्सा ह, 'बस पहुँचते बाड़

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तिसरकी आँख के अन्हार

8 January 2024
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एतनी बेरा रउवाँ कहानी सुनल चाहत बानीं ? आच्छा, त बताई की आपबीती सुनाई कि जगबीती ? ई तऽ रउवाँ अजगुत बाति फुरमावत बानीं कि हम एगो एइसन कहानी सुनाईं जवना में आपबीती त रहबे करे, जगबितियों रहे ! आच्छा, त स

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चम्पा परधान

8 January 2024
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'गजब हो गइल भाई ! अब का होई। का कइल जाव ?' अपनही में बुदबुदात परधान जी कहलें। उनका अन्दाज नाहीं रहल कि केहू उनके बात सुनत बा। 'का गजब भइल हो ? कवन उलटनि हो गइल ? कवने फिकिर में परि गइल बाड़ऽ?' पाछे त

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डुगडुगी

9 January 2024
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सबेरे मुँहअन्हारे डुगडुगी बजावत खुल्लर गाँव में निकलि गइलें। जवन मरद मेहरारू पहिलही उठि के खेत बारी कावर चलि गइल रहे लोग, ओह लोगन के बहरखें से डुगडुगी सुनाइल त सोचे लगले कि ई का भईल? कवने बाति पर एह स

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रजाई

10 January 2024
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आजु कंगाली के दुआरे पर गाँव के लोग टूटि परल बा। एइसन तमासा कब्बो नाहीं भइल रहल ह। बाति ई बा कि आजु कंगाली के सराध हउवे। बड़मनई लोगन क घरे कवनो जगि परोजन में गाँव-जवार के लोग आवेला, नात-हीत आवेलें, पौन

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राजा आ चिरई

10 January 2024
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राज का चारू कोना में आन्दोलन होखे लागल। सूतल परजा के जगावे खातिर नेता लोग फेंकरे लगलें। ऊ लोग परजा के बतावता के फेचकुर फौक दीहल लोग कि तोहन लोगन केतना दुख बिपत में परल बाड़ऽजा। परजा का ई बुझाइल कि जब

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कतिकहा विदवान

10 January 2024
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आईं, मास्टर जी बइठीं। कहीं, आप डाक बंगला में कइसे चलि अइनीं।' कहि के लुटावन मनबोध मास्टर के बइठवले। मास्टर बइठि के पुछलें, 'का हो लुटावन, दिल्ली से कुछ लोग आवे वाला रहलन। ओह लोग के कुछ अता पता बा।' लु

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सुनरी मुनरी, चन्नन-मन्नन

10 January 2024
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'देखऽ एक बाति तू समुझि लऽ कि आगे से गाँव के एक्को पइसा हम तहरे हाथ में नाहीं जाए देबि ।' कहि के मुनरी उठि परलि। सवेरे उठते रमधन ओके समुझावे लागल रहलें कि चेक पर दसखत कऽ के उनके दे देव, ऊ बलाके पर जाके

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जरसी गाड़ के बछरू

11 January 2024
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साहेब के गाड़ी दुआर पर आके खाड़ भइलि। डलेवर उतरि के पछिला फाटक खोलि के खाड़ हो गइलें, तब साहेब धीरे धीरे उतरलें। तबले गाँव के लइकन के झोंझ पहुँच के गाड़ी घेरि के जमकि गइल। रजमन उनहन के घुड़के लगलें 'ज

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नवका चुनाव

11 January 2024
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गाँव के सगरी पढ़वड्या लइका एकवटि के मीटिंग कइलें सन। मीटिंग में एह बात पर विचार भइल कि परधान आ पंच लोगन के जवन चुनाव होखे जात बा, ओमे परचा भरे वाला लोग के योग्यता के परख कइसे होखे। आजु ले ता जे जे परध

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एगो किताब पढ़ल जाला

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