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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023

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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-सामने नाथ बाबा के ढहल चौरा पर एगो लइका गाना गावत रहे। ओकर गाना के लाइन कुछ इहे रहे-

सोनवानी गाँव नगीना / जहाँ बसे लोग परवीना एके दिन के आवे पहुना रहि जा छ सात महीना।

एह गवनई के का मतलब? का साँचो एह गाँव के एतना आकर्षण बा कि अतिथि विभोर हो जाला ! टीसन से आवेवाला के हर मौसम में छौ किलोमीटर ऊबड़-खाबड़ पैदल चले के होई। बस टीसन भी एतने दूर बा बाढ़ बरसात में जे एक बार आ गइल ऊ सदा खातिर कान पकड़ लेई अब त सुखलो मौसम में गली-गली बाढ़ आ गइल बा। घर- घर में लगल हैंड पम्प के पानी से पूरा गली पनाला बनि गइलि । होते साँझ सत्राटा छा जात बा। दरवाजन पर रामायन बाँचे भा गावे के रिवाज बहुत पहिलहीं खतम हो गइल। एकाध साल से बिरहो गावेवाला खामोश हो गइलन। लोग निर्जीव हो गइल । उदासी गाँव में रात-दिन मँडरा रहलि बा । अइसने स्थिति में ऊपर के गीत के समीकरण कइसे बइठी? साँच त ई बा कि ई कहानी पुरान बा आ पुरनका सोनवानी के बारे में प्रचलित बा। नयका सोनवानी के बारे में त ओकर एकही अर्थ वा कि अतिथि बाढ़ का दिन में आइल बा। बेचारा पानी में कई महीना घिरल रहि गइल। शायद बेमार परि गइल। गाँव के कवनो डॉक्टर सुदामा ओझा रहलन उहो गुजर गइलन अब गाँव के मरीज गाँवे में मरो कई- कई नदी-नालन आ ताल-तलैयन के बाद टीसन एह गाँव में त लोग अस्पताल के सपनो नइखे देख सकत। एगो सपना रहे कि आजादी के बाद हमार गाँव में सरकारी नलकूप हो जाई ओकरा पूरा होखे में चौंतीस बरिस लागि गइल ।

एह गाँव में आजादी देर से आइल ऊ सन 1980 में मई महीना में ओह दिने आइल जेवना दिने ओ समय के कलट्टर श्री सुबोधनाथ झा जी गाँव में अइले उनकरा साथे दूसर अधिकारी भी रहलन। गाँव के लोग बहुते खुश भइल। इहवा के धरती पर ई पहिला मोका बा कि कवनो कलट्टर अइलन आ सभकर दुख-सुख पुछलन। ओही दिने अपना बी.डी.ओ.

के लोग देखलन | ग्राम सेवक के दुर्लभ दर्शन मिलल लगल, जइसे सभ सपना साँच हो जाई। सरकारी नलकूप खातिर कहल गइल । पचीस बरिस से खंडहर नियर पड़ल प्राइमरी इस्कूल के भवन दिखावल गइल कहल कइल कि नदी नाला आ ताल तलैया से भरल एह पिछड़ल गाँव में एगो मिडिल इस्कूल होखे के चाहीं नाला पर पुल के साथ सड़क के जरूरत त सोझे बा ।

फेर का भइल ? प्राइमरी इस्कूल के भवन खातिर सहायता मिलल । ऊ खड़ा हो गइल । कुछ समय बाद मिडिल इस्कूल स्वीकृत भइल। ई इस्कूल निर्माण आ शिक्षा प्रसार के तमाशा हो गइल । सन् 80 में इस्कूल खुलल। ओकरा खातिर धन स्वीकृत भइल। सन् 81 में मास्टरन के नियुक्ति सन् 82 में एकाध टाट आ टेबुल पहुँचल। सन् 83 के शुरू तक भवन के कवनो सुनगुन ना रहे। अनन्त काल तक कवनो ग्रामीण अभियंत्रण विभाग गाजीपुर का पेट में ऊ पाकत रहल अइसने खस्ता हाल सरकरी नलकूप के बा हैं, कवनो कवनो तरह ऊहो मिल गइल। लेकिन मिल गइला से का होला? तोन बरिस में कुछ ना भइल । न संयन्त्र, न नाली, न तार, न खम्भा आ न बिजली पानी बोरिंग पर एक अदद हाथी दाँत के मीनार नियर बिल्डिंग खड़ा बा पासे में पंडीजी के निजी नलकूप उजड़ल पड़ल बा। एह सरकारी नलकूप के भरोसे ओके समाप्त कइ दिहल गइल गाँव के आर्थिक विकास के सपना पर पानी फेरत ऊ बिजली आ नलकूप विभाग के फाइल में दबि गइल। बुरा होखे एह फाइलन के ! कहीं इन्हने में दबि गइलि ऊ सड़कि जेवन ओह बरिस गाजीपुर आ बलिया के सम्बंधित विभागन के सहमति से स्वीकृत भइलि। लोग बहुत निराश भइल। अब सड़क से गाँव ना जुड़ी। दुसरका पंचवर्षीय जोजना से गाँव-गाँव में सड़क के नारा लगल सन् 60 में एके युद्ध स्तर पर प्राथमिकता दिहल गइल कहल गइल कि हर डेढ़ हजार के आबादी वाला गाँव पक्की सड़क से जुड़ गइल। एहर सोनवानी जइसन लगभग तीन हजार आबादी वाला लाखन गाँव कूपमण्डूक जइसे पड़ि गइल। अब तक कुछ ना भइल त अब का होई? जब सड़क के ई हाल बा त बिजली के हाल का पूछे के बा? सोनवानी गाँव के सीवान पर कभी एगो खम्भा गड़ल रहे छोट गाँव न ह के पूछत वा? कुल्हि सुविधा बड़ गाँवन के अरे । ई छोट-बड़ के भेद केतना गहरा गइल बा !

छोटाई आ बड़ाई के हिसाब से मोटामोटी रूप में आज गाँव चार प्रकार के बा। प्रथम कोटि में महाभाग गाँव बा ई ऊ गाँव ह जहँवा प्रखण्ड विकास के कार्यालय बा। जाँबा कवनो मंत्री, सांसद, विधायक आ जिला स्तर के नेता के घर बा। दूसरा कोटि में भागभान गाँव, ऊ गाँव हउवन जाँदा पक्की सड़क बा, जहाँ अफसरन के पहुँचे खातिर सुविधा वा तिसरका कोटि में अभागा गाँव, ऊ गाँव जेवन सड़क से दूर बा। जहँवा विकास के गाड़ी पहुँचे में कठिनाई वा चउथा कोटि अभिशप्त गाँव के बा ऊ छोट-छोट टोला जेवन सड़क से बहुत दूर था। सोनवानी गाँव तिसरका नम्बर पर था। एकर जनसंख्या तीन हजार के छुअत बा। रकबा लगभग दू हजार बिगहा बा। किसान खेतन में काम करत बा। कबो कीमती बैल रखे के शौक रहे। अब लोग ट्रेक्टर रखले बा ई सभ देखत ई लगत बाकि गाँव के चहक आ चमक से भरल होखे चाहीं। लेकिन असलियत का वा? सड़क नइखे त सगरो संसार से कटल बा। मनहूसी में डूबल बा। लोग कुण्ठित बाड़न गिरावट एगो व्यापक रोग बा। समाज खण्ड-खण्ड वा केवनो रोजगार कइसे पनपी ? बाजार से एक बोरा माल ले आवे में दस रुपया किराया बइठ जाला कठिन वा आर्थिक स्थिति के बारे में कुछ कहल खेती अलाभकर वा, गुजर-बसर आ खाता- कमाता रोजगार नयका खेती आइल त नया उत्साह से उन्नतशील गेहूँ बोवे के लहरि आइलि। कुछ वरिस बाद अइसन लागल कि निछान गेहूँ पर निर्भर नई खेती घाटा के खेती बा। बाढ़ के क्षेत्र के कारण धान के फसल अनिश्चित वा सघन कृषि आदि खातिर कवनो प्रोत्साहन नइखे मिलत बीज, खाद, पानी, डीजल आ संयंत्रन के पुर्जन के मँहगाई अइसन मरलस कि कृषि क्रान्ति के सपना टूट गइल। गेहूँ के नई खेती के उत्साह ठण्ढा पड़ि गइल। गाँव फेर भाग्य आ भगवान के भरोसा हो गइल। मटर आ मसूर आदि के बाप-दादा वाली खेती चालू बा। इहे नियति बा कि ऊ न मरिहें न मोटइहें।

सड़क के अभाव विकास आ निर्माण के अर्थ में पिछड़ल बनवले वा, ऊ राजनीतिक चेतना के नइखे उकसे देत ब्लाको स्तर के कवनो नेता होइत त कुछ झपट ले आइत, अइसन इहवा के लोगन के विश्वास बा । सचमुच इहे दिखाई देता। कवनो नेता केतना ढीठ बा आ अपना गाँव खातिर धक्कम धुक्की के के केतना खींच लेत बा! विकास में सन्तुलन नइखे। ऊ राजनीति के हाथन बिक गइल बा सोनवानी में राजनीतिक चेतना नइखे त कुछ नइखे। डाकखाना बा, लेकिन अखबर ना आवेला चुनाव आवेला तबे इहवा सभे राजनीतिक बात करेला। लेकिन बात का सही मताधिकार से कवनो मतलब नइखे। ओमें देश के राजनीति के खयाल नइखे कइल गइल। ओकर फैसला गाँव के राजनीति से होले।

चुनाव के दिनन में उत्साहीनता बा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना के कुछ लोग गहिरा तनाव में रहेलन ई तनाव उम्मीदवार, पाटी आ राजनीतिक सिद्धांत के लेके नइखे, गाँव के गोल- गिरोह के लेके बा। फेर ई तनाव आ प्रतिस्पधी भी उहे लोगन में बा जे बड़ बा। छोट लोग सबके 'हाँ' कइ देलन आ मतदान के समय चुपचाप कबहीं 'आपन पाटी' समझिके कवनो पाटी के वोट देला आ कबहूँ बहकि के केहू दूसरा के। ई लोग जइसे सामाजिक दृष्टि से अदेख हउवन ओइसहीं राजनीतिको दृष्टि से ।

मुश्किल बा कि हम गाँव देखे चललों त पूरा गाँव हमार नजर पर चढ़त नइखे। गाँव में उगल एगो चमक-दमक वाला आधा गाँव सामने आ जात बा एमें प्रायः बड़े लोग हवन ई वास्तव में अधकचरा शहर था। ई अखबार आ राजनीति के बात करत बा। दुसरका छोट लोगन के गाँव एह सबका पाछे परदा में बा सोनवानी गाँव के कुल्हि भूसम्पदा भूमिहार ब्राह्मण, यादव, कायस्थ आ क्षत्रिय लोगन का पास बा। शेष तेली, कानू, कलवार, मुसलमान, बीन, भर, सोनार, नाई, बारी, मल्लाह, कुम्हार, कमकर आ लोहार ई कुल्हि जाति भूमिहीन बाड़ी से हरिजन एह गाँव में नइखन वर्ग संघर्ष इहवा पहिले-पहिले कबो ना भइल बाकी अब संघर्षे संघर्ष वा शायद राजनीति-विहीनता के अभिशाप के ई वरदान है। कालक्रम से सोनार, कुम्हार, तेली आ बारी के परम्परागत पेशा नष्ट हो गइल। ई लोग बाहर- भीतर जीविका खातिर हाथ-पैर चलावत बाड़न अइसन लोग गाँव से उजड़ियो जात बाड्न त गाँव के कवनो चिन्ता नइखे। अब पूरा गाँव खातिर ना सभ अपना-अपना खातिर जिअत बा पूरा गाँव के भाव जेवन रस्म आ रिवाजन में बँधल रहे ऊ धीरे-धीरे टूट गइल भा टूटे के कगार पर बा। रामायन गायन, नाथ बाबा के पूजा, मठिया कुटी पर के डोल, बटोर, शहनाई, चुंगी, चन्दा, अखाड़ा, कुश्ती, काली जी के पूजा आ कीर्तन आदि के अब बेमन से कवो कबो चरचा भर होत बा। ऊ पुरान रामलीला त बस गाँव के इयादे भर बा। नया लड़का कट्टा चलावे लगलन। खून के मोकदिमा खड़ा हो गइल ।

लोग कहत बा का हो गइल गाँव के? कबो इहँवा ओझा बाबा, ठढ़ेसरी बाबा, धारीदास बाबा, भंगी बाबा आ रामदास बाबा जइसन उच्चकोटि के महात्मा रहलन। कबो शिवदेनी मिश्र आ चन्द्रदेव चौबे जइसन प्रसिद्ध संगीतज्ञ रहलन। ओही परम्परा के पं. राजेश्वर पाण्डेय रहलन। कबो इहँवा अर्जुननारायण आ जैचन्दा राय जइसन न्यायाप्रिय शासक मुखिया रहलन। कबो देवनन्दन चौधरी जइसन शाहखर्च रईस, जूठन भगत जइसन उदार धनी, बनारसी लाल जइसन दीवान, देवशरण यादव जइसन पहलवान आ जगनारायण जसइन सभाचतुर आदमी रहलन। तब दीपन राय, राम जतन राय, जानकी राय, अभिमान चौधरी, सहदेव राय आ बाबूराम चौधरी आदि जइसन सरदार रहलन। गाँव सुशासित रहे। पुरनका पीढ़ी के सबसे वयोवृद्ध शतवर्षीय आचारनिष्ठ पं. ब्रह्मदेव पाण्डेय रहलन। हमरा देखते-देखते गाँव केतना बदल गइल? पुरनका लोगन में से सच्चिदानन्द राय, भूखन चौधरी आ विश्वनाथ पाल जइसन लोगन के चिन्ता रहे कि नयकी पीढ़ी में अइसन केहू नइखे निकलत जे आगे भावपूर्वक गाँव के पक्ष में इयाद कइल जाव चिन्ता सही रहे। गिरावट सचाई बा। गाँव के जेवन कुछ सौन्दर्य रहे सभ नष्ट हो गइल। गाँव के कुल्हि रास्ता घाट छेका गइल।

लेकिन ई हालत का सिर्फ सोनवानिए के बा? अरे, हिन्दुस्तान में मूलभूत गिरावट के दृष्टि से पाँच लाख से ऊपर सोनवानी बा सबुर करे खातिर ई काफी बा।

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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