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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023

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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिवान के गाँव कतहीं मतसा से सटल, कहीं बेटावर फहीपुर, मेदनीपुर, सबलपुर एक-दोसरा में धँसल, पत्थर गाड़ि के अलगियावल। दियरा तक फैलल सरकंडा, झरबेरी, पतलो, कुश-काँट, हिंगुआ, मदार, बबूर, पीपर, कनइल, सोता, कछार, गड़हा, बुडुआ, डाइन, चुरइल, सतीवाड़ से अँडसल साढ़े तीन कोस में पसरल हमार गाँव, गाँव से जादा गिराँव है। एगो घर, जनानखाना, दुआर, सार के संगे संगे मरदन के बइठका लिहले कइ गो छवनी, डेरा डंडा, धान-बधान में आपन घर घर ना रहे घरौंदा नियर 'कारज जंजाला'। एगो बेकहे जोग फैलाव मोट, चाकर, बाँस- बैसवाड़, गड़ही गड़हा, आखर बिरवा से भरल, लुंज-पुंज बुढ़वन के बतकही के ठेकान के एगो नाँव ह हमार गाँव ।

काली माई के चौरा किहाँ बइठ के हक्का-बक्का, मुल्ला, मुस्तकीम, रफीक, मजीद, अलीजान, हसनैन, नंगा, बुच्चा, यदुनंदन के संगे आल्हर उमिर बीतल गऊ किरिए, माई किरिए, बाबू किरिए कसम-किरिया खात तास जुआ आ पहलवानी देखत मुँह पर पाम्ही आ गइल। चेलिक हो गइलीं। बारह बरिस के पुता ना त कुत्ता सुनत गुनत, गाँव के माटी में, धूर में लपटा के उघारे निधारे घर के चउतरा पर लोटत पोटत पानी बरिसे खातिर इन्द्र भगवान के जोगावत सेयान हो गइलीं। बाढ़ देखलों, अकाल देखलों, उपास-ढाँस, गरीबी, बनिहारी, मइल कुचइल, बिना नहइले गाँव के देखले जमाना बीतल गरमी लागे त नीम के छाँह, जाड़ लगे त कउड़ा। कोदो के पुअरा के गद्दा पर जाड़ गरमावत पूरा गाँव के देखलों । कवनो अइसन पेड़-पौधा ना देखलीं जवना पर कवनों देवता के निवास- वास ना होखे। राना बाबा, ओझा बाबा, करइता साँप, शहीद, पोर चारो ओर साँझ होते चले-फिरे लागस सात बजे साँझ के अकेल दुकेल के 'भूत-पिचास निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे' जपत पहलवानो लोग के देखलीं। आठ-नौ बजे रात के कवनो परती में छम छम चलत चुरइल, पीठ के ओर पाँव के पंजा कइले सबके नजर आवे। फरी, मरी, दाई-माई से त पूरा जवार भरल रहे। गाँव में ना मंदिर ना मसजिद। एगो कुटिया रहे जहाँ टेढ़-मेढ़ शिवाला में बुढ़वा महादेव के पूजा खाली निठाह पानी से होखे। परसाद के कवनो जोगाड़ ना फूल-पत्ती को कबो फूल में कनइल, पत्ती में सिरफल

बाबा के गरिबवा महादेव कहे के रिवाज रहे। गाँव के बीच में कुटिया रहे, एह से कवनो मरद साधु के रहे के जोगाड़ ना बइठे कबो एगो कबो दूंगो सघुआइन माई, मतवा जी लोग उज्जर, साफ-सुथरा बिना किनारी के साड़ी पहिरले कुटिया के शोभा बनिके रहत रही। कुटिया में गइला पर तामा के लोटिया में तुलसीदल आ पानी से बनल पंचामृत भा चरणामृत के दू ठोप परसाद मिले नाँव अमृत आ स्वाद पानी आ तुलसीदल के बड़की मतवा जी के हमरा ऊपर दया रहे एक बेर जोर से मलेरिया बोखार घइलस, हमार होश- हवास गुम माघ-फागुन के मौसम रहे कुटिया से दू-तीन फरलॉग दूर हमार घर तेरह दिन बाद खुलल अपने गाँव के वैदजी रामवृक्ष सोनार अइले नाड़ी पकड़ले। भरोसा दिहलें कि धीरे- धीरे धीरे-धीरे कुल्हि ठीक हो जाई । वैदजी आधा बहिर आ आधा आन्हर रहलें । मुचुर-मुचुर ताकें। रोग देखते उनकर रोआँ फरके लागे आ अइसन पाचक शहद में लपेट के चटावें कि धीरे-धीरे जान जाए के खतरा हो जाए। जब बोखार से होश आइल त हमार बाबूजी के सहपाठी प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर उदयनारायण दुबे अइलें। पुछलें कि का खइबS! ई बोखार के पनरहहवाँ दिन रहे। हम कहनी कि मतवा जी कचरी (कच्चा चना) के रसदार पकौड़ी आ भात बनवले बाड़ी, ऊहे खाइब! बैदजो बोललन कि ना ना ना । कुपथ्य हो जाई । पहिले परोरा के पानी दिआई। हमार दादी कहली कि पहिले कुटिया जाए दीहीं। पनरह दिन खटिया पर सुतले जब एहिजे से देखत बाड़न कि कुटिया में का बनल बा, त हमके पूछे देई। साँच होई त ऊहे पत्थ होई। दादी गइली, त साँचहूँ कुटिया में कचरी पकौड़ी आ भात बनल रहे। दादी कटोरी में माँग के ले अइली । दू चमच चटा दिहली आनन-फानन दू में बोखार उतरल आ हम चंगा हो गइलीं । वैदजी मुँह सिकोरले धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपना घरे जाके हर्रे बहेरा आ अँवरा के चूरन कूटे लगलीं। आ कुनमुनाए लगलीं कि का जमाना आ गइल। जवन रोगिया के भावे तवने लोग खिआवें धन्वंतरि गइलें जहन्नुम में। 1

मतवा जी के मुअला पर एगो अधबूढ़ आ एगो जवान सघुआइन जी लोग आइल | तनी मस्ताना रहे लोग बाल मुड़वले, गर में तुलसी के माला पेन्हले चन्दन टीका थोपले। लोग घरे-घरे सिवाने सिवाने सीधा बटोरें आ गोविना दुसाध के माथा पर लाद के चार पसेरी, मन-दू-मन अँगऊ रोजे बटोरा जाए। कवनो कमी ना रहे। जेकरा घरे लगहर गाय रहे कुटिया में पाव-आध सेर दूध पहुँचा आवे, पूजा-परसाद बने लागल। दवना, तुलसी, गेना के फूल के महक से कुटिया भर गइल। चरणामृत में दूध, दही, घी, बतासा मिला के साँचो के पंचामृत बने लागल। बड़की मतवा जी के जादे इज्जत रहे। छोटकी मतवा जी के मस्तानी हँसी से कुछ छी मानुख शुरू हो गइल। एक दिन बड़की मतवा जी के सुमिरनी गायब हो गइल। छोटकी मतवा जी से पुछलो कि हमार सुमिरनो का हो गइल । छोटकी मतवा जी बोलली कि हम का जानीं। बड़की मतवा जी नाराज हो गइली आ गुस्सा में कहली कि बुजरी तूही चोरवले है। छोटकी मतवा जी कछोट कसली अपना अंचरा के कमर के दूनों ओर खोंसली दहिना पाँव के आगे बढ़ा के रामलीला के अंगद अस पदक्षेप क के दूनो हाथ के ताली बजावत बोलली-

तू बुजरी तोर घर बुजरा, तोरे बुजरपन आवेला, तोरे मदनकुप्पा में रामरटन जालें, तू ही सुमिरनी चोरावेलू, तू बुजरी तोर घर बुजरा, तोरे बुजरपन आवेला, तोरे बुजरपन आवेला...।

दुपहरिया ले साँझ तक छोटकी मतवा जी अइसन बवेला मचवली कि बड़की मतवा जो अपना कोठरी के ताला बन क के सूत गइली रातबिरात कब कहाँ चलि गइली पता ना चलल । फिर कबो छोटकियो मतवा जी चलि गइलों आ कुम्भ मेला में कवनो नागा बाबा के संगे आसन जमवले लउकली।

कुटिया में लइकन के बटोर के रामायण बाँचे के सिलसिला शुरू कइलीं जा। बाकी आधी रात के केहू केहू के नीम के पेड़ के नीचे झुलुआ डाल के झूलत झूमत छोटकी मतवा जी दिखाई पड़ें-

तोरे मदनकुप्पा में रामरटन जालें, तूही सुमिरनी चोरावेलू...।

कुटिया भुतही हो गइल । रामसेवक कानू के दादा-बाबा के कुटिया रहे । ऊहे कबो- कबो सबेरे साँझ बुढ़वा महादेव के नेहवावत-पोंछत लडके।

गाँव में अफरात डीह डामर रहे। मरद लोग अकसर सिवान में दिन बितावें। तीन कोस में फैलल सिवान में जगह-जगह डेरा डंडा रहे। हवा-पानी के लोभे लोग सिवाने में रहे। जवान लोग दिन में तास जुआ खेले, बीड़ी पिए। साँझ के हरिकीर्तन करें। घूम- घूम के खोरी में कुकुर मारें एगो परती मशहूर रहे परती के बीच में रेड़मेवा के एगो झाड़ी रहे । रेड़ जइसन पत्ता । पतई तुरला प टपटप रस चुवे ओह रस के दोना में लेके फुंकला से गोल-गोल बुलबुला बनि जाए। ई जगह गरीबनदास के तपोभूमि के रूप में मशहूर रहे गरीबनदास संन्यासी विरादरी के साधु रहलें। सात बरिस तक लाल मरिचा आ घरिया भर पानी पी के तपस्या कइलें। जाड़ा-गरमी बरसात कुशासन पर बइठ के अविचलित भाव से जमल रहलें। किस्सा मशहूर रहे कि बाबा के आसन के पास ना बादर बरसे, ना घाम उतरे, ना ठंढक लहराए। केहू के कुछ पुछला पर ऊ ऊपर ताकें आ सीधे भगवान से बोले-बतिआवें । केहू कवो ना देखल कि बाबा कब दिनचर्या खातिर बाहर जालें, कब नहालें, कब सुतेलें। दूर-दूर से लोग दरसन खातिर आवें। बाबा ना केहू के देखें ना सुनें। मुँह ऊपर के के भगवान से बोलें बतियावें। बाबा के दरसन करे एगो सधुआइन माई अइली । तीस पैंतीस बरिस के भरल-पूरल देह, हँसे त निर्झर झरै बोलें त फूल खिलें, मुसकाएँ त बिजुरी के रेखा आँख से कान आ कान से ओठ तक फैल जाए। बाबा के दरसन करिके माईजी बइठली कि बाबा के देह में बिजुरी दउरला चेहरा पर चमक आ गइल। ब्रह्मचर्य चेतंग भइल। लँगोटी कसि के बाबा पद्मासन से वीरासन पर बइठ गइल आ माई के ओर ताके लगलें। एकटका पुछलें कि 'कहवा से अइलू माई।' माई चुप्प। 'कहवा से अइलू मनुवी' माई देह तोरली फेर बाबा गरीबनदास के नजर मनुवी के ओर से नाहीं हटल। ओहिजे बइठल बइठल पूड़ी, परसाद, लड्डू, दूध-दही घी, मक्खन-मखाना आवे लागल। धीरे-धीरे बाँस के फट्ठी लगाके रसोई बनल फिर गादी लागल। आसन बनल । धूप दीप नैवेद्य से गरीबन बाबा के आश्रम महमह महके लागल। कबो-कबो शंख-तुरही बाजे । अन्हार होते आश्रम के रास्ता बंद जे ओहर से जाई, कोढ़ी हो जाई । ब्राह्म मुहूर्त में मनुवी नहा-धो के आसन लगा के बइठ जाएँ आ बाबा पद्मासन लगा के उनके निहारे लागें। बाबा जिनगी भर केहू से नाहीं बोललें। गरीबनदास के मुँहलग्गा संगी एगो त्रिदंडी साधु अइलें सात बरिस मरिचा खइल घरिया भर पानी पियल । उभिर नियराइल त आसन छोड़ि के कहाँ ताकत बाड़s ? बाबा त्रिदंडी स्वामी के ओर तकबे ना कइलें। मनुवी के ओर ताकत बोलले- 'कहे गरीबन सुन रे मनुवी / छत्री भगत ना मूसर धनुवी।'....

अब गिरहस्थ आश्रम में आईं। दूधनाथ लोहार, दुबरी दादा, बनारसी भइया, केशोदादा, नरसिंह भाई, बिरीज, विश्वनाथ सिंह, छाँगू सिंह यादव, रामजी तिवारी, रामराज, यदुनंदन आ अगल-बगल के गाँव से हरिवंश पाठक, फूलचंद कुशवाहा, शोभा यादव, रामसागर, जनार्दन तिवारी, कुबेरनाथ राय, अरविंद राय, ब्रह्मशंकर राय, श्यामसुंदर- पचसहन बूढ़ जवान आ लइकन के एगो अगठित समाज बनि गइल। बेमार के सेवा, गरीब के रख-रखाव, गाँव के सफाई, तास जुआ के जगहा पर खेल-कूद, हरिकीर्तन, रामकथा- आने कि तरह-तरह के नया काम शुरू हो गइल। आपस में लड़त-झगड़त, मिलत-जुलत, टूटत फूटत एगो चेतन समाज बन गइल। अखबारो आवे लागल। छोट मोट झगड़ा गाँव में अपनहीं निपटे लागल। पुलिस दरोगा, कोट-कचहरी बंद। हाला हाली से कवनो मुकदमा गाँव से कचहरी ले ना गइल। को-ऑपरेटिव सोसाइटी, नया खेती, चकबंदी से पहिले चकबंदी के सपना, ग्राम सभा से पहिले ग्राम सभा के कल्पना नवहा लोग के ग्रामोदय रहे। आगे-पाछे कवनो तारीख के जब महात्मा गाँधी के हत्या भइल त ई तय भइल कि गाँधीजी के सराध कइल जाई। बाकी सराध में बाभन लोग आ हरिजन लोग एके संगे बइठी। घर-घर से चाउर दाल आ पइसा रोपेया बटोर के भोज-भात भइल । पंक्ति लागल। हरिजन लोग के पत्तल सवर्ण लइका लोग उठावल बाभन आ चमार दूनो के दछिना देल गइल | बाकी जब बिदाई होखे लागल त चमार लोग के चौधरी चनरिक भइया कहलें कि 'बचवा होशियार रहिहऽ जा। गाँधी बाबा बनिया रहलें। अब बनिया लोग के राज हो जाई । ठाकुर- वाभन लोग मजूरी करिहें। लात खइहें। हमहन के गान्ही बाबा हरजन कहत रहन। हरजन माने हर जोतेवाला जन-बनिहार हमहन के किसमत में हरे जोतल लिखल बा। जन- बनिहार-मजूर होके दिन काटे के परी राज बनिया लोग करी गाँव में बिजुरी आई। बटन कतहुँ, अँजोर कतहूँ। ना आपन दीया, ना आपन बाती आ ना आपन तेल मुँह हमार तोहार लगाम ओन्हन लोग के हाथ में रही। ऊ लोग चाही त अँजोर ना त अन्हार । लोग खेतिहर के खेती सिखाई, लोहार के लोहारी, धोबी के कपड़ा धोअल, मुसहर लोग के बिल खोनल सिखाई। पवनी पजहर लोग के काम-धाम खतम हो जाई। घर में भूँजी भाँग ना। स्कूल में सिखावल जाई कि दतुअन करे खातिर कइसे मुँह बावल जाई गन्ही बाबा के जय, जवाहर लाल जी के जय, बबुआन के जय, हमार जय, तहार जय चलत बानी बचवा!' कहि के चनरिका भाई चलि गइलें।

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पचपन बरीस पहिले महात्मा गाँधी के सराध में गाँव के ई सरमन अच्छर अच्छर

सबका सामने आ गइल। देश-परदेश पढ़-लिख के का होई। चनरिका के साँच ओंघाई

त गाँव जागी जब गाँव सुतल रहे त ओह घरी हमरा गाँव में एगो काका रहलें पेचिस

के स्थायी रोगी। लोटा हाथ में, जनेव कान पर सबेरे साँझ दुपहरिया कबो जात- आवत

उनके देखल जाए। दिन में, रात में उनकर एगो बहुत बड़ विशेषता रहे कि ऊ गँड़जर्रा

रहलें । केहू के लइका साफ-सुथरा लडके त उनका पेट में हूक परि जाए। केहू के खेत

में फसल लहलहात नजर आवे त उनकर करेजा फाटे लागे हरियर पेड़ पालव देखते

उनकर मन उदास हो जाए। आ दूसरा तीसरा दिन कटहल आ आम के पेड़ त जरूरे उकठ

जाए। आम के फल में कोलवाँसी लागि जाए आ कटहल में सुखटा रोग। उनकर कई गो

बेटा लोग रहे। केहू के हरियर खेत देखें त आहि क के ऊ खेतवे में गिर परें लोट-पोट

के दस-पाँच हाथ अपने विगारे आ खटिया पर लाद पाथ के जब घरे आवें त पूरा रात

आहि बाप आहि माई करत घर भर के जगवले रहें। कबो जामुन के सिरिका पिएँ त कबो

अजवाइन फाँके । फेर जब बेटा लोग हाथ में लउर लेके हरियर खेत में हेंगा दे दें आ उनके

ले जाके देखा दें त उनकर चोला मगन हो जात रहे हऽ ह ह ह रावन के हँसी हँसे

के शुरू करें। गैंड्जर्रा काका के मरला के बाद आन्ही-तूफान अइला पर अइसन दृश्य लडके।

हमके मालूम नइखे लेकिन लोग कहेला कि अब त सगरो गाँवन में गँड़जर्रा काका के

राज बा, उनका मुअला से कुछ फरक ना परल खेत में सुतले मारल, खरिहान फूँकल,

मुकदमा में फैसल फँसाबल के मस्ती में विस्तार भइल बा हमरा जमाना में जवन दुर्घटना

रहे, कहे सुने के रसदार किस्सा रहे कहे सब अब गाँव के चरित्र हो गइल बा, लेकिन

हमार बड़का गुरु हजारीप्रसादजी रहितें त मनुष्य के अपराजेय यात्रा के इयाद दियवते,

कहतें "ऐसा नहीं होगा, ऐसा नहीं होगा। एक दिन गाँव फूलेंगे-फलेंगे और मनुष्य की दिग्विजयिनी यात्रा प्रसन्नता से ही समूचे देश को रच देगी।" हम का कहीं मन बड़ा उदास बा एह से ना कि कुछ बिगड़ गइल एह से कि मन के उल्लास आ सपना उजड़ गइल।...

गाँव में एगो पहलवान साहेब रहलें नाँव बाबू अंगद सिंह मंगला राय के चाचा राधे राय के चेला रहलें आ मंगला राय के उस्ताद अंगद सिंह के वजह से गांव में अदालत नट आ कई गो पहलवान लोग अक्सर आवें। अखाड़ा में जोर करें, खाए-पिएँ आ चल जाएँ। गामा, इमामबक्श तमाम पहलवान लोग के किस्सा बच्चा-बच्चा के जबान पर रहे। अंगद सिंह गाँव के लइकन के लाठी चलावे सिखावें लाठी के धरम कि ओह में लोहा ना रही चलावे के बेर दुश्मन के कंधा, जाँघ पर अंदाज से चोट करे के होई इसा पर अइसन चोट, साँढ़ पर अइसन चोट, मरद पर सँभार के, जनाना पर अगल-बगल लाठी पटक के लाठी चलावे के चाहीं ई अंगद सिंह सन 42 में गाँव के दूगो पहलवान झाँझ- झम्मन के संगे जमनिया थाना जरावे गइलें। थाना के लूटपाट के 42 से 47 तक पाँच बरीस पहाड़, नदी आ गाँव के ऊँच-ऊँच पेड़न पर सूत के बिता दिहलन अंग्रेज सत्ता गिरफ्तार ना कर पावल सन् 47 में देश आजाद भइल त गाँव के दिन लौटल। लेकिन का मिलल उनका? कुछ ना बाकी जे केहू चोरी-चकारी, डकैती लूट में सन् 42 के नाँव पर जेहल गइल ऊ स्वतंत्रता सेनानी हो गइल । अंगद सिंह बुढौतियों में गंगा पार कर देत रहलें । एही तैरे-तैरावे में उनुके असाध रोग भइल। बी.एच.यू. अस्पताल अइलें, राउंड पर बड़का डाक्टर के संगे छोटका ट्रेनी लोग आइल। जब सब कोई टोवे-टावे, जाँचे लागल त जबर्दस्त नाराज भइलन कहलें 'अरे सारे एक त हमार जान जात बा आ तोहने के किताब नियर कोंच- कोंच के हमरा के पढ़त बाड़s स' झटक-पटक के हमरा पास आ गइलें। कहलें कि हमके दवाई नइखे करावे के भेंट करे अइलों है। गाँव के एगो पहलवान हम, बावन गाँव के दबेर के रखलीं एगो पहलवान तू, गाँव के नाँव ऊँचा कइलs गाँव के इज्जत के ख्याल करिहऽ ओही घूर-माटी में गढ़ल खेलवना हउवा, गाँव के भुला जइबs त तहरा के दुनिया भुला जाई। -

सोचत बानी कि गाँव के भुलाए के एगो शाप त लेइए लेले बानी आ हमरा जियते दुनिया के भुलाए के इंतजाम बुढ़-पुरान लोग शुरू क देले बा अगर गणित के हिसाब लगावल जाए त ऊ लोग पहिले जाई, हम बाद में एह से सोचत बानी कि चल मन 'गंग 'जमन के तीरे।' काहे नाहीं जमनिया चलीं। परशुरामजी से कहीं कि फरसा उठाव । कुबेरनाथ राय से कहीं हे शब्दवेधी अर्जुन! एह कौरवन के मार द। अपना शब्द से उजार द| काहे नाहीं आपन अंगद भइया के आह्नान करीं कि तू अकेले बावन गाँवके निपटलऽ । हे बावन वीर ! ई चम्बलिया आ लंगड़ लूल आन्हर हमरा दुश्मनन के अपना लंगड़ी में लपेट के उत्तरवाहिनी गंगाजी में चक्का बान्ह के फेंक द। दइत्रावीर के चीलम में फूँक द। कुर्था के पवहारी बाबा के सिंह मंत्र से पगलन के ओझाई कइ द, दवाई कइ द मुँह में मरिचा झोंक द। खखार नियर थूक द आँसू नियर पोंछ दा खोट नियर फेंक द। पोटा नियर छिरिक द। जीवपुर के विजयपुर बना द। सतवाड़ के चंडी, पीपर पाँतो के बहमबाबा, अघोर पीठ के बाबा भगवान राम सबसे दोहाई बा हमार गाँव हमार बर्हम है हम अपना बर्हम बाबा से कहत बानी कि गाँव के बच्चा-बच्चा के आँख द, कान द, चीभ द दिमाग के प्रखर शब्द द का खाई का पीहीं, का लेके परदेश जाई...हे गणनायक करिवर बदन !

पैंसठ साल पहिले गाँव के बगल में एगो टेढ़की पुल रहे। पुल के बगल में पकड़ी के एगो ढूँठ पेड़ पर घमड़िया दइत। रात विरात आ जेठे के दुपहरिया में केहू ओहर से जाए त घमड़िया पटक देते रहे। पेड़ के नगीचे अगल-बगल एगो परती रहे। परती में सरफोका, गूम, गधपुरना, भटकटइया, चिचड़ी, शंखपुष्पी, अंगरइया, चकवड़, हिंगुआ, मदार, गूलर के पेड़-पौधा के भरमार रहे। वैद, औघड़, निहंग आ जोगी लोग आके ओहिजा दवाई खोजे। नटो बंजारा लोग कबो-कबो आवे। हमार उमिर छव बरीस आ छांगुर यादव के सात बरीस चर्चा भइल कि टेढ़की पुल के बगल से लारी आवत-जात बा। बिना घोड़ा, आ बिना ऊँट के अपने चलेला पो-पों बोलेला । एतना तेज भागेला कि आँख के बगल सेसर से निकल जाला । छांगुर कहले कि चलऽ लारी देखल जाय। सबेरे सात बजे के करीब हमनी के पुल प जाके बइल गइलीं दस एगारह बजल होई कि पो-पों करत लारी आइल आ निकलि गइल। छाँगुर कहलें कि कइसे देखल जाई? हम कहनी कि बइठ5 जब फेर लवटी त तू सड़क पर दउरे लगिह। ऊ अपने रोक दोहे सा दू घंटा बाद फेर पो- पों। छांगुर सड़क पर दउरे लगलें। लारी रुकल, छांगुर के एक चमेटा आ हमरा के छोट देखि के कनइठी । आ कहलस कि दुनू जना के एही गाड़ी पर बइठा के बरून उतार देव पैदल आवे के परी। छोट-छोट बच्चा, रोवे लगलीं जा त ड्राइवर नाँव पुछलस, नाँव बतवली। कहलस कि जा बाबू साहेब हवा, छोड़ देत बानी छांगुर से पुछलस कि तू के हवs! छांगुर कहलें कि हम बाभन हुई त कहलस कि जा मूँ जइबs त बर्हम हो जइबs बाकी कबो सड़क पर लडकल त लेके भाग जाइब लारी एगो दूगो, तीन गो, सइ गो, हजार गो। अब हम सत्तर वरिस के आ छाँगुर एकहत्तर बरिस के बाकी लारी देख के हमहूँ भागीले आ छाँगुरो भागत होइहें।...

प्राइमरी में हमरा संगे बनारसी मेहतर पढ़त रहलें। ऊ चार-पाँच बरिस बड़ रहलें। क्लास में उनकर टाट अलगे बिछे दुपहर में टिफिन जब होखे त ऊ आपन गमछा बिछा दें। घर के दुलरुआ लड्डु आ खाजा आउर आउर चीज लेके जाए। बनारसी गमछा बिछा के बोलस कि सब केहू आधा-आधा तोड़ के हमरा गमछा में फेंक द जा, ना त छू देइब हमनी सब छोट रहीं जा। आधा-आधा तूर के डाल दीं जा तूरे में कबो पूरे गिर जाए। जब हम यूनिवर्सिटी में पढ़ावे लगलों त पान के दोकान पर पान खाए गइली अउर लोग रहे दोकान पर पान हाथ में लिहल तले एगो आदमी बोलल कि पनवा दे द नाहीं त छू देव हम जान गइली कि बनारसी हवें । भीड़ से हट के उनका पासे गइलीं आ पान उनका मुँह में ठूंस के कहलों कि ससुर छू द बहुते देर तक बनारसी कान्ह पर हाथ घइले रहलें । आँख उनकर लोर से ओरमल आवत रहे। फेन सँभर के कहले कि भइया 'धरती आकाश एक हो गइल....

हमरा गाँव में एगो इसराइल धोबी रहलें। ऊ जतने डरपोक, उनकर मेहरारू अतने चढ़याँक | इसराइल मेहरारू से रोजे ठोकास इसराइल भर दिन गढ़ी-बाना खेलें आ घर दिन आड़ा अलोता रहें। एक बेर उनकर एगो गदहा चोरी हो गइल। ओकरा दू-तीन दिन बाद घमड़िया दइत के पेड़ पर से घों-घों-धू-धू-फुई फुई के आवाज आवे लागल | गाँव- घर के रास्ता छूट गइल। लोग पता लगावे जाय आ घोंघों धू-धू सुनते परान लेके भाग जाय एक दिन हमनी चार-पाँच गो लइका किरासन तेल आ पुअरा लेके गइलीं जा तय भइल कि पेड़ आधा-सुधा सुखाइए गइल बा। पेड़वे जरा देल जाए ना पेड़ रही ना रहिहें घमड़ी। ऊपर से ऊहे घोंघों धू-धू आवत रहे। बाकी हमनी के गीता आ हनुमान चालीसा के जोर पर आग लगा दिहली जा। आग लगते इसराइल धोबी निकललें खोड़िला में से। 'बाबूजी जान छोड़ द। हम इसराइल धोबी हई आग फेन बुता देनी जा। इसराइल के दस लात आ ले जाके उनका मेहरारू के सउप देलीं जा। घर में घुसते इसराइल के लबदा से पिटाई शुरू। एहतरे कइ कइ गो भूत-प्रेत भगावन क्रिया कइनी जा।...

एगो बेगम पारो रहली असल नाँव लेला प जीव-जान के खतरा बा । रूप-रंग से करिया माटी काठी से कलूटी। छरहर-हरहर सटक-पटाका उज्जर दाँत, उपटत छाती। मुठ्ठी भर के कमर नीचे गजबद हाथी । हाथ में लाठी। सगरो गाँव के भउजाई । फगुआ आवे त महीना भर बूढ़-पुरान, पट्टा जवान सबके फजीहत केहू के पछोटा में हाथ डाल के कीचड़ भा भीजल खरी डाल दें। कवनो घर में घुसरि जाएँ आ बिना पूछले बड़का पीढ़ा ले के थरिया परोस दें। जब लोग खाय बइठे त पोढ़ा के नीचे बिछावल नरिया पड़पड़- पड़पड़ फूटे त आके बोलें कि का देवरजी खाए के पहिलहीं? घर में बेटी-बहू... लाज नइखे लागत? उनका से लोगो लागल -लपटाइल रहत रहे। पूरा गाँव के मनोरंजन रहली। अबहीं दस साल पहिले गाँवे गइलीं त लाठी टेकत भीड़ के चीरत फारत आधा लटकल देह कहली कि बबुआ चीन्हऽ, हम के हई? बतावs हम के हईं। हम अंदाज से कहली कि फेंफना के माई हऊ। बगल में ललटेन रहे । ऊ उठवली आ आपन मुँह देखा के हमार मुँह देखलो। कहली कि हम फेफना के माई ना, तहार भउजाई हुई। बोलऽ... भउजी बोलs |

गाँव छूट गइल। अब चारो ओर भाई लोग लउकेला भउजी कहीं ना !

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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