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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023

2 देखल गइल 2

केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महसूस होखे लागेला जइसे एक फूँक- गाँजा क सुरूर सुर-सुरसुर-सुर सैंउसे अलंग में उतरत चलल जात होखे मसल कहल ह कि बड़ गाँव के बनिहार आ छोट गाँव के जिमदार बराबर होला !

गहमर में रहला के कुछ स्वाभिमान के सुरसुरी त होइबे करेला अब एशिया चाहे वर्ल्ड में गहमर गाँव के जोड़ के हैवीवेट मिलो भा जिन मिलो बाकिर एतना त तय वा कि यूपी-बिहार में एतना सघन पसरल ग्रामनामधारी सामुदायिक संरचना अउर कवनो नइखे। गहमर के माने भइल कि गाजीपुर जिला के गंगा-कर्मनाशा का उर्वर दोआबा में लगभग ओन्तालिस वर्गमील में फइलल एगो अइसन भूखण्ड जवना के गाँव का अलावे अउर कवनो संबोधन नइखे। एही भूखण्ड में गंगा का किनारे डेढ़ मील उत्तर-दक्खिन आ दू मील पूरुब- पच्छिम में फइलल लगभग एक लाख के ठसाठस ठकचल जनसंख्या के नाँव ह गहमर खास गनीमत भइल कि पिछला पचास बरिस में एह बस्ती में से अनगिनत परिवारन के स्खलन हो गइल आ लोग शहर में बसल चलल जाता नाहीं त आज जनसंख्या तीन गुना होइत ! ग्राम पिण्ड में से भरभराइ के जनसंख्या झरला का बादो अगर डेरा डंडा छावनी- एक्सटेंशन चाहे गहमर में समाइल मौजा पुरवा सिकन्दरपुर, निजामपुर, बबुरहनी, बंगला, मड़करा, बाँगर बाँड़, फकीरपुर, फटपुरवा, भरपुरवा, टेलही, खुदरा-गदाईपुर, पटखौलिया के अउरो अउरो जनसंख्या जोड़ लिहल जाय त जनसंख्या के फीगर डेढ़ लाख के लाँघ जाई। एह में ओह गाँवन के नाँव नइखे जहाँ के अदिमी जिला से बाहर गइला पर आपन गाँव-गाँव गहमर बता देला एकरा अलावे अगल-बगल के बड़ बस्ती जइसे बस के आखिरी पड़ाव बारा कलाँ आ ब्लाक बन गइल भदौरा के आपन पहचान मिल गइल, नाहीं त कुत्तूपुर, मगरखाही, भतौरा सागर, मनिया, सेवराई, बकइनिया ई कुल गहमरे कहात रहे। कर्मनाशा का पार बिहार का पुरनका आरा शाहाबाद (अब बक्सर में पड़े वाला कई गो गाँव जइसे सोनपा डेहरी) के अदिमी सुविधा खातिर आपन पता ठेकान गहमरे बतावेलन का कि उनका खातिर गहमर हर तरह से नगीची वा! 

गहमर एगो अइसन गाँव है जहाँ पोस्टापिस के आपन बिल्डिंग बा। सिनेमाहाल वा,

भारी-भरकम अस्पताल बा। दूदू गो डिग्री कालेज वा चरतल्ला इमारत वाली राजकीय

कन्या इन्टर कालेज बा। एक किलोमीटर लमहर (पटना-मुगलसराय मेन लाइन पर) सह

बरिस से ढेर पुरान प्लेटफार्म आ रेलवे स्टेशन वा एह गाँव में प्रतिदिन लगभग आधा

दर्जन डकमुंशी लोग बीसन लाख रुपिया मनिआडर बॉटेलन। एहिजा के प्राकृतिको परिदृश्य

मनोहरे रहल ह । गहमर में छव तरह के खेत के माटी बा जवना में हर तरह के फसल

पैदा होले। खेत सिवान का बीच-बीच में आम महुआ के सघन बगइचा बाड्न स, जवना

में जेकरा सवख बा ऊ अउरो तरह के फल-फूल लगववले बा एकरा अलावे गहमर लंगड़ा

आम का उत्पादन छवर (बेल्ट) में आवेला, एह से जे कृषि में पूँजी लगावे जोग बा ऊ

कलमी आम के आधुनिक बगइचो लगवले बा। गाँव का दखिने कर्मनाशा का थाला में

अबहियों एगो जंगल क छोट रूप विद्यमान वा जवना के मनिहर बन कहल जाला। ओहिजा

लोग बनसप्ती माई के गोड़ लागे, भूलन बाबा के दरसन करे आ बरसात का सीजन में

खेखला, कइत, बन परवर, गूलर तोरे चल जालन गंगा का उत्तर आरी के थाला बाँड़

कहाला जहाँ सरपत का जंगल में अनेकन वन्य जीव रहलन। रहल त कबो बाघो होई

काहें कि अबहियों बघनरवा बा बनसुअरा, हरिना आ हारिल तितिर जइसन शिकार के

आहारजीव त अभी हाल तक रहलन। अब नइखन वन्यजीव का नाँव पर बाँचल बा घोड़रज

(नीलगाय)। अब देखे के बा कि इहो लोग बाचत बा कि डायनासोर नियर कथाशेष होता।

मुस्लिम समुदाय इहन लोग का शिकार में रुचि लेता। गाँव से सियार के आवाज गायब

हो गइल बा । सुने में आवडता कि सरकार कई ट्रक सियार खेत में छोड़लऽसा पता ना

कवना वजह से एक बेर सियार पकड़ल गइल आ अब छोड़ल जाता। जवन होखे, वर्तमान

सियारन का भाषा में ऊ सुरीलापन नइखे जवन एह जवार का आदिवासी सियारन का बोली

में रहे। पता ना कवना देस के बोली बोलत बाड़न से आज के सियार ।

गहमर में कई गो बिसेस खासियत बा। एहिजा के दस-बीस हजार आदिमी हमेशा फउज क सेवा करेलन। एहिजा फउज के पिन्सिनो लेबे वाला दस-बीस सइ बूढ़ लोग हमेसा तारीख गिनत रहेलन । गहमर में एके बैंक बा ओह में रोज दू-चार सइ अदिमी के निपटावल जाला त महीना भर में पिन्सिन के काम ओरियाला । गहमर में कवनो एहरारू मेहरारू अंगूठाचिपोर मिल जाय त मिल जाय नाहीं त गाँव में लिखे भर सब पढ़ले बा । एहिजा के इन्टर कालेज साठ साल पुराना था। संस्कृत पाठशाला अपना जीर्ण-शीर्ण भव्य इमारत का साथ सइ बरिस पुरान बा। मिडिल स्कूल ओनइसवीं सदी के बा। गहमर में अंग्रेजो रहत रहलन स, उहनी के नील के गोदाम बा। किलोमीटर भर लम्बा गंगाजी से लेके गोदाम तक के पानी के पाइपलाइन के अवशेष बा। हिन्दी जासूसी कथा के जनक गोपाल राम गहमरी के तोप से उड़ावल कोठी बा। डीह डाबर में दबल पुरातत्व के सामग्री बा अनेकन खुबसूरत पक्का मकान वा अदिमिन में आधुनिक लूगा-फाटा, टाप-जिन्स, सवख सिंगार के संचेतना बा लेकिन गोड़ का नीचे जांघभर हाँच से भरल गली-खोर आ छवरियो बाड़ी स, जेमें अदिमी त छोड़ी हँकला पर बैल तक अनकसालन स गहमर के बहुमत जनसंख्या नगरपालिका के स्थापना पसन्द ना करे! अइसन नइखे कि नगरपालिका के प्रयास ना भइल । प्रयास भइल । नगरपालिका बनवो कइल। कई बरिस तक सक्रियो रहल बाकिर अफवाह उड़ि गइल कि नगरपालिका से जीवन के स्वतंत्रई समाप्त हो जाई गोरू बछरू पर टैक्स लाग जाई। फेरु का पूछे के! सबका अनकस बरे लागल। फौजी गाँव कड़बच-कड़बच किड़िक के खड़ा हो गइल गहमर रेलवे स्टेशन पर गाड़ी रोक दिहल गइली सा हजारन अदिमी मोंछ अंइठ के आ सीना तान के चिचिआइल, 'नगरपालिका भंग करो।' तनातनी जब बढ़ल त प्रशासन पुलिस आ गइल। गोली चलल जे मोछ अँइठ के सीना तनले रहे ऊत फउज में भागे पराये सिखले रहे बरक गइल। एकाध गो भोला-भाला सीधा अदिमी का खून में डूब के कारतूस जुड़इलन स। बाद में मोकदिमा चलल मामला होईकोर्ट तक गइल। जज लिलार सिकोर के कलम के माथा दाँत से ठोरिअवलस आ सोचत पुछलस कि आखिर ई कइसन गाँव ह जेकरा उन्नति आ विकास सोहात नइखे सब उन्नति खातिर लड़े आवेला, ई लोग अवनति का पक्ष में लड़ रहल बा । का ईहनलोग का गली के सफाई, रोशनी के इन्तजाम आ गाँव के सुनियोजल विकास नीक नइखे लागत? वकील, जज का कान किहें मूड़ी ले गइल, साँय के आवाज भइल आ समझा दिहलस कि हजूर कुछ जानवर अइसन होलन जिनका कनई-कांदो में अन्हारा घोघिया के घुलटल नीक लागेला, आ जान जाई कि नगरपालिका भंग होके ग्रामसभा वापस मिल गइल। अदालत का भरल सभा में गाँव के प्रगतिशील आ सही सोचे वालन के पानी उतर गइल।... खाली गहमरे ना यूपी- बिहार का पूरा भोजपुरी जवार में जवना गाँव में फौजी रिटायर ढेर बाड़न ओहिजा एही तरह के अंधा कानून लागू वा उटपटांग भाषा आ जोर-जबरदस्ती के माहौल बनाके हरेक गाँव में ईलोग हिन्दुस्तान पाकिस्तान के मोर्चा खड़ा कइले बा । एह लोग के पैदा कइल समस्या पर अब बड़े-बड़े समाजशास्त्री लोग सोचत बा। जरूरत एह बात के बा कि जे.सी.ओ. के नीचे तक के फौजी के रिटायरी से पहिले एह बात के पूरा तालीम देके वापस लौटावल जाय कि गाँव में कइसे रहे के चाहीं गाँव का मनोमालिन्य आ तनाव में एह लोग क योगदान मजिगर वा !

गाँव का कनई में रंगाइल जब एक बेर हम घरे पहुँचल त फउज के रिटायर नाऊ रंगलाल हमारा गाल पर पानी दरकच्चत पुछलन, 'मुंसीजी, जनमभूमि जननी च सुनले बानी? हमरा मन में आइल कि अपना देहि में चपकल कनई के छींटा रंगलाल का देंहि में रगर के छोड़ा लों आ हाथ जोड़ के कहीं कि ल ए रंगलाल भइया, एह जनमभूमि क अस्मिता तुहई सम्हार हम त गाँव का विरह में जिये चाहत बानों कहलो जाला कि दूर-दूर रहले प्रेम बढ़ेला अब त ठरो ठेकान नइखे। वे गोसिया मोआर के जमीन, जे चाहल

दुर्बल कइल। सरकारो बीच से नहर निकाल के रीती-छीती कइलसि । जेकरा लौना घटल

ऊ फेंड़ के डग काटल ढहल घर का ओर देखि के जेकरा छोह लागेला ऊ कहेला,

'अरे ललवा त बिला गइलन स।' वेतनभोगी मजूर एक जगह बिलाला त दूसरा जगह बस

जाला नइखीं देखले ? जहाँ ईंटा के भट्टा लागेला ओहिजा केतना अदिमी मड़ई डाल लेलन।

भट्ठा हटते मड़ई उजरि जाले। लेकिन सुधि ना जाले लवट लवट के मन दउरेला अरे

हेइजे फलनवाँ हमार कितबिया छिनले रहे। हेइजे हमके घिरवले रहे। हेइजे फलनिया हमके

देख के मुँह बिजुकवलसि। हई घरवा जवन गिरल बा एही में हम पैदा भइलीं। कहे के

मतलब कि भूमि ठौर के सुधि ग्रह के अनवरत परिक्रमास्थली हो गइल बा हमार ब्रह्माण्ड !

जब हमरा अइसन छोट अदिमी एतना सोचत बा त बड़े-बड़े अदिमी गाँव छोड़ के का

सोचत होई का सोचत होइहें संस्कृत के विश्वविश्रुत विद्वान डॉ. कपिलदेव द्विवेदी, ज्ञानपुर

में बसि के का सोचत रहल होइहें गोपालराम गहमरी, महाबीर प्रसाद गहमरी, देवता प्रसाद

गहमरी, चाहे आधुनिक युग में का.हि.वि.वि. के आयुर्वेद विभाग के पूर्व अध्यक्ष गोरखनाथ

चौबे आ अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष डॉ. तुलसीनाराण सिंह जइसन अदिमो वाराणसी में बस

के! हर गाँव नियर गहमरो से प्रतिभा पराह (पलायन भइल ह पिछला सइ बरिस में।

पहिले भारत में अस्सी आ बीस के परता बइठे गँवही आ शहरइतिन जनसंख्या में, अब

गाँव क जनसंख्या शहरि से कम हो गइल बा।

आखिर केतना ऊँच बिरह के ज्वाला लेके अदिमी गाँव छोड़त होई गहमर में बइठ के सवा दू सइ उपन्यास लिखला का बाद गोपालराम गहमरी आपन कोठी बेंच के वाराणसी का बेनियाबाग में रहे शुरू कइलन त 'मतवाला' अखबार में आचार्य शिवपूजन सहाय होली का सम्हेरा चिटुकी लेत लिखलन-

गहमर के गोपाल राज जी हिन्दी के जासूस करत बिलास विलास भवन में तज के छप्पर फूस भला यह बानप्रस्थी है !

गहमर में गहमरी के छप्पर फूस ना रहे। दू तल्ला के आलीसान कोठी, चारू ओर बगइचा, हाता, मीठ पानी के कुआँ। एक-एक ईंट पर 'जासूस काटेज' छाप के पकावल रहे। अइसन कवन बेबसी में आइल मन कि कोठी बेंचे के पड़ल? बेंचला का बादो कोठी सुख में आइल। सन् बयालीस के बागी राजाराम सिंह ओह कोठी के किनले रहलन। जब राजाराम सिंह के दमन करत उनका हरेक अड्डा पर तोप दागल गइल त गहमरी कोठिओ लखनऊ का रेजीडेन्सी नियर तोप के घाव खा के करिया-भभीछ खड़ा हो गइल । ओह घरी गोपालराम गहमरी जियत रहलन। बाद में ऊ कोठी हबड़ा मछरी चालान करे वालन क अड़ार बन गइल । जासूस काटेज के ई दुरदसा उनका (गहमरी का) जीवने काल में भइल। पता ना गोपालराम गहमरी कुछ लिखलन कि ना, कोठी पर तोप दगइला के जिकिर मन्मथनाथ गुप्त का लिखल सन बयालीस का इतिहास में बा। पता ना कइसन कइसन अमनख लेके अदिमी गाँव से निकल के पूरा देस में छितराइल बा, देसो से बाहर निकल के पूरा भूमण्डल में छितराइल बा, दूअर टापर नियर गुमसुम ऊ अदिमी सेमर का बीआ नियर उगल त गहमर में बाकिर अनुकूल वातावरण खोजत रूई का फाहा के पांख नियर डैना हिलावत सँउसे संसार से धाँग आइल गहमर छोड़ला का बादो गहमर जाये के पड़ेला। एगो कहावत कहल जाला कि

अड़हर जइबs बड़हर जड़बड़ माँग मुँड़ावे गहमर अड़ब

गहमर में जामल चाहे लइका होखसु भा लड़की, जब उनकर बिआह होला आ सन्तान पैदा होले त ओकर बार उतारे खातिर गहमर कमइछा माई का धाम पर जरूर आवे के होला। हाथ में कमइछा माई के झूल-फूल, सेनुर बतासा आ नरियर लिहले धाम का दुआरी पर ठाढ़ मेहरारू गावत मिलिहन-

देवी! खोलीं ना केवड़िया बड़ी देर से खड़ी पान लेके खड़ी, फूल लेके खड़ी देवी! खोलीं ना केवड़िया बड़ी देर से खड़ी

अव गहमर के कमइछा माई, मिर्जापुर के विन्ध्यवासिनी माई आ मैहर के शारदा माई के एगो त्रिकोण तीर्थ यात्रा वा जेकरा संवहर वा एक साथ तीनो धाम के दरसन करत वा।

आधुनिक गहमर सन पनरह सौ छब्बीस ईस्वी का बाद बसल खानवा का लड़ाई का बाद राणा सांगा के सेना में जब धोखा से भाग-पराह मच गइल त राणा के एगो विसवासी सामन्त राव धाम सिंह जूदेव अपना पुरोहित गंगेशेवर उपाध्याय आ दीवान वीरनाथ ठाकुर (कायस्थ) का साथे कवनो सुरक्षित स्थान का तलाश में निकललन साथ में बाल-बच्चा का अलावे कमइला माई के एगो भव्य प्रतिमा रहे, जवना के आक्रमणकारियन का हाथ में पड़ के विखण्डित होखे के डर रहे। इहन लोग के मुगल सेनापति मीर बाकी पछिअवलहूँ। रहे। खैर, प्रतापगढ़ जिला का आसपास ई लोग मीर बाकी के चकमा देके सारनाथ का जंगल में घुस गइल। उहाँ से ई लोग आधुनिक मुगल सराय का और आइल जवन गंगा- कर्मनाशा का दोआबा में गहवर जंगल से भरल रहे। ई जंगल पुरुष में आरा ( (अरण्य) तक फइलल रहे। एह में बाघ भालू- हुड़ार अजगर करइत आ मनिहर साँप के खूंखार वन्य जीवन रहे। जंगल के बीच जगह-जगह चेर खरवार के कोट आ गढ़ी रहे एह घनघोर जंगल में घाम सिंह आ उनका सैनिक टुकड़ी के भोजन दुर्लभ रहे। भोजन का नाँव पर पीपर बरगद के गोदा आ छीन-छपट के जुटावल गाय के दूध रहे जवन खीर नियर पका के पंच खात रहलन। -

कहल जाला कि कमइछा माई सपना देखवली कि जहाँ नीम का पेड़ पर बाघ दहाड़त लटके ओहिजे हमार स्थापना होखो आधुनिक धाम का लगे ई अजगूत लठकल अइसन लागत बा कि ओह स्थान पर कवनो आदिवासी राजा के गढ़ी रहे जवना के लड़ाई में पराजित कइ के ओही गढ़ी का दूह पर कमइछा माई के पहिल थापना भइल। ओह जमाना में पराजित का गढ़ी किला में रहे के रिवाज ना रहे, बलुक ओके ढाहि के जमीन्दोज कर दिहल जाय चाहे ऊ खुदे बिरान पड़ल पड़ल जब धूल माटी के ढँका जाय त ओह डोल पर खेती होखे लागे भा फेड़ जाम जाय। गहमर में अइसने स्थान सँकरहट था। सँकरहट शंकर चेर के राजधानी रहे। धाम सिंह से हरला के बाद शंकर चेर सोनभद्र पलामू का ओर भाग गइल आ ओकर उजरल बस्ती सैकड़न साल तक धूल में दबात खेत बन गइल । ओह बस्ती पर बनल खेत के कुछ भाग त कमइछा माई का नाँवे लिखा गइल आ कुछ भाग अउर अदिमी जोते लागल। तीस-चालीस साल पहिले तक ओह खेतन में साही के मान नियर छेद हो जाय जवना में मुँह डाल के देखला पर पक्का कमरा लडके। माटी के ठिल्ली लडके। कई गो किसान के मोट पल्ला के सीसो के भारी-भारी केवड़ियो मिलल खेत जोतत के सोना के मोहरो मिलली स निठाली अहिर के एक गगरी गोजई मिलल रहे जवन इतिहास क दबाव झेलत झेलत पत्थल हो गइल रहे एह सदी का सातवाँ दशक में जब नहर खोनाये लागलि त ओह डोह पर पत्थल के कई गो विचित्र प्रतिमा निकलली सा एगो चौकोर लमहर पत्थल पर चौबीस अवतार नियर सूअर वगैरह के आकृति रहे। एगो तीन मुँह के सुन्दर केशविन्यास वाली देवी के खण्डित प्रतिमा ओही डील पर बान्हल सती लाची फुआ का चठरा पर धइल रहे। पता ना लाची फुआ के परिचय का बा। बाद में (अठारहवीं सदी) एह क्षेत्र से सट के गंगा नदी बहे शुरू भइलो कहल जाला कि एगो साधू रहलन जवन बहुत बूढ़ हो गइल रहलन। एगो बरसात का संझा खानी ऊ अपना एगो चेला के गंगाजल ले आवे के भेजलन ओह घरी गंगाजी डेढ़-दू किलोमीटर का बाद रहली आ साधू का लगे एगो पातर धार के नारा रहे चेलवा असकतिया के नारा के पानी देके चल गइल । सवाद में फरक पाके साधू का आरु आ गइल आ चिचिआ के गंगा माई के गोहरवलन, ए गंगिया आठ आ गंगामाई राताराती पत्थल अइसन कड़ेर धरती, पर्वत अइसन झंझाट झाबर सुरहुर ऊँच फेंड कोड़त ढाहत साधू का कुटिया तक आ गइली । आश्चर्य ई बा कि पिछला डेढ़ सौ साल में हजारन बिगहा जमीन एह किनार से ओह किनार चल गइल बाकिर साधू के समाधि के माटी के वेदी अभी जस के तक बा-निर्जन- -शान्त एह गंगा नदी का कोप में सँकरहट के तीन चौथाई से ढेर भाग कट के बह गइल। कगार पर खूबसूरत ईंट से जोड़ल गोल मेखला लड़के, पता ना ऊ कुँआ रहे कि नाज रखे के कोठिला । अवहियो आठ-दस बिगहा के डील बाचल बा। पता ना ओह में का दबल बा। अइसन कई गो डील बा। कमइछो माई का टीला में कहल जाला कि चहबच्चा बा गंगा का किनारे पंचमुखी घाट से पछिम बिचली खूंटी का डील में घन गड़ला के चर्चा होला। दन्तचर्चा है कि चेरो खरवार लोग का पास बीजक रहे जवना पर खजाना गड़ला के नक्शा अंकित रहे । ऊ रात के आके कोत खनत रहलन स अब कई गो टीला गंगा में ढहि गइल बा। एही जीतल भूमि पर गहवर गाँव बसल। तब एकर नाँव गहवर रहे। जंगल में बसल मड़ई वाला गाँव के अउर नाँव होइयो का सकत रहे? जंगल काटत के बुढ़ऊ महादेव के शिवलिंग मिलल एगो बनबिलार के मूस खेदलस त ओहिजा घाम सिंह के मड़ पड़ल। अगल- बगल में बस गइलन गंगेश्वर उपाध्याय, वीरनाथ ठाकुर, सेना के सिपाही लोग, पराजय का बाद पुराना राजा के प्रजा पवनी पजिहर। लेकिन एह स्थापना का बाद धामसिंह राजा ना रहि गइलन, चउघुर कहाये लगलन उपाध्याय, पधिया हो गइलन दीवान ठाकुर दास आ लाल खुद गहवर का ना पता चलल कि कब अंग्रेजी में लिखल डबलू गलती से एम पढ़ा गइल आ गहवर गहमर हो गइल ।

पता ना कइसे धामसिंह जूदेव के बंसज लोग तीन जातिन में बँटा गइल ठाकुर, भुंइहार आ पठान । ठाकुर लोग कहेला कि घाम सिंह ठाकुर रहलन। भुंइहार लोग कहेला कि ऊ भूमिहार ब्राह्मण रहलन मिसिर। लेकिन सिकरवार शब्द पर झगड़ा नइखे। धामसिंह के एगो लइका सैन्यूमल के बंसज अपना के सिकरवार राजपूत कहेलन आ दूसर लइका पूरनमल के वंसज सिकरवार भूँइहार इहन लोग क कमइछो माई के बँटवारा भइल। सैन्यूमल के कमइछा माई (मूल) गहमर में बाड़ी आ पूरनमल के कमइछा माई रेवतीपुर । कार्नवालिस का राज में जब भूमि के नियोजन भइल त एहिजा के राजशाही खतम हो गइल । तब चौरासी गाँव राजपूतन के, छप्पन गाँव भूँइहारन के आ चौदह गाँव पठानन के रहे। एह में चौदह के पहाड़ा बा, चउदह चउके छप्पन आ चउदह छक चउरासी पता ना एकर का मरम बा। कुछ दिन तक गहमर के राजस्व डुमरांव के राजा का खजाना में जमा होत रहे। लेकिन डलहौजी का समय में अंग्रेजी राज में गहमर फेर आ गइल। चकबन्दी का पहिले तक गहमर में खेतके पट्टी करत रहे। कार्नवलिस भूमिसुधार करत आधा गाजीपुर तक आइल रहे तले मर गइल। कहल जाला कि गहमर में बाइस पट्टी ह चार पट्टी लगान कम लागे खातिर चोरावल है। गाँव का भीतरी पट्टी मोहल्ला के पहचान बा। 18-20 पट्टी के खेत व्यवस्था केहू का नाम पर बा जइसे गोबिन राय पट्टी अइसन प्रमाण मिलेला कि जब गहमर के चउघुर अवधूत राव (सैन्यूमल के लइका) रहलन ओह घरी एगो मुस्लिम सैनिक टुकड़ी गहमर आके लगान के माँग कइले रहे अवधूत राव का साफ मना कइला पर उनके नाना प्रकार के जातना जइसे मुँह में खपचल ठोकल, बइरकंटी का सुतावल आ खउलत पानी से नहवावल - दिइल गइल, बाकिर ऊ (अवधूतराव) टस से मस ना भइलन। एह जिद्द का आगे हार के वापस लौटत मुगल सरदार आपन खीझ मिटावे खातिर रास्ता में जात एगो करकटहा (डोम) के देख के पुछलस, 'करे गाँव किनबे?" ओकरा (डोम) दाँत निपोर के असमर्थता जतवला पर मुगल सरदार जबरदस्ती ओकर टेंट टटोरुए त दूगो मुगलिया पइसा मिलुए। ओही पइसा के लेके ऊ हँसी-मजाक में गहमर के पट्टा ओह करकटहा के लिख दिहलस। लेकिन जब मुगल सरदार लगान ना वसूल पवलस त करकटहा का वसूलित ? हैं, गहमर बहुत दिन तक हँसी-मजाक में करकटहा क गाँव भइल रहल।

करकटहा के सनह देके जब मुगल आगे बढ़ल त एगो कानू पतई बहारत रहे। अवधूतराव का निडर जिद्द के जब चरचा चलल त ऊ कानू कमइछा माई का ओर हाथ उठा के सरल मन से कहुए कि बस इनही के कृपा बा। फेर का रहे, कई हजार साल पुरान प्रतिमा भुजुरो भुजुरी हो गइल। मुगल सरदार धन का लालच में टीलवो खोने चहलस बाकिर कहल जाला कि असंख्य काला भंवरा निकल के पिछिया लिहलन स त ओकरा (मुगल का) भागे के पड़ल। बाकिर अभी आजुओ जवन मेहरारू सुन्दर होले ओकरा सुघराई के तुलना कमइछा माई का ओही भुजुरी भुजुरी प्रतिमा से होला । खण्डित ढेरी अबहियो बा । नयकी प्रतिमा का साथ ओहू क पूजा होला ।

जइसे जइसे इतिहास आगे बढ़ल, रेल, डाक, फौज के महीना तनखाह, आधुनिक

सुविधा लउकत गइल । मध्यकालीन मानसिकता के धार कम होत गइल। चउरासी गाँव,

छप्पन गाँव आ चउदह गाँव के पहाड़ा छितरा के एकता खो बइठल । अब एकर ढेर भाग पुरनका आरा (शाहाबाद) जिला में जाके बिहार कहाता आ कम भाग गाजीपुर में रहि के यू.पी. चउरासी के बटोर अब लउरा लाठी खातिन नाहीं, बस भोजभात में होता। कहो.. कवनो कवनो खाली धन से टांठ घर में बाकी सब त नई समस्या में अझुराइल बा। नक्सल समस्या, महँगाई समस्या, बेरोजगारी समस्या, आ अखबारी समस्या, जइसे जात-पात, हिन्दू-मुस्लिम, मंडल- कमंडल, चोर-चुड़क्का, अकेलापन के एहसास।

अब एके गाँव में कई गो गाँव लउकी। जहाँ सलसन्त परिवार बसल बाड़न ओहिजा शान्ति बा। धर्म आ नीति के चर्चा बा। जहाँ गरीबी बा, भूख बा, ओहिजा धर्म के चर्चा कहाँ नीक लागी ? ओहिजा माई-बहिन होता, आवऽ हो आवड होता कट्टा बन्दूक निकलत बा। घर का भितरो असन्तोष के कोहराम बा। अभाव के कलह बा। रोज सांझ के गली में कोनचा पर चिरइन का हल्ला नियर अनेक सुर मिल के 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' हो जाई आ समवेत स्वर में सुनाई दी- 'अरे तोर देखल बा रे, त तोर देखल, जो-जो पीढ़ा घ के ऊँच भइल बाड़ी।'

गारियो-गलौज में कैडर बा, रैंक था । जवना रैंक के जे बा ओही रैंक खातिर निर्धारल गारी दिआई त क बुरा ना मानी। नाहीं त ऊ बरिसन दुसमन बनल रही समाज का मौखिक दिशा निदेशिका में ई तय बा कि रड़हो-पुतहो बुजरी-छिनरो उड़ासी पुतकाटी चाहे मर्दानी गारी में बहिन-बेटी कब केकरा के आ कवना हालत में कहल जाला जे ई सत्संग नइखे कइले ऊ अगर गारी दी त समाज विद्रूप आ तनावग्रस्त हो जाई आ जे एके नइखे समझत ऊ अगर सुनी त बिना समझले कोहाँ जाई। पत्रा कम पड़त बा नाहीं त विस्तार से बता देतीं। अवधूत भगवान राम अपना गाँव के पाठशाला कहत रहलन। हम अपना गाँव के इनवरसीटी मानला भले पोस्ट ग्रैजुएशन नइखीं कइले बाकिर गहमर इनवरसीटी के इनरोलमेन्ट त बड़ले बा ।

गहमर से अँडजाइल अदिमी कहेलन कि एह गाँव क सबेरे-सबेरे नाँव लिहला पर दाना ना मिले। कहाँ से मिली? जब एको दाना छोड़ल जाई तब न मिली! एहिजा का जीवन- दर्शन में शत्रु के अधूरा ना पूर्ण संस्कार कइल जाला। बालमुकुन्द सिंह गहमरी लिखले हउअन कि-

खपड़ा नरिया माटी-ढेला पत्थर से लड़ी त क घरी अड़ी।

गहमर जबर है। गहमर जटिल है भोलानाथ गहमरी का नजर से-

काँट- ट- कूस से भरल डगरिया

धरीं बचा के पाँव रे माटी उपरा छान्ही- छप्पर

ऊहे हमरो गाँव रे

गहमर टरले ना टरे एगो बहुत पुरान कहावत है कि नवली नवे न गहमर टरे बीच करहियाँ धरहर करे।

पुराना जमाना में गाँव से गाँव के सिवान खातिर लड़ाई होखे। मामला आगे बढ़े त अदालत खातिर धन क जरूरत पड़े। जे धन दे, ज्ञान दे ओकर सम्मान होखे। कुन्दन कोइरी अइसने अवसर पर जब धन दिहलन त बड़-बहुआ का दुआर पर उनके खटिया पर बइठे के अधिकार मिलला समाज-सेवा क मूल्य त मिलबे करेला । जरूरत सेवा में निःस्वार्थ भइला के बा

अब अइसन बात नइखे। लोग काम कम करत बा, विज्ञापन ढेरा हाथ में झाड़ू लेके फोटो खिंचावता। काम नइखे होत बाकिर साइनबोर्ड लाग जाता विकास का नाम पर राजनीति होता । लूट मचल बा। समाज खात खात बेमार पड़ जाता-

का होई कइ के परापतो के दुगुना खात खानी घरे उत्पादके के ठेहुना ज्ञान भइल लतरी के दाल

इहे गाँव ह

(आनन्द संधिदूत)

अइसना परापत से गांधी मना कइले रहलन हिन्द स्वराज लिख के के मानता ! सँउसे देस का संगे गहमरो के आचरण बिछलाइल बा। चरित्र गिरल बा विचार लोटिआइल बा । उदेस खाली धन-अर्जन भइल बा। हायघन हायधन में गहमरो क सामाजिक सौन्दर्य गिरल बा । पहिले घर में एकाध गो रांड़ बेवा, एकाध गो अकलोल बकलोलजी रह लेत रहलन। अब भाई-भतीजा आ पितियाउत के के कहो, आपन सग बाप उपेक्षा से अउँजा के रेल से कट मरत बा। सुनसान देखि के भोकर भोकर के रोवता । सासु-ननद गंगा में बूड़-धँस मुअत बाड़ी बेटी पतोह का पेट का पाछा नया नया सामाजिक अनुबन्ध समझे के पड़त बा। जइसे जइसे जनसंख्या बढ़त बा ओइसे ओइसे सामाजिक मरजादा ठकच के भरल रहिला बूट का कोठिला नियर जगहे जगहे चिटक रहल बा। उसे देस नियर गहमरो में चोर सन्त क बोली बोल रहल बाड़न जइसे पाव भर छान के जै सिरी राम-

मछरी का फेर में भगत भइल बकुला शेर ओढ़े बकरी के खाल इहे गाँव ह

अशोक द्विवेदी का कहनी 'पोसुआ' के किरदार गहमरो में मिलिहैं। एहिजो मुसहर चोरी का जुल्म में डोरिआवल जालन इहन लोग पर लाखन रुपिया चोरी भइला के मामला दर्ज होला । लेकिन, खाना तलाशी में मड़ई से बरामद होला एक भर गाँजा, एगो नीसघ सबरी आ गाँव से माँगल टूका खाँड़ रोटी मुसहर चोरी के माल ना पावे, ऊ चोरी के मजदूरी पावेला । ऊ चोर मजदूर ह! मजूरी में पचीस-पचास गो रुपिया आ बोनस में जेहल गइला पर जमानत एहिजा कहावत है कि-

चउधुरी रहलन गाजीपुर लुटवा लिहलन उधरनपुर !

एहिजा जीवन जीये खातिर जवना कलाबाजी के जरूरत होले ओकर खमो-पेंच बड़ा जटिल वा एकर तुलन कलकत्ता का जटिल जीवन प्रणाली से कवनो कवि कइले बा -

कलकत्ता है कल पर

गहमर ह पेंच पर

गहमर में रहि के केहू के बिजनेस व्यापार ना चमकल राजनीति ना चमकल । इहाँ तक कि ज्ञान कला आ साधुता तक में लाही लाग गइल। एहिजा बनिया लोग का खाली उधार ना, लक्स साबुन सूता से काट के आधा बेंचे के पड़ेला। बड़े-बड़े मौनी बाबा चिड़चिड़ा के गारी बके लागेलन। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ के राजनीति धराशायी हो जाले, जब कवनो चुडुक्का 'इहे जाले...' कहि के पीछे मुंह कइ के खिस्स से हँस देला !

एहिजा के बानरी सेना अठारह सौ सन्तावन आ ओनइस सौ बयालीसो में कमाल देखवले बा । सन् सन्तावन में मैगर सिंह गुरदेल से मार के अंग्रेजी सेना के हरवले रहलन। बाद में उनके कालापानी भइल। प्रसिद्ध नारायण वर्मा आ दयाशंकर उपाध्याय के लिखल एगो पुस्तिका (मैगर सिंह की जीवन कथा) छपल बा। गाजीपुर गजेटियर में उनके जिला क आतंकवादी लिखल बा। मन्मथनाथ गुप्त सन् बयालीस का आन्दोलन में कई गो बीर के नाँव गिनवले बाड़न । आजादी का बाद अनेक झूठ-साँच रणबांकुरा लोग लमहर समय तक पिन्सिन पावल गांधीजी के घड़ी गहमर स्टेशन पर करिहांइ से चोरी हो गइल रहे, किदो गिर के हेरा गइल रहे। खादी के साड़ी पहिन के एकर चर्चा बहुत दिन ले रहल। फलनियाँ कहे कि चिलनियाँ लेले बा। चिलनिया कहे कि हमार नाम लेबू त तहार ऊ लट्टा नीयर धूरब कि तूही जनवू! सहदेव बो बढ़इन के जब महात्मा गाँधी के लटकन घड़ी मन परे त कहसु ओहो हो क्या लटकन घड़ी थी हमार माई से कहसु कि जान तारू ललाइन, अंग्रेज सरकार बोला कि गन्त्री माराज, तुम तो बिदेसी सामान जार- -फूँक देते हो, फिर भी तुमको हम एक बिलैती घड़ी देता है, तुम टैम देखना। ओही बिदेसी घड़ी के चोरवा के गहमर गाँव महात्मा गाँधी के स्वदेशी दर्शन पर आपन जजमेन्ट देते रहे।

गहमर में साँप का कटले केहू ना मुए। बकस बाबा जे बाड़न! दूर-दूर से साँप के काटल लआत आवेलन आ हँसत चल जालन गहमर में चमत्कारी सन्त बुलाकी दास बाबा के मठिया बा । ऊ घांटो राग के प्रवर्तक रहलन। उनकर पांडुलिपि नागरी प्रचारिणी सभा में (शायद) बा। एगो दूसर चमत्कारी सन्त चिनगियो शाह के मजार बा जहाँ उसे लागेला । एकरा अलावे नानक शाही, कबीर पंथी, औघड़पंथी हर तरह के केन्द्र बा। स्वामी दयानन्द सरस्वतियो का अइला के प्रमाण मिलेला।

गाँव में श्रेय क लड़ाई जोर पकड़ले बा। एह से सामाजिक सौन्दर्य बिधुना गइल बा। एकरा अलावे दबल आ दबवनिहार के झक्काझूमर त होते बा। एह से भय आ शंका बढ़ल बा बड़का आ छोटका का लड़ाई में सबसे ढेर नोकसान शान्तिप्रिय सहनशील मध्यम वर्ग के बा। एहिजा जनान्तरण के रोग बा। काहे कि गहमर के अदिमी मद्रास बम्बई में त बस गइल, बाकिर मद्रास भा बम्बई के अदिमी गहमर ना आइल एह से असन्तुलन बा गहमरो में हार के हार सिक्ख, मद्रासी, मराठा, मारवाड़ी, बंगाली बसल रहितन त गाँव खिल उठित !

गहमर में देस का टटका विचार के ले आवे वाला नेता विश्वनाथ सिंह गहमरी आ विश्वनाथ सिंह सूबेदार रहलन। गहमर के संस्कृतिआउत पहचान देवे में प्रसिद्ध नारायण वर्मा ( लेखक - रंगकर्मी), चन्द्रदीप सिंह मास्टर ( रंगकर्मी), लाल बहादुर मास्टर (रंगकर्मी), अंगद सिंह (नेता), बालमुकुन्द सिंह गहमरी (पत्रकार), रामनाथ उपाध्याय राकेश (कथा वाचक कवि), शिवपूजन लाल (शिक्षाविद), वासुदेव लाल गहमरी (अंग्रेजी लेखक), भोलानाथ गहमरी (भोजपुरी कवि) के जोगदान उल्लेखनउक बा। गाँव के जेकरा से गौरव मिलल ओह में पं. शीतल उपाध्याय क नाँव प्रथम बा ऊ कालाकांकर में अंग्रेजी पत्र 'हिन्दुस्तान' के सम्पादक रहलन, उनका अण्डर में महामना मदन मोहन मालवीय जइसन लोग काम करत रहे। शीतल उपाध्याय के मकान शीतल भवन गहमर का एगो मोहल्ला के पहचान बन गइल बा दुसरका विद्वान जेकरा पर गहमर के गर्व भइल ऊ संस्कृत के जगतव्यापी विद्वान आ जानल मानल आर्य समाजी पंडित पद्मश्री डॉ. कपिलदेव द्विवेदी जी हुई। एही तरे मान्धाता सिंह शिक्षक नेता बहुत दिन तक रहलीं।

आज का तारीख में संस्कृति, साहित्य, समाजसेवा आ सरकारी सेवा के द्वारा जवन गहमर के सपूत गाँव आ गाँव का बाहर अगहर बाटें उहाँ सघन के नाँव लेत डर लागत बा कि दूगो गिनाई त चार गो छूट जाई । बाकिर टी. वी. सिरियल आ सिनेमा कलाकार अंजन श्रीवास्तव के नाँव लेबे के परी जे खाली भारत ना भारत का बाहरो लोकप्रिय बाड़न । अंजन लइकाई में गरमी का छुट्टी में गहमर आवसु ! ऊ बहुत सुग्घर भोजपुरी बोलेलन ।

गहमर में हाथी के पोसल, पक्का मकान उठावल, ऊँख के बोवल ना सहत रहे। बाकिर अब कुल सहता। हाथी के जगह त कार जीप लेले बा बाकिर एक से एक बढ़ियाँ मकान बा आ लाठी अइसन नीसघ आ चभला पर गर गर रस वाली ऊँख पैदा होता।

सहत त कुल्हिए बानीं अगर सहात नइखे त प्रियजन के विछोह पता ना कहाँ अलोप हो गइल माई, बाबू, बड़की माई, बड़का बाबू, जगरनाथ बो भउजी, बिसनाथ भइया, इनरदेव पधिया, अनत बरई, बनइला साहु, समली के माई, सामसुन्दर भांट... गिने लागी त रात ओरा जाई नांव ना ओराई। अब गाँव में ऊ आनन्द कम से कम हमके नइखे मिलत। विश्वनाथ सूबेदार सबेरहीं लाउडस्पीकर लगा के देस दुनियाँ के खबर गाँव के सुनावत रहलन। केतना इयाद करीं? लाली का माई के ठण्डा तेल, गुद्दी के माठा, घरभरन के रेक्सा, कुल्हिए मन परत वा आ, अभी हाले में जबरदस्त धोखा दे दिहलन उमेश तिवारी हमके चिट्ठी लिखलन कि कमइछा स्थान का कविसम्मेलन में जरूर अइहs आ अपने गायब एह आवारा नामधारी का मौत पर पूरा गाँव से दिहल पता ना केतना सब्जेक्ट देके केतना - केतना छन्द हमसे जबरी लिखवलन उमेश तिवारी।

जइसे आसमान का परदा पर पलटा मार के हार के हार तरई मुअत-जियत कबड्डी खेलत दरहम-बरहम होत रहेली स ओइसहीं मिरित लोकवो में कबड्डिए होता। कब केकर पारी आई आ कबडी कबडी कहि के चल जाई पता ना गहमर में गायिका रामदेई भइली । ओह जमाना में माइक ना रहे बाकिर जब महफिल में दुमका मार के ठुमरी गावसु त बूढ़ बतावेलन, गंगा ओहपार तक सुनाई दे

एही ठंइया झुलनी हेराइ गइल दड़या रे....

हम मिर्जापुर में थथमल बानीं बाकिर हमरा आत्मा के झुलनी गहमर में हेरा गइल बा। किदो ओही झुलनी के खोजत मरे का सम्हेरा बसदेव भइया पटना में आपन आलीसान कोठी छोड़ के गहमर का खपरैला में आ गइल रहलन।

जवना घर में अदिमी मूए आवडता ओही घर में केतने अदिमी पैदो होखे आवडता गहमर फरडता निझाता निझाता फरडता । हमनी का फल हई जा आ गहमर एगो बोधिवृक्ष ।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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