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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023

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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक ना पावे-झारखंड क्षेत्र के पहाड़ी नदियन के आपन रंग आ मिजाज है गोड्डा तक त आदमी बस से पहुँच जाय बाकिर ओकरा आगे पथरगामा जाए खातिर बैलगाड़ी के इन्तजाम रहे, कम-से-कम दूगो बैलगाड़ी, एगो कझिया के ए पार, एगो ओ पार, नदी के कसहूँ हेल-लाँघ के, बच्चासव त अक्सरहाँ बड़कन के कान्हा प बइठके, ओ पार पहुँचें आ बच्चासब त चाहे जतना मगन होखें, बड़कन के मुँहे एकट्ठे एक्के गुहार निकले ए सब से कब मुक्ति मिली भगवान कि भगवान नइखन त का सरकारो नइखे। हालांकि ऊ दिन पीछे छूटि गइल बा, पुलसब बन गइल बाड्न स, मजबूत भारवाही पुल, जेकरा ऊपर से अब बैलगाड़ी कम आ कोइला से लदल ट्रक जादे गुजरेली स, पुल के ऊपर से गुजरत पुरान दिन इयाद आवेला त लागेला कि ऊहे नीक दिन रहे, गाँवे पहुँचे के पहिले दूर शहर के कालिज के पनिहार हमसभनी के क्लेश- कल्मष घुल जात रहे, मन निखर आवत रहे। सॉपिन नदी आ सुन्दर नदी के बीच पसरल बसल बा ई गाँव- पथरगामा विश्व के सबसे पुरान पर्वत श्रृंखला से मण्डलित एह इलकवे के क्षितिज हमरा मस्तिष्क-प्रदेश में फैलल बा, दिशा-ज्ञान देत, केहू जब कहेला भा हम जब कहेली 'पुरुष' भा 'दक्खिन' त अपने जनपद के आकाश दिशा मनआँखान के सोझा खुल-खिल उठेले, जेकरा पिछवाई के रूप में हरमेस कवनो धुंधराइल पहाड़-आकृति होखेले, आज से करीब सत्तर करोड़ बरिस पहिले, पृथ्वी के पहिल भूगर्भीय हलचल में- जेकरा के पश्चिमी भू-विज्ञानी लोग चर्नियन हलचल कहेला पृथ्वी से बहिराइल 'मैग्मा' के संपुंजित आकारे प्रकार झारखण्ड क्षेत्र के पहाड़ी हुई स। अब इहाँ के जमीन में भूकम्प के अनेसा ना थरथराय, जमीन सख्त होके अविचल बन गइल बिया जेकरा के विद्वान लोग कहेला 'टेराफर्मा'- असही मिजाज बनल बा इहाँ के आदिवासी आ अनादिवासी लोगन के- अहथिर, शांत आ धीरजधर हैं, त हम कहत रहीं कि एइजा अबहूँ आकाश के अध्यक्षता करेला कवनो पहाड़ी, कवनो बहुमंजिला बिल्डिंग ना, हालांकि पक्का के दुमंजिला- तिमंजिला मकान बन गइल बाड़े स अनेकानेक बौना, चीपट, समय-प्रवाह से घिस गइल ए पहाड़ियन के कनकन में कतना स्मृति भरल बा ई बूढ़ पहाड़ सब जेकरा आगे सात करोड़ बरिस के उमिर वाला हिमालय बच्चा बुत भर ह! बहरहाल, प्रकृति के अनुपम धरोहर संथाल परगना, छोटानागपुर के ए समय- सिद्ध पहाड़न पर ठेकेदारन के लोभदंत गइल बा, जेने-तेने क्रशर के गुगुआहट गूँजत रहेला, खण्ड-खण्ड होके बोल्डर आ चिप्स में बदलत जा रहल बा ई पहाड़ लोग, जिनकर पाँख अपना वज्र से इन्द्र पहिलहीं काट देले रहन, उनुकर अस्थि-मांस-मज्जा के लूट-खसोट मचल बा, झारखण्ड के पहाड़ के अरण्य रोदन सुनेवाला केहू नइखे। पहाड़ के दुख-दर्द के सुनवइया के होई, जबकि जनता के दुख-दर्द के पहाड़ नौकरशाहन के नइखे लउकत, अर्जुन के चिरईंया के आँखि लेखा उनुकर ध्यान बन्हल बा कमीशन से रिश्वत से नेता लोग मुँहदुब्बर बा आ जे मुँहजब्बर बा ओकरा मुँह में माल भरल बा, बोले के कोशिश कहला प गोंगों निकलेला काल्हु के झारखण्ड अलग राज्य बन जाय त का होई, ए इलाका के भाग्य बदली कि ओही कुछ लोगन के जिनिकर भाग्य अइसहूँ बुझाता कि बरियार वा काल्ह के जे होखे, आज त 'ललमटिया' कलमटिया हो गइल बा । जसीडीह टेसन ओर से ना जा के पीरपैंती ओर से केहू पथरगामा जाय त ललमटिया पड़ी आँख में अंजन अस लागि जाई इहाँ के नामानुरूप भुँइरंग ओ ललमटिया में उत्तम श्रेणी के कोइला के खदान निकलल, अब ऊ एशिया के सबसे बड़ कोइला खदानन में गिनाला, जेने देखों तेने लाम गरदन आ ओकरो से लाम बाँह वाला, जिराफन के हेठावत मशीन सब एने से ओने घूमत आ महापेटू ट्रकसब लदल- फदल बीड़ियात हैं, कोइला के घूर से ललमटिया अब कलमटिया हो गइल। नीके भइल । बाकिर ए महादृश्य के विष्कंभक में कतना विष बा! कोइला क्षेत्र के नौकरशाहन के आखि बचा के कि उनहन के मिली भगत से उछाँड़ में अवैध उत्खनन चलत रहेला, तस्करी के वाहन ह साइकिल, देखल जा सकेला दूनो ओर बोरन में कोइला के दुर्वह भार लदले, साइकिल के पक्की सड़क के आखिरी छोर प सघले, अपने बाँया अलंग कच्ची प चलत, रीढ़ के पैंतालीस डिग्री के कोण प निहुरवले, हैण्डिल पकड़ले, फी थाना दू रुपया के दर से 'अँखमुँदाई' थमावत, करियर देह के करिखवाले लोगन के साइकिल कतार देखते मन में निराला के पंक्ति गूँजे लागेला'मानव इहाँ बैल घोड़ा है। दिन-भर, रात भर आ फेरू दिन-भर चलत रह के लोग पहुँचेला उहाँ, जहाँ ई कोइला बेच के उनहन के चूल्हा सुनुग सके, उनहनो के चुहानी के छान्ही प चुँआ के धुजा फहरा सके, भले एके बेर बस अतने। बाकिर अतने खातिर कतना... ओह! आ जो कवनो अधिकारी अरिचित परिचित होखे भा भूले-भटके कवनो हँसमुख चेहरा वाला अधिकारी मिल जाय त तनी पूछों कि 'ई सब का होता, लटकत वा कुछ त उसकदार जबाब मिली कि 'हमनी के त जानि के आँखि फेर लेनी जा, ना त ई बेरोजगार नौजवान लोग चोरी-डकैती लूट-मार करत नजर आइत, सही साँझे गाड़ी घोड़ा छेंकत, उत्पात करत आए जवाब के आगे नतमस्तक महला के अलावा अवरू कुछ कहत करत ना बनी। ताम-झाम के साथे नौकरशाहन के गाँव में चहुँपाई हमरा इयाद बा। कइसे भुलाई

ऊ अमिट घाव, जे गाँव के देहिया में लागल। जवना मैदान में गाँव के लइकासब खेलत

रहन स, गाँव के ऊ मैदान जवन बहुत बड़ नाहियो होके बचपन खातिर अपार रहे, ओकरे

में उन्हनी के खूँटा खेमा गड़ल। पता चलल कि ए मैदनवा में ब्लाक आफिस बनी,

बीडीओ-सीओ अइहें। हमनी के हाई इस्कूल में पढ़त रहीं जा, अभी गइले रहीं जा, हाई

इस्कूलवा के हमनी के 'एन. जी. हाई स्कूल' कहत रहीं जा काहेकि पूरा नाम 'नोपचन्द

घासीराम हाई स्कूल लेत लजात रहीं जा-इस्कूल के भवन बनावे में सशर्त दान सहायता

क के एगो मारवड़ी सेठ आपन पुरुखानाम के साइनबोर्ड इस्कूल के माथा प टाँग गइल

रहन जेकर भदेस के सकारते पढ़वइयन के लिलार तमतमात रहे ओ इस्कूल के आपन

कवनो मैदान ना रहे, मिडिल इस्कूल के त बलुक एगो छोटक्का मैदान रहलो रहे जे अब

वॉलीबॉल (हथकन्दुक) लायक जँचत रहे, जनमैदनवे हमनीसब के फुटबॉल मैदान रहे,

ओइजे ब्लाक आफिस उठल, हमनी के मैदान उठ गइल । उजड़ल बचपन के पनाह मिलल

गाँव के सीवान प पसरल इंगाल में जहाँ कि एकरा पहिले हमनी के साल में एक्के दिन

बटुरत रहींजा, होली के दिन कि रात होलिका जरावे आ होरहा भूँजे; ऊहे डेंगाल हमनी

के फुटबॉल के आपन केन्द्र-बिन्दु मतिन धारण कइलस मन परेला, इलाकाई प्रतियोगिता

में कप भा शिल्ड के जगहा खस्सी रहत रहे, फाइनल मैच के दिन मैदान के हाशिया प

एगो खूँटा से बन्हल खस्सी के मिंमियाहट खेलवइयन के जोश बढ़ा देते रहे, कहाँ अवरू

होई अइसन जीयत शिल्ड, हम त मांसाहारी ना रहीं, रहीं खाँटी शाकाहारी आ ता ऊपर

निखुराह, बाकिर ओ खस्सी के पगही खोल के गाँवे ले आवे के सुख से बड़ कवनो अवरू

सुख ना जनात रहे। हमनी के बचपन त खेलत-कूदत बीत गइल, बरिसन पहिलहीं गाँवे

गइला प देखलों कि अब लइकन खातिर खेले कूदे के कवनो जगहा ना बाँचल, विकास

के नाम प गाँव ओ डँगाल तक पसर गइल, गाँव के बचवन खातिर मैदान अब टेलिविजन

के चौकोर परदा-भर बँचल, तेन्दुलकर कुम्बले के चौका-

1-छक्का पर थपरी बजावत रहेला

लोग, उन्हन लोग के खेल आँख भर के; मैदान के मौत प का रोई, गाँव के भितरी गाँव

मरत जा रहल बा, देर नइखे कि कवनो कांन्वेन्टनामधारी स्कूल बोर्डधारी गुमटिया के बगल

में एक भोर अचक्के कुकुरमुत्ता मतिन एगो ब्यूटी पार्लर फूट पड़ी, ईहे बँचल बा-

ब्यूटीपार्लर, बीडियोपार्लर त कतने खुलल आ मुँदल अबकी गाँवे गइलीं त जनलीं कि

केतने बुजुर्ग आँखि मूँद लेल लोग, उन्हनलोग के घुंघुआइल पनियर आँखि ना लउकल,

मारवाड़ी बुजुर्ग त एक्को नाहीं; पता चलल कि मारवाड़ी लोग काम-धन्धा समेटि के गाँव

छोड़ के अनते जा रहल बा, मकान-दुकान बेचिके, जवन मकान नइखे बिकाइल ओकरा

भीतर अन्हरिया पख बन्द बा अमावस भरल बा ठसाठस -जवन दरवाजा खिड़की के

फाँफर से रिस निकस के गाँव के जगर-मगर आ चहल-पहल के सँवरावत रहेला, झँवरावत रहेला त का ऊपर से हरियर लहलह होइयों के गाँव भीतर से खंखड़ हो रहल बार

गउआ के जरूर कवनो भितरिया रोग धइले वा नाहीं त हर बरिस, दशहरा भा दीवाली के मोका प, गाँव में होखेवाला नाटक के सिलसिला काहे बन्द हो जाइत! 'हुण्ड' जो अभियो बाड़न, बुढ़ा गइल बाड़न बाकिर कस बल त बाँचल बा-कविराज जी के छोट भाई हुण्ड जी, जे हीरो बने खातिर भागिके बम्बई गइले बम्बई - पलट हुण्ड जी, जे लवटि के 'हम्मीर- हठ', 'वीर अइभमन्यु' आ 'जयद्रथ वध' जइसन इलाकाप्रिय नाटकन के सूत्रधार भइले, हीरो भला उनुका अलावा के होइत, वीर अभिमन्यु भा जयद्रथ के रूप में जब ऊ स्टेज प धड़ाम से गिर पड़स त तख्ता टूट जाय, उनुकर गिरलका के सीन खातिर लइकालोग हुलुक- हुलुक के देखत रहत रहे कि कब गिरिहें हुण्ड जी कि कब ए इलाका के 'टेराफर्मा' में एगो लघु भूचाल आई! हुण्ड जी पारसी थियेटर के अतिनाटकीय शैली के बेल लगइले जेकरा में धोरे सहजता के समावेश हमार पीढ़ी करे के कोशिश कइलस हालांकि हुण्ड जी के रहते ई संभव ना रहे बाकिर बस ओतने, ऊहो बेल मुरझ गइल; हुण्ड जी अभियो आपन घर के रहवासी कम आ गाँव के चौराहा के बशिन्दा जादे हवें चउरहवे उनुकर चौपाल ह-दस चुक्कड़ चाय सुडुक के आ बीस बीड़ा पान चर के बड़ा बेमन से उहाँ के घरे लवटला एक पहर रात भइला प; अब त उनुका संगे बइठ के बीतल दिन के पगुरावहूँ वाला केहू ना बाँचल, ढेर रणबांकुड़ा लोग सोझ हो गइल हुण्ड जी के चौक-शरणागति देखि के निराला जी के 'ठूंठ' मथेला वाला कविता, जेकर पहिल पंक्ति है 'ठूंठ ह ई आज' के आखिरी पंक्ति भितरा गूँजे लागेला, 'केवल वृद्ध विहग एक बइठल कुछ कर याद'। अब त गाँव में होलियो के रंग फीका हो गइल । पहिले त होरी-गवनिहारन के दल दुफाँक भइल जरूरे एकरा पीछे रजधानी पटना से चुअल-चहुँपल जातिवादी जहर होई उत्सव के धूमधाम त बढ़ गइल बाकिर ओकर भितरिया आनन्द बिला गइल। दशहरा के मेला, कोस भर दूर, बारकोप में लागत रहे- अभियो लागेला, पहाड़ी के पदतल में, जेकरा भीरी बरगद के ऊ विशाल पेड़ बा जेकरा नीचे दिनहुँ अन्हार सिमटल रहत रहे, जेकरा देने दीठ उठवते देहे डरलहर दउरि जात रहे, जोगिनी थान नाम से जनात ऊ जगह त अब प्रचारित महातम वाला एगो मन्दिरलेखा खड़ा हो गइल बा, बरगद के नीचे के अन्हरिया मिटि गइल बा, ओकरा थाला के जगह सिरमिट के चउतरा बा, एगो धर्मोद्योग चल रहल बा उहाँ, घरमडरू लोगन के भरोसे निडर मेलवा में जाय खातिर खासकर नवमी के रात बैलगाड़ी जोड़ात रहे, माई दादी लोग ओकरे में बइटस, बचवन सब गैसभरल गुब्बारा मतिन आगे-आगे ललकत चलस, पूरा जवार जुटत रहे, छर्रा के दिन औरतन के अरपल दूध के गंध में नया कपड़ा के गंध घुल-मिल जाय, लवटत बखत बैलगाड़ी के लगे से मेलासहिते पूरा भुँइदृश्य चाँदनी में मिंजाइल लउकत रहे। दशमी के दिन आदिवासी लोगन के भीड़ जुटत रहे-ठट्ठ-के-ठट्ठ - माँदल बाजे आ ओ लोग के मण्डलाकार नाच मन मोह लेवे बाकिर अब गाँव के मेलो दुआरे प चाहीं- आवत- जात पनहिया टूटता त पछिला कुछ बरिस से सेयान लोग गाँव में दशहरा के मेला जोड़े लागल, बाकिर इहाँ ओ आनन्द के परस कहाँ!

बाकिर ओ आनन्द के अभिलास बेमानी बा जे लोहार, खलिसा ऊख के दिन में बरिस-भर परिवार खेपे लायक कमाई क लेत रहे लोग, जिन्हनी के बले कोल्हवाड़ गमक उठत रहे, उन्हनी के दरवाजे कोल्हू जंग खा के धूर में बदलत जा रहल बाड़न सः त ऊ का करिहें, जो नेत्र त्रासक वेल्डिंग के धन्धा ना शुरू करिहें त, भा गुपचुप केहू-केहू कट्टा- पिस्तौल बनावे के। ओइसहीं, ऊ घोड़ा बगटुट भाग गइले जा जे भगत कहाय वाला वणिक समुदाय के दुआरे बन्हात रहे लोग; उन्हनिए प चढ़ के सुदूर देहातन में जात रहे भगत लोग, बीज खातिर धान देत रहे आ अगहन में, फसल कटला प घोड़ा प खाली बोरा लदले फेनु जात रहे, लौटेबेरिया घोड़ा लदल-फदल होत रहे; अच्छा धन्धा रहे, ईहो आ चाँदी के गहना बन्धक राखे के भी, मन्द, बलुक बन्द हो गइल। अब ऊ लोग के रोजगार जादेतर बाजार में सिमट गइल बा पथरगामा के बाजार में, जे अगल-बगल के गाँव-देहात खातिर बड़का बाजार ह, सौदा सुलुफ खातिर, चीज-बस्त खातिर, नीमक-तेल खातिर जहाँ लोग आवते रहेला, घुरिआइल तलुअन गाँव के मुख्य सड़क के दूनो ओर बनल पक्का- अधपक्का मकानन में पथरगामा के 'बाजार' घोषित करे वाला दुकान बाड़े स, जादेतर किराना के आ कपड़ा के एकरा बादो हप्ता में दू दिन हाट लागेला, ओ दू दिन अगल- बगल के गाँव- गँवाड़ा से जादेतर लोग खरीदार बन के ना, बेचनिहार बन के आवेला, साग- सब्जी के टोकनी माथे उठवले, नाज के बोरा लदले। ई हाट में एगो जैविक गन्ध होला, बाजार में जेकर परस कहाँ बाकिर तबो ई बाजार बीच के हाट ह, मउराइल मुरझाइल | आदिवासी हाट के बाते कुछ अउर है। कवनो छोटमोट पहाड़ के गोड़तारी, कुछेक गाँछ- बिरिछ के छाँह तले जुड़े वाला आदिवासी हाट! जेकर एगो किनारी पर भाँधी जरूर लागल होई - एगो, दूगो भा तीनगो भाँथी- हँसिया कचिया, खुरुपी खंती, फाल- फावड़ा-कुदाल, आ तनी दूर हट के उकडू बइठल लोगन से घिरल भाँथी। आ ओ हाट के दोसर किनारी पर मदाइन महकत एगो आनन्दक्षेत्र जरूर होई, जहाँ लबालब भरल लबनी-पर-लबनी खलियात रहेला आ ओ हाट में होइहें बइठल जुलाहाजन, गमछी लुंगी चादर के ढेर सामने लगवले- उनुकर खान्दानी बुनकरी के उपज ।

उपज शब्द उचरते हमरा मनआँखन के आगे खेतन के पसार अँक जाता, जल-भरल खेत से उठत रोपनी के गीतन के बिसरल गूँज जगे लागत बा बाबा के साथे हम खेते जात रहीं, उनुकर पिउँइया चढ़ल भा अँगुरी पकड़ले। हम बाबा के साथे लागल रहत रहीं, माँ के दूध छुटला के बादे से दुआरे शाश्वत रूप से पसरल रहे वाला बाबा के बड़का तखत प उनके साथ सूतत रहीं । बाबा हमरा के रामायण, महाभारत, पंचतंत्र के कहानी सुनावत रहस, कहानी सुने के हमरा बड़ा चाव रहे, बबो कहानी सुनावत ना थाकस उनुके सिंचाई से कथा रसिक बनल हमरा हाथे खत्री जी के चन्द्रकान्ता सन्तति लागल, ओकरा खण्डसब के फेनु- फेनु पढ़त सुरुज के अन्तिम रोशनी पकड़े खातिर हम फसल-बीच लागल मचान प चढ़ बइठत रहीं, तब बिजली ना आइल रहे, लालटेन बरत देर होत रहे, ओकर खींचातानी मचल रहत रहे, पाठ्ये पुस्तक पढ़े खातिर लालटेन मिलत रहे, 'अलाय बलाय' पढ़े खातिर नाहीं पढ़ाई के मुआमला में त हम जल्दिए बाबा के हाथ के बाहिर हो गइलों बाबा अपने जतना कर्मठ किसान रहन ओतने पढ़ाँको। उनुके करने घर में किताबन के बड़का अलमारी में चाँद, विशाल भारत, सुधा आ संसार साप्ताहिक नियन पुरान आ महत्वपूर्ण पत्रिकन के अंक रहे। ओही दिनन में घरे आके हमरा के ट्यूशन पढ़ावस जयन्ती यादव- हमार जयन्ती मास्टर, बगैर एको पइसा लेले, असल में क रिनचुकाई करत रहन, हमार बाबूजी, जे आपन किताबन प अपना नाम के बाद सगर्व 'बीए' लिखत रहन, जइसन कि ओघरी चलन रहे, उनुका के पढ़वले रहन जयन्ती मास्टर अपना नियन एक्के रहन डँगाल प गाय चरावे ले जास त गाँछ तर बइठ के बहुत मीठ वँसुरी बजावस, दूनो बखत दण्ड-बइठक लगावस, कवितो लिखस, बाद में जब हमार कविता छपे लगली स त हमरा गाँवे चहुँपे के राह जोहस, हम अभी हाथ-मुँह ना घो पाईं कि आपन कविता-कापी लेले पहुँच जास पक्का आर्यसमाजी। गाँव में साल में एक बेर आर्य समाज के जलसा होत रहे तीन-चार दिन बेतरह मनसाइन रहत रहे; प्रचार खातिर जब बैलगाड़ी चले त जयन्ती मास्टर कूदि के माइक प बइठ जास आ हरमुनिया के भाँधी सम्हारत शुरू हो जास, एकदम्मे पक्का राग, डूबि के गावस, आँखि मूदि के गाँव के अन्तिम घर बीत गइला प आँख खोलस आ कहस, 'भाइयो और बहनो... भाइयो और बहनो के जगहा बीच सड़क गुड़मुड़िआइल दू-चार गो कुक्कुर किंकियात उठs सन। बाद में योग के सनक सवार भइल त सुरुज से आँख मिलावे लगले, देर देर ले; घर के लोगन खातिर बेसम्हार हो गइले, आर्य समाज के प्रचारक बन के पंजाब गइले आ ओनिए खप गइले, एगो पोस्टकार्ड आइल कोना-फाटल, उनुकुर लड़का धावल पंजाब पहुँचले बाकिर पखेरू त उड़ गइल रहे। बहरहाल, देर ना लागल आ हमार संगी हो गइले अशोक चाचा-पट्टीदारी के चाचा, बाकिर असलन दोस्त, अंगरेजी साहित्य के विद्यार्थी, तीक्ष्णघी, पूरा चैम्बर्स डिक्शनरिए घोख गइल रहन, हमनी के प्रिय खेल कि डिक्शनरी खोल के कतहूँ से कवनो शब्द पूछल जाय, पाँच में से चार आ कबहू- कबहूँ त पाँचो के ठीक-ठीक अर्थ भाख दोहें ऊहे अशोक चाचा के संगे सौंपिन आ सुन्दर नदी के किनारे-किनारे टहरत साहित्य, खास क के अंगेरजी साहित्य, के चर्चा चलत रहत रहे हमरा मस्तिष्क के रचावट प बाबा के बाद अशोके चाचा के विधायक प्रभाव पड़ल, एही से हम आगे के कॉलेजी पढ़ाई अंगरेजी साहित्य से कइलीं। ऊ अशोक चाचा नोंह- भर प्रतिभा के उपयोग क के आजकाल्ह नौ-दस किलोमीटर दूर के जिलाशहर गोड्डा के सफलतम वकील हवे, हैं, नौह-भर प्रतिभा के उपयोग के के, बाकी पंजा-भर याकि पाँजर-

भर शेष प्रतिभा के का भइल, ई ना उनुका पता बा ना केहू के, अवरू केहू के एकर फिकिर

करे के जरूरते का बा ! जे होखे, अशोक चाचा के संगे अँगरेजी में लिखल शुरू के के

हम जल्दिए हिन्दी में कविता लिखे लगली, इयाद आवत बा कि ओही घरी उचरंत-चित्त

अशोक चाचा के कइसहूँ उनुका टेबुल प बइठवले राखे खातिर अदालते परिसर में दिन

बितावत हम एगो कविता लिखले रहीं 'गोड्डा कचहरी में जवन तभिए कवनो साहित्यिक

पत्रिका में छपल साँच पूछ त गाँव हमरा भीतर उमड़त-घुमड़त रहेला, चाहे हम कतनो

दूर रहीं, हमार गाँव जेकरा आकाश के गदबेर में बसेरन के लवटत कउआ-दल काक-

काकली से आकुल करत झाँपि लेला, कठआ-दल जिनिकर मजबूती से मुकाबला भूअर

पाँख आ पीयर चोंचवाला मैना लोगन के समूह करेला, गैंउआ के सीवान प तड़बन्ना में

ताड़कंठ में लागल लबनी में चोंच डुबा के पखेरूलोग मता जाले, हमार गाँव जेकरा चौहद्दी

पठाढ़ हाथी के रंग के पहड़वन प हमार बचपन सवारी कइले बा एही गाँव के हई

अँजोरिया, 'अँजोरिया' मथेला वाली आपन कविता के जब पिछला बेर गाँवे सुनवलों त

माँ-मइया सहित्ते अँजोरियो के आँख अँसुअन के कटोरा बन गइल, तब रोअल भुला चुकल

हमरो आँख कसमसाय लागल।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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