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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023

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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रहर, गोहूँ, ऊख जियादा होला।

पतनई एतना ऊँच हौ कि कब्बो बाढ़ि नाइ आइल नदी किनारे के खेत पानी में डुवि जालैंड, मंदिर के सीढ़ी आ पक्के कुआँ क जगत पानी में थोरा-बहुत डूबि जाले, मंदिर क राम, सीता, लछिमन, हनुमान आ गाँव बचि जालें मंदिर के बगिया तब गुलजार होले जब कहीं से बरात आ के टिकेले ।

ओइसे पतनई में नाऊ, बारी, धोबी, धुनिया, बढ़ई, लोहार, बाजे वाले, कसाई, चमार, कायथ, भुँइहार, बनिया, अहीर सभे बाँट, बाकी भुँइहार ढेर बाटै भुँइहारन क हवेली आ बनिया लोगन क बखारी देखते बनेले। कायथ लोगन के बहरे रहले के मारे या त उनकऽ घर ढह गयल भा ढहे के कगार पर बा। गाँव के बीचो बीच एक ठो गड़ही बा। पड़ोहा देखते बास आवेला । ज्यादातर घरन में जीउआ बाटे, अब नयी-नयी मसीन बा।

एही गाँव में सन् 35 में हमार जनम भइल जनम होते हमार माई मरि गइल। घर में अउर कई मउत भइल। एक ठे चाचा रहलैंड उनके पास घोड़ा गाड़ी रहल। ऊ भागि गइलैंड कलकत्ता । ताऊ जी मरि गइलँ। हम 19 भाई बहिन रहलीं न जाने केतना भाई- बहन मरि गइलैंड। पिता जी बहुत दुखी भइलैंड, तेरह कमरा क बखरी छाड़ि के चल दिहल दुसरे गाँवे ।

धुनिया के घर में धुनकी क तुक्कताँय अबहिन हमके इयाद बा गड़ही क काई आ अगल-बगल के अँड़सा के इयाद अवहिनो बा । पकवा इनार, हेडमास्टर बुढ़उ बाबा, चरखा चलावत गोरकी दादी, बुआलोग आ चाचा के मउति अबहिनो यादि बा हमरे पास एक ठो कपड़ा के घोड़ा रहल, ओम्में एक ठो काठ क गाड़ी रहल, ऊ बिसभोर ना होला। भइया एक ठो अमरूध के फेड़ लगवले रहलैंड कहो भुलाइब ना बगल में हमार समौरिया एक ठो बिटिहिनी रहल, गोर, ओकरे साथ हम खेलीं ओकर माई हमके रोज चिलगोजा, बादाम, काजू, किसमिस, तालमिसरी, छुहारा, चिंरौजी सबेरे-सबेरे दूनो हाथे में भरि के दे दे, आज सोचि के दंग हो जाईला

1 चिउँडाँड़ के दक्खिन एक नोनियन क गाँव ह चक भगवानदास। पिताजी ओही जूँ आ के बसि गइलैंड इहाँ धान खूब होला। तीन तरफ ताल, ताल में कमल, कमलगट्टा, मछरी, एक तरफ घाघरा से पानी एक नारा में आवे त हमहन बड़का झींगा आ मछरी मारि ले आईं। ओ जमाना में बड़का झोंगा घाघरा में खूब होखे। अब त बान्ह बनि गइल, दोहरी में पुल बनि गइल, नहर त बनी गइल। अब कहाँ मछरी, अब कहाँ झींगा, कुल सपना होइ गइल। तालो खतम हो गइलैंड न पानी, न कमल, न कमलगट्टा। कुल गायब। अरे, अउर त अउर नाव- संस्कृति खतम होइ गइल। ना त हमहन के नाई से एह पार, ओह पार जाई, दोहरी से बड़हलगंज तक नाव यात्रा बड़ी नीक लागे। दूनो किनारे चत्रा का घुघुनी आ चत्रा का बहुतै नीक नमकीन आ असली दूधे क चाह मिले। अब सब बिलाइ गइल । दोहरी क मेला कई बेर देखलीं बड़ा मजा आइल देसी घी के खूब बड़का लंबी गुलाबजामुन मिले। दोहरी के गुलाबजामुन जिला जवार में मशहूर रहे अब त छोट-छोट मिलेले, घासलेट में बनल । दू ठो स्टीमरो चलै। पीपा के पुलो रहे। बड़हल गंज से दोहरी ले नाव पर, फिर पीपा के पुल से आगे यात्रियो एही तरह से आयें।

हमहन के बैलगाड़ी से दुसरे गाँवें गइलीं। हम बड़ा खुश रहलीं घूरे पर अवाँट- बवाट गावत रहलीं। लेकिन हमरे बहिन लोग अपने-अपने संखिन से मिलि-मिलि रोवें। हमरे सहन में, दुआरी पर हर साल ई लोग गोधना आ पिड़िया मनावें। ई सुनीला, अमरूध क फेड़ ना ह, घर गिरि गयल, बाकी गोधना आ पिड़िया अब्बों होला ।

हमरे गाँव में जीयनपुर क दू ठो मिसकार रहें। उनके पास घोड़ा आ बंदूक रहे। ऊ चिरई मारें। नौ महिना तक हमहन के चिरई, मछरी, बड़का झींगा खाईं। तिने महिना रहरी क दाल खायल जाय। एक दिन दिनडुबानी हमरे बाप घोसी से अइलँड, दाल के नाव सुनते कूदे लगलँ । राति के मछरी मरववलैंड तब कहीं उनके चैन मिलल । अब त कुल चीजु बजार से आवेला। तब घीउ, दूध, तरकारी ई सब बिना पइसा क मिलि जाय। हमरे इहाँ हाथी पर चढ़ल बड़े-बड़े जमीदार, कोतवाल, कलट्टर आवें आ रुकें। धान कटे आ ले के जायें।

धानकटाई के समय बगिया में नट-नाटिन रुकैं खूब आल्हा होय, महरारू गोदना गोदवावें । गीतन क धूम रहे फजीरे जाँता क गीत, बरसात में कजरी आ झूला अठर झूलागीत। होली में चत्रा आ हमरे पिता जी खूब होरी गावें, रंग-गुलाल के साथ मेहरारू दौरि दौरि के गोबर फेंकें। दादी के पास 'प्रेमसागर' क पोथी रहल। छोटके भाई के पास गुलबकावली, किस्सा तोता-मैना आ सोरठी बृजाभार रहल। ऊ बहुत खर्चीला रहलँड बहुत बीड़ी पियें, ऊ कौनो करम ना छोड़लैंड फल ई भयल कि एक पर एक खेत बिकाई गइल। एहू जूँ कई मउति भइल, कई ठे विआह भयल। पिता जी के ऊपर कर्जा पर कर्जा आ भाई साहब खेत के पैसा इहाँ इहाँ, एम्मे ओम्मे उड़ाई दें।

हम ललका भात खइलें हई, पालक के साथ, सजावदही के साथ सुरकल धाने के हरियर चिउड़ा आ सजाव दही हमके बहुतै नीक लागे। देसी चीनी, सावाँ क सतुआ आ देसी घी के खूब मजा लिहलीं। कोदो क लिट्टी आ सिधरी के मछरी हमके नीक लागे । जब कोदो कटै त कोदो काटे वाली कुल कोदो क पोरा चबायँ आ उनकऽ ओठ महिना तक लाल रहै। कुल बड़ी नींक लगे। कब्बो कब्बो खेत कटत क रहरी में, खेतन में, डाँठ उठावत गिरावत के चुम्मा चुम्मी, चिपका चिपकी क खेल हम देखले हई।

हमरे एक ठे भइया रहैं, उनके पास सफेद घोड़ा आ बंदूक रहै । ऊ बहुत बढ़िया शिकारी रहें। चिरई मारि के ले आवैं त हर चिरई अलग पतुकी में पकावैं। हम सुततो रहीं त जगा के खियावें। कबो-कबो चिरई मारे खातिन जायँ त घोड़ा पर आगे गोद में बैठाइ लें। जब ऊ चिरई मारै त हम बटोरीं। लालसर, जलमुर्गी आ सुरखाब क इयाद हमके हौ । हमरे गँवा क नोनियवाँ कुल दिनडुबानी ताल के किनारे जाँय एक ठे थरिया आ एक ठो दिया लेइके। दिया थरिया के पीछे रहे आ ऊ कुल धरिया बजावै। बस, चिरई आ जाय नगिच्चे आ ऊ दन से पकड़ लें। अब कहाँ ताल, अब कहाँ चिरई ।

हमरे ई भइया एक दिन ओही घोड़ा पर बइठा के ले गइलैंड गोठीं । उहाँ उनकऽ एक ठे प्रेमिका रहे, कौनो सुन्नर वेश्या । ऊ बहुत भली रहे, हमके आपन दूध पियवलसि । ओकरे पहिले हम मलयज के महतारी के दूध पियले रहलीं मलयज के महतारी हमार सबसे बड़ बहिन रहली।

हमरे ई भइया गँजेड़ी-नसेड़ी रहलऽ उनके जेबा में गुलाब के खूब पंखुड़ी रहे सबेरे उठि के अफीम के हरियर खेत में चलि जायें, बलेड से पोस्ता क डंठी पाछि दें अफीम जब निकसे त चाटि के चलि दें। हमार बड़की भौजी तनिको नीकि ना रहली। हाथी जइसन उनके दूगो दाँत बड़ा बड़ा निकरल रहे। भइया के मन में एकर बड़ा दुख रहल। ऊहो मरि गइलन।

हमरे घर के बगल में एक अहीर परिवार रहे, बड़ा गरीब ओकरे पास छतनार बरगद जइसन एक ठो महुआ के पेड़ रहे ओकर कुछ हिस्सा हमरे अंगनाई में आयल रहे। कुछ महुआ हमरिओ आँगन में गिरै त हमहन पोस्ता के साथ महुआ ततै लेई आ ओखरी में कूटि के मुसरे मुसरे लाटा बनाई लेई, सोंधा-सौंधा, मीठ-मीठ, अहिरा के घर भर ओझिला खायें, कोइना खायें, कोइनी के तेल जरावें। जब महुआ चुकि जाय तब अहिरा ताले में से लड़ई निकारि के बेचै ओकर लड़का फड़का हमरे घरे पले-बढ़े। एक दिन अहिरा कमाये गयल आसाम आ लौटवे ना कइलस ओकरे पहिले ओकर बड़ भाई बहरे कमाति रहल। क अब घरे रहे आ अपने भयहुआ के खूब मारे ओकर भयहु पीयर गोराई लिहले गजगामिनी रहे। ओकर बिआह त वइसे चउिँटीडाँड़ में भइल रहल। ऊ सड़की के किनारे रोज गोवर पाथे । अहिरा जब दोहरी जाय त दुमकि जाय आ बतिआवै। पता चलल ओकर घर जट गरीब हौ, ऊ कब्बौ रहरी के दाल ना खइलस। बस फिर का। अहिरा कहलस, चल हमरे घरे, तोकें हम रहरी के दाल खिआइब के दिन तवन आज दिन, ऊ ओही महुआघर क दुखियारी होइके रहि गइल। रोज ओही गजगामिनी चाल से हमरे दुआरे कुआँ पर पानी भरे आवे। अब ऊ सुखी हो। ओहू के दिन लउटि आइल। ओकर छोटका लइका सुनौला, जबरजंग डाकू होइ गइल। हमरे जवार क अपने महतारी के सोना से लाद दिहलस । पक्का मकान बनाइ लिहलस |

ओकरे घर के पास एक ठो बड़ी बसवारी आ बड़ी गूलर हो गूलर पर गूलर बाबा रहे। आगे बगिया हो, ओम्मे चुड़ैल आ भूत रहलँड, एइसन बगिया पतनइयो में रहल। एक बेर हम जमुनी क फेंड़े पर चढ़ि के जामुन खात रहलीं। बस, डरिये टुटि गइल, हम गिरली चपाकू से।

पतनई के बगिया में प्राइमरी स्कूल रहल। इहाँ हम पटरी पर चार पाँच महिना लिखले-पढ़ले रहलों । इहाँ कौनो स्कूल ना रहल। चमरौटी में कारी माई क थान रहल। साल में एक बेर हर घर के लोग सोहारी हलुआ चढ़ावें आ पालल बकरा कटै चमरौटी पतनइयो में रहल। लेकिन ईहाँ कई टुकड़ा में रहल। एक ठे चंगेरा ताल के पास, एक ठे गड़ही के पास चंगेरा के पास हमार सहपाठी एक ठे नचनिया रहे, बड़ा दूर-दूर तक जाय। नाचे त नाचे, गइबो करे बढ़ियाँ, खूब सुन्नर क रहे आ घुंघराला बाल रहे। ओकरे घर हम एक बेर पानी पियलीं, ओकर बाजा देखलों। पानी के ले के बड़ा हड़कंप मचल । एइसने हड़कंप तब मचल जब हमरे भइया चोरी से मुर्गा बनवलैंड आ आमलेट खइलैंड | हमरे घर में तब ई मानल जाय कि ई दुई चीज खाली मियाँ लोग खालँ । पिताजी पंडित बुला के हवन ओवन करा के उनके फिर से हिंदू बनवलँ ।

दुसरकी चमरौटी में एक ठो दर्जी रहलें। बाद में सरपंच भइलैं। उनके इहाँ तिरंगा से भाँग छानत हम एक बेर देखलीं। दूसर रहलँड लंगड़ ऊ ताड़ी पियें, लहकार के गावैं आ टिटकारी मारि के एक्का चलावें । ताड़ी छुटपन में हमहूँ पियलीं । पिताजी भोरहुरिये ले जायें तरकुले तक, टटका ताड़ी उतरवावें आ हम पीहीं कब्बो कब्बो कलेजी भी मिले। महतारी के दूध के जगह इहै ताड़ी कुछ कामै आइल |

दूनों गाँव में सुअरी के खोभार रहै। सूअर के छौना हमके बड़ा नींक लागें नोनिया लोग सूअर के तेल बड़े मन से खायें, घीउ हमहन के देइ दें। खेते के मूस, पानी क डोंड़हा कब्बो खायें। मूस त भूँजि के खाँय एक बेर हमहूँ के तनी सा चिखवले रहलँ । हम बहत नाला के उप्पर पहरा लगाइ के बइठि जाईं। जब चेल्हवा सिधरी ढेर क हो जाय त कब्बों घर में तावा पर ठंढा मसाला में कोहड़ा के पत्ता से भूनि के पका लोहल जाय आ नाहीं त बहरवें रहेट्टा जरा के भूजि पूँजि खाइ डारल जाय। ओ समय हमके भूजल गरई बड़ी नीक लागे।

जीयनपुर के मिसकार महिनन हमरे गाँवें में रहें आ चिरई चाउर एक्कै में बनाइ के खायें, हम त हर समय उनके पिछवें पिछवें रहीं, त हमहूँ के खिवावें। कुल गाँव उन्हन के चाचा कहैं। ओ जमाना में हिंदू मुस्लिम में भेद भाव ना रहल कौनो जाति के केहू होय, बड़ छोट के हिसाब से व्योहार होखे छोट बड़ के देख खटिया छोड़ दें।

एक ठो ओझा रहें। पचरा गावैं। उनके पेट पीठ पर खूब बार रहे। ओम्मे जुआँ (ढील) पड़ि पड़ि जाय । हमार कई ठे सखी रहली अतवारिया आ बनरी के इयाद हौ बनरी के हम ईंटा घिसि के सेनुर माँग में भरले रहली ओकर माई बहुत दिन ले मयके में रहने के बाद जब गइल त ससुरारी से कब्बों ना लौटला ऊ मरदे से बहुत घबड़ाय। उनले बन्हले के बाद पेटे में अतवरिया आइल बनरी के बाप छाँगुर कलकत्ता में एक ठो हलवाई कोहाँ नोकर रहे एक दिन ओकरे काम से मालिक खुश हो गइल आ छाँगुर परात भर रसगुल्ला खाइ गइलैंड। उनकऽ जिनिगी भर क ई इच्छा रहल। दुसरे दिन जब छाँगुर दुकानी पर ना अइलैंड उनके ठीहा पर मनई भेजल गइल। उनके पनारा बहत रहल उठी ना पावें। मालिक आयल, कहलस, "अउर खो 500 रसगुल्ला अउर पी सीरा अब निकरत ह न सीरा।' कौनो तरह से रुपया पइसा दे के मालिक छाँगुर के गाँवे भेजलस। छाँगुर फिर कलकत्ता नाइ गइलें। छाँगुर सौंप-बिच्छू झारें। गुलैची- इलैची दुइ बहिन रहलीं। खूब गावैं। हमार आजी खूब लमछर, खूब गोर रहें। उनकs बार पियराइ गइल रहे। उनकऽ नाकि खूब लमहर रहै, जीभियो ओइसनी रहे। बोरिया पर बइठि के, बइठका के दरवज्जा से सटि के सम्हने अँगोठी रखि के दिन-रात हुक्का पियँ आ सबके गरियावै। सब मनावै कि बुढ़िया मरि जाय। एक बेर हमरे बहिन लोग उनके उप्पर भठरा फेंकि दीहल गारी अउर बढ़ि गइल। एक बेर लोटा से आपन कपार फोर लिहली नराज होइके दुसरे गाँवे चलि गइली। पिताजी मनाइ के ले अइलँ । फिर दवाई से कपार ठीक भइल। आजी हमके बहुत मानें कब्बो कब्बों हमरे खातिन बरखीर बनावें, गोदी में बैठाइ के खियावें। एक बेर जाड़ा में राती क रजाई के उप्पर अँगीठी रख के हुक्का पियत ओलरि गइली अँगीठी उलटि गइल, रजाई जरे लगल, खटियो में आग लगि गइल। ऊ उठि के दीवारी से सटि के चिल्लाये लगली। हमरे बड़की भौजी जान- वृद्धि के अइबे ना कइली । लपट टाँड़ ले चहुँपि गइल। तब इहाँ आयल हमरे जीजा बाहर से चिल्लइलैंड, पितो जी चौकि के उठलैं। दरवाजा खोलवावल गयल, कुआँ से पानी ले-ले के आगि बुझायल गयल आजी 110 साल के होइके मरली मरती नायँ, अगर उनके माता माई ना निकरती। साँझी के माता माई के किरपा भइल। फजीरे देखत हईं कि खटिया के पावा से बन्हल बकरी (छेरी) भूसी खाय आ आजी के मुँह चाटै पिताजी अइलैंड आ रोवे लगलँ । जब चिता जाये लगल तब हमरे भित्तर जइसे हूक उठल आ पुक्का फाड़ि के हम रोवे लगलीं। अब हमरे घर में इतनी उमर के बूढ़ केहू ना होई । आजी एक ठो पीयर क छोट क लकड़ी लेइके चलें त उनकऽ कमर आसमान छुए आ उनकऽ नाक भुइयाँ। घर में ऊहै रहली जे 1857 क खिसा सुनावें।

जाड़ा में बइठका में कउड़ा जरै। हमहन के गंजी भूनि भूनि खाई। तपते तापत ऊखि चूसीं। चारों ओर बइठि के सब कहाँ-कहाँ के बतकहीं करें। अगल-बगल बोरा बिछै । सब ओही पर सुतै। गर्मी में बहरे बरसात में हमहन के जोन्हरी के बाल भूनि भूनि खाई। मेहरारू धान देइके मछरी तरकारी खरीदें। बड़की भौजी बकरी पालि-पालि बेचें।

एक दिन लंगड़ के एक्का पर बइठा के हमरे पिता जी ले गइलैंड चिउंटीडाँड़ आ प्राइमरी स्कूल में हमार नाँव लिखाइ दिहलँड हमके पटवारी के नक्सा वाले कपड़ा के पानी में गर्मा के, धोके बुश्शर्ट बनल रहल। हाफ पैंट पता ना केथुआ के रहल, बहुत जल्दी बदरंग होइ गइल। स्कूल सड़की के किनारे लइका कुल भुइयाँ बोरा बिछाइ के बइठल रहलँड । एक्कै मास्टर रहलँ । उनकऽ कुर्सी लोहा क कि टिने के रहल। हम जाइ के कुर्सिए पर बइठि गइलीं। लइकवा कुल देखि के मुस्कियय पिताजी जब चलि गइलैंड हमके एक ठे बोरा पर बिठाइ दीहल गइल । हम धोरिके देर में मूर्ति भरलीं। लइकवा ठट्ठा मारि के मास्टर साहब से बतवले स। एक बेर एक आँख वाली कार से बड़का भइया हमके दोहरी ले गइल। नई बाजार के सड़क पानी में डूबि गइल रहल। कान्ही पर लेइ के चलल । कार छोड़ि दिहल | देखत हुईं कि एक ठो कुआँ जड़ से उखाड़ के बहत जात रहे। कुआँ के बिच्चे में बरगद के छोट क फेड़ रहे। ओप्पर एक ठो कौआ बइठल रहे। अब ऊ सड़क ना हो। नई बजार के आगे आइ गइल हौ दोहरी में सरजू में भइया हमके उठाइ के डुबो के निकारि दिहलँड फिर पैदल ले गइलैंड एक ठे चिकवा कीहाँ। ऊ त बकरा क एकहक चीजु देखि देखि काटे के कहत हवें आ एहर मूते क घार भइया के सफेद धोती के पछोहा ले चहुंपि गइल। चिकवा देखलस। हँसल आ इसारा कइलस भइया मुड़ि के देखलँड कहलँs बतावे के न चाही। संकोच के मारे दुइ बेर एइसन भयल ।

गाँव में रहीं त एक ठो लंबा कुर्ता पहिरि के दिन भर लइकन आ मिसकारन के साथ घुम्मीं खेलीं घर में केहू पुछत्तर ना रहे। अब पिताजी दोहरी से, घोसी से आवैं तब हमार खोज होय। अब जब हम स्कूले जाये लगलों त डीह क, बरगद के भूते क किस्सा सुनत सरजू, सुरखाब, लंगूर, कोई (कुमुदिनी), बेर्रा देखत (कब्बो तोरत-खात) स्कूले जाये लगलीं। बोरा, पोचारा, पटरी, दुद्धी लेके जाये लगलीं। अतवार के पोहड़ी काटी। कब्बो कब्बो नदी में नहाई। हम सरकंडा के कलम से पटरी पर बड़ा खुशखत लिखों। पटरी पर डोरा से रेखा बहुत सीधा खींचीं। पटरी घोंटारि के चमकवले रहीं। जब कागज पर लीखे लगलीं त काजर, घीउ आ चाउर जराड़ के रोसनाई बनाइ के सरकंडा के कलम से लीखे लगलीं।

दुपहरिया क छुट्टी होखे त हरघौली होते आईं राहि में एक ठे गड़ही पर धोबीघाट रहे। उहाँ डर लगे। काहें कि कब्बो एक ठो धोबी मरि गइल रहे आ राति के छियो राम- छियो राम करै। राही में लतरी क साग, छिम्मी, चना, बथुआ के साग, ऊखि जोठ भर खात चूसत घरे आई आ खा-पी के जाई गर्मी में सिद्धा ले के जाईं। मास्टर साहब बनावें। हमरे संघतिया रामकिसुन मास्टर साहब के सेवा टहल करें, अमिया तोरि के चटनी बनावें, मास्टर साहब के नहवावें। हम त आये पर चढ़ि के अमिया खाईं। एतना कि बनास फूट जाय। बाद में बहिन इलाहाबाद से आइल त छोटके भैया टिफिन ले आवे लगलैंड। हमके कटल पियाजि में गारल निब्बू बड़ा नीक लागे। एक दिन जाड़ा में बहरे पढ़त रहलों कि घामे से हम बेहोस होइ गइलीं। पानी के छींटा देइके होस में लेइ आवल गयल आ छुट्टी होइ गइल। एक गिलास पानी पियलीं आ घरे आइ गइलीं। हमके ऊ नोनियाइन देखे आइल जवन ई कहि के रोवा दिहले रहल कि तूं रोज खाली कुर्ता पहिरि के नंग-धड़ंग घुम्मेलs, जा किछु पहिरि के आवा नातऽ तुहार फुत्री एही चक्कू से काटि देव ओही दिन हमरे पिताजी छोट क धोती ले अइलैंड।

हमरे बहीन राही में कहलसि कि एतनी बड़ी दुनिया हौ, एक सूरज से काम त चली ना। जरूर दुई सूरज होइहें। हम कहल सूरज त एक्कै हो एही तकरार में ऊ हमके पटरी से कपारे पर अइसन मरलसि कि कपार से खून बह निकरल आ हम रोवे लगलीं।

हमार कपार छोलवावल रहल। स्कूल के पीछे के बेल के पेड़ से बेल खूब गिरें। बेल गिरल । हम एहर से दउड़लों, लंगूर ओहर से हमहूँ पकड़ली, ऊहो पकड़लस | फिर हमरे घुटे सिर पर मारे लगल, लइका दउरवलँड तब जान बचल बेल ले के अइलीं । फोर-फोर खायल गयल। एक बेर एक ठे लड़का कटहर क कोआ ले आके खियवले रहल। तरकुल त हमहन के कई बेर खइलों आ वइर, जामुन, गुल्लर साधे-साधे खायल गयल ।

गाँव में रसभरी भी खूब मिले। पिता जी आजमगढ़ से बढ़िया-बढ़िया आम ले आवैं। दुइ पइसा फीस लगे। पाँच रुपया गोड़ धड़के पास कराई। ओ समय क पढ़ाई जिनगी भर काम आवति बाबीस ले पहाड़ा आ सौ तक गिनती क झूमि झूमि के रटाई, हुच्चा, पहुंच्चा, व्योहार गणित, बहीखाता, चक्रवर्ती अंगगणित, अच्छर क पढ़ाई कविता से मास्टर साहब कबो-कबो पटरी पर दाल चाउर से अच्छर लिखवावें। नक्सा में मटर, चना, सरसो से प्रांत रंगवावें। बाद में चिट्ठियो लिखव । व्याकरण पर एतना धियान दें कि स्त्रीलिंग- पुंलिंग आ 'ने' क का मजाल कि गलती हो जाय। एक ठो रहे जदीद मेन्टल आ आजमगढ़ क भूगोल। हमहन के कुल इयाद रहे ओ जमाना में हमके पिता जी के गुनिया खूब नीक लागे ।

मास्टर साहब अतुरसावाँ से पैदल चलें आ सूरज निकरतनिकरत हरधौली चहुँप जायें। हमहूँ अँगोछा में भेली भूजा बान्हि के हरधौली चहुँप के उनके साथे होइ लेई राही में ऊ ज्ञान के बाति करत स्कूले आवैं। ऊ ताला खोलें। हमहन के खिरकी प्रार्थना नकछेदी करावें। हमरे बगलि रामसनेही बइठें आ ठोपे ठोप मूतैं। उनके धोती से बास आवै। दुसरे बगल इमिरतो बइठें। हमके इमिरती खियावें। हम मानीटर रहलीं। एकाध बेर झगरो भइल खटिकन भुँइहारन से एकाध गड़बड़ियो भइल। का रहल कि बड़-बड़ लइका आ बड़- बड़ लड़की पढ़े आवै। कुछ दिन में लइको गायब। पढ़ाई बंद। एकाध मास्टरो गड़बड़ अइलैंड आ चलि गइलैंड मास्टर साहब हमेसा बनल रहलँड । गर्मी में दिन में छुट्टी होइ जाय। गोड़े में परासे क पत्ता बन्हवावें आ कपारे पर परासे क पत्ता रखवावें। गर्मी ना लागे एक बेर ढेर तपन में हमरे घरे अइलँड । खइलँड, पियलँड, सुतलs साँझी क घरे गइलैंड।

एक बेर सड़की पर हमहन के करइत दउरत देखलीं ओ जमाना में दोहरी से आजमगढ़ तक रोज दिन-रात भर भरे ट्रक पर लदल गोरी फौज घूरि उड़ावत आवै जाय। हमहन के डेराई। चेचक के टीका लगावे वाले जब आवै, हमहन के रहरी के खेत में छिप जाईं। एक बेर त एक गोरा हमरे गँडओ में बंदूक बन्हले लउकल रहल। घर पर कर्जा, जंग के नाव पर कन्ट्रोल से कपड़ा, मट्टी क तेल बिकै

एक दिन अजोध्यानायक अइलँड । बतवलैंड देश आजाद होइ गयल। बड़ी खुशी भइल। काहें? ई तब ठीक-ठीक ना मालूम रहल। हमरे दुआरे तिरंगा फहरावल गइल । हमहन के धान सुरुक के माटी में पोत के (वजन बढ़ावे खातिन) बेचीं आ बदले में उसिनल गंजी खाईं। ओइसे एक पइसा में दुई तीन गंजी मिलै ।

एक दिन फिरो अजोध्यानायक अइलैंड बतवलैंड, गाँधीजी के गोडसे मार दिहलें । बहुत दुख भयल ओह दिन हमनी के उपवास कइली मऊ में आजादी मिले से पहिले भारत के कुल नेता आयल रहल। हम बीमार रहलीं ना जाइ पवलीं। मास्टर साहब से

कुल जनलीं। गांधी जी के न देख पवले क दुख हमेसा रही, बाकी सबके त देखि लिहलीं। दर्जा चार में हम पूरा जिला में प्रथम अइलीं । दोहरी में इम्तिहान, लूह। कई दिन बीमार रहलीं। बीमार त बचपन में हम कई बेर पड़ली एक बेर हमार अवाज चलि गइल । अंबिकाप्रसाद श्रीवास्तव धनौती से घरे अइलँड, च्यवनप्राश बनवलँड, दूधे के साथ तीन महिना खड़ले पर कफ निकरतनिकरत आवाज लौटल। एक बेर पेट खराब भयल हमरे छोटकी भौजी के कवन चिंता। हम दिनभर मेंड़ो से खेते में लाल आँव रहल। जब पिताजी तहसीलों से अइलँड त झगरू क माई बतवली मास्टरे साहब दवाई बतवलें । बबुरे क पतई पीसि के दुधे में तीन दिन पियावल गइल तब हम ठीक भइलीं। कई बेर हमके पीलिया भइल। झरले से ठीक हो जाय एक बेर गठिया हो गयला भागीरथी राय के दवाई से तीन महिना में ठीक भइली । पाँच सेर नींबी के पतई पानी में जुराइ के ओही पानी से नहवावल जाव आ तारपीन के तेल मलल जाय।

मास्टर साहब पाँचवें में हमार नाँव अपने गाँव में लिखवा दिहलें। मिडिल इसकूल खंडहर में रहल। प्रिंसिपल बड़ा मरकहा रहें रोज बाँसे क नई कइन ले के आवैं, दीगर जवान उर्दू आ गणित पढ़ावें। एक दिन हमहूँ मारि खाइ गइलीं। फिर उहाँ पढ़े नाइ गइलीं। अपने पिताजी के साथे छोटके भइया के झकाझक कुर्ता आ हाफ पैंट पहिरि के चलि गइलीं इलाहाबाद। पहली बेर आइसक्रीम खड़लों यहाँ से जब आईं त लड़का गट्टा माँगे, बड़ बीड़ी माँगे। केहू महकउआ तेल माँगे।

दू ठो रेक्सो चले लागल। कलकतिया जवान जब खा-पी के पइसा खान लें त अरबी-तड़वी बोलें आ झगरा करें। नोनिया चमार अब ऊँची जाति के लोगन से बराबरी करे लगलैं| गाँव में अब केहू बस कंडक्टर, केहू कुछ कई तरह के मसीन लउके लगल । हमरे खेते में अंबेडकर के प्रतिमा बनि गइल। गाँव में तरह-तरह के अफसर लूटे-खसोटे खातिन आवे लगलं । पहिले मेहरारू अपने नाद से दूसरे के नाद तक फुफुती उठाइ के गरियावत नाचत झोटा झुटवल, पटका पटकी करें, अब सबके अंदर-बाहर इहे हाल होइ गइल गइली व मालूम भइल डाकघर खुलि गइल हो चकभगवानदास सपाई-बसपाई होइ गइल है। पतनई में भले बाढ़ ना आइल बाकी ईहाँ कई बेर बाढ़ आइल मकान ढहि गइल। नाव से दुसरे गाँवे जाय के पड़ल, चकवड़ खाये के पहल 


अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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