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कवने गाँव हमार !

2 November 2023

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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽतानी कि जहाँ जनमलीं, उहे न हमार गाँव होई एह पर माई बतवलस कि तोर जनम त नानी घरे भइल रहे। माई आ दादी घरे त लइका भइल सहते ना रहे आ सहबो करित त इहाँ करवइया के रहे? के सउरी सम्हारित? तोरा ईया से त कुछु होला ना आ पतोह खातिर कुछ करबो ना करती हो सकेला एहूसे कह देते होखस कि एह घरे लरिका भइल ना सहेला कवनो अउरी गोतिन दयादिन चाहे छोट ननदो त ना रही कि सम्हारे आ जइती लोग एही से ईया माई के नानी घरे पठा देले होइन, आ हमार जनम नानी घरे भइल होखी। अब हमार जनम त नानी के गाँव तिलौली भइल, बाकी ओह गाँव के त हम आपन गाँव कह ना सकला, ऊ त नानी के गाँव-घर रहे, जहाँ जनमते हमके जमुआ ध लेलस, त नानी कह दूर गाँव से खोजवा के बत्तख मँगवली, आ ऊ बत्तख अपना पाँखी के भीतर हमके ढाँक के बइठल त हम बाँच गइलीं। ओह गाँव में सभे हमरा जनम पर शुभ मनवलस। सभे खुश रहे, चाहे उ घगरिन रही चाहे नाउन बारिन रही, चाहे घर के दाई- मजूरिन रही, काहे कि नानी ओह सबके दे लेके खुश कर देले रही तबो ऊ हमार गाँव ना रहे!

हम बड़ भइला पर कई बेर नानी के गाँव जात रहीं। सभे हमके बहुते मानत रहे। भर गाँवे दउर दउर के खेलों भकोला नाना के त कुल लइकन साथे मिल के खूबे रिगाई। उ गाँव त खाली हमरा नानी, मउसी आ मामिए लोगिन से भरल रहे। सभे कहे कि एह बबुनी के जनम एहिजा भइल रहे। बचे के उमीद ना रहे। बाकी देखs, कइसन नीक देह- धाजा भ गइल बा ओह गाँव के लरिका सयान सभेत आपन रहबे कइल, कुकुरो-बिलार, बानर लंगूर, गाय- प-बैल, छेरी भेंड़ी, मुर्गा मुर्गी आ बर बाजार कुल्ही पर अपने अधिकार बुझात रहे- काहे कि ऊ हमरा नानी के गाँव रहे। केहू के घर-अंगना, बर- बगइचा चाहे खेत-खरिहानी में उछले कूदे में कवनों डर ना लगे-कुल त नानी के गाँव के रहे। सब ओरी ममे नाना लोग भरल रहे, एह से चारो ओरी अपने राज लउकत रहे तबो ओके एको बेरी आपन गाँव ना कह सकलीं।

जनम के कुछ महीना बादे गाँवे स्वरूपुर पहुँच गइलीं। इहाँ हमार जनम ना भइल रहे, बाकी ई घर हमरा ईया बाबा आ माई बाबूजी के रहे एही से ई हमार घर आ गाँव कहाइला हमरा गाँव में कई गो टोला रहे दक्खिन टोला, उत्तर टोला, अहिर टोला, भर टोला, चमार टोला, कोइरी टोला, सोनार टोला, कोहार टोला आ एह कुल टोला के मिलाके हमार गाँव रहे। एही गाँव में आपन लरिकाई बीते लागल। एहिजा के गड़ही, नदी- पोखरा, वर-बगइचा, भीटा-डीह, ऊसर पलिहर, खेत-खलिहान कुल हमरा के चीन्हत रहलऽ सन। ओह दक्खिन टोला के कुल घरवा के हम 'मउसी' रहीं, काहे कि दिनभर में एक बेरी कुल्ही घरे खेले चाहे घूमे पहुँच जात रहीं मोका बेमोका कवनो कवनो दिदिया, चाची, फुआ, भउजी चाहे ईया सभे से बतियाइयो लेत रहीं। केहू घरे हमार बार झरा जात रहे, त केहू घरे फराको सिया जात रहे। कहीं दीदी लोग के साथ गोटी खेलत रहीं, त कहीं एक्कड़-दुक्कड़, कबो-कबो कनिया-पुतरी के बियाह करे के मोका मिले त केकरो दुअरा से फूल-पत्ती चोरा के ले आके पूजा खातिर ध देत रहीं, त केहू के दुअरा से अमरूघ तुरात रहे, त कहीं से पपीता लडकी, नेनुआ, सेम ई कुल त सबका घरे चाहे पिछुआरे बोवले रहत रहे, त लुका के कुछु तूरे में बड़ा मजा आवत रहे। भर टोला दउर-दउर के ई कुल खेल खेले के समय बारहे तेरह बरीस ले रहे, ओकरा बाद त एहू गाँव के चाचा, काका, भइया लोग के सोझा बड़ा अदब लेहाज करे के पड़े। ई डर हरदम बनल रहत रहे कि कवनो बगइचा चाहे पोखरा ओरी केहू देखी आ घरे जाके कह दी त चाची, ईया आ भाई लोग लागी आँख देखावे ई कुल घूमे से बरजी लोग आ रहन से रहे के कही। माई आ चाची के रटल रटावल नियम इयाद आ जात रहे। कहे लोग कि बेटी पतोह के रहन-चाल से रहे के चाहीं ई रहन-चाल ना बिगरी त सभे पूछी। अब तोहार उमिर बियाह जोग भइल जाता । क दिन एह गाँव में घूमे आ ऊख तूरे के चाहे साग खोंटे के सुख उठावे के मोका बा ! अब कुछे वरीस में ई गोइंड़ा के कुल खेतवा खरिहनवाँ तहरा के देखे खातिर तरसत रह जइहन स तू त अब एह गाँव के इज्जत भर रह जइबू

हम सोचते रह गइलीं कि अब इहो गउवाँ हमार ना ह का? एक दिन उहो आइल जब रोवत- रोवत सबके अँकवार भेंट करत, समकर गोड़ घरत, चिल्लात, डॅहकत, कुहकत- एह गाँव के छोड़ देलों, त साँचो बुझाइल कि ना, इहो गाँव हमार ना ह। हमरा बाबूजी के साथे-साधे सभे लोग कहल कि हम एह गाँव के अमानत रहीं, एही से एह गाँव के खूंटा से हमार पगहा खोल के हमरा ससुर जी के ई लोग धरा दीहल ह । अब एह ससुरे जी के गाँव भटमीला हमार गाँव है। अब हम एही घर-गाँव में बन्हाइब ।

अपना माई के गाँव से बीस बरीस के नाता तूर के हम अब अपना गाँवे पहुँच गइलीं। हमार मनवा कबो कहवे ना करे, कि ई नयका घर हमार ह। ऊ त घउर-घउर के अपना माई आ भइयाघरे चल जात रहे। ओह सखी-सलेहर के साथ जाके खेले लागत रहे। कबो सबसे झगड़े आ कबो रोवे एही चलते एह मन के बड़ा मोट आ मजबूत सिक्कड़ में बान्ह के राखे के परल-क रहे, एगो मरद के पियार, दुलार आ बाँह के फाँस जबले ए सिक्कड़ में मन बन्हाइल रहत रहे, तब ले कहे कि ई घर आ गाँव हमार ह। कहे के त घर हमार रहे तबो एह घर में हमार कवनो अधिकार ना रहे। सब अधिकार त सास, ननद, मरद आ देवर के रहे, त हमार मन मनबे ना करे कि ई हमार घर है। जब घरवे हमार ना रहे, त कइसे कहीं कि ई हमार गाँव ह। माई बाबूजी के गंडवा के लोगवो कहे कि उहे तोहार घर है, बाकी हमार बउराह मन ई माने के तइयार ना रहे। कुछ दिन ले एही उलझन में परल रहीं, कि एक दू लरिकन के माई बन गइनी । अब लरिकन के पढ़ावे आ लायक बनावे खातिर एहू घर- -गाँव के छोड़ के बहरा अपना मरदे के नोकरी पर शहर अइसन गाँव में चल गइनी उहाँ किराया के घर में रहे लगलीं। अब अपना घर में खयका बनाई आ लरिकन के खियाई अब अपना पति आ लरिकन के सेवा करें। एहतरे ओही किराया के घर के जवना पर हमार पूरा अधिकार रहे अपन घर कहे लगलीं। कहीं कि ई हमार घर है। अब ई घर आ गाँव न त नानी के रहे, न माई बाबूजी के आ न हमरा सास-ससुर के अब

ई घर हमार रहे। एके गाँव कहीं चाहे शहर, उहे हमार रहे। आज जब मन में ई बिचार उठल कि अपना गाँव के बारे में कुछु कहीं, चाहे लिखीं, त ई हमार मन विचलित हो गइल, कलम मचले लागल, बाकी सोच ना पवलों कि हमार गाँव कवन रहे? लागता कि भर जिनगी हम खोजब अपना गाँव के तबो ऊ ना मिली। कहेला लोग कि जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ त ऊ पानी कहाँ बा कि हम ओहमें पठीं, आ हमार गाँव मिल जाव एह घरी हमरा भर मन सन्तोष मिलता ओह गाना के सुने में जैमें गावल गइल बा कि 'हम उस देश के बासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। भर जिनगी के एह घर में कई गो घर, गाँव, शहर आ प्रान्त घूमे के परल, बाकी कवनो हमार ना कहाइल । अब त इहे कहब कि ई पूरा देसवे न हमार बा जहाँ खुल के चिरई नियर बिचरन करे के मिलता ! न त एह घूमे में कवनो पासपोर्ट के जरूरत वा न बीसा के एही से कहनी है कि हमार गाँव कवन ह, उत्तर से दक्खिन ले गंगाजी नियर हमहूँ खाली बहल करौंला। अब हम सोचबे ना करब कि हम कवना गाँव के बानी ह, ई जरूर कहब कि हम एह देश के बासी बानी, आ ई देसे हमार गाँव बा।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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