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पूरबा गात

3 January 2024

3 देखल गइल 3

( १ )

मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।।

दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।।

भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।।

मोरा दूनो भैया० 11

अवध नगरिया से गइले, निपटे सपनवा भइले ना, मेरा राम दूनो भइया से बनवां गइले ना ॥ २ ॥

मोरा दूनो भैया० 11

सुरुजा के किरिनि लगले लाल कुम्भि लाइल होइ हैं, जागल होइहें ना मोरा राम दूनो भैया जागल होइहें ना ।। ३ ॥

मोरा दूनो भैया० ।।

सूतल होइहें छवना वे बिछवना दूनो भइया से थाकल होइहे ना मोरा बनवा के तपसिया से बनवा गइले ना ॥४॥

कहत महेन्दर रोअति माता कोसिला रानी से अजहू अइलेन ना मोरा कोखिया के बलकवा से बनवा गइले ना ।। ५ ।।

राम दूनो भैया० ।। 

कौशल्या बिलख कर कह रही हैं।-

'हे राम ! मेरे दोनों भाई बन गये ? हा राम! मेरे दोनों भाई वन गये ? वे सवेरे ही से अब तक भूखे होंगे। चलते-चलते उनके पैर दुख गये होंगे। हा। राम के दोनों ओंठ भूख प्यास और यकथे से सूखे होंगे' ॥१॥

'मेरे लाल सूर्य किरणों के लगने से हाय, कुम्हला गये होंगे। हा, अब वे उठे होंगे ? दोनों भाई सोकर उठे होंगे ?' ॥३॥

'वे दोनों बालक बिना बिछावन के कहीं रात में सो लिये होंगे। हा, वे दोनों भाई अब थक गये होंगे। वे वन के दोनों तपसो अब थक गये होंगे ? वे वन चले गये' ।।४।।

'महेन्द्र कहते हैं कि कौशल्या रानी रोती हैं और कहती हैं- अरे ! आज भी मेरी कोख के दोनों पुत्र जो एक दिन में लौटने को कहकर बन गये थे, नहींलांटे' ॥५॥

क्या मा कौशल्या का यह विलाप पाठक के हृदय को अधिक नहीं तो उतनी ही तीव्रता से नहीं मथ देता, जितनी तीव्रता से 'तुलसी' हरिऔध' और 'सूर' को 'कौशल्या' और 'यशोदा' के विलाप को सुनकर वे आई हो जाते हैं? पाठक ! विचारें और समझें। कवि भाव को छोड़कर रस से हटकर क्षणमात्र भी दूसरी ओर नहीं गया। यही खूबी है। करुणा कौशल्या के कंठ में पेठकर स्वतः आ रही है। पुत्र को ममता रखनेवाली हमारो सीधी- सादी माताओं की विचारधारा ठीक इसी रूप में बहती है।

(२)

हे रघुनन्दन असुर निकन्दन कब लेवो मोर खबरिया राम । रवना हरले हमें लिहले जाला नगरिया लंका राम । रथवा चढ़ाई अकास उड़वले सूझत नाहीं डगरिया राम ।। १ ।। जनकपुर नगर नइहर छूटेले छूटले अवध नगरिया राम । ससुरा के सुख कुछऊ ना जनलों हो गइलों वन के अहेरिया राम ॥ २ ॥ जनक राय अस वपवा हमरो पुरुष राम धनु घरिया राम । हाय रघुनन्दन असुर निकन्दन कब लेब मोर खबरिया राम ।। ३ ।। 

'हे असुर निकन्दन, मेरी खबर कब लोगे। मुझे रावण हर कर लंका नगरी लिये जा रहा है। रथ पर चढ़कर आकाश में रथ उड़ा भागा। मुझे कोई भी पय नहीं दिखाई दे रहा है ।।१।।

'मेरा मायका जनकपुर छूट गया और छूट गई अयोध्या नगरी भी। मैंने ससुराल का सुख कुछ नहीं जाना। केवल वन का शिकार बन गई ॥२॥

'मेरे जनक राजा ऐसे पिता हैं। और धनुषधारी राम ऐसे पुरुष हैं। पर हाय, असुरों को संहारनेवाले राम ! तुम मेरो खबर कब लोगे।'

( ३ )

हमरा से छोटी छोटी भइली लरकोरिया से हाय रे सवलियो लाल,

हमरी वयसवा वीतल जाय ॥ १ ॥ से हाय रे० ॥ बाबा निरमोहिया गवनवा ना दोहले, से हाय रे सॅबलियो लाल, बिरहा सहल न जाय ॥ २ ॥ से हाय रे० ।। वाट के बटोहिङ्ग रामा, तूही मोरा भइया, से हाय रे सँवलियो लाल, हरी से सनेसवा कहिओ जाय ।। ३ ।। से हाय रे० ।। आधी आधी रतिया, रामा बोलेला पपीहरा, से हाय रे सॅवलियो लाल, कोइलरि के बोलिया ना सोहाय ।। ४ ।। से हाय रे० ।। अइसने समैया राजा सुधि विसरवले, से हाय रे सॅवलियो लाल,

रहि रहि जिया घबराय ।। ५ ।। से हाय रे० ।। कहत महेन्दर कागा उचरहु अंगनवाँ से हाय रे संवलियो लाल, कवले कन्हइया मिलिहें आय ।। ६ ।। से हाय रे ।।

'विरहिणी मायके बैठी-बैठी वसन्त ऋतु में ससुराल की चिन्ता कर रही है।'

'हम से छोटो अवस्था वाली लरकोरी (पुत्रवतो) हो गई, हाय रे सर्वेलिया लाल ! पर मेरी उमर ऐसी ही बोती चली जा रही है ॥१॥ 

मेरे निरमोही पिता ने (दूसरा पाठ है बाबा हाठ कइले बाबा ने हठ किया) मेरा गवन नहीं किये। सो हाय रे संवलिया लाल ! मुझसे यह विरह नहीं सहा जाता' ॥२॥

'हे मार्ग से चलनेवाले पथिक ! तुम्हीं मेरे भाई हो। हाय रे संवलिया लाल! तुम मेर। सन्देसा मेरे ही हरी से जाकर कहना कि आधी आधी रात यहाँ पपीहा बोलता है, और हाय संवलिया लाल। तुम ध्यान नहीं देते। उस पर कोयल को यह बोलो और नहीं सही जाती है। हाय रे संवलिया लाल, तुम ध्यान क्यों नहीं देते ? सो ऐसे वसन्त ऋतु के समय में मेरे राजा ने मेरी सुधि विसरा दो है। मेरा हृदय रह-रहकर घहर उठता है- दुःख से गरज उठता है। हाय रे संर्वालिया ! ध्यान क्यों नहीं देते ?' ॥ ३,४,५॥

'महेन्द्र कहते हैं कि विरहिणो काग को सम्बोधित करके कह रही है कि हे काग ! तुम मेरे आँगन में उचरो (बोलो) तो। मेरे कन्हैया कब तक मुझसे आ मिलेंगे।' ॥६॥

विरहिणो का कितना जोता-जागता स्वाभाविक हृदय उद्गार है। जब पुरवी राग में पंचम स्वर में पानी वरसते समय यह गाया जाता है, तो सुनने वाले का हृदय एक बार तो अवश्य हिल उठता है।

'महेन्द्र' मिश्र छपरा जिले के मिश्रवलिया प्राम, पोष्ट जलालपुर के निवासी हैं। आपको जाली नोट बनाने के अपराध में एक बार सजा हो गयी थी। आपके रचे अनेक गीत छपरा शाहाबाद, और गोरखपुर, गया, बलिया आदि जिलों में गाये जाते हैं। आप आज भी जोवित हैं। रचना करते हैं कि नहीं ज्ञात नहीं; पर आप हैं बड़े रसिक। आपको कई पुस्तकें भी प्रकाशित हुई थीं। प्रस्तुत गीत उनके प्रकाशित 'महेन्द्र मंगल' (प्रयम भाग) से संकलित है। विहात में रंडियाँ तो प्रायः उन्हीं के गीत कुछ दिनों तक गाती रही थीं।

( ४ )

कुछु दिना नैहरा खेलहू ना पवलीं हो बाला जोरी से, सैया मागे ला गवनवा हा बाला जोरी से ॥ १ ॥ 

बभना निगोरा मोरा बाड़ा दुख देला हो बाला जोरी से, धरेला सगुनवा हो बाला जोरी से ॥ २ ॥

लाली लाली डोलिया रे सयुजी ओहरवा हो बाला जोरी से, सैयाँ से आवे अॅगनवा हो बाला जोरी से ।। ३ ।।

नाहीं मोरा लूर ढंग एको गहनवा हो बाला जोरी से, संयाँ देखि हे जोवनवा हो बाला जोरो से ॥ ४ ॥

मिलि लेहु मिलि लेहु संग सहेलिया हो बाला जोरी से, फेरूँ होइहें ना मिलनवां हो बाला जोरी से ॥ ५॥

कहत 'महेन्द्र' कोई माने ना कहनवा हो बाला जोरी से, सैयाँ ले चलले गवनवा हो बाला जोरी से ।। ६ ।।

इस गीत का अर्थ ईश्वर-पक्ष और श्रृंगार दोनों में लगाया जा सकता है ईश्वर-पक्ष बहुत सुन्दर उतरता है।

'मैं कुछ दिन नहर में खलने भी न पाई कि संयाँ बरजोरों से मेरा गवना करने को कहने लगे। हाय बरजोरी गवना माँगने लगे।' ।१।।

'निगोड़ा ब्राह्मण मुझे बड़ा दुःख देता है। वह बलपूर्वक मेरे गवन का सगुन रखता है। हाय मेरे गवन की साइत बरजोरों से धरता है' ॥२॥

'लाल लाल डोली है। उस पर सब्ज रंग का ओहार लगा है। बर- जोरी से संयाँ मेरे आँगन में लाकर रखता है। हाय! बलपूर्वक वह डोली मेरे आँगन में रखता है' ॥३॥

'मेरे पास न कोई लूर ढंग है, किसी का न ज्ञान है न रहन सहन की तमीज ही है और न कोई आभूषण ही मेरे पास हैं। हाय बरजोरी से (वल पूर्वक) संयाँ मेरे जोबनों को देखगा। हाय बलपूर्वक सैयाँ मेरे जोबनों को निरखेगा' ।।४।।

'हे संग की सहेलो ! तुम सब मुझसे मिल लो। तुम सब किसी तरह मुझसे मिल लो। अब मेरा फिर यहाँ आना नहीं होगा। हाय बलपूर्वक मैं जा रही हूँ, मैं फिर यहाँ नहीं आऊंगी' ॥५॥ 

महेन्द्र कहते हैं कि विरहिगी यह कहती चली हो गई कि मेरा कहना कोई नहीं मानता। बलपूर्वक संाँ मेरा गवना करके ले चले। कोई मेरा कहा नहीं सुनता, नहीं सुनता। संयाँ बरजोरी से मुझे ले ही चले' ॥६॥

कितना सरस और ज्ञानमय यह गीत है। भक्त और रसिया दोनों इसको एक समान गा-गाकर और ईश्वर तथा प्रेयसी के प्रति अपने-अपने स्वभावानुसार अर्थ लगाकर अपनी-अपनी उमंगों में डूबने-उत्तराने लगते हैं। महेन्द्र मिश्रजी को अधिकांश रचनाएँ ऐसी ही सरस हैं। पर खेद है कि किसी गुगग्राही ने उनको पुस्तकाकार रूप में आज तक एक जगह एकत्र नहीं किया। बिहार की कितनी निधियाँ इसी तरह रोशनी में आये बिना ही नष्ट हो गयीं, यही सबसे बड़े खेद की बात है। हिंदी-लेखकों के अग्रज इस ओर ध्यान दें, प्रकाशक समझें कि जिस मातृभाषा को दी हुई रोटी उन्हें मिलती है, उसके सपूतों को इस तरह अजाने मर जाने का सबसे बड़ा दायित्व उन्हीं पर है। माधुरी ने 'पढ़ीस' अंक निकाल कर 'पढ़ीस' को हिदी-संसार के सामने ला दिया है। अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, मैथिली, नागरी आदि के संकड़ों 'पढ़ीस' न जाने कब और कहाँ मर मिटे ।

(

५ )

आरे मोरा दूनो रे बलकवा आजु बनवा गइले ना। आजु बनवा० ॥ कोसिला सुमितरा रानी झेंखेली अगनवा कि सुनवा भइले ना मोरा कंचन के अगनवा कि सुनवा भइले ना ॥१॥ आजु बनवा० ॥ 'जनक कुमारी सीता अति सुकुमारी हो की सँगवा गइली ना तजि के अवध नगरिया कि संगवा गइली ना ॥२॥ आज बनवा० ।। कठिन कठोर केकई लेलू बरदनवा की दुलमवा भइले ना हमरा राजा जिअनवा कि दुलमवा भइले ना ।।३।। आजु बनवा० ।।

'अरे ! मेरे दोनों बालक आज बन गये। कौशल्या और सुमित्रा रानी झंख रही हैं और कह रही हैं कि हमारा सोने का आगन आज सूना हो गया' ॥१॥ 

जनक कन्या सोताजी अति सुकुमारी हैं, वह भी उनके संग अवध नगरी त्याग कर चली गयीं। हाय आज मेरे दोनों बालक बन चले गये' ॥२॥ 'अरी कंकेवो! तुम कितनो कठोर हो। तुमने ऐसा वरदान लिया कि हमारे पति का जोना असम्भव हो गया। हाय! आज हमारे दोनों बालक बन चले गये' ॥३॥

(६)

आरे मोरा बंसीवाला कान्हा मधुबनवां गइले ना । मोरा सांवली सुरतिया भुलाई रे दीहले ना ॥ १ ॥ ओही मधुवनवा में कूबरी सवतिया लोभाई रे गइले ना । ओही कूवरी के सँगवा लोभाई गइले ना ॥ २ ॥

ओही मधुबनवा से उधोजी लवटले, से लेइरे अइले ना । मोरा जोगिया के पतिया ॥ ३ ॥ मोरा बसी वाला० ।। 'अरे मेरे बंशी वाले कान्ह मधुबन गये। वे हमारी साँवली सूरति को भूल गये ॥१॥

'उसी मधुवन में कुबरी सौत रहती है। वे कान्ह उसो कूबरी के ऊपर

लुभा गये । अरे वे उसी कूबरी पर लुभा गये' ॥२॥

'उसो मधुबन से उधोजो आये हैं। वहीं मेरे योगी का पत्र ले आाये हैं' ॥३॥

'मेरे बंशो वाले कान्ह मधुबन गये।'

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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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भोजपुरी भाषा का विस्तार

15 December 2023
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भोजपुरी भाषा के विस्तार और सीमा के सम्बन्ध में सर जी० ए० ग्रिअरसन ने बहुत वैज्ञानिक और सप्रमाण अन्वेषण किया है। अपनी 'लिगुइस्टिक सर्वे आफ इण्डिया' जिल्द ५, भाग २, पृष्ठ ४४, संस्करण १९०३ कले० में उन्हो

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भोजपुरी काव्य में वीर रस

16 December 2023
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भोजपुरी में वीर रस की कविता की बहुलता है। पहले के विख्यात काव्य आल्हा, लोरिक, कुंअरसिह और अन्य राज-घरानों के पँवारा आदि तो हैं ही; पर इनके साथ बाथ हर समय सदा नये-नये गीतों, काव्यों की रचना भी होती रही

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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड

18 December 2023
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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड में गाया जाता है, जिसका संकेत भूमिका के पृष्ठों में हो चुका है- कसामीर काह छोड़े भुमानी नगर कोट काह आई हो, माँ। कसामीर को पापी राजा सेवा हमारी न जानी हो, माँ। नगर कोट

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भोजपुरी लोक गीत

18 December 2023
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३०० वर्ष पहले के भोजपुरी गीत छपरा जिले में छपरा से तोसरा स्टेशन बनारस आने वाली लाइन पर माँझी है। यह माँझी गाँव बहुत प्राचीन स्थान है। यहाँ कभी माँझी (मल्लाह) फिर क्षत्रियों का बड़ा राज्य था। जिनके को

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राग सोहर

19 December 2023
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एक त मैं पान अइसन पातरि, फूल जइसन सूनरि रे, ए ललना, भुइयाँ लोटे ले लामी केसिया, त नइयाँ वझनियाँ के हो ॥ १॥ आँगन बहइत चेरिया, त अवरू लउड़िया नु रे, ए चेरिया ! आपन वलक मों के देतू, त जिअरा जुड़इती नु हो

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राग सोहर

20 December 2023
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ललिता चन्द्रावलि अइली, यमुमती राधे अइली हो। ललना, मिलि चली ओहि पार यमुन जल भरिलाई हो ।।१।। डॅड़वा में वांधेली कछोटवा हिआ चनन हारवा हो। ललना, पंवरि के पार उतरली तिवइया एक रोवइ हो ॥२॥ किआ तोके मारेली सस

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करुण रस जतसार

22 December 2023
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जतसार गीत जाँत पीसते समय गाया जाता है। दिन रात की गृहचर्य्या से फुरसत पाकर जब वोती रात या देव वेला (ब्राह्म मुहूर्त ) में स्त्रियाँ जाँत पर आटा पीसने बैठती हैं, तव वे अपनी मनोव्यथा मानो गाकर ही भुलाना

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राग जंतसार

23 December 2023
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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भूमर

24 December 2023
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झूमर शब्व भूमना से बना। जिस गीत के गाने से मस्ती सहज हो इतने आधिक्य में गायक के मन में आ जाय कि वह झूमने लगे तो उसो लय को झूमर कहते हैं। इसी से भूमरी नाम भी निकला। समूह में जब नर-नारी ऐसे हो झूमर लय क

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26 December 2023
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खाइ गइलें हों राति मोहन दहिया ।। खाइ गइलें ० ।। छोटे छोटे गोड़वा के छोटे खरउओं, कड़से के सिकहर पा गइले हो ।। राति मोहन दहिया खाई गइले हों ।।१।। कुछु खइलें कुछु भूइआ गिरवले, कुछु मुँहवा में लपेट लिहल

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राग कहँरुआ

27 December 2023
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जब हम रहली रे लरिका गदेलवा हाय रे सजनी, पिया मागे गवनवा कि रे सजनी ॥१॥  जब हम भइलीं रे अलप वएसवा, कि हाय रे सजनी पिया गइले परदेसवा कि रे सजनी 11२॥ बरह बरसि पर ट्राजा मोर अइले, कि हाय रे सजनी, बइठे द

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भजन

27 December 2023
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ऊधव प्रसंग ( १ ) धरनी जेहो धनि विरिहिनि हो, घरइ ना धीर । बिहवल विकल बिलखि चित हो, जे दुवर सरीर ॥१॥ धरनी धीरज ना रहिहें हो, विनु बनवारि । रोअत रकत के अँसुअन हो, पंथ निहारि ॥२॥ धरनी पिया परवत पर हो,

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भजन - २५

28 December 2023
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(परम पूज्या पितामही श्रीधर्म्मराज कुंअरिजी से प्राप्त) सिवजी जे चलीं लें उतरी वनिजिया गउरा मंदिरवा बइठाइ ।। बरहों बरसि पर अइलीं महादेव गउरा से माँगी ले बिचार ॥१॥ एही करिअवा गउरा हम नाहीं मानबि सूरुज व

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बारहमासा

29 December 2023
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बारहो मास में ऋतु-प्रभाव से जैसा-जैसा मनोभाव अनुभूत होता है, उसी को जब विरहिणी ने अपने प्रियतम के प्रेम में व्याकुल होकर जिस गीत में गाया है, उसी का नाम 'बारहमासा' है। इसमें एक समान ही मात्रा होती हों

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अलचारी

30 December 2023
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'अलचारी' शब्द लाचारी का अपभ्रंश है। लाचारी का अर्थ विवशता, आजिजी है। उर्दू शायरी में आजिजो पर खूब गजलें कही गयी हैं और आज भी कही जाती हैं। वास्तव में पहले पहल भोजपुरी में अलचारी गीत का प्रयोग केवल आजि

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खेलवना

30 December 2023
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इस गीत में अधिकांश वात्सल्य प्रेम हो गाया जाता है। करुण रस के जो गोत मिले, वे उद्धत हैं। खेलवना से वास्तविक अर्थ है बच्चों के खेलते बाले गीत, पर अब इसका प्रयोग भी अलचारी को तरह अन्य भावों में भी होने

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देवी के गीत

30 December 2023
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नित्रिया के डाड़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूलो झूली ना, मैया ! गावेली गितिया की झुली झूली ना ।। सानो बहिनी गावेली गितिया कि झूली० ॥१॥ झुलत-झुलत मइया के लगलो पिसिया कि चलि भइली ना मळहोरिया अवसवा कि चलि

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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विवाह क गात

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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

3 January 2024
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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

3 January 2024
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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024
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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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