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घर से घर के बतकही

30 October 2023

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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्खिन दिसा में दस मील पैदल चलला का बाद ई गाँव पड़ी। बीच में गोरी नदी पड़ी। गोरखपुर आ बड़हलगंज वाली पक्की सड़क पर एगो टीसन वा कौड़ीराम इहाँ से पूरब चलला पर डुमरी पड़ेला ए तरफ से बीच में राप्ती नदी पड़ी। अगर ए सड़क से चलल जाय त गगहा उतरि के दस मील उत्तर चले के पड़ी। एहू तरफ से बीच में राप्ती नदी पड़ी। राप्ती का किनारा गजपुर मिली, ई मन्त्रन द्विवेदी आ राम अवध द्विवेदी के कस्बा है। गाँव से पाँच मील पच्छिम रूद्रपुर कस्बा बा, जवन गउरी बाजर आ बरहज वाली सड़क के बीचो बीच बा। एह ओर गोरी नदी बीच में पड़ी। ए तरह से डुमरी से बाहर जाय के होखे चाहे बाहर से डुमरी, दस मोल चाहे छौ मील पैदल चलही के पड़ी। हमरी खलिहर गोड़े में चारो दिसा के ना जाने केतना पैदल यात्रा बन्हाइल बा। बाकी जब पैदल यात्रा के बाद गाँवे पहुँचीं तब सब थकान गाँव का अपनापन के जल से धोवा जाय। दूर से आँखी में आरी पासी के रंग- ढंग उतरे लगे, खेत के रंगत हमरा साथे हो जाय, बाग-बगीचा बोलावे लागे आ देवी- देवता के चउरा असीसे लागे थोड़े देर बाद, गाँव पहुँचला पर लगे कि एक-एक घर आपस में वतिआवता-देखऽ त आपन बेटा वापस आइल बा !

हैं, इहे हमार गाँव ह-लगभग डेढ़ सौ घर के गाँव डुमरी त हम पहिले अपना गाँव के भूगोल से राउर परिचय करा दी। एकरा उत्तर दिशा में एगो गाँव रानापार- हमरी प्रारम्भिक कविता गुरु मदनेश जी के गाँव एही का उत्तर पच्छिम कोन पर तनी हटि के बिशुनपुरा गाँव बा, इहाँ एगो प्राइमरी मिडिल स्कूल वा, इहें से हमार प्रारम्भिक शिक्षा शुरू भइल । इहाँ के सोमवारी बाजार के साथ ना जाने केतना खट-मीठ अनुभव हमरा मन में भरल बा, अब्बो इहाँ जाये के बेर-बेर मन करेला एही गाँव में हमरी गाँव के लोगन के जेवर बने, शादी- बिआह के कपड़ा सिआय हमरी गाँव से तीन-चार फर्लांग दूर पकड़डीहा गाँव बा, जवन विद्यानिवास जी के गाँव ह आ उहाँ के रचना में रसल- बसल बा हमरी गाँव का पच्छिम में बहुत दूर तक खुलल जमीन वा ओकरा बाद कुछ गाँव बसल बा। दक्खिन और अमारा गाँव आ पूरब और मकुरहा गाँव बा हमरा गाँव के उत्तर पूरब आ उत्तर पच्छिम आम के दूगो बड़हन-बड़हन बगीचा वा पहिलका बड़की बारी आ दुसरका छोटकी बारी कहाला ए दूनूँ से हमरी बचपन के ना जाने केतना प्रसंग आ क्रियाकलाप जुड़ल वाटे, केतना अनुभव बनल बाटे। अब्बो ई सब हमके स्पन्दित करेलें आ अपना साधे मिलाके हमके हमार बचपन लवटावत रहेलें।

हमरा गाँव में खेतन के फैलाव पूरब में सबसे ढेर बा एकर वजह ई ह कि हमरा गाँव से मकुरहा काफी दूर बा आ मकुरहा के लग्गे तक हमरे गाँव के खेत बा हमरो ढेर खेत एही ओर बा। मकुरहा आ हमरा गाँव का बिच्चे एगो टीला बा, जवना पर कई गो पेड़ बा । इहें एगो बड़हन पीपल का पेड़ के नीचे दीच्छित बाबा (बरमबाबा) के चउरा वा इनिकर परताप बड़ी भारी ह ई हवें त हमरे गाँव के पूर्वज बाकी आरी पासी के कई गाँव के लोग इनिकर पूजा करेलें। ई हमरे पिता जी का सिरे आवें आ हमरी घर के हित रक्षा करें। इनिका बारे में अनेक कथा-कहानी कहल सुनल जाले टीला पर एगो पोखरी वा आ पोखरा का किनारे एगो बड़हन सेमल के पेड़, ओपर भूत-पिशाच ना रहें-ई कइसे होई? गाँव में सेमल के पेड़ पर के भूत-पिशाच के अनेक कहानी कहल जाली ए टीला का पास हमरो कई खेत बा, मकई की रखवारी खातिर हमके जाय के पड़े। कब्बो कब्बो अकेले रहला पर बहुत डर लागे। जब कवनो पंछी टिहाय आ हवा सरसराय त भय से हम कॉपि जाई। मने मने दीच्छित बाबा के याद करों आ भरोसा करों कि दीच्छित बाबा के रहते कवनो भूत-पिशाच हमारा लगे कइसे आई !

टीला से होत गाँव की ओर अइला पर गाँव से पहिले ऐगो खुलल मैदान बा ई गाँव का कई लोगन के खलिहान है। ए मैदान में पाकड़ के दूगो बड़हन बड़हन पेड़ बा एक का नीचे डीह राजा के चउरा बा दुसरका का नीचे बरम बाबा के इहें हमरो खरिहान बा। चइत शुरू होते पाकड़ के पेड़ लाल-लाल पत्ता से भरि जाय खरिहान में डाँठ गिरे लागे । एक-डेढ़ महीना तक खरिहान में बहुत रौनक रहे। एक से एक चरित्र आपस में संवाद करें, गावें, विनोद करें, बुझाय गाँव घर-घर से निकल के खरिहान में जमा हो गइल आ ओ घरन के विशिष्टता एक साथ हिल-मिल गइल। पाकड़ पर रहि रहि कोइल बोलल

करे।

खरिहान से उत्तर छोटकी बारी बा। छोटकी बारी में एगो पोखरा बा जवन मलगड़ही कहाला । पोखरा का एक ओर सघन बँसवारी बा, दूसरा ओर बड़हन इमली के पेड़। गाँव के लोग कहलें कि पोखरा में बुड़वा (डूब के मरे वाला लोग), इमली पर भूत आ बँसवारी में चुरइल रहेले । कई लोग आपन अनुभव सुनावेलें “जब आधी रात के हम आवत रहली, पाँव के घुँघरू छम-छम बाजत रहे, सुनिके हमार परान सूखि गइल। हम त दूसर राह धइले गाँव अइनीं।" कई लोग ए बात का हाँ में हाँ मिला देलें एक बेर एक जन बतवलें कि बरसात का समय में एक दिन उनुका कहीं मोरही जाये के रहे । ऊ तनी अन्हारे निकल पडलें, देखत का हवें कि इमली का उँचकी डार पर एगो विशालकाय आदमी बइठल वा, बहन-बहन जटा बा, गोड़ जमीन पर लागल बा आ आँख लूक अइसन जरडता... हमन के छोट-छोट लड़के ई सब सुनिके डेरा जाई जा ए सब के असर अइसन भइल कि आजु बौद्धिक स्तर पर एके नकरले के बावजूद ई सब सपना में आवेला खरिहान के बाद गाँव में प्रवेश कइल जाय। सबसे पहिले खेत में दू घर बा-पूजन मिसिर आ वृषभान मिसिर के आगे मीनमल पंडित आ नरसिंह के एकरा बाद हमार घर है। हमरा घर का बाद पच्छिम में बहुत घर बा, दक्खिन ओर त गाँव फइलले बा। अब्बे जवना जवना घर के हम जिक्र कइनी हैं सबके आपन चरित्र वा आपन विशेषता बा साँच कहीं त एक लय में गाँव के रहला का बावजूद सबके आपन विशिष्टता बा, हर व्यक्ति के आपन चरित्र बा, हर घर के आपन विशिष्ट कथा वा अन्तरंग पहलू वा एहसे बहुत दिन से शहर में रहेवाला हमार लेखक मन चरित्र के विशिष्टता क खोज खातिर गाँव आ जाला ।

अब पच्छिम की ओर से गाँव में आइल जाउ पच्छिम उत्तर की ओर बड़की बारी बा एकरे साथ हमार आ हमरी अइसन अनेक लइकन के ना जाने केतना सम्बंध रहल बा एही बारी से होके हमन के स्कूल जाई गर्मी का दिन में स्कूल से लवटत के बलबलात धूल में जरत हमने के पाँव एही बारी की ओर बढ़े आ इहाँ आ के लगे कि माई के अँचरा मिल गइल। राहत से भरके हमने के बस्ता पटक, इहाँ के कुआँ से पानी पो आ चिक्का खेले लागीं एही बारी से होके एगो सड़क गुजरेले जवन घुनही तक जाले। ए सड़क से इहाँ अनेक रास्ता फूटे लें। एक रास्ता सरार, जगपुर होत गगहा तक जाला। ई सड़क बहुत चालू सड़क ह, एहसे ई हमन के बहुत नीक लागे, एपर किसिम-किसिम के लोग आवत जात रहें। गर्मी का दिन में ई बरात आ डोली का रंग में रंगा जाय हमरा गाँव में आवे वाली ढेर बरात एही बारी में रुके, रात के खूब नाच-गान होखे सोचे लाग त बहुत स्मृति उभरी एहसे आगे चलल जाऽ वारी का दक्खिन हमन के खेत बा, खेत का बाद नगड़ा नाला नगड़ा नाला का नीचाट सून तट पर घंटहवा पीपर बा जवना पर मिरतक के घंट बन्हाला देखल जाउ, अवहिनो घंट लटकल वा । बहुत दूर तक एकान्त रहले से इहाँ दिनहुँ डर लागेला । हैं एही नगड़ा नाला से राप्ती के पानी आवेला आ हमन का खेत में फइल जाला, फसल डूब जाला। गाँव के लोग पानी रोके खातिर बान्ह बान्हें, बाकी बाढ़ के पानी कच्चा बान्ह के मान के कहाँ? हैं, नागपंचमी पर गाँव के लोग इहें कवनो खेत में चिक्का खेलेलें, कुश्ती जमावलें आ लड़की लोग नाला का पानी में पुतरी दहवावेला । हमके याद वा हमन के डंडा से पतुरी पीटी त लइकी लोग हमन के घुघरी खाये के दें। 

ए नाला आ गोपालपुर का बीच के खुलल मैदान हमरे गाँव के खेत है हमरो कई खेत इहाँ बा। फसल का मौसम में इहाँ खूब रौनक रहेला भूत-प्रेत के कहानी ए नलवो से जुड़ल बा । इहों बुड़वा बा पाकड़ पर प्रेतात्मा वा एहसे इहों हमन के डर लागे। अब दक्खिन ओर से गाँव में चलल जाए। गाँव का दक्खिन काली माई के धाम बा। नवरातर में इहाँ ओझरती सोखड़ती चलत रहेला। काली बहुत प्रतापी मानल जालो। नवरातर में इहाँ बहते धूमधाम रहत रहे। रामनौमी की रात में गोड़इत नगाड़ा बाजे, सबेरे औरत धार चढ़ावें । प्लेग का समय ई शीतला माँ बन जायें, इनका धाम पर खूब जयजयकार होखे। बिआह का समय बर के आखिरी परिछावन इहें होखे, कूप देवता, डीह राजा, बरम बाबा से असीस लिहला का बाद अन्त में डोली इहों उतरे आ इनिकर असोस लेके रवाना होखे। काली माई का धाम से आगे बढ़ला पर दलित लोगन के घर पड़ी ।

हैं, हमार गाँव ब्राह्मन लोगन के गाँव ह बाकी गाँव की संरचना में कई जाति के भूमिका होला। खास तौर से दलित लोगन के भूमिका त बहुत ज्यादा ह, ई लोग न रहे। त कृषि व्यवस्था चरमरा जाय हमरी गाँव में ब्राह्मन लोगन के बाद चेटी लोगन के संख्या ढेर बा। ए लोगन के मुखिया रहलें गोंड़इत पोलई छान्हीं छप्पर का बीच उनुकर कच्चा मकान उनकी विशिष्टता के गवाही देला पोलई स्वाधीनता आन्दोलन के सिपाही रहलें। उनुकर एगो नाच - मण्डली रहे जवना में ऊ मिरदंग बजावें। गाँव के गोंड़इत भइला के नाते उनका अनेक सुविधा मिले। दलित के अलावा हमारा गाँव में दू घर भूमिहार, तीन घर यादव पांच घर गड़ेरिया, एक घर नाई, एक घर धोबी, एक घर कहार, दू घर बनिया, दू घर तेली बाड़ें। ए रूप में ई गाँव एकतरह से स्वावलम्बी बा एकर सब दैनिक जरूरत गाँवे में पूरा हो जाला। दूसरा गाँव के मुँह ताके के ना परेला। हँ, शादी-बिआह में माली- मालिन, बारी बारिन दूसर गाँव से आवेलें ।

गाँव दक्खिन टोला, उत्तर टोला, पच्छिम टोला में बँटल रहे। पूरा गाँव के ब्राह्मन लोगन के गोत्र एके रहे गौतम गोत्र, बाकी घराना कई रहे। उत्तर टोला, दक्खिन टोला आ पच्छिम टोला के पुरुखा लोग अलग-अलग रहे। हमरे गाँव में सब लोग आपस में घुल-मिलके रहें। बाकी कब्बो कब्बो झगड़ा टण्टा हो जाला, तब घराना वाली बाति मन में आ जालै आ एही का तहत गोलबन्दी हो जाला। बाकी अइसन बहुत कम होखे सचाई त ई ह कि पूरा गाँव एक साथे अनेक लय में बंधल रहे जवना में एगो मुख्यालय रहे अभाव के, लगभग पूरा गाँव अभाव में जीये। दू-चार घर अइसन होई जवन सम्पन्न कहा सके। बाकी सब घर अभाव से लदल रहे जे लोग सम्पन्न रहे, उनुका पास चाहे त खेत अधिक रहे चाहे उनुका घर के कुछ लोग बहरा कमात रहे। ई लोग दूसरा के कर्जा देके उनुकर खेत रेहन रखले रहे ढेर लोगन का पास एतने खेत रहे कि उनुकर खाना-पीना आ थोड़ा जरूरत पूरा हो सके बाकी जब बाढ़ आवे तब सब फसल तबाह हो जाय। कब्बों- कब्बो बाढ़ का चलते रब्बी के बोवाई समय से ना हो सके। सिंचाई के व्यवस्था ओ घरी ठीक ना रहे। पोखरी का पानी से जेतना सिंचाई होखे, हो जाय, आस-पास का खेत का कुछ पानी मिल जाय, पोखरी से दूर का खेत का पानी ना मिले। जे एक बेर कर्जा का फन्दा में पड़ जाय आ आपन खेत रेहन रख दे, से कर्जा से लदत जाय आ ओकर खेतवो आपन ना रहि जाय, ऊपर से कुछ अधिक खेत रेहन रखा जाय। घर के औरतन के जेवर कस्बा का चठघरी की तिजोरी में समात जाय।

- गाँव में गरमी के दिन सबसे अच्छा होखे। फसल कटे, डाँठ ढोवल-ओसावल जाय आ सब घर में अनाज लच्छमी के रूप में पहुँच जायें। छोट-से-छोट खेतिहर अनाज के सुख कुछ दिन पावे, पवनी परजा राहत महसूस करें। मजूरो के घर में ए समय अनाज रहे। सब लोग ए समय फुरसत में रहे ए से केहू का ओसारा में इकट्ठा होके तास खेले आ गम्मज करे, तरह-तरह के विनोद-संवाद चले। हमरो घर का सामने वाला घर का ओसारा में लोग जुटे, खूब बतकही जमे दूगो खास चरित्र पूजन माई आ बेचू भाई के भिड़न्त देखे लायक होखे। दूनोजन हँकले में उस्ताद आ अपना रंग में रंगल, घण्टन कहकहा लगावे वाला।

इहे शादी - बिआह के मौसम रहे लोग गाँव आ रिस्तेदारी के बारात करे। बारात करेवाला के दिन राग-रंग आ मस्ती से भरल होखे। कई दिन पहिले से शादी वाला घरे जुटान शुरू हो जाय गाना-बजाना आ मौज-मस्ती का साथ काम में हाथ बँटावल जाय। शादी-विआह एक घर के उत्सव ना सब घर के उत्सव रहे। कस्बा से मँगावे वाला सामान केहू ले आवे, कवनो दूसर काम केहू करे। काम के बोझ शादी वाला घर पर ना पड़े। दुख के घड़ी में भी ई सामूहिकता झलके। एक तरह से गरमी के दिन अवधूत दिन होलें। ई दिन गरीब लोगन के अवधूत अइसन जीए के सुविधा देलें-ना कपड़ा-लत्तर के चिन्ता, न रजाई कंवल के ना आगी तापे के झंझट ई दिन गरीबन के साथी दिन हवें।

गरमी के दिन भविष्य का अच्छा दिन खातिर तइयारी के दिन होलें। गुड़ाई का बाद खेत धूप में जरत रहेगा, खेत से ढेर खेत के दुसमन खर-पतवार जरेला आ ए तरह से खेत तप के खर-पतवार से खाली होके बरखा के राह देखेला-ए बादल! आके हमर तप्त देह के रसमय के द, तब नया फसल के बीज पड़ी, अंकुर फूटी, फसल लहलहाई आ गाँव के जिनगी मंगलगीत गाई आ जा बादल, आ जा....! खेत का साथे किसानो आकास की ओर देखे लागेला ।

आषाढ़ चढ़ते हमरा गाँव के आँख आकास और देखे लागे। गाँव का मालूम रहे कि बरसात बाढ़ लेके आई, सब कुछ डूब जाई, घर के बीआ डाँड़ हो जाई, तब्बो बादल- बादल के पुकार मचल रहे समय से बादल ना आवे त कई तरह के टोटका कइल जाय। खेत सूखता, बिआ डाले के समय जाता आ बादल लुका-छिपी खेलता । आशा बहुत बलवान होले। पानी जब बरसी त खूब बरसी नदी उफन जाई, चारो ओर पानी-पानी हो जाई। कब्बो कब्बो बाढ़ ना आवे तब गाँव में चारों ओर खरीफ के फसल लहराय समृद्ध जीवन के भविष्य आँख का आगे साकार होखे लागे आ सुन्दरता के घटा खेत में घिरे लागे। तब बाढ़ के आशंका से फसल महोत्सव के आशा काहें छोड़ल जाय?

पानी बरसे लागल, गाँव की आँख में उत्साह आ गइल, खेत में बीज पड़े लागल। खेत में अँखुवा आवे लागल, जइसे इहाँ से उहाँ तक धरती का रोमांच हो गइल होखे । फसल बढ़े लागल, कण्ठ से कजली के राग फूटे लागल, ओसारा में झूला पड़ गइल बाकी ई का हो गइल? पानी लगातार बरिसता सुनाता-रात्रि में उफान आवडता, गोर्रा उफनाता ! हे राम, का होई, बाढ़ आ गइल, गाँव का चारो ओर छाती भर पानी, हवा हुहुकार करता, लहर शोर करता, चारो ओर बजबजाहट फइल गइल। लोग गाँव का किनारे खड़ा होके अपनी फसल के आ अपना सपना के मरत देखता तब्बो लोग दरवाजा पर जुटता, हँसी-मजाक, चलता, आखिर ई दिन काटे के बा त रो के काहें कटे! हँसी-बतकही में अभाव छिपावल जाता। सब एक दूसरा के हकीकत जानता बाकी सब बहस में मगन बा।

रात के अन्हार फइलल बा, पानी बरसता रुक-रुक के केहू ना केहू के घर के दीवार गिरता केहू का घर में पानी चूवडता त खटिया सरकावल जाता। चूल्हा साँझे ठण्डा गइल रहे। अब ओपर पानी टपकडता बाहर बाढ़ के पानी के बजबजाहट बढ़त जाता आ गाँव का लोग के नींद से टकराता लागता, रात नाहीं ह, अंधकार के लट छितरवले कवनो डाइन है। सबेर होत फिर जिनगी शुरू हो जाय, लोग रात के दुःस्वप्न के झटक के खड़ा हो जायँ आ एक दूसरे से मिल के सामूहिक राग से बँध जायँ ।

बाढ़ हटते जमीन नहा धो के तैयार हो जाय आ लोग नया बीज डाले के उत्साह से भर जाया शरद ऋतु ताजगी लेले आवे, हवा में, धूप में, आकाश में, जमीन में अजीब जीवन-गंध भर जाय। दसहरा, दीवाली, कार्तिक पूर्णिमा के त्योहार तरह-तरह के छवि से भरल आवे, जीवन हँस उठे, अपने अभाव में गावे लागे। फिर छोट-छोट लौ अइसन, अँखुवा चारो ओर लागे, भविष्य के सपना आँख में पले लागे। धीरे-धीरे हेमंत आ सिसिर आवे त हरियाली के बाढ़ आ जाय, फूल के समुन्दर लहरे लगे। सरसो, तीसी, मटर के पीला, नीला, लाल फूल, दूर-दूर तक खाली फूल।

बाकी घर का भीतर चूल्हा उदास रहे रब्बी के फसल से कवनो तरे बरसात त कटि जाय, हेमंत, सिसिर के कटल मुस्किल रहे दलित वर्ग धान काटे चम्पारन चलि जाय,भीख मांगे निकल जाय आ गुरु लोग चेलान करे निकले। दू-तीन घर में कुछ भाई तंत्र- मंत्र- ज्योतिषवाला रहलें, ऊ लोग अपना काम पर निकल जाय, बाकी लोग अपना अभाव से जूझे हैं कुछ बड़हन खेतिहर लोगन के काम-धाम ठीक तरह से चले आ कुछ ओ लोगन के जेकरा घर के लोग बहरा कमाये गइल रहे चाहे जे दूसरा के करजा देके मालदार बनल रहे।

तब्बो केहू का हुलास में कवनो कमी ना रहे। खेत में लहरत फसल मन में सुख उपजावे आ समूह में जिला के संस्कार एकान्त उदासी में सामूहिक हंसी-खुशी के कठड़ा जरा दे। केहू का दरवाजा पर बड़हन कउड़ा बरे, चारू ओर लोग एकट्ठा हो जाय आ शरीर गरमावे एकरा साथे अनेक लंतरानियाँ सबका मन के गरमा दे, सब घंटन समूह राग में बंधल रहे। उहाँ से सब दूदू तीन-तीन का झुण्ड में निकले आ खेत का ओर चलि जाय । अइसने दिन का विस्तार में माघी अमवसा आवे लोग गंगा-सरयू नहाये चले, मकर संक्रान्ति आवे, ए दिन से फाग शुरू हो जाये। पहिले मानस पाठ होत रहे फिर ए के विदा के के फाग शुरू हो जाय।

धीरे-धीरे वसन्त पंचमी आ जाय एही दिन सम्मत गड़े, लोग समझ ले कि वसन्त आ गइल। अब गाँव के मस्ती शुरू होखे, हवा के रुख बदल जाय। झर झर झर झर पत्ता झरे लगे, फसल में खास तरह के पाकल गहराई आ जाय एगो अजीब, रूमानी ख्वाब से मन भर जाय। मन दूर-दूर उड़े लागे। भूखल-नांगट लोग फाग गवला में मस्त हो जाय। लोग रात-रात भर फाग गावे, दुपहर में गावे, घरे गावे, खेत में गावे, राह में गावे। फाटल- फाटल कपड़ा पर रंग डरले लोगन से राह भरल रहे। केतना उन्माद फागुन में रहे आ केतना ओ समय का लोगन में ई लोग घर- -फूंक मस्ती वाला लोग रहे लोग फागुन में एतना रमे कि घर घर के अभाव पता ना चले। एक बात रहे, मन में सबका बुझाय कि खेत में ओ लोगन खातिर समृद्धि तइयार हो रहल बा, अब एह से अभावग्रस्त लोग अब ओतना दुखी नइखे, गीत सबका कण्ठ से ना पेट से निकसsता। होली के उत्साह के बारे में का कहल जाय? होली एक दिन के ना पूरा फागुन के त्योहार रहे। मादकता आ मस्ती से भरल ई पूरा महीना सब सामूहिक मस्ती से जीए। सम्मत जरेवाला दिन आ रंग खेले वाला दिन त लगे पूरा गाँव सामूहिक राग बन गइल बा छोट-बड़, बूढ़-लइका, स्त्री-पुरुष सब वसंत बन जाय । होली के साँझ के सब पर उदासी आ जाय कि हाय, फागुन बीतत जाता फिर चइत आवे, खेत कटे, खलिहान में गाँव के सामूहिक जिनिगी के खूबसूरती झलके आ अन्न के उष्मा से जिनिगी में एगो नया चमक आ जाय । चइत में रामनवमी के मेला चले। गाँव के लोग उहाँ जाय, मेला के आनन्द ले आ साल भर खातिर मसाला वसाला खरीदे। एह तरह से साल भर के समय चक्र पूरा हो जाय । 

हमार गाँव दोसर गाँवन से कई माने में विशिष्ट मानल जाय। ई विशिष्टता अच्छा आ बुरा दूनूँ रहे अच्छा ए मामले में कि इहाँ शिक्षा दूसरे गाँवन से अधिक रहे प्राइमरी तक ढेर रहले, मिडिल स्कूल तक पढ़े वाले लोगन के संख्या कम ना रहे रामगति मिसिर, भीमल मिसिर अइसन कई लोग स्कूल में पढ़ावतो रहे लोग ओ घरी एक आदमी-कैलाशपति मिश्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आ एक आदमी श्रीराम मिसिर, हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़त रहे लोग ई दूनूँ जने वकालत पास कइलें जब हमन के बड़ भइनी आ पढ़ाई करे बहरा निकलनों त बहुत लोग शहर की ओर पढ़े निकलल आ गाँव शिक्षा का आस से भर गइल। दूसर बात ई रहे कि हमरे गाँव के लोग जवार में अपनी विशिष्टता के कारन जानल जाय। कन्हैया बाबा आ शिवदत्त बाबा अपनी सम्पन्नता खातिर मशहूर रहलें त हमार असम्पन्न पिताजी अपनी सामाजिकता का कारण पिताजी साँप के मंत्र जानों, पीलिया झारों, देवता उनुका सिरे आवें घूम-घूम के फाग गाईं, तैराकी करों। कई डूबत आदमी के पिताजी बचवले रहनों। सबसे बड़हन बाति ई रहे कि बाबूजी तमाम लोगन का साथ उठी- बइठों, किस्सा-कहानी के मजमा लगवले रहीं।

हमरा गाँव में स्वाधीनता संग्राम का समय काफी हलचल रहे पिताजी, नरेश भाई, पोलई हरिजन कांग्रेस के झण्डा उठवले कांग्रेसी सभा में जायें आ राष्ट्रगीत गावत प्रभातफेरी करें। आसपास के सुराजी लोग हमारा गाँव में आवें, बातचीत करें, सबके उत्साही करें। हमरा अइसन छोट-छोट लइके सुराजी चहल-पहल में शामिल रहलें।

हमरे गाँव के विशिष्टता के कारण इहो रहे कि इहाँ एक से एक जवांमर्द रहलें । उनुके दिलेरी आ बहादुरी के किस्सा मशहूर रहे। एकरा चलते हमरा गाँव के सामूहिक ताकत एतना प्रबल मानल जाय कि दूसरा गाँव का हमरा गाँव से टकराय के हिम्मत ना होखे । जमीन्दार, दरोगा के जालिम ताकत भी इहाँ के जवांमर्द से टकराय में घबराय। ए जवांमर्द लोगन के आपन खासियत रहे। चन्द्रबली, वृषभान, रामगरीब, सुरप्रसाद, पृथ्वीपाल, दल्लू- ई लोग गाँव के लीजेण्ड बन गइल। एकरा बाद वाली पीढ़ी के विशिष्ट लोगन में पूजन भाई, बेचू भाई, नरेस भाई, अम्बिका सुकुल, दरियाव मिसिर मुख्य रहलें। ए सबके आपन- आपन रंग रहे। हमरो पीढ़ी में कई विचित्र शख्सियत उभरत रहें जवन आगे चलके करामात देखवलस। गाँव कुछ बरिबंड लोगन खातिर भी जानल जाय जे आपन ताकत गलत काम खातिर लगवले रहें। कहीं चोरी हो गइल, खेत कटा गइल, लंपटई भइल, बैल चोरावल गइल त कुछ नाम सबका जुबान पर एकाएक आ जाय अइसन नाम दुसरो गाँव में रहे एहसे हमरा गाँव के ए माने में अलग से रेखियावल ना जा सकेला|

सवर्णलोग चाहे सम्पन्न होखें चाहे असम्पन्न, बड़हन खेतिहर होखें चाहे छोटहन- सामन्ती संस्कार ए लोगन में रहे। ई लोग गोसयाँ रहे आ नाई, धोबी, कहार, अहीर, गंडेर,तेली परजा रहलें सवर्ण लोगन की जमीन में घसल दलित लोग सवर्ण लोगन के अधीन रहलें। छोट दायरा में हर सवर्ण पिछड़ा आ दलित से कहे सलूक करे जवन बड़हन पैमाना पर जमीन्दार आ सामन्त गाँव के जबर्जस्त लोगन के आतंक ढेर रहे स्वारथ सिद्ध ना भइला पर ई लोग पिछड़ा आ दलित का साथे अमानवीय व्यवहार करे।

ये सबका वावजूद एगो मानवीय सम्बंध गाँव में रहे। पिछड़ा लोगन से कवनो ना कवनो परिवारिक रिस्ता जुट जाये। दलित वर्ग के साथ भी अपनापन रहे ए जाति में रघुवर नाई, दसरथ कहार, सिवनन्त्रन गरी, मेघन धोबी, जत्तन तेली, दलित वर्गीय पोलई अइसन लोग गाँव का केन्द्र में रहे। हमरा मन में ए लोगन के अनेक सन्दर्भ बा। गाँव की संरचना में यादव परिवार के कई आदमी के अहम भूमिका रहे।

जवन लोग सबसे ढेर याद आवडता ऊ लोग उपेक्षित रहला का बावजूद गाँव का जीवन में रस घोरे एगो सीताराम रहलें, इनके सब निकम्मा कहे बाकी ई सबके उपेक्षा हंसिके सहें आ बाँसुरी की धुन से वातावरण के रसमय बना दें। गाँव का संकट में सबसे पहिले आगे आयें। एगो सुखदेई फुआ रहली जवन सवति आ गइला का बाद अपना ससुरा से नइहर आ गइली, जहाँ अकेल उनुकर माई रहली। ईहो सबकी उपेक्षा का बावजूद सबका सुख-दुख में सरीक होखें, पर्व-त्योहार पर गावें बजावें, सगुन उचारें, सिर-दर्द झारें, औरतन के सौदा सुलुफ करें, अपना खेत आ घर के काम सम्हारें। ए तरह से गाँव का औरतन से अपना के जोड़िके ऊ दोसरे के दुख हरें आ आपनो दुख कम करें आ एक तरह से अपना पति का अत्याचार के अपना तरह से प्रतिरोध करें। अइसन ना जाने केतना अभिशप्त स्त्री-पुरुष गाँव में रहलें जे अपना के मिटा के जीवन मूल्य रचत रहलें ।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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