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पकड़ी के पेड़

1 November 2023

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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भारी पेड़ नरम नरम छाल वाला पतवन गहबह ओकरे नीचे खड़ा होके ऊपर देखले पर आसमान नाहीं देखाई पड़े। मोट मोट बाँह वाला चिरइन आ बटोहिन के छाँह देवे वाला। गर्मिन में गाँव के लोग ओकरे छाँहे बडठि के सुरती मलें, बोलें बतियावें अपने घर-गिरहस्ती के काम करें। पेड़ नाही हऊ, हमरे गाँव के पहिचान ह। दूरे से लोग बतावेलें, ऊ जवन पकड़ के पेड़ लउकत बा, ऊहे गाँव ह भेड़िहारी हमनी के आँख एतना आदी हो गइलि बा कि लमही से वोह पेड़ के देखि के मन निश्चिंत हो जाला कि अपने गाँवे पहुँचि गइलीं। बचपन में जब हम बाहर से आई आ अगली बगली ऊँखी के खेतन के बीच संझा के समय मन डर से धुकपुकाये लगे त दूर से ए पाकड़ के देखि के वैसहाँ बल मालुम होखे जइसे तकलीफ में कुछ लोगन के हनुमान चालीसा पढ़ले पर मालुम होला । येह पाकड़ि के डारिन पर चिरई चीं-चीं, चूं चूं, काँव-काँव करें, लें-झगड़ें, बानर उछलें कूदें। ई सगरो गाँव के एयरकंडीशन बइठका रहे लोग गरमी के दुपहरिया येही तरे काटें। येही के सोरी पर हमार बाबा बइठत रहें आ बाबूजी यहीजा बइठिके मजूरन के मजूरी के हिसाब-किताब करें। येही जा हमार खरिहान रहल आ येही जा आधा गाँव के देवरी होखे। राति राति भर विदेसिया नाच होखे येही के तरे लरिकाई में कई बेर चमारन आ कहारन के नाच हम येही जा देखलीं । बिरहा - फरउदी सुनलीं। बटोहिया आ विदापति, राजा भरथरी आ रानी पिंगला के गीत येही जा सुनलीं। एकरे नीचे एगो अखाड़ा रहल जवना में गाँव के रेखयाउठान लोग कुस्ती लड़ें। हमहूँ लड़ले बानी एह अखाड़ा में नागपंचमी के दिने लइके चिक्का कबड्डी येही जा खेलत रहें। राति में जब डाकुन के हल्ला होखें त गाँव के लोग येही जा जुटत रहें। गाँव भर के बराति येही जा टिके। हमके लगता कि ऊ गाँव अभागा होलें जहवाँ अइसन पेड़ नाहीं होलें। बिना बारे के कपार जइसन आ बिना समधी के बराति जइसन ।

येही पेड़े के छाँहे हम देखले बाटी गरीबी, अंधविश्वास, सड़ल-गलल, धूरि गर्दा में सनल गाँव के मन। अपने में लड़त-गड़त, सिर फुटौवल करत, मेहरारुन के झोटा- झोटॉवल करत, हाथ चमका-चमका के एक दूसरे के गरियावत। जादू, टोना, आ पंचाइत में फरिओता करत पुलिस वाले येही पेड़े के नीचे गाँव के अदिमिन के बइठा के पिटाई करें, रुपया असूलें। पटवारिन के बस्ता येही के नीचे खुले आ बन्द होखे। लगान असूली में गाँव के लोग यही जा बइठावल जां। ई पाकड़ के पेड़ हमरे गाँव के लमहर सुख-दुख के इतिहास के गवाह ह ई अपने आँखो से देखले बा हमरे गाँव के विदाई आ विछोह गवना में लड़किनि के डोली येही के नीचे रुकति रहे- 'तनि एक डोलिया बिलमाउ रे कहरवा'। हमरे माई के आखिरी जात्रा के डोली येही के नीचे रुकलि रहल 'अँगना तो परवत भयो, देहरी भयो विदेश ले बाबुल घर आपनो, मैं तो चली पिया के देश । बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय।..।'

येह गाँव में हमरे बाबा के बाबा आइल रहलन अपने एकलौते बेटा आ मेहरारू के साथे ई कोई सवा सौ बरिस पहिले के बात होई। ओकरे पहिले हमार पूर्वज कहाँ- कहाँ, केतना केतना दिन रहलें, येकर हिसाब हमरे लगे ना बा हम त येहीजा जनमलीं आ येही के जानत बानी ये ही गाँव के माटी, पानी, धूप हवा में बनल बानी हम |

गोरखपुर शहर के उत्तर-पूरब कोन पर पैंसठ किलोमीटर के दूरी पर बसल ई गाँव ह 'भेड़िहारी' जवने के कागज में नाव ह रयपुर भैंसही' येकरे उत्तर में नेपाल के सीमा ह, पूरूष में बिहार के आ पच्छिम में गोरखपुर जिला (अब महराजगंज जिला) के अपने येही भूगोल के चलते ई. गाँव के कई बेर जिलाबदल होत रहल बा। आजादी के पहिले ई गाँव गोरखपुर जिला में रहल, उन्नीस सौ अड़तालीस में देउरिया जिला में चलि गयल आ उन्नीस सौ चौरानवे में कुशीनगर जिला में। 1

जइसे जोगी लोग 'पिण्ड में ब्रह्माण्ड' के दरसन के लेलें ओइसहीं येह गाँव में पूरा देश के दरसन कइल जा सकेला जवन सच्चाई हम इहाँ देखलीं ऊहे पूरे देश के सच्चाई ह। ओसे खराबो कुछु नाहीं आ ओसे अच्छो कुछु नाहीं। घर-परिवार के झगड़ा, खेत- मेंड़ के रगड़ा, मारपीट, भूख-बिमारी, शोषण अत्याचार, प्रेम-लगाव, परब-तिठहार, जादू-टोना, ढोंग-पाखण्ड, सुन्दर कुरूप सब कुछ।

हमारे गाँव के एक किलोमीटर पच्छिम एक नदी बहेले जेके गाँव वाले 'नदी' कहेलें। बड़हन भइले पर हमके मालूम भइल कि ई छोटी गंडक नदी है। एमें बारहो महीना पानी रहेला। हमरे बचपन में ई नदी बरसात में विकराल रूप ले ले आ आस-पास के गाँवन में तबाही मचा दे। ई नदी हमरे गाँव के महतारियो रहे आ डाइनियो। बिना येह नदी के पार कइले हमार गाँव बाकी दुनिया से जुड़ ना सकेला। हम रोज येह नदी के नाव से पार कके पढ़े जात रहलीं। कई बार हमार नाव धार में बहलि रहे। भँवर में फँसलि रहे। भगवाने बचवलें । आज सोचला पर अचरज होता कि कइसे तब डेंगी नाव पर खड़ा होके येह नदी के पार करीं जबकि पौरे के बित्तासो भरि आजु तक नाहीं जनलीं। नदी के किनारे बसले के कारण हमरे गाँव में एक चउथाई मलाह बाड़ें। रोज सबेरे कान्हे पर जालि आ हाथे में झोली लेहले नदी के ओर जात आ साँझ के जालि में मछली फँसवले लौटत मलाहन के चित्र हमरे मन में आजुओ ओइसही ताजा बा । राति भर नदी किनारे निचाट में रहे वाले मलाहने से हम बचपन में भूत-प्रेत आ बुडुअन के कहानी सुनले रहलीं।

हमरे गाँव में एक चउथाई मुसलमान बाड़ें। जब तक हम शहर नाहीं आइल रहली आ अखबारन से भेंट मुलाकात नाहीं भइल रहे तब तक हम हिन्दू-मुसलमान के कौनो फरक नाहीं समुझत रहलीं। एक्के बोली एक्के पहिरावा, एक्के खान-पान आ दूनो के जिनगी के समस्या एक्के। छोट मोट फरक जरूर रहे। पर तब हमके ऊ देखाई ना दे। हमरे इहाँ मुसलमानन के सबसे बड़का तिउहार रहे मुहर्रम, जौना में हिन्दुओ ओतने जोश से भाग लें। हिन्दुओं अपने घरन में तजिया रखें आ ओकर मनोती मानें हिन्दू-मुसलमान दूनो लड़के 'थकरी' खेलें आ ई नाच-गान आधी आधी राति ले चले। हमहूँ येमें शामिल रहीं। जहिया तजिया निकले वोह दिन नदी किनारे मेला लागे येह दिन के हमन के साल भरि अगोरत रहीं। केतना खुशी के दिन रहे ऊ! अब त एतना खुशी कौनो दिने ना होला । न एतना बेचैन होके कौनो एक दिन के अगोराई होला। जौने दिने भोर में तजिया निकले ओकरे पहिले वाली राति हम दियासलाई, मोमबत्ती, फुलझड़ी आ पटाखा अपने खटिया पर सिरान्हे रखि के सूतों, कि भोर में येके खोजे के न पड़े। गाँव के सब तजिया हमरे दुआरे पर रखल जा। जइसही तजिया दुआरे पर आवे हमार बाबा आ बाबूजी अपने अपने खटिया से नीचे उतरि के जमीनी पर बैठि जाँ चाहे खड़ा हो जाँ। हमरे घर के मेहरारूओ घर के दुआरे के केवाड़ी से झाँकि - झाँक के तजिया के हाथ जोरें। हम भाई बहिन फुलझड़ी छोड़ें, पटाखा फोड़ें आ तजिया के घुमरी लगावें। हम ते लाने लामे दुसरे गाँवन ले पायकन (तजिया के चारों ओर घूमे वाले रखवार) के साथे तजिया देखे जाई अब ई सब एक सपना बुझाता । समय बदलि गइल। आजादी के बाद के राजनीति हिन्दू-मुसलमान के बीच खाई खोदि देहलसि । शहर गाँव में पहुँच गइल । दू सम्प्रदाय बनि गइलें। अरब के पइसा से गाँव- गाँव महजिदि बनि गइल । मुसलमान लइकन खातिर अलगे मदरसा खुलि गइल। गाँव- गाँव मुल्ला मौलबी पहुँचि गइलें । येह बदलाव के जिम्मेदार हमरे देश के नेता लोग हवन जेके येही में फायदा बा। उनके कुरसी येही बँटवारा से बचल रही। येह घिनौना काम में सब दल के नेता लोग लागल बा हमरे गाँव में ई आजादी के बादि के सबसे बड़हन आ सबसे खराब बदलाव भइल बा।

गरीबी, निरक्षरता आ उपेक्षा के अन्हरिया में डूबल बा हमार गाँव इहाँ जाड़ा में अब्बो कुछ लोग नंगे रहेलें। कपड़ा नाहीं, बिस्तरा नहीं, ओढ़ना नाहीं दवाई के पइसा नाहीं । खाये के भरिपेट खाना नाहीं । केहू के पुलिस फँसले बा, केहू कर्जा से दबाइल बा, केहू के लेखपाल चक्कर में डरले बाने केहू के भाई से झगड़ा बा, केहू के बापे से केहू के अपने मेहरारू से इहाँ के समस्या गनले मान के नाहीं बा। थाना पन्द्रह किलोमीटर पर बा। तहसील 25 किलमोमीटर पर बजार 8 किलोमीटर पर टेलीफून, पोस्ट आफिस- कौनो सुविधा नाहीं सड़कियो कच्चा । लड़िका-लड़की के स्कूल भेजें त का पहिनाके ? घरे त नंगहूँ रहि लीहें आ स्कूल जाये लगिहें त पेट पर्दा कइसे चली? ई एक दूसर दुनिया बा परती जमीन जरूर टूटल पर मन में परती ओइसहीं बा। ऊहे रूढ़ि, अंधविश्वास आ सड़ल-गलल दिमाग । समय बदलला के साथ कुछ बदलाव जरूर भइल बा, कुछ नहर, पुल-पुलिया आ सड़कियो बनि गइल बा, कुछु घरन में खाये पिये के भी हो गइल बा । कुछु लड़िका-लड़की स्कूलो जाये लागल बाड़े बेकिन यह बदलाव के रफ्तार बहुत मद्धिम बा। यह गति से त अबहिन सैकड़न बरिस लगि जाई तब ले दुनिया न जाने कहाँ पहुँचि जाई। हमरे देश के नेता गांधी महतमा गाँवन के उद्धार के सपना देखत रहलन। ऊ गाँव के स्वतंत्र आ आत्मनिर्भर बनावे के चाहत रहलन। ऊ चाहत रहलन कि गाँव में राजकाज पहुँच जाय आ गाँव सब तरह से अपने गोड़े पर खड़ा हो जाय। लेकिन गांधी महतमा के सपना पूरा ना भइल। गांधी जी के अंतिम आदमी आजुओ गाँव में आजादी के बाट जोहता ।

जब हम पढ़त रहली त ईहे सोचीं कि पढ़ि-लिख के गँउवे में बसब आ गाँव के आदर्श गाँव बनाइब विद्यार्थी जीवन में कुछु दिन हम राजनीतिक नेतो लोगन के साधे रहली आ अपने गाँव खातिर कई जोजना बनवलों, एक दू ठो कइलीं भी। लेकिन अंत में हमहूँ. अपने गाँवे के साथ धोखा कइलीं जइसे सब लोग करेला नोकरी खातिर जब शहर अइलीं ते शहर हमहूके घोंटि लेहलसि । लिखला पढ़ला में लगि गइलीं आ गाँव छूटि गइल। छूटि त गइल लेकिन भुलाइल नाहीं। अजुओ जब हम सपना देखीलें त ओमें उहे खेत खलिहान, बगीचा, पेड़-पालो, जानवर, चिरई -चुरुंग रहेला जौने के बचपन में देखले रहलीं । दुपहरिया में तपत सिवान, जाड़ा में कउड़ा के घेरि के बइठल लोग, सावन भादो के टिप टिप लइकन के बहत नाक, बूढ़न के झुकल करिआँव, लड़किन के डेराइल डेराइल आँखि, सुनगत चूल्हा, ऊपर उठत घूँआ...। केतना केतना गिनाई। हमरे जिनगी में जवन कुछु बाटे ऊ सब हमरे गाँवे से मिलल बा। अगर हमार गाँव निकालि दीहल जा त हमरे भीतर कुछु ना रहि जाई।

हम जवन कुछु अच्छा खराब लिखले बानी ओहू में से गाँव के निकालि दीहल जा त ओह में कुछु नाहीं रहि जाई। हमार माई जवन किस्सा-कहानी सुनावे आ हमके खेलावे वाले गाँव के लोगो जवन कुछ सुनावें ओमें करुणा बहुत रहल। सुनिसुनि के हमन के रोवें लागीं । ऊ लगाव अब बहुत कम हो गइल बा। लेकिन जबले तनिको रही तबले हमरे भीतर गाँवो रही। अब त गँठओ के मन बदलत जाता, तब्बो शहर से त ठीके बा मुनाफा कमइले के एतना हबिस अबहिन गाँव के मन में नाहीं घुसल बा गाँव के मन में अबहिन आदमिन से, पशु-पच्छी से, पेड़-पालो से लगावो बचल बा ई बचल रही त हमरे गाँवे के साथ हमरे देश के संस्कृतियो बचल रहि जाई। गांधी जी पच्छिम क मशीन के सभ्यता के शैतानी सभ्यता कहत रहलन। ऊ शैतान हमरे देश के शहरन के घोटि गइल बा अब गाँवनों के लीले के तइयार बा भगवान हमरे गाँव के रच्छा करें।

जब हम बहुत छोट रहली आ उत्तर के आसमान में जब बिजुरी चमके त हमार माई कहे कि ई पहाड़ पर मिरगा लोग चरत बा आ वोही लोगन के आँखि चमकत बा। अजुओ जब उत्तर के असमान में बिजुरी चमकेले त हमरे भीतर पाँखि जागि जाला आ हम उड़ि के घुसि जाली वोह क्षितिज के भीतर जहाँ एक नहीं बा, कुछ खेत, कुछु हरियरी, कुछ पेड़, कुछ बाँसन के कोठि, कुछ मरद मेहरारुन के चेहरा वा जहाँ हम जनमल रहल आ जीने के लोग हमार गाँव कहेला।

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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3 November 2023
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एगो किताब पढ़ल जाला

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