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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024

4 देखल गइल 4

अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।। 

घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥ 

रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । जैसिह अपनी बहिनि हमका व्याहउ रे ना ।। ३ ।। 

अतना बचन सुनि घरवा लवटेलनि रे ना । जैसिह गोड़े मूड़े तनिलनि बइठि जगावलहि कुसुमा चदरिया रे ना ॥ ४॥ बहिनिया रे ना । भइआ तोरा घरमावा नाहीं जइहें रे ना ॥ ५ ॥

 ऊठहु भइया रे करहु भइया तोर पति राखें दतुइनिया रे ना । भगवनवाँ रे ना ।। ६ ।।

 जो तुहू मिरजा रे हर्मोह लोभानेउ रे ना । मिर्जा बाबा के गॅउवाँ भुइयाँ बकसहु रे ना ॥ ७ ॥ 

हँसि हँसि मिरजा गॅउाँ भुइयाँ बकसे रे ना । राम रोइ रोइ बिलसे कुसुमा के बावा रे ना ॥ ८ ॥ 

जो तुहूँ मिरजा रे मिरजा काका जोगे हँसि हँसि मिरजा रे हमहीं लुभानेउ रे ना । हाँ या बेसाही रे ना ॥ ९ ॥

 हथिया बेसाहेले रे ना । कुसुमा के काका रे ना ॥ १० ॥

रामा रोइ रोइ चढ़े जो तुहू मिरजा रे हहि लोभानेउ रे ना । मिरजा भैया जोगे घोड़वा बेसाहे रे ना ।। ११ ।। 

हँसि हँसि मिरजा रे घोड़वा बेसाहे रे ना । रामा रोइ रोइ चढ़े कुसुमा के भइया रे ना ॥ १२ ॥

जो तुहू मिरजा रे हमर्माह मिरजा तिरिया जोगे गहना लुभानेउ रे ना । गढ़ावउ रे ना ।। १३ ।।

हँसि हँसि मिरजा गढ़ावइँ रे ना । रामा रोइ रोइ पहिरै कुसुमी के भउभी रे ना ।। १४ ।।

जों तुइँ मिरजा रे हहि लोभानेउ रे ना । मिरजा चेरिया जोगे चुनरी रंगावउ रे ना ।। १५ ।।

हँसि हँसि मिरजा रे चुनरी रंगावइँ रे ना । रामा रोइ रोइ पहिरे कुसुमा के चेरिया रे ना ।। १६ ।।

एक कोस गइली दूसर कोस गइली रे ना । रामा तीसरे में लागो पिअसिया रे ना ।। १७ ।।

घरहीं में कुइयाँ खोनइवों मोरी धनिया रे ना । धनिया पिअडू गेडअवा ठंढा पानी रे ना ॥ १८ ॥

तोही सगरवा पनिया निति उठि पीअवों रे ना । मिरजा बाबा के सगरवा दुर्लभ होइहें रे ना ।। १९ ।।

एक घोंट पीअली दूसर घोंट राम तिसरे में भइली पीअली रे ना । सरबोरवा रे ना ।। २० ।।

'अपने ओसारे में कुसुमी अपने लम्बे केश झार रही थो। उस पर एक तुर्क की दृष्टि पड़ी ॥१॥

'तुर्क ने अपने नायक और सिपाही से कहा, कि दौड़कर आओ और जैसिह को पकड़ लाओ' ॥२॥

'जैसिह पकड़ लाये गये और उसने उससे कहा' जैसिह, यदि राज पाट चाहते हो, तो अपनी बहन को मेरे साथ ब्याह दो' ।।३।।

'यह बचन सुनकर जर्यासह घर लौट आये और शोक के मारे सिर से पैर तक चादर ओढ़कर पड़ रहे ॥४॥

'कुमुमो भाई के पास बैठकर उसे जगाने लगी-- हे, भाई, उठो तुम्हारा धर्म नहीं जायगा विश्वास रखो। हे भाई ! उठो मुँह हाय धोओ। दातुन करो। तुम्हारी लाज भगवान रखेंगे' ।।५, ६।।

'कुसुमो ने मिरजा से कहा- हे मिरजा ! यदि तुम मुझपर मोहित हुए हो तो मेरे बावा को गाँव और भूमि दो' ।।७।।

'मिरजा ने हँस हँस कर कुसुमा के पिता को गाँव और भूमि दिया। और कुसुमा के बावा ने रो रो कर उसे ग्रहग किया' ।।८।।

'कुसुमी ने मिरजा से कहा- हे मिरजा, यदि तुम मुझपर मोहित हो तो मेरे काका को हाथी खरोद दो' ।।९।।

'मिरजा ने प्रसन्न मन से कुसुमा के काका के लिए हाथो खरीद दिया और कुसुमा का काका रोता हुआ हाथो पर चढ़ा' ।।१०।।

'कुसुमी ने मिरजा से कहा, हे मिरजा, यदि तुम मुझपर लुभाये हो तो मेरे भाई के लिए घोड़ा खरीद दो' ॥११॥

'मिरजा ने हँस हँस कर उसके भाई के लिए घोड़ा खरीद दिया और कुसुमो का भाई रोता हुआ उस पर चढ़ा' ।॥१२॥

'कुसुमो ने कहा, हे मिरजा ! जो तुम मुझपर मुग्ध हुए हो तो स्त्रो के योग्य गहना बनवाओ' ॥१३॥

'मिरजा ने प्रसन्न मन से गहना गढ़ा दिया। कुसुमी को भौजाई ने रो रो कर उस गहना को पहना' ।।१४।।

'कुसुमो ने कहा- हे मिरजा ! जो तुम मुझपर मोहित हो तो मेरी दासी के लिए चूनरो रंगा दो' ।।१५।।

'मिरजा ने चूनरी रंगा दी जिसे रोती हुई दासी ने पहना' ।।१६।। 'कुतुमी मिरजा के साथ एक कोस गयो। दो कोस गयो। तीसरे कोस में उसे प्यास लगी ।।१७।।

'मिरजा ने कहा--अरो मेरो कामिनी! घर पर हो मैं तेरे लिए कुत्राँ खोदवा दूंगा। तुम सुराही का ढंडा पानी पीना' ।।१८।।

'कुसुमी ने कहा- हे मिरजा ! तुम्हारे कुएँ का पानी तो मैं नित्य पीऊँगी। पर यह मेरे पिता का खुदाया हुआ सागर मुझे दुर्लभ हो जायगा' ।।१९।।

'कुसुमी सागर में पानी पोने गयी। उसने एक छूट पानी पिया। दो घूंट पानी पिया। तीसरे घंट के साथ वह सागर के अथाह जल में कूद कर नोचे डूब गयो' ।॥२०॥


निराई के गीत

इस गीत को नायिका कुसुमो का त्याग वैसी हो ऐतिहासिक घटना है जैसी कि कितने सतियों के त्याग के ज्वलन्त उदाहरणों से भारत के इतिहास के पन्ने भरे हैं। इसको समालोचना लिखते समय पं० रामनरेश त्रिपाठी जो ने लिखा है- 'घटना सत्य जान पड़ती है। क्योंकि युक्त प्रान्त और बिहार दोनों प्रान्तो में इस घटना को लेकर गोत रचे गये हैं। खेत निराते समय अब भी मजदूरिने इस गीत को गा गा कर भगवती कुसुमा के सतीत्व-रक्षा को महिमा हिन्दूकन्याओं को सुनाया करती हैं।'

त्रिपाठीजी की बातें सत्य हैं। आगे वे लिखते हैं कि यही गोत बिहार में आटा पीसते समय इस प्रकार गाया जाता है।

( २ )

आहि काठ केरि नैया रे तैया; इंगुरे ढरल चारो पलवा हूरे जी ।। तेहि घाटे उतरेला मिरिजा सहेववा! जेहि घाटे भगवती नहाले हुरे जो ।।१।। 

पनिया भरनि पनिभरनि विटियवा; केकर बहिनी करे असननिया हूरे जी ।। गाँव केर गौआ होरिल सिह रजवा; उन्हकर बहिनी करे असननिया

हूरे जो ।।२।। 

धाव तुह नउआ, धाव चपरसिया होरिल सिंह के पकरि ले आवहु रे जी ।। पनिया भरति पनिहारिन बिटियवा; होरिल सिह मकनिया कहाँ बाड़े

हूरे जी ।।३।।

 उत्तर मुहें उतराहुत उनकर दुअरा चननवा के गछिया हू रे जी ।। होरिल सिंह मुसुक चढ़ाव हू रे जी ।।

(जब रे) होरिल सिंह गइले मिरजा पसवा; नइ नइ करेले सलमिया हू रे जी ।। लेहु न होरिल सिंह डाल भर सोनवा; भगवति वहिनिया मोहि बकसहु रे जी ।। आगि लगहु मिरिजः डाल भर सोनवा, मोरे कुले भगवति जामेली ह रे जी ।। घरवा से निकसों अँगना ठाढ़ भइली, अगना ठाढ़ो भउजी रोवेली हुरे जी। आगि लागहु भगवति तोहरी सुरतिया; तोहरा कारन सामी बान्हलहूरे जी ।। लेडू ना भउजी घर गिहिथनवा; होरिल छोड़ावन हम जाइबि हूरे जी ।। जो तुहें मिरजा हमरा से लोभल, होरिल सिंह के मुसुक छोड़ावहु रे जी ॥ जो तुहूँ मिरजा हामारा से लोभल; हमरा जोगे चूनरी रंगावहु रे जी ।। जो तुहूँ मिरजा हमरा से लोभल; हमरा जोगे गहना गढ़ावहु रे जी ॥ जो तुहें मिरजा हमरा से लोभल; हमरा जोगे डॅड़िया फनावहु रे जी ।। हंसि हँसि मिरजा गहना गढ़वले; रोइ रोइ पेन्हे बेटी भगवति हू रे जो । हँसि हँसि मिरजा डॅड़िया फनवले; रोइ रोइ चढ़े बेटी भगवति हू रे जो ।। एक कोस गइली, दूसर कोस गइली, लागि गइली मधुरी पिअसिया हू रे जी ।। गोड़ तोरा लागीला अगिला कहरवा, बून एक पनिया पीआवहु रे जी ।।

मिरिजा गहुअवे पनिया पीआहु रे जी ।।

तोरा गड़ अवे मिरिजा नित उठि पीअवो, बाबा के सगरवा दुरलभ

भइले हू रे जी ।। एक चिरुआ पीअली, दूसर चिरुआ पीअली, तिसरे गइली सरबोरवा हू रे जी ॥

रोवेला मिरिजवा मुड़वा ढ़ठावाला, मोर बुधि छरे छोटी भगवति' हू रे जी ।।

रोइ रोइ मिरिजा रे जलिया लगावेले, बाझि गइल घोंघवा सेवरवा

हू रेजी ।। हँसि हँसि होरिल सिह जलिया लगावेले बाझि गइली भगवति बहिनिया

हू रे जी ॥ हँसले होरिल सिह मुंहे खाइ पनवा, तीन कुल राखे भगवति बहिनी

हू रे जी ॥

इस गीत को बिहार का गीत बताते हुए पं० रामनरेश त्रिपाठी अपने ग्रामगीत में लिखते हैं- 'यह गीत युक्त प्रान्त के (पूर्व लिखित नं० १ गीत 'अपने ओसारे कुसुमा झारे लम्बी केसिया रे') गीत से कुछ अधिक विस्तार पूर्वक है। पर मूल घटना में अन्तर नहीं है। हाँ, बिहार के गीत को अन्तिम पंक्तियाँ युक्तप्रान्त के गीत में नहीं हैं, जिनके बिना रस को पूर्णता नहीं होती थो। कुसुमा या भगवतो ऐसी बहन पाकर जैसिह या होरिल सिह ऐसे भाई को पान खाकर षित होना ही चाहिए।

यह गोत अंग्रेजों को इतना पसन्द आया कि लाइट आफ एशिया के रचधिता, अंगरेजी के प्रसिद्ध कवि सर एडविन आर्नाल्ड ने इसका अंग्रेजी पद्य में अनुवाद कर डाला, जिसे सन् १९१८ में, हिन्दी भाषा के परम प्रेमी सर जार्ज ए ग्रिअर्सन ने इंगलैन्ड के स्कूल आफ ओरिएन्टल स्टडीज में एक व्याख्यान में गाकर सुनाया था।

त्रिपाठीजी ने इन दोनों गीतों के बाद इसी भाव के चार गीत और दिये हैं; जिनमें एक को फैजाबाद जिले से, दूसरे को बलिया जिले से प्राप्त गीत वे कहते हैं; और शेष दो को बिहार हो में गाये जाने वाले गोत वे मानते हैं। चारों ये और दो ये इन छः गीतों को मैंने ठीक उसी रूप में उद्धृत किया है, जिस रूप में वे 'ग्रामगीत' में छपे हैं। इससे फैजाबाद के टांड़ा तहसील को भोजपुरी बलिया को भोजपुरी तया बिहार के शाहाबाद आदि जिलों की भोजपुरी का रूप एक पण्डित द्वारा संगृहीत गीतों में पाठक को देखने को मिलेगा। त्रिपाठीजी ने यदि इन गीतों के साथ 'भोजपुरी' का नाम रखा होता, तो अति उत्तम था। पर शायद उनको यह ज्ञात न था कि फैजाबाद में भी भोजपुरी बोली जाती हो, इससे और इससे कि उनका संग्रह भाषा के क्रम से नहीं हुआ था, 'भोजपुरी' न रखने में उनका कोई दोष नहीं कहा जा सकता ।

इन विभिन्न स्थानों की भोजपुरी को देखकर पाठक समझ जायेंगे कि इनमें भेद का एक तरह से अभाव है।

फैजाबाद जिला में वही नं० १, २, गीत इस प्रकार गाया जाता है-

देहु न मैया मोरी ककही कटोरिया हो ना ।

मैया बाबा के सगरवा मुड़वा मींजी हो ना ।।

मुंड़वइ मीजि कुसुमी सुखवं लगली हो ना । आइ गइल मिरजा लसकरिया हो ना ।।

केकर है कुसुमी बारी दुलारी हो ना ।

काके सगरवा मुड़वा मींजउ हो ना ।।

गंगा क हैं हम बारी दुलारी हो ना । मिरजा जीउधन सगरवाँ मुड़वा मींजी हो न ।

एतना बचन मिरजा सुनबों न कइलै हो ना ।

मिरजा जीउधन कै छेकैला दुवरिया हो ना ॥ लेउ न जिऊधन डाल भर सोनवा हो ना । जिउधन अपनी बिटियवा मोहि देहू हो ना ।।

का करों मिरजा डाल भर सोनवा हो ना ।

मिरजा हमरी कुसमी मरि गइल हो ना ।।

इतना बचन मिरजा सुनवो 'न कैले हो ना ।

मिरजा गंगा जिउधन नावै हथकड़िया हो ना ।।

लोहे के टटरवा मिरजा दतियाँ दिअउल हो ना ।

नकियन लिदिया दुसावै हो ना ।।

देहु न भौजी अपनी चदरिया हो ना ।

भउजी बिरना संसति देखि आई हो ना ।।

अगिया लगावों कुसुमी तोरी सुन्दरइया हो ना । कुसुमी तोरे कारन हरि मोरे बन्हल हो ना ।।

दस सखि अगवा दस सखि पछवाँ हो ना । विचवा में कुसुमी बिटिया हो ना ।।

मुंहाँ पटुकवा दैके हॅमला मिरजवा हो ना । अरे दूनी कुलवा बोरैले कुसुमिया हो ना ।।

जो मिरजा चाहा (चाह) तू हमके हो ना ।

मिरजा बाबा भैया हथिया बेसाही हो ना ।।

हँसि हँसि मिरजा हथिया बेसाहैं हो ना । रोइ-रोइ चढ़ जिवधन बपवा हो ना ।।

जो तू मिरजा हर्मोह लोभइला हो ना ।

मिरजा हमरे जोगे कपड़ा बेसाही हो ना ।।

हँसि हँसि मिरजा गहना कपड़ा बेसाहैं हो ना । रोइ रोइ पहिरैले कुसमिया हो ना ॥

हँसि हँसि मिरजा डॅड़िया बेसाईँ हो ना ।

रोइ रोइ चड़ैले कुसमिया हो ना ।। एक वन गइलें दूसर बन गइलें हो ना ।

तीसरे में बाबा के सगरवा हो ना ।।

पइयाँ तोरे लागंलों (लागोला) कहरा बढ़इता हो ना ।

कहा बाबा के सगरवा पानी पीयव हो ना ।।

बाबा सगरवाँ पानीं अबइल ढवइल हो ना ।

हमरे सगरवा निरमल पनियाँ हो ना ।।

तोहर सगरवा नित उठि पीयबि हो ना ।

बावा सगरवा दुरलभ होई हो ना ।।

एक घूंट पीअली दूसर घूंट पीअली हो ना ।

तीसरे में जाली तर बोरवाँ हो ना ।।

रोइ रोइ मिरजा जलिया नवाब हो ना ।

बाझल आवै घोधिला सेवरिया हो ना ।। मुहाँ पटुका दूँ के रोवैला मिरजवा हो ना ।

अरे दूनों कुलवा बोरैलो कुसुमिया हो ना ।।

हँसि हँसि जिउधन जलिया नवावे हो ना । बाझल आवै कुसुमी विटियवा हो ना ।।

मुँहाँ पटुकवा है के हॅसलै जिउधन हो ना । दूनी कुलवा राखैले बेटी कुसुमी हो ना ।।

यही गीत बलिया जिले में इस प्रकार गाया जाता है--

देहू न मैया रे कंगही कटोरिया हो ना ।

अपने सगरवा मुड़वा जो मीजें ।

बाबा के सगरवा मुड़वा मींजब हो ना ।।

घोड़वा कुदावै मिरजा रजवा हो ना ।।

घोड़वा कुदावत परिग नजरिया हो ना ।

केकरी तिरियवा मुड़वा मीजै हो ना ।।

घोड़वा घुमाव वोहि घोड़ सरिया ।

बाबा का पकरि मँगावै हो ना ।।

अपनी कुसुमा मोहि विआहो हो ना ।

कैसे मैं बिहाहों अपनी कुसुमिया ।।

तू तो तुरुक हम बाम्हन हो ना । एतना बचन सुनि मिरजा रजवा ।।

वावा के डार हथकड़िया हो ना ।

अगिया लगावो बेटी तोरी सुन्दरइया ।।

वावा के चढ़लि हथकड़िया हो ना ।

देहुन मैया रे अपनी चदरिया ।।

वावा के ससतिया देखि आवों हो ना । जो तुही मिरजा हो हमहीं लोभानेउ ।।

बावा जोगे हथिया बेसाहऊ हो ना । जो तुही मिरजा हो हमही लोभानेऊ ।।

भैया जोगे घोड़वा वेसाहउ हो ना ।

भैया जोगे गहना गढ़ावो हो ना ।।

भौजी जोगे चूनरी रंगावी हो ना । हंसि र्हसि मिरजा रे डोला फनावे ।।

रोइ रोइ चढ़े कुसुमा रनिया हो ना । एक बन गइली दूसर बन गइली ।।

तिसरे में बाबा के सगरवाँ हो ना ।

तनियक डोलिया थमाओ मिरजवा ।।

बाबा के सगरवा मुहाँ धोइत हो ना ।

वावा के सगरवा सुन्दर ढबइल पनियाँ ।।

हमरे सगरवा पनियाँ पीयों हो ना । तोहरा सगरवा मिरजा नित उठि होइ हैं ।।

बावा के सगरवा दूलम होइ हैं हो ना । एक घूंट पीअली दूसर घूंट पीअली ॥

तिसरे में गइली तराई हो ना । रोइ रोइ जलवा डरावै राजा मिरजा ।।

फॅसि आवै घोंघिया सेवरिया हो ना । हँसि हँसि जलवा डराव भैया गंगा राम ।।

आवे ली बहिनी कुसुमवा हो ना । मुंहवा पटुका है के रोवे राजा मिरजा ।।

मोरे मुंहे करिखा लगइबू हो ना । सिर पर पगरिया बाँधि हँसै भैया बाबा ।।

दूनी कुल राखेऊ बहिनी कुसुमा हो ना ।

इसमें कन्या का नाम तो कुसुमा है, पर भाई का नाम गंगाराम हो। क्या इस गीत की भोजपुरी बलिया की भोजपुरी नहीं मालूम होती। या तो त्रिपाठीजी सम्पादन करते समय भोजपुरी न जानने की वजह से कुछ गलती कर गये हों, या लिपि-पाठ गलत मिला हो। बलिया में विशुद्ध भोजपुरी बोली जाती है। शाहाबाद, बलिया, छपरा को भोजपुरी प्रायः एक समान हो है।

( ४ )

फिर इसी गीत का एक रूपान्तर त्रिपाठीजी ये देते हैं-

देहु न मैया मोका ककही कटोरिया । बाबा के सगरवा मुड़वा मींजव हो राम ।।

मुंडवं मोंजि कुसुमी लट छटकावे ।

भोजमन (भोजमल) बगलिया में ठाढ़ हो राम ।।

हॅसि हँसि भोजमल डॅड़िया फनावै । रोइ रोइ कुसुमी सवरिया हो राम ।।

भैया और बाबा ठाढ़ मन झखै । जरै कुसुमी तोरि सुन्दरिया हो राम ॥

मुड़वा तो हमरा नवायेउ हो राम ।।

एक कोस गइली दुसर को गली ।

तिसरे में बाबाजी के बगिया हो राम ।। तनि एक डॅड़िया यमाओ तुम भोजमन ।

देखि आइ बाबा अमरैया हो राम ।।

बाबा अमरैया तू नित देखेउ कुसुमी । चलते मैं बगिया लगैवै हो राम ।।

एक कोस गली तिसरे में बाबा के दूसर कोस गैली । सगरवा हो राम ।।

नहाइ लेइ तनि एक डॅड़िया थमाओ हो भोजमन । बाबा के सगरवा हो राम ।।

एक वुड़की मरली दूसर बुड़की मरली ।

तिसरे गई मंझधरवा हो राम ।।

रोइ रोइ भोजमन जाल छोड़ावें । बाझी आये चटकी चुनरियां हो राम ॥

दूसर जलवा छोड़ावै भोजमन । बाझो आये अंग के अँगियवा हो राम ।।

तीसर जलवा छोड़ाव भोजमन । बाझी आये घोंधिया सेवरिया हो राम ।।

हंसि हँसि मीरा भैया जलवा छोड़ाये । बाझी आये मरली कुसुमिया हो राम ॥

मुँहवा पटुका दै रोवै भोजमन । भल छल किहेउ बारी कुसुमी हो राम ।।

हंसि हंसि वावा लोथिया उठावै । भल पति राखेउ घेरिया कुसुमी हो राम ।।

मुँहवा रुमलिया देइ के हं से भैया । भल पति राखेउ वहिनी कुसुमी हो राम ।।

इसमें कन्या का नाम तो कुसुमी है; पर उसको बलात हरण करने वाला भोजमन या भोजमल कोई हिंदू ही है।

अंत में त्रिपाठीजी ने लिखा है- 'बिहार में यह गीत एक प्रकार से और गाया जाता है। उसकी प्रारम्भ की पंक्तियों से गीत में वर्णित घटना के समय का भी पता लगता है।' जैसे-

( ५ )

पूरब पछिमवा से अइले रे फिरंगिया । दानापुर में बरिक उठावल रे की ॥

बरिक उठवलस खिरकी कटवलस । चारो ओर पलटन बसवलस रे की ।।

उहो कोटे मिरजा रे झिझरी खेलत हैं। जाही कोटे भगवति नहाइल रे की ।। नजर परत मिरजा बोलले सहेववा से । 'होरिलसिह क पकरि मँगावहु रे की ।।

इत्यादि ! आगे को कथा वैसे हो है, जंसो भगवतो के गोत में वर्णित है। जान पड़ता है, जब पहले-पहल अंग्रेज दानापुर में आये और उन्होंने अपनी छावनी बना डाली, उस समय ऐसी कोई घटना अवश्य हुई है, जिसकी चर्चा प्रान्त भर में गीतों द्वारा व्याप्त हो गयो।

( ६ )

ऊँची अटारी उरेही चितसारी हो ना, राम ! किन धना पुतरी उरेहे हो ना ॥ १ ॥ लहुरी पतोहिह्या पूता तोरो भवहिया हो ना, रामा उन धन पुतरी उरेहे हो ना ॥ २ ॥

एतना बचन जब सुने राजा जेठवा हो ना, रामा गोड़े मुड़े ताने ले डुपटवा हो ना ।। ३ ।। उठहु ना पूता मोरे हाथ मुंह धोवहु हो ना,

रामा खाइ लेहु दुधवा आ भतवा हो ना ॥ ४ ॥ कइसे के मइया मोरी हाथ मुंह थोई हो ना, मैया लहुरी पतोहिया मनवा बसली हो ना ॥ ५ ॥

लहुरी पतोहिया पूता भवहि हो तोहार, रामा ऊ त तिलंगवा के जोइया हो ना ।। ६ ।। ले आव छोटकी ढालि तरुवरिया हो ना, छोटका भइया क खबरिया हम जावि हो ना ।। ७ ।। लेइ लेहु जेठ ढालि तरुवरिया हो ना। जेठ हम त बानी राम रसोइया हो ना ॥ ८ ॥

एक वन गइले दूसर बन गइले हो ना, रामा तीसरे में भइया के फउजिया हो ना ॥ ९ ॥ सोवहु न भैया मोरे सुख के निदरिया हो ना, भइया तोहरा पहवा हम देवइ हो ना ।। १० ।। डोले लगली जुड़ली वेअरिया हो ना, रामा आइ गइली सुख के निदरिया हो ना ॥ ११ ॥ रामा हने लागे भैया के करेजवा हो ना, जेठ सगे भैया मारि घरे लवटें हो ना ॥ १२ ॥ अगने कि भितरा मैया बाड़ी छोटका हो ना, रामा खोलि देहु चनन केवरिया हो ना ।। १३ ।। कहाँ मारेल जेठ कहाँ ढकेलेउ हो ना, जेठ कहाँ के चील्ह मंड़राली हो ना ।। १४ ।। ऊचवहि मरलीं खलवहि ढकेलली हो ना, रामा सरगे चिल्हरिया मेड़राली हो ना ।। १५ ।। तोहरा के छाड़ि जेठ न अउर के होइव हो ना, जेठ हरिजी के लोथिआ मगाव हो ना ।। १६ ।। तोहरा के छाड़ि जेठ न अउर के होइव हो ना, जेठ चनना चइलिया चिरावउ हो ना ।। १७ ।। तोहरा के छाड़ि जेठ न अउर के होइव हो ना, जेठ नगर से घोउआ मॅगावउ हो ना ॥ १८ ॥ तोह्रा के छाडि जेठ न अउर के होइब हो ना, जेठ रचि रचि चितवा सजावउ हो ना ॥ १९ ॥ रामा जो हम होइ सतवंती हो ना, मोरे अॅचरा भभकि उठे अगिया हो ना ।। २० ।। वरे लगली लकड़ी भसम भइली छोटका हो ना, रामा जेठवा मले दूनो हथवा हो ना ।। २१ ।।

जो हम जनिती छोटका अस छल करवू हो ना, रामा काहे मरितेॐ सग भइयवा हो ना ।। २२ ।।

रामा काहे मरितेउँ सग भइयवा हो ना, रामा काहे तूरितेऊँ दहिनी बहियां हो ना ।। २३ ।।

'ऊँची अटारी पर चित्रशाला सुन्दर चित्रों से सुशोभित है। पुत्र ने माता से पूछा- हे मा ! यह यह सुंदर चित्र किसने बनाया ?' ॥१॥

'माता ने कहा- बेटा, मेरी छोटी पतोहू, जो तुम्हारी भ्रातृ वधू होती है, उसने इसे बनाया है ॥२॥

'पुत्र ने जब यह सुना, तब सिर से पैर तक चादर ओढ़कर सो रहा' ।।३।।

'माँ ने कहा- हे बेटा, उठो हाथ मुंह धोकर दूध भात खा लो' ॥४॥

'पुत्र ने कहा- हे माँ ! मैं कैसे मुंह हाय घोऊँ? तुम्हारी छोटी पतोहू मेरे मन में बस गई है' ।।५।।

'माँ ने कहा- बेटा वह तो तुम्हारी भ्रातृ बधू है। उसे छूना हो पाप है। फिर वह तिलंगा की स्त्री है' ॥६॥

'जेठ ने कहा- हे छोटी बहू । ढाल तलवार लाओ। मैं छोटे भाई की खवर लेने जाऊँगा' ।।७।।

'छोटी बहू ने कहा- हे जेठ ! ढाल तलवार ले लो। मैं रसोई में रसोई बना रही हूँ ॥८॥

'जेठ एक बन गया। दूसरा बन पार किया। तोसरे बन में उसके भाई की फौज यी' ॥९॥

'उसने अपने छोटे भाई से कहा- हे भाई ! रात हुई, तुम सुख की नींद सोओ। मैं तुम्हारा पहरा दूंगा' ।।१०।।

'जेठ भाई पहरा देने लगा। ठंडी हवा बहने लगी। छोटे भाई को सुख की नींद आ गयो ॥११॥

अब जेठे भाई ने छोटे भाई के कलेजे में तलवार धँसा दी। और अपने छोटे भाई को मार कर घर लौटा' ॥१२॥

'घर पहुँचकर उसने कहा- हे मां, छोटका आँगन में है कि भीतर कोठरी में ? चन्दन का केवाड़ खोल तो दो' ।॥१३॥

'छोटका ने कहा- हे जेठ ! तुमने मेरे पति को कहाँ मारा और कहाँ फेंका और बताओ कि कहाँ चोल उन पर मंडरा रही है' ।।१४।।

'जेठ ने कहा- मैंने उन्हें ऊँचे से मारा और नीचे ढकेल दिया। तथा उसको लाश पर आकाश को चोल मड़रा रही है' ॥१५॥

'छोटी बहू ने कहा- हे जेठजी ! मैं तुमको छोड़कर दूसरे किसी को नहीं होऊँगो। तुम मेरे प्राणनाथ को लाश को मंगा दो' ।।१६।।

'हे जेठ ! मैं तुमको छोड़ दूसरे किसी को नहीं होऊँगी। तुम चन्दन को लकड़ी चिरवा दो। शहर से घो मंगादो और अच्छी तरह से चिता सजवा दो।' ॥१७, १८, १९॥

'जेठ ने सब प्रबन्ध छोटी बहू से आश्वासन पाकर कर दिया। छोटो बहू चिता के समीप जाकर बोली- हे भगवान् ! जो मैं अपने पति की सतवन्ती स्त्री होऊँ, तो मेरे अंचल से अग्नि भभक उठे ' ॥२०॥

'आग भभक उठी। लकड़ी जलने लगी। छोटकी उसमें जल कर भस्म हो गयी। जेठ दोनों हाथ मलने लगा' ॥२१॥

'उसने पछता कर कहा- हे छोटी बहू, यदि मैं जानता कि तुम ऐसा छल करोगी, तो मैं अपना सगा भाई क्यों मारता ? मैं अपने ही हाथ अपनो दाहिनो भुजा क्यों तोड़ता ॥२२॥

इस आशय का गीत पहले आ चुका है। त्रिपाठीजी के ग्रामगोत में भी जाँत के गीत में नं० २७ वाँ, जो मगही भाषा में है, इसो आशय का गीत है। जान पड़ता है, ऐसी घटनाएं बहुत घटीं हैं, तभी अनेक गीत रचे गये। यह भी सम्भव हो सकता है कि एक ही घटना के आधार पर सब गीत रचे गये हों।

(७)

जो मैं होतिउँ वन के कोइलिया, बने रे बने रहितिउँ हो ना ।। मोरा हरि जइते अहेरिया, त सबद सुनइतेउँ हो ना ।।

'यदि में बन को कोयल होतो, तो मैं बन में ही रहती। मेरे प्राणनाथ जब शिकार करने जाते, तो मैं उनको अपने शब्द सुनाती।'

'उस विरहिणी को, जिसका स्वामी सदा शिकार ही खेला करता है, कितनी सुन्दर कामना है।'

(८)

हमरा बवैयाजी के सात वेटवना रे ना । रामा सातो के चन्दा वहिनिया रे ना ॥ १ ॥

रामा सातो भैया चलले परदेसवा रे ना । रामा चन्दा बहिनी लगली गोहना रे ना ॥ २ ॥

फिरि जाहु फिरि जाहू चंदा बहिनियाँ रे ना । बहिनी तोहें लाइब चनरहरवा रे ना ।। ३ ।।

बरहे बरिसवा प लवटे सातो भैया रे ना । रामा ठाढ़ भइले चन्दा मोहरर्वां रे ना ॥ ४॥

भीतर बाड़ कि बाहारा बहिनिया रे ना । रामा थामि लीतिउ चनरहवा रे ना ॥ ५॥

मोरा पिछुअरवा पंडित भैया मितवा रे ना । भैया चन्दा के सोब गवनवा रे ना ॥ ६ ॥

रामा आजु एकादसिया बीहान दोआदसिया रे ना । रामा तेरस के बनेला गवनवा रे ना ।। ७ ।।

पहिले पहिल चन्दा अइली गवनवा रे ना । रामा उनकर ससुर मागे पनिया रे ना ।। ८ ।। पनिया उड़ेरइत झलके चनरहवा रे ना। चन्दा कहाँ पवलू चनरहरवा रे ना ॥ ९ ॥

हमरे बवैयाजी क सात वेटवना रे ना ।

वावा उहे देले चनरहवा रे ना ।। १० ।।

पहिले पहिल चन्दा अइली गवनवा रे ना ।

उनकर जेठवा मागे जूड़ पनिया रे ना ।। ११ ।।

पनिया उड़ेरइत झलके चनरहरवा रे ना । चन्दा कहाँ पवलू चनरहरवा रे ना ।। १२ ।।

 हमरे बवैयाजी के सात वेटवना रे ना । जेठऊ उहे देले चनरहरवा रे ना ।। १३ ।।

 पहिले पहिल चन्दा अइलीं गवनवा रे ना । उनकर समिया माँगे जूड़ पनिया रे ना ।। १४ ।।

 पनिया उड़ेरइत झलके चनरहरवा रे ना । बहुअरि कहाँ पवल चनरहरवा रे ना ।। १५ ।। 

हमरे बवैयाजी के सात बेटवना रे ना । सानी उहे देले चनरहरवा रे ना ।। १६ ।।

 केहू ना माने चन्दा के बतिया रे ना । रामा चन्दा से मागे किरिअवा रे ना ।। १७ ।।

 भइया चनना चइलिया चीरि देवहु रे ना ॥ २० ॥

मोरे पिछुअरवा लोहार भइया मितवा रे ना । भइया धरम करहिया गढ़ि देवहु रे ना ॥ १८ ॥

 मोरे पिछुअरवा तेली भइया मितवा रे ना । भइया करुवहि तेल पेरि देवहु रे ना ॥ १९ ॥ 

मोरा पिछुअरवा बढ़या भइया मितवा रे ना ।

नइहरा क साथी मोरा भइया क सुगवा रे ना । भइया जाइ कह भइया आगे हलिया रे ना ।। २१ ।।

 ऊँचे ऊँचे वईडे मोरा ससुरा के लोगवा रे ना । रामा खलाँ बइठे भइया बाबा रे ना ।। २२ ।। बड़ बड़ पाग बान्हि ससुरा के लोगवा रे ना । रामा भइया वावा वान्हि अॅगवछिया रे ना ।। २३ ।।

 रामा तेहि बोचे खदके करहिया रे ना । रामा तेहि तर काहि सतवन्ती रे ना ॥ २४ ॥ 

जो चन्दा बहिनी तू सत के ठहरवू रे ना । बहिनी तेमे जोगे डॅड़िया फनइत्रो रे ना ।। २५ ।।

 जो चन्दा वहिनी तू कांच उतरवू रे ना । बहिनी जीअत खंदका गड़इयों रे ना ॥ २६ ॥

 रामा आँगिनि होवसु जूड़ जैसे चन्दा डलली करहिया में पनिया रे ना ।। २७ ।।

 हथवा रे ना । रामा तसहीं अगिनी भइलों पनिया रे ना ॥ २८ ॥

 मुहवाँमें रुमलिया देके रोवे ओकर समिया रे ना । रामा मोर सती चलली नइहरवा रे ना ।। २९ ।। 

रामा मुहवाँ रुमलिया देइ हँसे सातो भइया रे ना । रामा बहिनी जोगे डॅड़िया फनावहु रे ना ।। ३० ।।

 एक वन गइली दूसर बन गइली रे ना । रामा तीसरे में मिली बन तपसिन रे ना ।। ३१ ॥

 बहियाँ पकरि समुझाव बन तपसिन रे ना । बेटी सामी मन घर ना गुनहिया रे ना ।। ३२ ।।

 चन्दा खड़ी खड़ी सामी के निरखे रे ना ।

जो हम होई सामी सत के तिरिअवा रे ना ।

सामी ढहर ढहर लोरवा 'ढारेले रे ना ।। ३३ ।।

सामी अस कइ डहल मोर मन विलगवल रे ना । सामी तबहू त सैया विनु तिवई के रहगित रे ना ।। ३४ ।।

'मेरे पिताजी के सात बेटे हैं। सातों को एक बहन चन्दा है। सातों भाई परदेश चले। चन्दा भी उनके पोछे-पीछे चलो। भाइयों ने समझाकर कहा-- हे चन्दा बहन, तुम घर लौट जाओ। हम तुम्हारे लिए चन्द्रहार ले आवेगे।' ।।१, २,३।।

'बारह वर्ष बाद सातों भाई लौटे। चन्दा के द्वार पर खड़े होकर बोले--बहन, घर में हो कि बाहर? चन्द्रहार थाम लो' ॥४,५।।

'भाइयों के घर के पीछे एक ज्योतिषो रहते थे। भाइयों ने उन्हें बुला कर कहा- है मित्र, चन्दा के गोने की साइत शोध दो' ।।६।।

'ज्योतिषी ने कहा- आज एकादशी है। कल द्वादशो है। परसों त्रयोदशो को साइत है' ।।७।।

'चन्दा गौने आई। पहले पहल उसके श्वसुर ने उससे पानी माँगा। पानी ढारते समय उसके चन्द्रहार की झलक देखकर श्वसुर ने पूछा-- चन्दा ! तुमको यह चन्द्रहार कहाँ मिला' ।।८, ९।।

'चन्दा ने कहा- मेरे पिता के सात पुत्र हैं। उन्होंने मुझे यह चन्द्रहार दिया है ॥१०॥

११,से १६ तक के पद्यों में चंदा के जेठ ओर पति ने भी पानी माँगा है और पानी ढारते समय हार देखकर चंदा से वैसे ही प्रश्न किये गये हैं और चंदा ने वही एक उत्तर दिया है।

'किसी ने चन्दा की बात का विश्वास नहीं किया। सबने (उसके सतोत्व पर शंका करके और यह सोचकर कि किसी परपुरुष ने उसे चन्द्रहार दिया है) उससे शपथ लेना निश्चय किया' ॥१७॥

'चंदा शपथ देने पर तैयार हुई। उसने कहा- हे मेरे पिछवारे रहनेवाले मेरे मित्र लोहार, तुम धर्म को कड़ाही मेरे लिए बना दो' ॥१८॥

'हे मेरे पिछवारे रहनेवाले बढ़ई भाई, मित्र, तुम चन्दन की लकड़ी मेरे लिये चीर दो' ॥१९॥

'हे मेरे पिछवारे रहनेवाले मेरे भाई, मित्र तेलो, मेरे लिए कड़ आ तेल पेर दो' ॥२०॥

'और हे मेरे नहर के सायो सुआ ! हे भाई, तुम जाकर हमारे भाइयों से इस शपय का हाल कहो ॥२१॥

'शपय का सब ठीक हो गया। ऊँचे-ऊँवे स्थानों पर तो मेरे ससुराल के सब लोग बंडे और नोचे-तोचे स्थान पर मेरे भाई और बाप बैठे' ॥२२॥

'ससुराल के लोग तो बड़े-बड़े पाग बांधे थे और मेरे बाप और भाई सिर पर केवल अंगोछा हो लपेटे थे' ।॥ २३॥

'हे राम, उस सभा के बीच में कड़ाही चढ़ो हुई यो। और उसी के पास सतो चन्दा खड़ी यो' ।।२४।।

'भाइयों ने बीच सभा में बहन को सम्बोधन करके कहा- हे बहन चंदा ! जो तुम सत को सच्ची साबित होओगो, तो हम तुमको तुम्हारे योग्य पालको पर चढ़ाकर यहाँ से ले चलेंगे' ॥२५॥

'पर हे चन्दा बहन, अगर तुम कच्चो साबित हुई, तो हम तुमको यहीं जीते जो गड्ढा खुदाकर गाड़ देंगे' ।॥२६॥

'चंदा ने स्वामी को सम्बोधन करके धोर वाणो में कहा- हे स्वामो ! यदि मैं आपको सत्य को स्त्री होऊँ, तो यह आग (खोलता तेल) शीतल जल के समान हो जाय ॥२७॥

'इस वाक्य के साथ चन्दा ने ज्यों ही खोलते कड़ाही में हाथ डाला, वैसे हो खोलता हुआ तेल जल के समान शोतल हो गया' ।॥२८॥

'इस दृश्य को देखते हो स्वामी मुख पर रूमाल देकर रोने लगा और कहने लगा कि हाय, मेरी सती स्त्री अब मुझको छोड़कर चलो जायेगो' ।॥२९॥

'इस विजय को देखकर सातों भाई, जिनके माथा ऊँचे हो गये थे, और जो मुझ पर रूमाल रखे हंस रहे थे, अपनी बहन के लिये सुन्दर पालको ठोक करके उसे ले चले' ।॥३०॥

चन्दा एक वन में गयो। दूसले बन को पार किया। तीसरे बन में उसे बन की तपस्विनी मिलो। उन्होंने चन्दा की बाँह पकड़कर उसे समझाते हुए कहा कि हे बेटी ! अपने स्वामो का अपराध अपने मन में न रखो' ।।३१,३२॥

इस वाक्य को सुनकर चन्दा खड़ी हो गयो। वह वहीं खड़ी-खड़ी एक टक अपने स्वामी को निहारने लगी। और उधर स्वामी चुप काठ मारा-सा खड़ा-खड़ा दोनों आँखों से आसू गिराता रहा' ।।३३।।

'चन्दा ने कहा- हे स्वामी! तुमने मुझे इस तरह दुःख दिया कि मेरा मन तुमसे विलग हो गया; पर तब भी हे स्वामो, बिना पति के स्त्री का निर्वाह नहीं है (रहगित रहाइस रहने का कोई ठिकाना)' ॥३४।।

इस गीत में करुण रस को पुष्टि कितने सुन्दर और सफल रूप से को गयी है। इसके अन्तिम दो चरणों को पढ़कर कोन सहृदय ऐसा होगा, जिसको आँख भर न आयें। स्त्री के दयनीय और परवश जोवन का दृश्य भी इस अन्तिम वाक्य से कितने सुन्दर रूप में व्यक्त किया गया है- 'सामी अस कइ डहल मोर मन विलगवल रे ना। सामी तबहू त संया बिनु तिवई के रहङ्गित जे ना।'

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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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भोजपुरी भाषा का विस्तार

15 December 2023
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भोजपुरी भाषा के विस्तार और सीमा के सम्बन्ध में सर जी० ए० ग्रिअरसन ने बहुत वैज्ञानिक और सप्रमाण अन्वेषण किया है। अपनी 'लिगुइस्टिक सर्वे आफ इण्डिया' जिल्द ५, भाग २, पृष्ठ ४४, संस्करण १९०३ कले० में उन्हो

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भोजपुरी काव्य में वीर रस

16 December 2023
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भोजपुरी में वीर रस की कविता की बहुलता है। पहले के विख्यात काव्य आल्हा, लोरिक, कुंअरसिह और अन्य राज-घरानों के पँवारा आदि तो हैं ही; पर इनके साथ बाथ हर समय सदा नये-नये गीतों, काव्यों की रचना भी होती रही

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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड

18 December 2023
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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड में गाया जाता है, जिसका संकेत भूमिका के पृष्ठों में हो चुका है- कसामीर काह छोड़े भुमानी नगर कोट काह आई हो, माँ। कसामीर को पापी राजा सेवा हमारी न जानी हो, माँ। नगर कोट

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भोजपुरी लोक गीत

18 December 2023
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३०० वर्ष पहले के भोजपुरी गीत छपरा जिले में छपरा से तोसरा स्टेशन बनारस आने वाली लाइन पर माँझी है। यह माँझी गाँव बहुत प्राचीन स्थान है। यहाँ कभी माँझी (मल्लाह) फिर क्षत्रियों का बड़ा राज्य था। जिनके को

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राग सोहर

19 December 2023
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एक त मैं पान अइसन पातरि, फूल जइसन सूनरि रे, ए ललना, भुइयाँ लोटे ले लामी केसिया, त नइयाँ वझनियाँ के हो ॥ १॥ आँगन बहइत चेरिया, त अवरू लउड़िया नु रे, ए चेरिया ! आपन वलक मों के देतू, त जिअरा जुड़इती नु हो

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राग सोहर

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ललिता चन्द्रावलि अइली, यमुमती राधे अइली हो। ललना, मिलि चली ओहि पार यमुन जल भरिलाई हो ।।१।। डॅड़वा में वांधेली कछोटवा हिआ चनन हारवा हो। ललना, पंवरि के पार उतरली तिवइया एक रोवइ हो ॥२॥ किआ तोके मारेली सस

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करुण रस जतसार

22 December 2023
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जतसार गीत जाँत पीसते समय गाया जाता है। दिन रात की गृहचर्य्या से फुरसत पाकर जब वोती रात या देव वेला (ब्राह्म मुहूर्त ) में स्त्रियाँ जाँत पर आटा पीसने बैठती हैं, तव वे अपनी मनोव्यथा मानो गाकर ही भुलाना

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राग जंतसार

23 December 2023
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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भूमर

24 December 2023
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झूमर शब्व भूमना से बना। जिस गीत के गाने से मस्ती सहज हो इतने आधिक्य में गायक के मन में आ जाय कि वह झूमने लगे तो उसो लय को झूमर कहते हैं। इसी से भूमरी नाम भी निकला। समूह में जब नर-नारी ऐसे हो झूमर लय क

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26 December 2023
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खाइ गइलें हों राति मोहन दहिया ।। खाइ गइलें ० ।। छोटे छोटे गोड़वा के छोटे खरउओं, कड़से के सिकहर पा गइले हो ।। राति मोहन दहिया खाई गइले हों ।।१।। कुछु खइलें कुछु भूइआ गिरवले, कुछु मुँहवा में लपेट लिहल

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राग कहँरुआ

27 December 2023
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जब हम रहली रे लरिका गदेलवा हाय रे सजनी, पिया मागे गवनवा कि रे सजनी ॥१॥  जब हम भइलीं रे अलप वएसवा, कि हाय रे सजनी पिया गइले परदेसवा कि रे सजनी 11२॥ बरह बरसि पर ट्राजा मोर अइले, कि हाय रे सजनी, बइठे द

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भजन

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ऊधव प्रसंग ( १ ) धरनी जेहो धनि विरिहिनि हो, घरइ ना धीर । बिहवल विकल बिलखि चित हो, जे दुवर सरीर ॥१॥ धरनी धीरज ना रहिहें हो, विनु बनवारि । रोअत रकत के अँसुअन हो, पंथ निहारि ॥२॥ धरनी पिया परवत पर हो,

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भजन - २५

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(परम पूज्या पितामही श्रीधर्म्मराज कुंअरिजी से प्राप्त) सिवजी जे चलीं लें उतरी वनिजिया गउरा मंदिरवा बइठाइ ।। बरहों बरसि पर अइलीं महादेव गउरा से माँगी ले बिचार ॥१॥ एही करिअवा गउरा हम नाहीं मानबि सूरुज व

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बारहमासा

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बारहो मास में ऋतु-प्रभाव से जैसा-जैसा मनोभाव अनुभूत होता है, उसी को जब विरहिणी ने अपने प्रियतम के प्रेम में व्याकुल होकर जिस गीत में गाया है, उसी का नाम 'बारहमासा' है। इसमें एक समान ही मात्रा होती हों

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अलचारी

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'अलचारी' शब्द लाचारी का अपभ्रंश है। लाचारी का अर्थ विवशता, आजिजी है। उर्दू शायरी में आजिजो पर खूब गजलें कही गयी हैं और आज भी कही जाती हैं। वास्तव में पहले पहल भोजपुरी में अलचारी गीत का प्रयोग केवल आजि

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खेलवना

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इस गीत में अधिकांश वात्सल्य प्रेम हो गाया जाता है। करुण रस के जो गोत मिले, वे उद्धत हैं। खेलवना से वास्तविक अर्थ है बच्चों के खेलते बाले गीत, पर अब इसका प्रयोग भी अलचारी को तरह अन्य भावों में भी होने

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देवी के गीत

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नित्रिया के डाड़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूलो झूली ना, मैया ! गावेली गितिया की झुली झूली ना ।। सानो बहिनी गावेली गितिया कि झूली० ॥१॥ झुलत-झुलत मइया के लगलो पिसिया कि चलि भइली ना मळहोरिया अवसवा कि चलि

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

3 January 2024
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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024
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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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