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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024

1 देखल गइल 1

( १ )

रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।। हम ना० ।।१।। हम ना० ॥३॥

( २ )

पूछत भरत राम कहाँ माई।

जब से छुटली अजोधिआ नगरी हमरा

घरे गलियाँ औ हाट बाट में परजा राम विनू मोर सूनी अजोधिया लखन बिनू ठकुराई। सिया बिना मेरो मंदिल सूनो रोइ पछार भरत भाई खाई ॥२॥

उदासी आई ।।

रोवत पाई ॥१॥

'भरत पूछ रहे हैं- हे मां राम कहाँ हैं? जब से मेरी अयोध्या छूटी तब से उदासी सदा छाई रही है। यहाँ घर-घर, गली-गली और हाट- बाट सर्वत्र मैंने प्रजा को रोते हुए हो पाया ॥ १ ॥

'हाय ! राम के बिना मेरो अयोध्या, लक्ष्मण के बिना मेरी ठकुराई और सीता के बिना मेरा घर, सूने हो गये- यह कहकर और रोकर भरत पछाड़ खाकर गिर पड़े' ॥२॥ ( ३ )

बिगड़ी प्रभु नाथ! तोहे बिनु हमरी ॥ नइहरे में जो बीरन होते उनहुँ के करितों आस ॥ १ ॥ ससुरो में जो देवर होतनि उनहू के करितों आस ॥ २ ॥ दुअरा पर एको रुखओ जो होखिते तो हम होइतों ठाढ़ ॥ ३ ॥ बिगड़ी प्रभु० ।।

विधवा अनाथ होकर रो रही हैः-

'हे स्वामी! तुम्हारे बिना मेरी सब प्रकार से बिगड़ गयो। नहर में कोई भाई होता, तो उसकी भी आशा करतो। ससुराल में कोई देवर होता, • तो उसकी भी आशा कर सकती थी। और इस घर के दरवाजे पर एक वृक्ष भी होता, तो उसके नीचे हो खड़ी होती ॥१,२ ३॥

सचमुच विधवा का रुदन बड़ा ही मार्मिक है। अंतिम पंक्ति तो हृदय को हिलाये बिना नहीं रहती।

( ४ )

बन के चलले दूनो भाई, कोई समुझावत नाहीं ।

भीतर रोवें मातु कोसिला, दुअरे भरतजी भाई ॥१॥ 

कोई समु० ।। आगे आगे राम चलतु हैं पीछवा लछिमन भाई ।

तेकरा पीछे सीता सुन्नरि सोभा बरनि न जाई ॥२॥ 

कोई समु० ।। भूखि लगे भोजन कहाँ परहें, पिआस लगे कहाँ पानी ।

नीदि लगे डासन कहाँ मिलिहँ, कुस कांकर गड़ि जाई ।।३।। 

कोई समु० ॥ रिमझिम रिमछिम मेह वरिसेले पवन बहे पुरवाई । कवने बिरिछ तरे भीजत होइहें रामलखन दूनो भाई ।।४।।

 कोई समु० ।। 

'हा ! दोनों भाई बन को जा रहे हैं, उन्हें कोई समझाता नहीं। भीतर कौशल्या माता रो रही हैं और बाहर भरतजी भाई रो रहे हैं' ।।१।। 

'आगे आगे राम जा रहे हैं, उनके पोछे लक्ष्मण। उन दोनों के पीछे सीता सुन्दरी जा रही हैं, जिनको शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता' ।।३।। 

'हा, भूख लगने पर उन्हें भोजन कहाँ मिलेगा और प्यास लगने पर वे पानी कहाँ पोवेंगी। नींद की दशा में उनको बिछावन कहाँ मिलेगा ?

(कोमल) शरीर में कुश कंटक गड़ जायेंगे।' रिमझिम रिमझिम करके मेघ बरस रहा है। पूर्वी हवा वेग से चल रही है। हा ! दोनों भाई किस वृक्ष के नीचे भीग रहे होंगे ॥४।।

( ५ )

ऊँचहि घरवा के ऊँची रे अटरिया, ते चढ़ि बइठेली रूपा देई झारे लामी लामी केस ।। १ ।।

का तुह रूपा बेटी झारे लामी केसिया, तोरा सामी जुझेले गइया रे गोहारि ॥ २ ॥ 

हाथ केरी ककही हाहि रहि गइली, माथा के सेनुरवा दैवा हरले सभवा वइडल तुहूँ बाबा हो रे जाइ ।। ३ ।।

 हमार, बीता एक जगहिया बावा हमरा के देत ॥ ४ ॥

बीता एक जगहिया रुपवा तोहि बलिहार, लेइ आउ कयथवा रुपवा लेहु ना नपाइ ।। ५ ।।

 मचियहि बइठलि अमा तू मइया हो हमारि, लहरा, पटोरवा देहु हमरा के दान ॥ ६ ॥ 

लहरा पटोरवा रूपा तोरे बलिहार, लेइ आउ बजजवा रुपवा लेडु न फराय ।। ७ ।।

 पसवा खेलत तुइँ भइया हो हमार, चनन चइलिया देहु हमरा के दान ॥ ८ ॥ 

चनन चइलिया रुपवा तोरे बलिहार, लेई आउ बढ़ड्या रुपवा लेहु ना चिराय ॥ ९ ॥

भँडरा पइसलि तुहूँ भउजी हो हमार, अवध सिन्होरवा भउजी हमके द दान ।। १० ।।

पूरुव के चनवां पछिम कइसे जात, भउजी के सिन्होरवा ननद नाहीं दान ॥ ११ ॥

एक त बेटी पातरि दूसर सुकुवारि, कइसे कइसे सहनू बेटी अगिनी क आँचि ।। १२ ।।

तोहरा लेखे अम्मा आहो अगिनी के आँचि, हमरा लेखे अँचिया वा सितली बतास ।। १३ ।।

'ऊँचे घर को ऊँवी अटारी है जिस पर बैठकर रूपादेवी अपने लम्बे केश झार रही हैं' ॥ १॥

'हे रूपा बेटी ! तुभ अब बाल क्यों झार रही हो? तुम्हारे पति गायको रक्षा करने में मारे गये ॥ २ ॥

'रूपा के हाय को कंधो हाथ ही में रह गयी। उसके माथे का सिंदूर भगवान हरण किये चले जा रहे हैं ॥ ३॥

'सभा में बैठे हुए हे मेरे पिता, मुझे एक बीता भूमि दान दो ॥४॥

'हे बेटो रूपा ? तुम पर एक बोता भूमि अर्पण है। कायस्थ बुलाकर नपा लो' ॥ ५॥

'मचिया पर बैठी हुई हे अम्मा तू हमारी मत्ता हो। हमें एक रेशमी धोती दो' ॥ ६॥

'हे बेटी रूपा; रेशमी धोती तुमपर अर्पण है। बजाज बुलवाकर फड़वा लो' ।।७।।

'हे पासा खेलते हुए मेरे भाई मुझे थोड़ी-सी चन्दन की चैली प्रदान करो' ॥८॥ 

हे रूपा वहन ! चन्दन की चेली तुम पर अर्पण है। बढ़ई बुलाकर चंदन की चली चिरा लो' ॥ ९॥

'भंडार में घुसी हुई हे मेरी भावज ! मुझे अवध का सिन्होरा प्रदान करो' ॥ १० ॥

'पूरब का चन्द्रमा पश्चिम को कैसे जा सकता है ? भौजी का सिन्होरा ननद को कैसे दिया जायगा ? ॥ ११ ॥

'हे बेटी, एक तो तुम ऐसे ही पतले अंग की हो दूसरे सुकुमार हो ? आग को आँच कैसे सहोगी ?' ॥ १२ ॥

'हे मां ! तुम्हारे लिए आग की आँच आँच है। मेरे लिए तो बह शोतल वायु है' ।॥ १३॥

कहना नहीं होगा कि रूपादेवी सती हो गई। उसके मायके में पति निधन की सूचना मिली और वहीं वह सती हुई।

( ६ )

सुधिया न लेले राजा हमरी सुरति के ।। अपने त जाइ के बिदेसवा में छवले, पतिओ ना लिखे राजा हमरे इ मन के ॥ १ ॥

जो सुधि आवे राजा तुमरी सुरति के, अँसुवा बहे जइसे नदिया सवन के ॥ २ ॥ अर्थ सरल है ।

( ७ )

तमुआ गिरवल कहाँ जइव हो कहाँ लगिहें ठेकान ।। काहे लगवल बबुरवा हो गलगइत तू आम । अमिरित करीत भोजनवा हो भजित हरि नाम ।। १ ।। प्रेम बाग ना बउरे हो प्रेम न हाट बिकाय । बिना प्रेम क मनुआ हो जइसे अन्हरिया राति ।। २ ।। प्रेम नगर के हटिया हो होरा रतन बिकाय । चतुर चतुर सौदा कइले हो मूरख पछताय ।। ३ ।। 

'हे बालम ! तुमने हमारी सुधि नहीं ली ।'

'तुम स्वयं तो जाकर विदेश में पड़े हो। मेरे मन का हाल जानने के लिए तुमने पत्र भी न भेजा' ॥१॥

'हे राजा ! तुम्हारी याद आते हो मेरे आँखों से आँसू की धारा ऐसी बहने लगतो है, जैसे सावन में नदी बहती है ॥२॥

'हे प्रिय, तुमने संसार में अपने गार्हस्थ जीवन का तम्बू गिराया। अब कहाँ जाओगे? तुम्हारा ठिकाना कहाँ लगेगा ?'

'ऐसी बात यो, तो तुमने बबूल क्यों लगाया ! अर्थात् गृहस्थी का जोवन क्यों बसाया ? आम को बाग लगाते अर्थात् परोपकारमय जीवन बिताते और अमृत ऐसा फल खाते और राम का नाम भजते ?'

'हे प्रिय ! प्रेम के वौर बाग में नहीं आते। प्रेम बाजार में भी नहीं बिकता। बिना प्रेम का मनुष्य अंधेरी रात को तरह है। प्रेम के बाजार में होरा रत्न बिकते हैं। चतुर-चतुर लोग जो प्रेम के पारखी हैं, सौदा कर लेते हैं। मूर्ख जो प्रेम के पारखी नहीं हैं पछताया करते हैं' ॥२,३॥

'स्त्री अपने पति को समझा रही हैं कि जब तुमने गार्हस्थ्य जीवन का तम्बू इस संसार में खड़ा किया अर्थात् मुझसे विवाह करके गृहस्थी जमा चुके, तब तुम्हें प्रेम करके हो अपना जोवन सार्थक करना चाहिए। इस जोवन में भी प्रेम के द्वारा तुम रत्न प्राप्त कर सकते हो।'

(८)

मैं न लड़ी थी बलमा चले गये हो । रंग महल में दस दरवाजा, ना जानी खिरिकिया खुली थी ॥ १ ॥ पांचों जानी मोरी रान्ह परोसिन तुम से वलमु कछु कहियो न गये हो ।

मैं न लड़ी थी बलमा चले गये हो ॥ २॥

'मैंने लड़ाई झगड़ा नहीं किया था; पर प्रियतम (मेरी आत्मा) चले गये।' 

इस रंग महल में (शरीर में) दस दरवाजे हैं, (दस इन्द्रिय रूपी द्वार हैं) मुझे नहीं मालूम कि कौन-सी खिड़की खुली थी, जिससे प्रियतम चले गये।'

'अरी पांच सहेलिनों (पांच ज्ञानेन्द्रियाँ) तुम मेरी पड़ोसिन हो क्या जाते समय प्रियतम ने कुछ तुमसे कहा नहीं ?'

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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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भोजपुरी भाषा का विस्तार

15 December 2023
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भोजपुरी भाषा के विस्तार और सीमा के सम्बन्ध में सर जी० ए० ग्रिअरसन ने बहुत वैज्ञानिक और सप्रमाण अन्वेषण किया है। अपनी 'लिगुइस्टिक सर्वे आफ इण्डिया' जिल्द ५, भाग २, पृष्ठ ४४, संस्करण १९०३ कले० में उन्हो

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भोजपुरी काव्य में वीर रस

16 December 2023
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भोजपुरी में वीर रस की कविता की बहुलता है। पहले के विख्यात काव्य आल्हा, लोरिक, कुंअरसिह और अन्य राज-घरानों के पँवारा आदि तो हैं ही; पर इनके साथ बाथ हर समय सदा नये-नये गीतों, काव्यों की रचना भी होती रही

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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड

18 December 2023
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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड में गाया जाता है, जिसका संकेत भूमिका के पृष्ठों में हो चुका है- कसामीर काह छोड़े भुमानी नगर कोट काह आई हो, माँ। कसामीर को पापी राजा सेवा हमारी न जानी हो, माँ। नगर कोट

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भोजपुरी लोक गीत

18 December 2023
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३०० वर्ष पहले के भोजपुरी गीत छपरा जिले में छपरा से तोसरा स्टेशन बनारस आने वाली लाइन पर माँझी है। यह माँझी गाँव बहुत प्राचीन स्थान है। यहाँ कभी माँझी (मल्लाह) फिर क्षत्रियों का बड़ा राज्य था। जिनके को

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राग सोहर

19 December 2023
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एक त मैं पान अइसन पातरि, फूल जइसन सूनरि रे, ए ललना, भुइयाँ लोटे ले लामी केसिया, त नइयाँ वझनियाँ के हो ॥ १॥ आँगन बहइत चेरिया, त अवरू लउड़िया नु रे, ए चेरिया ! आपन वलक मों के देतू, त जिअरा जुड़इती नु हो

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राग सोहर

20 December 2023
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ललिता चन्द्रावलि अइली, यमुमती राधे अइली हो। ललना, मिलि चली ओहि पार यमुन जल भरिलाई हो ।।१।। डॅड़वा में वांधेली कछोटवा हिआ चनन हारवा हो। ललना, पंवरि के पार उतरली तिवइया एक रोवइ हो ॥२॥ किआ तोके मारेली सस

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करुण रस जतसार

22 December 2023
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जतसार गीत जाँत पीसते समय गाया जाता है। दिन रात की गृहचर्य्या से फुरसत पाकर जब वोती रात या देव वेला (ब्राह्म मुहूर्त ) में स्त्रियाँ जाँत पर आटा पीसने बैठती हैं, तव वे अपनी मनोव्यथा मानो गाकर ही भुलाना

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राग जंतसार

23 December 2023
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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भूमर

24 December 2023
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झूमर शब्व भूमना से बना। जिस गीत के गाने से मस्ती सहज हो इतने आधिक्य में गायक के मन में आ जाय कि वह झूमने लगे तो उसो लय को झूमर कहते हैं। इसी से भूमरी नाम भी निकला। समूह में जब नर-नारी ऐसे हो झूमर लय क

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26 December 2023
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खाइ गइलें हों राति मोहन दहिया ।। खाइ गइलें ० ।। छोटे छोटे गोड़वा के छोटे खरउओं, कड़से के सिकहर पा गइले हो ।। राति मोहन दहिया खाई गइले हों ।।१।। कुछु खइलें कुछु भूइआ गिरवले, कुछु मुँहवा में लपेट लिहल

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राग कहँरुआ

27 December 2023
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जब हम रहली रे लरिका गदेलवा हाय रे सजनी, पिया मागे गवनवा कि रे सजनी ॥१॥  जब हम भइलीं रे अलप वएसवा, कि हाय रे सजनी पिया गइले परदेसवा कि रे सजनी 11२॥ बरह बरसि पर ट्राजा मोर अइले, कि हाय रे सजनी, बइठे द

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भजन

27 December 2023
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ऊधव प्रसंग ( १ ) धरनी जेहो धनि विरिहिनि हो, घरइ ना धीर । बिहवल विकल बिलखि चित हो, जे दुवर सरीर ॥१॥ धरनी धीरज ना रहिहें हो, विनु बनवारि । रोअत रकत के अँसुअन हो, पंथ निहारि ॥२॥ धरनी पिया परवत पर हो,

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भजन - २५

28 December 2023
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(परम पूज्या पितामही श्रीधर्म्मराज कुंअरिजी से प्राप्त) सिवजी जे चलीं लें उतरी वनिजिया गउरा मंदिरवा बइठाइ ।। बरहों बरसि पर अइलीं महादेव गउरा से माँगी ले बिचार ॥१॥ एही करिअवा गउरा हम नाहीं मानबि सूरुज व

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बारहमासा

29 December 2023
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बारहो मास में ऋतु-प्रभाव से जैसा-जैसा मनोभाव अनुभूत होता है, उसी को जब विरहिणी ने अपने प्रियतम के प्रेम में व्याकुल होकर जिस गीत में गाया है, उसी का नाम 'बारहमासा' है। इसमें एक समान ही मात्रा होती हों

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अलचारी

30 December 2023
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'अलचारी' शब्द लाचारी का अपभ्रंश है। लाचारी का अर्थ विवशता, आजिजी है। उर्दू शायरी में आजिजो पर खूब गजलें कही गयी हैं और आज भी कही जाती हैं। वास्तव में पहले पहल भोजपुरी में अलचारी गीत का प्रयोग केवल आजि

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खेलवना

30 December 2023
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इस गीत में अधिकांश वात्सल्य प्रेम हो गाया जाता है। करुण रस के जो गोत मिले, वे उद्धत हैं। खेलवना से वास्तविक अर्थ है बच्चों के खेलते बाले गीत, पर अब इसका प्रयोग भी अलचारी को तरह अन्य भावों में भी होने

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देवी के गीत

30 December 2023
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नित्रिया के डाड़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूलो झूली ना, मैया ! गावेली गितिया की झुली झूली ना ।। सानो बहिनी गावेली गितिया कि झूली० ॥१॥ झुलत-झुलत मइया के लगलो पिसिया कि चलि भइली ना मळहोरिया अवसवा कि चलि

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

3 January 2024
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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

3 January 2024
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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

4 January 2024
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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024
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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

4 January 2024
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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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