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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023

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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार। 

कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से बसल से बढ़ल से बढ़त बीच शहर के रमना मैदान, साँझ बिहान, घूमे से जादे फिरहीं के काम सल्टावे। सटले कचहरी के कारोबार जवना मुदई मुदाले गवाहन से गुलजार गाँव-गिराँव के खेतिहर मजूर-हरवाह चरवाह। गमछा में सतुआ सानत आ तवनो प घात लगवले कवनो करियवा कोट कलआ के अतनवो बतावे- बुझावे में सत्पिसान कि जवन तू बूझत बाड़s बचवा तवन ई ना ह एह आरा के जे असल टाइप के बसिन्दा कहाय, जैन- अगरवालजन, ओहू लोग के मुहल्ला के कवनो सुपातर गली पकड़ला प दुनो ओर के बड़-बड़ बिल्डांग के पिछवाड़ के खुलमुँह खिलखिलात कमाऊ पैखानन के बदौलत गाँवे के गैंड़ा के कवनो डीह-बँसवार से होके गुजरला के कहे अपनाइत सुगंध-सवाद, ऊहे मजा मजा त ई कि पढ़ाई के बढ़ाई के बेंवत बान्हत जब बनारस पहुँचल त इवो चकचक चाहे जतना शहराती, चखचख ओतने देहाती आपन खीस-रिस नेह-छोह कुच्छो कढ़ावे में जवना जवना गारी रसगारी के संपुट के साथे हमार नहर किनारे के गाँव पहरपुर, तवने तवने के साथे गांगी किनारे के गाँव आरा, तवने तवने के साथे गंगा किनारे के गाँव बनारस ।

आ पाँजा भ पोथी पतरा पढ़ के कुछ आउर उजियावे के बजाय, ओकरे के घोर- माठा करत, पढ़ते-पढ़ावत रहे के उघामत जहाँ पवली, तवन गाँवे ना खलिसा-बड़ागाँव । अब, हम ना गँवार त गँवार के !

पहिलका जवना गाँव के जनलीं, जहाँ जनम-करम, तवन पहरपुर पलट के पुछला प पवना पहरपुर। बाद में जनलों कि दुसरको एगो गाँव बा हमार-फरहदा पलट के पुछला प नथमलपुर फरहदा ।

ई, पहचान के पक्का करे खातिर अपना गाँव के साथे, बलुक अगते, बगल के गाँव के नाँव जोड़े के जवन बान तवन अइसन जब्बर कि आजो जवना बड़ागाँव में बानी तवन पलट के पुछला प बसनी-बड़ागाँव ।

पताना, ई. पीएम-एमपी टाइप के जे लोग होला, अतना देस बिदेस एक कइले रहेला, पलट के पुछला प अपना देशवा के 'पाकिस्तान हिन्दुस्तान', 'नेपाल भारत' बतावे के तमीज राखेला कि ना!

बाद में जनलों कि जवन दुसरका गाँव ह, फरहदा, तवने असल में पहिलका गाँव ह। खन्दानी उहवे वा भाई- भवद्धी। फरहदे के बसगित है, पहरपुर में जाके बसल बानी जा, तड़का पा

बाकिर एसे का होखे के त जे कनौजिया कहाला से कन्नौज में कहीं के होखी! आर्य लोग इवे के कि कहीं अउरू के, ई झंझ आजु ले ना फरियाइल 'के कहाँ के' आ 'जे जहाँ के' 'ते तहवे के' आ 'तेही तहाँ के के फेरा में जो परल जाय, अद-बद के सभकर जड़वे जो जोहाय लागे, त अचरज ना अगर देश भर में जे जहाँ बा तहाँ से उखड़ जाय आ जड़ के नाँव प जवन हाथे लागे तवन दतुअनवो के कामे ना आवे ।

अँइसे, कुछ लोग आजकाल्ह ईहे धंधे फनले बा घोर जोर-शोर से हैदल गैदल- पैदल । कलकत्ता, बंबे - जहँवे दाँव लागे तहवे। बले बतावे प पर जाय के, केहू के, अचक्के, कि ई जवन घड़ बा तहार, इहवा, तवना के जड़ जवन बा तवन हुँहवा बा... ते हे हो, हुँहवा जा, इहवा का?!

मान लीं कि मनई मनई ना ह, गाछे बिरोछ ह त गाछो-बिरीछ त जड़ के जहाँ- के-तहाँ छोड़ के वहरियइबे करेला आखिर आ जे कहे कि 'हुँहवा जा', से ही बतावे कि अपने ऊ जहवा बोआइल तहवे काहे ना रहल घुकुड़ियाइल, काहे बहरियाइल, आ बहरियाइल त बहरियाइल, काहे के नरवा कटवा लेलस सरवा!

बाबा, छोटका बाबा, के हिस्सा में पहरपुर, बड़का बाबा, बाबा के बड़का भाई, के हिस्सा में फरहदा । त भइल कि फरहदा त छूट गइल। बाकिर हमन के हिस्सा में त जतना बाबा, जतना आजी ओतने बड़को बाबा, बड़कियो आजी त फरहदा छुटियो के छूटल ना। कहाँ कुछ छूटेला त छुटिए जाला ! आ कवन कहीं कि पहरपुर घराइल त घराइए गइल, धराइले रह गइल । कहाँ कुछ घडले घराला आ घराला त धराइले रह जाला ! बाकिर, कहाँ केहू छोड़ेला आ काहे केहू छोड़े। निचलका डाढ़ से गोड़ उठे मत आ उपरका हाथ में आ जाय, उपरका से हाथ हटे मत आ ओकरा उपरा वाला प चढ़ जाई आ चढ़ते चल जाई - ई जवन मन ह मनई के, तबने मनवा के जवन कइल-कुकइल, तवने कइला- कुकइला से जवन भइल कुमइल, तवने भइला- कुभइला के मारखानी कविता-कहानी आ तवने असल जिनगानी !

आछा त ए बुढ़मस, अब बस!

- फरहदा हेठार पहरपुर दक्खिन फरहदा में भातो त गेहुमे के, पहरपुर में रोटियो त चाउरे के खटनी के खेती पहरपुर के कादो पाँक में जतने गोड़ लसराई सराई ओतने उजियाई। फरहदा के खेती फरछीन छींट के काट ल टाइप। उहाँ, बाकिर, खेती से अधिका आम - महुआ के बगान के आ ओहू से अधिका जजमनिका के आमद जनाय जात के बाभन भइला के जवन मजा कहाला तवन फरहदा में भरखर भेंटाय पता ना, जमनिका के आपन 'छोड़ले ना छूटे' सवाद रहे कि दो पुश्तैनी पेशा के पोसले राखे के जिद कि बड़का बाबा पटना आयुर्वेदिक कॉलेज के पहिला बैच के जीएएमएस के डिगरी अछइत जजमनिके के आपन जिगरी बनवनीं। शुरू-शुरू में बुला, आयुर्वेदिक दवाई बनावे वाला कवनो नामी कंपनी से उहाँ के बुलावा आइल रहे। गइनी त देखनी कि पथार के पथार महुआ सुखावल जाता, का दो 'द्राक्षासव' बनावे खातिर भरहींक लेह देह कइके लवटि अइनों फेर त अंत अंत ले उहाँ के अपना बैदाई के कुछ सहतमोल चूरन बनावे-बाँटे आ 'कटहर के अपच केला से केला के अपच घीव से, घीव के अपच जामुन से, जामुन के अपच नीमक से, नीमक के अपच चरघोअन से दुरावे के कुछ नुस्खे उस्खा बतावे ले समेट के रखनी। हालांकि तब्बो, घरहीं से दवाई बिरो ले के बेमरिता के घरे बिना बोलवलहूँ पहुँच जाय वाला बबे के बैदाई के बल रहे कि गाँव के के जाने कतने गरीब- गुरबा शहर जाय, डक्टरवन के हाथे दुहाय से अक्सर सोगहगे बच जायें।

हमन खातिर फरहदा माने बड़का बाबा। बड़की आजी बड़की आजी के जो कभी ठाकुर जी के भोग लगावे के होखे त खाली तुलसीदल डाल के हाथ जोड़ लेला से उनुका संतोष ना होखे । रोटी के तनिएक पपरा भा दू दाना भात के जले गोपालजी के मूरत के मुँह में सटा ना देस तले उनुकर मन ना माने। अगिला दिन ले ऊ सुखा के केनियो टघर- उधिया जाय त मनाय जे खवा गइल । अब बुझाला कि ना, असल में खवाइए जात रहे। भुक्खड़ भइला के भेद मत खुले, एही डरे भगवानजी भात ओत के एकाध गो सूखल दाना कबो कबो अपना अगल-बगल लउकवा देस हम ना मानव कि बड़की आजी के बाद कबो भरछुधा भेंटाइल होई भगवानजी लोग के ना ईहे मानब कि बड़का बाबा के बाद ओतना तरह के सवाद, मुँहफेरवन के ओतना तरह के मजा ऊ लोग पवले होइहें 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द' के साथे अकेले चाह (चाय) के के जाने कतने प्रकार उहाँ के अपना ठाकुर जो के पेश कइले होखव। चीनी के गुड़ के मिश्री के, बताशा के लचिदाना के पटउरा के ऊहो ना त दुचार दाना महुआ के डाल के दुधगर, पनसोह, बिना दूध के चहपत्ती, चाहीं त जरूर, बाकिर ऊहो ना त ओकर काम चुटकी भर टंकण भस्म भा लवण भास्कर चूर्ण से चलावल जा सकेला, ऊहो ना त मेथी, हर्दी, सोंठ, मुट्ठी भ पंजोरी तक से चाह के माने बस अतने कि गर्मागर्म तनी भ सेराइल? चली। एकदम्मे सेराइल? ना, फेरू से गर्भावे परी आ जो चुल्हवे बुता गइल होखे? तवना के त बतिए दोसर बा, तवना के त माने कि ठाकुर जी चाहते नइखन कि उनकर जीभ जरो त उनुका मर्जी से भला बाहर के बा!

घर से भोरे भोरे लोटा लेके मर-मैदान निकलल आ हप्ता दस दिन बाद एह से ओह से होह गाँव होत लवटल बड़का बाबा खातिर कबो नया ना रहे। जे पा ले बाबा के, बिलमा ले। लोग लगे देह के बेमारी से लेके उपरवार तक, लड़का-लड़की कि बियाह से लेके नोकरी, मोकदिमा आ परदेसी सर्वांग तक के बारे में तरह-तरह के सवाल रहे आबबे लगे रहे अइसन सवालन के ओइसन जवाब जवन धिरजा धरावे, दिल ना दुखावे। उहाँके जइसे सरसरा के, निधड़क, अपना फरहदा के, ओसहों जवार पथार के कवनो गाँव के गली-कूचा से निकल जाईं। सब घाँगल, सब जानल। अनगँव त उहाँ के, पहिलहुँ पहिल पहुँचल कवनो गाँव में, हमरा ना बुझाय कि केनियो से कबो बुझाय आ ई बेंवत, आपन- आन कवनो गाँव में अनगँव ना माने के, जइसे बड़का बाबा में ओसहीं छोटको बाबा में। बाबा लोग बुला, कुल्ही गाँवन में पेहम जवन एगो कॉमन गाँव होला, कॉमन आ आपन, तवना के जोह कि दो पा लेते रहे। आ हर गाँव में ओह कॉमन गाँव के भइला के अलावा जवन होला, जवन जवन, जवने के देखे सुने छुए सूँघे सवादे के फेरा में रिखि-मुनि- संत सूफी फकीर लोग रहिए में रहल करे हरमेसे-तवनो के खबर रहे बुला बाबा लोग के, जवना के कि खबरे ना भइल अब ले एह देश के पर्यटन मंत्रालै के, नेतवन- व्यूरोक्रेटवन के, आ जवना से वाखबरे भइला के चलते ओसहीं पैदल प्रवीण रहन गान्ही बबा, ओसहीं अथक, जइसे हमार बाबालोग।

छोटका बाबा के साधे चले में बाकिर, हमन के, थकान तनी जादे होखे । उहाँ के दबावत ना रहीं, बाकिर काहे दो उहाँ के साथे लइकाही जवना के कहल जाला, तवन उपरबँबे ना करे। इन्द्रियलोग के उहाँ के बहुत कुछ अपना बस में क लेले रहीं आ उहाँ के साथ रहला प ऊ लोग हमनियों के वेबस ना क पावे, अक्सर बाकिर लड़े के त परबे करे। मर-मिठाई के दोकान छूटल जाता, छुटियो गइल, ना रुकनी बाबा, ना हमनिए के, रोकवो ना कइनी जा, बाकिर ओकरा छुटला के छाप हमनी प त छुटिए जाय । एह में होखहीं के रहे थकान, तनी जादे बड़का बाबा के साथे ई ना रहे। उहाँ के अपने रुक जाई, रोकहूँ के ना परे हम त, पता ना चटोर जादे रहीं एसे कि अपना बाबा- बाबूजी दूनो लोग के मास्टर भइला के मुताबिक पहरपुर- आरे दूनो जगह एगो ओरचल-चउरल टाइप के जवन माहौल रहत रहे, तवना के चलते जबे मोका मिले बड़का बाबा के साधे हो लीं। जजमनिका में थोर बहुत झूठ-साँच के बहुत परवाह ना रहे उहाँ के घरहीं में देही प दुचार बून पानी के छिरिकवानी देके 'अपवित्रः पवित्रो वा' पढ़ लेनी त 'भोरहीं भोरे गंगाजी से नहा के चलले आवत बानी' बतावत उहाँ के खास कवनो आहस ना लागे। अइसन निरउठ झूठ हमरा अइसन नहान के मतलब नहा 'न' लगावे वाला जीव के, जाड़ा में रजाई के सुख से जरिको उनइस ना जनाय । बड़का बाबा एक बे एगो टमटम के लदनी के मारे 'अब भहराइल कि तब' घोड़ा प पैना सटकरला के खोसी, टमटमवाला के भोजपुरी, हिन्दी, संस्कृत तीनो भाखा में भरहोंक मँभोरला के बाद तय भाड़ा से कुछ अधिके थमा के हमरा के लेले- देले बीच राह में उतर गइनों आ भिरिए परी तिरिछे तिरिछे' बतावत पक्का पाँच कोस पैदल चला के कवनो जजमान के बेटी के बियाह करावे पहुँचनीं । विध-विधान के दौरान दर दछिना के कवनो मोका आवे त बाबा जजमान के अवसि के इयाद करवाई कि छोटका पंडित त छुटले जा तारे कुछ उन्हूँ के अर्पाय। अक्सरहाँ त जजमान लोग भुलाय से बाज ना आवे ना बबे बाज आई इयाद परावे से अइसना में ई छोटका पंडित जवन लजान लजायें तवना के हाय हो राम, कवनो फोटो ना रहल आज विडियोबाजी के जमाना रहित त ईहो लठकित कि कइसे छोटका पंडित दछिना में पावल के अपने पाकिट में, बाकिर पकिटमार

अस डालत बाड़े, कि कहीं केहू देखे मत ! भोजन के बेरा आइल त बाबा कहनीं कि हमार व्रत बा। बबुआ मुँह जुठिया लीहें, हम कुछ फल फलाहार से काम चला लेब पंचकोसिहा रस्ता में एगो जजमान किहाँ माठा में सातू मिला के पियला के निकाल दिआय त ई व्रत वाला बात कवनो झूठो ना रहे। खैर, बबुआ जी गइले पूड़ी-बुनिया से नरेटी ले मुँह जुठिया अइले अइले त देखले कि फलाहार खातिर बाबा के सोझा थरिया भर काजू-किसमिस राखल बा। अब एह फलाहार में त शामिल होखे लायक रहिए ना गइल रहन, बाबा के साथे एह अफसोस में जरूर शामिल भइले कि जवना माठा-सातू के पी के बाबा व्रत में रह गइले तवने माठा-सातू पी के, बबुओ काहे ना ब्रते में रह गइले दुसरके दिन एगो दोसरा गाँवे जजमान के सतनराएन सामी के कथा सुनवला के बाद एह गलती के सुधार लेल गइल। बता देल गइल कि हमरो, बबुओ के व्रत बा, कुछ फल फलाहार से काम चला लेल जाई इन्तजार होखे लागल | घंटना बुझाइल जे आज धरिया से एको दाना बाँच के ना जा पाई। संजोग सही, कि आज थरिया में ना, बरहगुना में आइल फलाहार सेर भर उसिनल सकरकन आ सवासेर उसिनल आलू, छिलकोइया सहित्ते। बाबा एह फलाहार के देखते कहनीं कि जजमान, आज कवन दिन है। जजमान कहले कि बाबा, काल्ह सोमार रहे, आज मंगर है। बाबा कहनी कि ना हो, काल्ह मंगर रहे, आज बुध है। जजमान कहले कि ना बाबा, आज मंगर ह काल्ह बुध होई बाबा कहना कि घतेरे कि, तब त तू नाहके हलकान भइल5, व्रत त हमनी के बुध के रहेला, मंगर है तब त जवन बनल बा तवने ले आवड, फलाहार के जियानी से का फैदा....

फरहदे के फैदा कि कई माने में 'डोमघाउज' से जतना मिलत-जुलत, ओतने अलगो- थलग एगो 'बभनगादह' के बारे में हम जान पवलीं। दखिना के लेके जजमान के दुआरा से, ओकरा बँटवारा के लेके अपना अँगना तक बभनगादह के अनेक अवसर हो सकेला| लिखतंग के वेद-कतेब कुच्छों में बकतंग के एह विद्या के कवनो जिकिर त नइखे, बाकिर एकरा भीतर वेदकतेब सबके जगह मिलल करेला गादह करनिहार बाभन लोग के बोले- विवादे बकबकाय के औकात के मुताबिक एकरा प्रकार प्रारूप वगैरह-ओगैरह प विस्तार से बतियावल जाय, कुछ कवितावलो कथावल जाय त हो सकेला कि दलित-विमर्श लेखा बभन- विमर्शो के एगो जगहा बन जाय, बकता-विचारक लोग खातिर एही बहाने कमाय खाय के एगो अवरू रस्ता निकल जाय। निकालब। बतियाइब। कहियो । -

- चीका-कबड्डी फुटबॉल में, फगुआ में, चइता में, समिलात के कवनो काज, कवनो परोजन में, हुलास भा गरब-गुमान भा बेंवत-बटोर के कवनो जून, कवनो मोका प पहरपुर गाँव जेकर जैकारी सबका से पहिले पारेला, ऊ हवे पहाड़ खाँ बाबा । एको घर मुसलमान ना फिलहाल जवना गाँव में तवना गाँव के परम पूज्य पुरुखा उनके नाँव प बसल पहाड़पुर पहरपुर भइल, अइसन सुने में आवेला जवना ठेकुआ के तूर के रोट बने आ कालीजी, महावीरजी के चढ़े तवने के मांस के मलीदा बने, पहाड़ खाँ बाबा के चढ़ावल जाय। पहरपुर मैं उनुका के लेके हिन्दू-मुसलमान के कबो कवनो चरचो ना 'झगरा ना' के साधे खातिर 'चरचा ना' के ई सोझ सरल पहरपुरिया रस्ता, एह देशवा के पता ना लउकबो करी कवहीं कि असहीं, बानरे के बनवले राखी ई, मजहबियाँव-जतियाँव के आपन सदाबह- सदाबहार घाव के !

गाँव के बारे में हमरा जनला-मनला में, चहला में, जवन जतना जइसे आ जइसन, तवन- ततना तइसे आ तइसन के जड़ में जवन गाँव सबका से बढ़ के तवन पहरपुर। भले फरहदा माने, हमरा खातिर, बड़के बाबा, बड़किए आजी आ केहुए केहू कुछुए-कुछ उनके अलावा, बाकिर पहरपुर माने त अतना अतना कि कहले कहाय ना, अइसन अइसन कि बिना कहले रहाय ना, आ कहते रहल बानी, कहते रहब जवना के असहूँ भा कसहूँ, कविता कइ के भा कहानी लिखके भा मुँहजबानी।

एकर माने ई ना कि हमरा गाँव के कवनो सिधवा सोझिया किताबी गाँव मान लिहल जाय। घुर्चियाही इचटाही जइसे देश भ में सगरो, एहिजो बाता बाती, गारा-गारी, सात पुसुत के उधारी - जइसे सगरो के, एहिजो के रोजिन्ना के रोजगार मथफुटउअल से लेके जनमरडअल तक एकरो इतिहास में दर्ज बा। थाना पुलिस, कोट-कचहरी एह गाँव से कम नइखे कमाल । बाकिर जात-धरम के नाम प बहुत अकबकात बकबकात अपना गाँव के, हम नइखीं सुनले कवहीं रात-बिरात कहीं से कवनो हलगुलान भइल त कच्चे-बच्चे सँउसे गाँव घठरल। चोर-डकउतियन के त अक्सर जान लेके पराय परल आ कबो-कबो त नाहियो पराय पावल लोग दशहरा में सतमी से लेके दशमी तक ओतना लाग के नाटक खेलल आ ओतना जाग के नाटक देखल, हम त, केहू कतनो कहवावे, कहबे ना करब कबहीं, कि कहीं अठरी कवनो जात औकात के केहू, कौनो जात औकात के केहू से, महज अपना जात- औकात के चलते, दबत अगर नइखे लउकल एह देश हिन्दुस्तान के प्रदेश बिहार के जिला भोजपुर के थाना संदेश के पहरपुर नाँव गाँव में त अतनवो अपना गाँव प अगराय खातिर कम नइखे हमरा जाने में, कवनो माने में।

घघाइल जो चाहीं त निकहा घघाय भर, बड़-बड़ बड़मनइन के गाँव हमार गाँव । जइसे महँगू भाई के, जे नाटक के मंच पर तब मेहरारू बन के उतरे के मदही देखवले जब मेहरारू बने के नामे प मर्द कहाय वाला मनइन के मेहराय के अलावे कुछ ना आवे, बड़-बड़ सूरमा पोंछ सटका के सरकि जायें। जइसे नूनूलाल के बतियइहें त चाहे जतना अँटकिहें, गइहें त गजब हरहरा के! ओही अँटकला के मारे बात के रेघावे के उनुकर आदत, डायलॉग डिलिवरी के एगो अइसन अन्दाज रचलस जवन उनुके आ उनुके रहे, आ रहे परतुक के परे जानत बानी कि नाँव गिनवाइब त पार ना पाइब बाकिर बाज ना आइब ई बतावे से कि हरमुनिया प बाजनाथ जी बाड़े आ ढोलक प बोगन जी मुसहर त रउरा गावे आवे आ मत आवे, गाई, ऊ लोग हर हाल में बजा ले जाई दुनिया के कवनो विषय के लेके, आसान ना रहे बहस में रामेश्वर जो मेहता से पार पावल, तर्क त जइसे उनुका रोआ-रोंआ से फड़के, बोलत ओठ सटे ना, सुनत लोग हटे ना। एही गाँव के बाबू धीर सिंह, जवार पथार में जिनिकर बल बिकरम के कथा-कहानी अस कहल सुनल जाय। का केहू, देस दुनिया के सर समाचार के ओइसन रसिया जइसन रामसेवक जी साह! कहाँ केहू अवरू सिरी सिंगासन अहिर अइसन, कान प हाथ लगा के, चउगेठ के चठमाथा, गायडाढ़ के तइयारी के रात बिरत रात, 'बाजल बोल' पर टूटे वाला दोल्हा के गवनिहार, ओतना लमहर साँस के साथे, ओतना थरथरात हरहरात सुर-लहरी में! जे सुनल उनुका के, सेही समुझ पाई कि भगा भगा के, जगा जगा के गावल आखिर कहाला का होत होई लोग पहलवान, बाकिर हम त मनवले ना मानब कि ददन लाल, श्याम मिसिर, भूषन सिंह से बढ़ के होई केहू कतहीं ना ईहे मानब कि सोरठी बृजभार, सारंगा सदावृज के रामचन्दर साह से बढ़िया केहू होई पढ़वइया! ई ना बुझाय कि सुनावत बाड़े, जनाय जइसे अपने सुनात चलल आवत बा। धोरे घरी खातिर ओह कलेस के सोची जवना के करेजा से लगा के, जोकरई में जिला जवार में नाम कइले कमइले हंसलाल चलती गाड़ी के आगे आ गइले ना ना, लोरायझोराय मत केहू, झोराय-झुराय के एगो दूगो बात त बा ना जइसे दुनिया में, देश में, नगर, महानगर में, गाँव-गाँव में, तइसे हमरो गाँव में; ओकरा के लेके

फरके से झंखला कैंखला के नाटक, जे उहाँ रह के काटत बा, ठाटत बा, ओकरा कवना

काम के बने त तनी मुस्काई जरूर ना केहू अवरू के त रउरा त कामे आई, ना कुछ

अव त बस, तनी देर ले ललटेन बार के पढ़त लड़के के फेरा में परल कवनो लइका

'के 'किरासन तेल' जइसन जहीन नाम से बोलावे लागे वाला 'एह' गाँव आ 'गाँव' के सुभाव

पजतना, ततने ओकरा बूझ प, सूझ प कि सूझेला कइसे ओकरा कि तनी बड़-बड़ दाँत

वाला केहू के 'ट्रैक्टर' कहते कुछ अइसन सुने के मिली कि अतमा अघा जाई । बाकिर

महीन मजाक के मार में माहिर जेकरा के कहल जाला ऊ हमरा गाँव के देहाती जी! हीरालाल

देहाती, जे हँसी ना उड़ावेले केहू के कवहीं, उड़िया जाय घर हँसी जरूर उपजा देले,

ऊ चाहें, अगर केहू चाहे लोहा सिंह नाटक में ऊ जो लोहा सिंह बन के उतर जायँ आ

बड़का बाबूजी फाटक बाबा, आ खदेरन के मदर बन के गनपत मिसिर त गाँव में केहू

बना रहे जे हँसे हहाय में लाफ्टर चैनल के नवजोत सिंह सिद्ध से दब परे। अक्सर त एह

लोग के गढ़िए गढ़ के संवाद बोले के परे काहे कि तब पर्दा के पीछे से प्रॉम्प्ट करत छोटको

बाबूजी के हँसी अक्सर बेसम्हार हो जाय। विजय मिसिर के डराइबरी जो केहू नइखे देखले

त मत देखो, डराइबरी त जटुलियो साह के देखल जा सकेला आ चहला प चिहाइलो जा

सकेला कि जवना गाँव में आरिए डगर, रोड सड़क के नामो-निशान ना, तहाँ कइसे

अइसन अइसन, बिहार के गड़हन-गड़ल सड़कन के माहिर डराइवर; आ जो विजय मिसिर

के गावल नइखे सुनले केहू तब्बो कवनो बात ना, गवनई त गुप्तेसर भइया, रजिन्दरो भइया

से सुनल जा सकेला, रामायण-महाभारत के एक-से-एक प्रसंग, एक-से-एक तरज-अरज

के साधे, देखलो जा सकेला कि गावत में गरदन के नस कइसे फूल के गोहुअन साँप अस

फुफकारे लागेला, आ गवनई त शिवोवरत भइया सुना दीहें, झोर दीहें, झुमा दोहें, बाकिर

विजय मिसिर से मुसहर लोग के बोली-बानी जो केहू नइखे सुनले, ओही-ओही लफज

में ओही-ओही लहजा में, जवना के जाने कतने पीढ़ी से एगो दोसरा तरह के लहजा में

बोले वाला लोगन के बीच में बसियो के ऊ लोग आजु ले सँचले जोगवले रखले बा,

त जाय, जरूर सुने; अतना मीठ, अतना मनभावन कि सुनके मुसहरी लोग के भोरात-

मोहात हम देखले बानों साँच कि झूठ, सुनले बानीं कि एक वे हमरा गाँव के मुसहर

लोग कवनो दोसरा गाँव के मुसहर लोग से फुटबॉल के मैच सँकारल त उहन लोग के

तरफ से विजयो भाई खेले गइले आ उनुका गोराई के लेके ओहर से जब उनुका मुसहर

भइला प सवाल उठावल गइल त अपना मुसहरई बोली में एह रंगभेद के लेके अइसन

झझकार के झरपेटले विजय भाई कि मैच त बाद में जितवले, ओह लोग के मनवा पहिलहीं

जीत लेले गारी के ममिला में बाकिर, गावे वाला ना; गद्यगह, लेन-देन वाला गारी के

ममिला में, नजर महतो अइसन महामौलिक, सदाटटका प्रतिभा त एह ऑल इण्डिया, माने

सैंडसे दुनिया, माने पहरपुर नाम ग्राम में न भूतो न भविष्यति टाइप हमरे गाँव के बघवा बाबा जे बाघ से बजले पछड़ले आ ओकर नाँव छिनले अइले इंजीनियरिंग के पढ़ाई में कवनो डिजाइनिंग डिपाट होखे त ओकरा गाड़ी भेज के हमरा गाँव से बलेसर भइया के बोलावे के चाहीं, कुछ सीखे, कुछ जाने के चाहीं के जाने के बे अपना बइठका के बदलले डिजाइन आ हर बेरा पहिलका से फाइन टूकर कहेला जेकरा के ई भोजपुरिया गाँव ओहो 'दूकर' चाचा के मुँहे उचरल अँगरेजी के फर फर अँगरेजी कहल जाला, पता ना अँगरेजवन के ई पतो बा कि असहीं अँगरेज बनल रहेलन स 'स' के बाद 'र' के बाद 'वा'....

अतना त ऊपर झाँपर अतना त झारन झूरन अतना त असहीं उड़न्ता । तुरन्ता । गहिरे गइला प घरे-घरे जाय परी आ तब लागल चलल चलि आई साथे-साथे, जतने बात बड़-बड़, छोट-छोट ओतने बतंगड़ बाकिर अतने त नइखे न भइया । एगो दूगो गाँव त बा ना, ननिअउरा, फुफिअठरा, बहिनिअउरा, मउसिअउरा, ससिअउरा आ होत नाता आ हीत नाता के हीत नाता आ साथी सँघतिया आ साथी सँघतिया के साथी संघतियन के के जाने कतने-कतने गाँव जवन जतने ओ लोग के ओतने हमार, हालांकि अपना एह बहुत-बहुत गाँवन में से बहुत-बहुत गाँवन में हो अइला के बावजूद बहुत-बहुत गाँव बा जहाँ पहुँच नइखीं पावल आ बहुत-बहुत गाँवन में त पहुँचियो पाइब कि दो ना, अपना एह अवतार में।

आपन एगो घरवे से न कवनो गाँव आपन होला। शहर में त किराया के घर में उमिर काट दी तब्बो चाहीं त कब्बो कह सकला कि आपन शहर है। जवन कहहीं भर के आपन, ओकरा के आपन कहीं भा अनकर भा कहवे मत करों कुछ, कुछ फरक त परेवाला वा ना। बाकिर गाँव त कवनो तब्बे आपन कहाई जब होई आपन आ तब्बे होई आपन जब गाँव में आपन एगो घर होई, चाहे ढहले ढिमिलाइल, टुटले-टपकत, बाकिर आपन घर, जवन जरूरी नइखे कि अपने बनवला बनववला के नाते आपन होखे, केहू के घर हो सकेला आपन, ओह केहू के आपन बनला, आपन बनवला के नाते।

हम भगमानी कि जाने कतने-कतने गाँव-नगर-पुरवा में हमार आपन घर हम अभागत कि जाने कतने-कतने गाँव में कतने-कतने आपन घर के रहते, शहर में किराया के घर में हमरो दोष, बाकिर देशवो के कम ना जवन विकास के दिसाई धउरल त देखिहा लोग के घिरावत कि हे हो, जनमल जो जाहs त भले जनम ल गाँव में, बाकिर जीयल जो चाहs त मूँए खातिर शहरे में चलि आवड, एकरा अलावा कवनो 'चारा' बाँचल नइखे, कुछ खवा गइल, कुछ खवाता, बकियवो खवा जाई। हालत ई बा कि जेकरा गाँव खातिर लड़े के बा, ओकरो रैली लेके दिल्लिए पटना जाए के बा; खा-खा के खेत, पसरल जात देश पर जवन दिल्ली-पटना, तवना दिल्ली - पटना में।

शुभ मानी अपना पहरपुर गाँव के, जहाँ हमरा होश में घर के केहू ना लेल आपन आखिरी साँस जियबे कइल गइल जहाँ, कि इयाद राखीं कि ओह पहरपुर से निकलिए के बाँचे पवली आजी, जबकि भुँइसेज दिया गइल रहे तीन दिन के अडिग बेहोशी के बाद ! हिसाब नइखे एह आजाद हिन्दुस्तान के सरकार के कवनो महकमा के पासे कि गाँवन में कतना लोग जियते भुँइसेज पावल, भुँइसेज पवला के मारे मरल बाबा के बारे में त हमरा आज ले ना फरियाइल कि उहाँ के आरा में तेजलीं आपन परान, जहाँ रहीं उहाँके अपना अन्तिम दिनन में, कि पहरपुर में, जहाँ रह रहके चल जाइल करी उहाँ के तने तने ना सही, मने मने बाकिर जरूर अपना अन्तिम के अन्तिम दिनन में।

माफ कइल जाय, अपना गाँव के गावे के दौरान अपना बाबा के माने छोटका बाबा के, बतियावहीँ के ना रहे हमरा जनला के बादो कि उहें के कबिलाँव कि नतुहा रहीं जा जवना गाँव में तवना में नतुहा कहइनों जा ना कवहीं 'खेत बिगाड़े बथुआ, गाँव बिगाड़े नतुहा' कहाउत के पेट, ऊहें के रहे परताप कि कबहूँ हमन के परंतुक से ना पटाइल। जनला के बादो कि उहाँ के बतियवला बिना गाँव के गावल पुराय वाला नइखे। असल में हमरा पुरावे के हइए नइखे, ओरियावे के बा आ हम अभी बाबा 'के' का बतियाई, हमार त अभी बाबा 'से' बतियावल ना छूटल। उहाँ के ना रह गइला के नाहिंए लगलका के चलते उहाँ के बाद जवन भइल, निमनका ना, बउरका जवन भइल, जवन जवन, तवना-तवना के भइला प हमरा, अपना तहे तहे दिल से, सदेह सन्देह सपनवन में जइसे कुछ-ना- कुछ होत चल जाला, उहाँ बिना ओसही होत चल गइल बहुत बहुत कुछ, जवन असल में भइले नइखे बुला, कहियो, बुझाला, कि बुझाई। तबे बुला बाबा 'के' बतियाऽ पाइब, छूट के खुल के ईहो बा कि बाबा के बतियाइब त ई त होई ना कि आजी ना अइहें। आ ई कहसे होई कि आजी अइहें त पारा पारी गाँव के मय के मय मेहरारू लोग ना आ जइहें मनिहें त नाहिंए। मना त कइली ना आजी केहू के कबहीं ना सास के जे अबगे अपना पतोह के देल दुख गा के गइली, ना पतोह के जे अपना ओही ओही सास के देल दुख गावे खातिर ताके में रही कि कब सासजी जास -

सभे आइ... बाकिर... माई त... नाहिंए न...

त गाँव जरूर कुछ ना कुछ छूट गइल। जइसे अँउसिया महुआ छूट गइल सेनुरहवा आम वगइचा वाला खेत जइसे माई। बड़की फुआ। बड़की आजी भउजाई। बड़का बाबा। आ बाबा आ आजी । किन्नू चाचा । लल्लू चाचा जगदीश चाचा आ सुखदेव चाचा, गया चा' आ गंगा ठाकुर ठकुराइन आ... आ जइसे छुटियो के ना छूटल केहुओ, कुछुओ, ओसह गडओ जोहला प गँठआ में हमहूँ होखब कहूँ जब नाहिंयो रहि जाइब एह दुनिया में, तबहूँ- 'जइसे रे घिव गागर ।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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