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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024

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(८)

चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।।

गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥

झिनाँ के सारी मोरा रेसम के चोलिया, गरदवा कइले ना मोरा पापो रे बलमुआ गरदवा० ।। नाहीं० ॥

अवहीं उमिरि मोरा वारी से जवनियां, जुलुमवां कइले ना गइले पिया परदेसवा जुलमवा० ।। नाहीं० ।। कहे नाय सरन पियारी हियरा धरु धिरिजवा, गजब रे कइले ना कढ़ गइले रे बहनवा ।। गजब० ।। नाहीं० ।।

(১

)

पूर्वी विहाग

(जगरनाथ कवि-कृति)

सत्याग्रह में नाम लिखाई, सइयाँ जेहल छवले जाई, रजऊ कइसे होइहें ना, ओही जेहल के कोठरिया रजऊ कइसे होइहें ना ।। टेक ।।

गोड़वा में बेड़िया हाथ पड़ली हथकड़िया, रजऊ कइसे चलिहें ना, बोझा गोड़वा में जनाई, रजऊ कइसे चलिहें ना ।।

घरवाँ त सइयाँ कुछ करते नाहीं रहलें, अटवी कइसे पिसिहें ना, भारी जेहल के चकरिया उहाँ कइसे पिसिहें ना ।।

घर के जेवनवाँ उनका नीक नाहीं लागे, उहवां कइसे खइहें ना, जव के रोटिया घास सगवा उहाँ कइसे जेइहें ना ।।

मखमल पर सुतले उनका निदिया ना आवे, उहाँ कइसे सुतिहें ना, सइयाँ कमरा के सेजरिया उहाँ कइसे सुतिहें ना ॥

जगरनाथ बुद्धू सत्याग्रह में नाम लिखइहें जेहल उनहू जइहें ना, भारतमाता के करनवाँ जेहल उनहें जइहें ना ।।

रजऊ कइसे होइहें ना, ओही जेहल के कोठरिया, रजऊ कइसे होइहे ना,

इसी तरह अनेकानेक सामयिक विषयों को लेकर भोजपुरी कवि लिखा करते हैं। उनमें रोति कवियों की तरह अपनी लेखिनी को किसी एक खास विषय (यानी शृंगार और अध्यात्म) तक ही सीमित रखने को परिपाटो नहीं है। इससे भोजपुरी कवि को विचार-स्वतन्त्रता तथा उसके विषय ग्रहण का व्यापक दृष्टिकोण प्रमाणित होता है। और नीचे के यह गीत 'पूर्वी का पीताम्बर' उर्फ 'पूर्वी भंडार नामक' प्रकाशित पुस्तिका से संगृहीत है, जो मेवालाल एण्ड कम्पनी, कचौड़ी गली बनारस द्वारा प्रकाशित है।

( १० )

गवना लिआके हमके घरे बइठाके हो छयलऊ । अपने सिधारल विदेस हो छयलऊ ।। टेक ।। जोहोला हम रहिया अइसन भइल निरमोहिया हो छयलऊ । तरसे ला जियरा हमेस हो छयलऊ ।। अपने सिघरल० ।। हमके भूलइल कवना सवतीन पर लोभइल हो छयलऊ । एको नाहीं भेजेल सनेस हो छयलऊ ! ।। अपने० ।। 

तोहरे करनवाँ रजऊ! तजबइ परनाँ हो छयलऊ । जियरा पड़ल बा अनेस हो छयलऊ ! ।। अपने० ।। मोट कइके नजरिया तेजि के गइल सेजरिया हो छयलऊ । लटिअइलें मथवा के केस हो छयलऊ ! ।। अपने ० ।। जगरनाथ बुद्ध अइसन भइलें निरमोहिया हो छयलऊ । दे गइलें कठिन कलेस हो छपलऊ ! ।। अपने० ।।

ग्रामीण विरहिणो का बड़ा सुन्दर और स्वाभाविक विलाप है। सावन की चलती पुरवाई में, जब खेत की मेड़ पर खड़ा कृषक आकाश के बादलों को देखकर अपनी प्रेयसी को बिसूर बिसूर कर अपनो हृदय व्यथा को इस गीत के द्वारा पंचम तान में अलापता है, तब सुननेवाले के मन को क्या दशा होती है, यह वहीं समझ सकता है, जिसने स्वयं उसे कभी सुना है।

पूर्वी दोहावली

( ११ )

खोजें सखियाँ सब विलखाई, पूछें ग्वालिन से हखाई । हरिजी कहाँ हो गइले ना ।। टेक ।।

दोहा

हम विरहिन के तजि के स्याम, गइलें कवनी ओर । स्याम के सूरति विसरति नाहीं, हाय ऊ गइलें छोर ।। १ ॥

कहाँ लोभाई हो गइले ना, देख गइया के चरवइया । कहां लोभाई हो गइले ना, सूनर बेंसिया के बजवइया ।। हरि जी कहवाँ हो गइले ना ।।

दोहा

मथुरा अवर विन्दावन खोजली, नाहीं मिले मुरार । विन मोहन के पड़त चैन ना, अइसन हाल हमार ॥ २ ॥ 

जाके कहाँ भुलइले ना, अइसन होकर के निरदइया । जाके कहाँ भुलइले ना। सूनर वॅसिया के वजवइया ।। हरिजी कहाँ गइले ना० ।।

दोहा

जब से प्रभु जी तजि के गइले, तब से लगत उदास । कहाँ भुलइलें अइलें नाहीं, जोहीलाँ उनके आस ।।

अवहीं नाहीं हो अइलें ना हमरे दहिया के जेंवइया । अवहीं नाहीं हो अइलें ना। सूनर बँसिया० ।।

कइली कवन तकसोर स्यामजी, गइलीं नाता तोड़ । बालेपन से प्रीति लगाके, चललीं अकेले छोड़ ।।

अवहीं नाहीं हो अइले ना, कहत जगरनाथ केंधइया । अवहीं नाहीं हो अइले ना । सूनर बँसिया० ।।

( १२ )

जबसे बलमुआ गइलें एकली पतिया ना भेजलें । पिया लोभाई गइले ना, कवनी सवतिन के सेजरिया पिया ।। लोभाई गइले ना० ।।

दोहा

जब से सइयाँ छोड़ि के गइलें, भेजले नाहीं सनेस । कामदेव तन जोर करत बा दे गइले कठिन कलेस ।। सइयाँ बेदरदी भइले ना, हमरी लिहले ना खबरिया । सइयाँ बेदरदी भइले ना ।। 

दोहा

तड़प तड़प के रहीं सेज पर, लागे भयावनि रात । जोवन जोर करत बिनु सइयाँ ई दुख सहल न जात ।। केहू विलमाई लिहलें ना गइले बँगाले नगरिया । केहू बिलमाई लिहलें ना ।।

दोहा

अपने पिया परदेस सिघरले, छाड़ि अकेले नार । पिया रमले सवतिन घर जाके, हमके दीहले बिसार ।। पिया बीसारी गइले ना बइठल जोहोला डगरिया । पिया विसारी गइले ना ।।

दोहा

दिल के अरमनवा दिल में रहि गइले, करी हम कवन उपाय । गम के रतिया कटति नाही काटे, सोचि सोचि जियरा जाय ।। पिया खुवारी कइले ना लिहलें हमसे फेरि नजरिया । पिया विसारी गइले ना ।।

दोहा

सहवान उस्ताद हमारा, दिया ज्ञान बतलाय । जगरनाथ बुद्ध का मिसरा, सुन मन खुस हो जाय ।। आज सुनाई गइले ना गाके सुन्दर तरज पुरुविया आज सुनाई गइलेना ।।

( १३ )

सोरहो सिगार कइके सूतली सेजरिया, सपनवाँ एक ना । राम, देखी अजगुतवा सपनवाँ एक ना ।। 

पूरुब देसवा में सइयां मोर वन्हइले से पड़ि हो गइली ना रामा हाथ में थकड़िया से पड़ि हो गइली ना ।।

तेजलों सिगार सब धइलों अभरनवाँ से का रे होइहें ना हमर सइयां के वलिया से का रे होइहें ना ।।

छोड़लों हम सुग्गा साड़ी कढ़लो में फेंकि हो दिहली ना अपना नाके के झुलनियां से फॅकि हो दीहली ना ।।

कहे श्री किसुन तिवारी सुनि हो लेबू गोरिया से के हो मेटिहें ना रामा ब्रह्मा के लिखनियाँ से के हो मेटिहें ना ।।

विद्यापति ठाकुर की रचनाएँ

( १ )

पिया मोर बालक हम तरुनी, कवन तप चुकलों भइलों जननी ॥

पहिर लेल सखि इक दछिनक चीर, पिया के देखत मोर दगध सरीर ।।

पिया लेलों गोद कइ चलली बजार, हटिया के लोग पुछें के लागु तोहार ।।

नाहीं मोरा देवर नाहीं छोट भाइ, पुरुब लिखल हउएँ सामी हमार ॥

यह गीत कविता-कौमुदी भाग १ में दिया हुआ है। बाल-विवाह का बड़ा सुन्दर व्यंग्य है।

कबीर की रचना

( १ )

अइली गवनवा के सारी उमिरि अबहीं मोरी बारी ।। टेक ।।

साज समाज पिया ले अइले अवरु कर्हरिया चारी । बम्हना बेदरदी अँचरा पकरि के जोरत गठिया हमारी ॥

सखी सब गावत गारी ।।

बिधि गति बाम कछु समुझि परत ना बएरी भइलि महतारी ।

रोइ रोइ अँखियाँ मोर पोंछति घरवाँ से देत निकारी ।।

भइलों सब के हम भारी ।।

गवन करा के पिया लेइ चलले, इत उत बाट निहारी ।

छूटत गाँव नगर से नाता, छूटत महल अटारी ।।

करम गति टरत ना टारी ।।

नदिया किनारे बलमु मोर रसिया, दीन्ह घुंघट पट टारी ।

थरथराय तन काँपन लगले केहू ना देखे हमारी ।।

पिया लइ अइले गोहारी ।।

कहें कबीर सुनो भाई साधो यह पद लेहु बिचारी । अब के गवना बहुरि नहि अवना करि लेहु भेंट अँकवारी ।। एक बेर मिलि ले पियारी ॥

( २ )

पावल सतनाम गरे के हरवा । साँकर खटोलन रहह्नि हमरी दुबरे दुवरे पाँच कहरवा । ताला कुंजी हमें गुरु दीहलीं जब चाहों तव खोलों केवरवा ।। प्रेम प्रीति के चुनरी हमारी जब चाहों तब नाचो सहरवा । कहे कबीर सुनो भाई साधो वहुरि न अइवे एही नगरवा ।। 

( ३ )

कइसे दिन कटिहें, जतन बताये जइओ ।।

एहि पार गंगा ओहि पार यमुनां, बिचवी मड़इया हमरा के छवाये जइओ ।।

अँचरा फारि के कागद बनाइनि, अपनी सुरतिया हियरा लिखाये जइओ ।।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, बहियाँ पकरि के रहिया बताये जइओ ।।

धर्मदास कृत

( ४ )

मितऊ मड्ड्या सूनी करि गइलो ।। अपने बलमु परदेस निकसि गइलो, हमरा के कछुओ ना गुन देइ गइलो ।।

जोगिन बनिके मैं बन बन हूड़ीं, हमरा के बिरह वियोग देइ गइलो ॥

सँग के सखी सब पार उतरि गइलो, हम धनि ठाढ़ धरमदास यह सार अकेली रहि गइलो ।। अरज करे लें, सबद सुमिरन देइ गइलो ।।

धर्मदासजी कबीर के शिष्य और जाति के कसौंधन बनिया थे। ये बान्धव- गढ़ के बड़े भारी महाजन थे। सन् १५७५ वि० में कबीर साहह्न के परम धाम सिधारने पर उनकी गद्दी उन्हें मिली। धर्मदासजी के गीत भी कबीरदास जी के गीतों की तरह प्रारम्भ में प्रायः सभी भोजपुरी में शायद रचे गये थे; पर बाद के हिन्दी भाषी विद्वानों ने उन्हें हिन्दी या ब्रजभाषा का रूप देकर उसे हिन्दी का बना डाला। या उन्होंने हिन्दी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में रचना की। पहली दशा में, हिन्दी के विद्वानों पर कोई अपहरण का दोष नहीं लगा सकता ! भोजपुरी का ज्ञान न होने के कारण ही उन्हें उन शब्दों का पाठ वैसा शायद रखना पड़ा हो, जैसा कि हिन्दी में उनका रूप सहज हो हो सकता था। पर जहाँ 'ल' प्रत्यय से क्रिया का प्रयोग इस तरह से हुआ था कि उसका रूपान्तर उसी मात्रा में होना नितान्त कठिन था, वहाँ बाध्य होकर उन लोगों को भोजपुरी शब्दों का वही रूप छोड़ देना पड़ा, जैसे वे पहले थे। उदाहरण के लिए इसी गीत को पं० रामनरेशजी त्रिपाठी अपनी कविता-कौमुदी में देते समय 'गइलों' को गइली, 'मड़इया' को बड़या, निकसि को 'निकर्कार', 'होइ' को ह्व, 'बिरह / विरोग' को 'विरह बैराग', 'संग के सखीय' को, 'संग को सखो', 'गइली' को 'गेली', 'देइ' का 'है', आदि पाठ लिखा है। यह साधारण उदाहरण है। ऐसे उदाहरण अनेक हैं।

( ५ )

मोरा पिया बसे कबने देस हो । अपने पिया के ढूढ़न हम निकसी केहू ना कहत सनेस हो । पिया कारन हम भइली बावरी, धइली जोगिनिया के भेस हो । ब्रह्मा विसुन महेस ना जाने का जाने सारद सेस हो । धनि जे अगम अगोचर पवलन हम सब सहत कलेस हो । उहाँ के हाल कबीर गुरु जनले आवत जात हमेस हो ।।

इस गीत में भी पाठ के सम्बन्ध में वही भूले पं० रामनरेशजी त्रिपाठी ने की है जो पूर्व के गीत में की थी। जैसे 'पवलन' को 'पइलन', 'जनले' को 'जाने 'के', को 'के', 'धइलो' या 'धरों' को 'धर्यो' 'भइली' को 'भईहैं', 'बसे' को 'बर्स' पाठ देकर हिन्दी के अनुकूल बना दिया है। 

( ६ )

साहव चितवो हमरी ओर ।। टेक ।:

हम चितईं तुम चितओ नाहीं, तोहरो हृदय कठोर ।

अवरन के तौ अवर भरोसा, हमें भरोसा तोर ।।

सुखमनि सेज विछायो गगन में नित उठि करों निहोर । धरमदास बिनवें कर जोरी, साहेव कविरा बंटी छोर ।।

कबीर साहब ने हिन्दी या व्रजभाषा वालों के अपने गीत के अर्थ को सम- झने की इस कठिनाई को समझा था; पर तब भी उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में ही अपनी रचना को और इन शब्दों में उसको पश्चिमी देश के निवासियों के लिए दुर्बोध स्वीकार किया था--

बोली हमरी पुरुख की, हमें लखे नहि कोय । हमको तो सोई लखे, धुर पूरब का होय ।।

यानी उनकी भाषा इतनी ठेठ भोजपुरी थी कि पूरबवाले (भोजपुरी) हो उसे समझ सकते थे, दूसरे नहीं।

बात यह थी कि उस समय काव्य के लिये संस्कृत, प्राकृत और पाली आदि के बाद दूसरो उन्नत भाषा नहीं थी। और उन भाषाओं में काव्य करना जन-काव्य नहीं होता। इसी से प्रायः अधिक सन्त कवियों ने अपनो मातृ- भाषाओं में ही रचना की है, जो आगे चलकर अन्य भाषा-भाषी भक्तों द्वारा हिन्दी, ब्रजभाषा, पंजाबो आदि अनेक बोलियों के उन शब्दों से भरदी गईं, जो उनके मूलरूप और अर्थ को कायम रखते हुए आसानी से बदल दिये जा सके। यही कारण है कि एक ही गीत के अनेक पाठों को हम देखते हैं और एक ही गीत में कई भाषाओं के शब्दों के रूप भी दृष्टिगोचर होते हैं। कबीर और धरमदासजी के तो कितने ऐसे गीत हैं, जिनमें आद्योपान्त भोज- पुरी के शब्द रहने पर भी केवल एक तो क्रिया या सम्बन्धकारक का रूप बजभाषा का कर के उसे ब्रजभाषा का कर दिया गया है। 

जगजीवन साहब कृत भजन

ये चन्देल राजपूत थे। बारीबंकी जिला का सरहद गाँव जो सरजू तोर पर बसा है, वहीं कै ये रहनेवाले थे। ये धरनीदास के समकालीन थे। इनके चलाये सम्प्रदाय को 'सत्तनामी' सम्प्रदाय कहते हैं। इनकी रचनाएं अवधी में भी बहुत हैं।

(७ )

जोगिया भंगिया खवावल, बउरानी फिरों दिवानी ।। अइसन जोगिया के वलि बलि जइहों जिन्ह मोहि दरस दिखावल । ना करसे ना मुख से पिआवे नयनन सुरति मिलावल ।। काह कहों कहि आवत नाहीं जिनकर भाग तिन पावल । जगजीवनदास निरखि छबि देखले जोगिया मूरति मन भावल ।।

(८)

चरनन में लागि रहिहों री ।। टेक ।। अवरू रूप सब तिरथ बतावे, जल नहि पइठ नहइहों री । रहिहों बइठि नयन से निरखत, अनत न कतहूँ जइहों री ॥ तोहरे से मन लाई रहिहों, अवर नाहीं मन अनिहों री । जगजीवन के सल गुरु समरथ, निरमल नाम गहि रहिहों री ।।

(১)

चलु चढ़ीं अटरिया धाइ री । महल में टहल करे ना पाई, करों कवन उपाई री ॥ इहां त बएरी बहुते हमरी, तिन से कुछु ना बसाई री । पांच पचीसल निसि दिन सतावे, राखलइन अरुझाई री ।। साई के निकट वइठि सुख बिलसवि, जोतिसे जोति मिलाई री । जगजीवनदास अपनाय लेहु वै, नाही त जीव डेराई री ॥ 


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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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विवाह क गात

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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

3 January 2024
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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

4 January 2024
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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024
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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

4 January 2024
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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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एगो किताब पढ़ल जाला

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