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शहर में गाँव

3 November 2023

2 देखल गइल 2

देवारण्य देवपुरी। देवरिया।

बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के एल. ओ. सौ. सदानीरा चम्पारण्य त चम्पारन हो गइल आ ओह हिसाब आ तुक से एके देवारण होखे के चाहीं लेकिन हो गइल देवरिया ! कइसे? बड़का-बड़का भाषा वैज्ञानिक जब एह पहेली के ना सुलझा पवलें त हम का बताईं। एतने जान लीं कि देवारण्य, देवपुरी, देवरही जवन नाम देवरिया के पुरखा मानल जाला ओसे देवरिया के रिश्ता कवनो विद्वान जोरि नाहीं पवले। उनके व्याकरण आ भाषा विज्ञान के सूत्र अपसे में अझुरा गइल लेकिन देवरिया के ऊ लोग बान्हि ना पावले रिमझिम बरसत पानी के संगीत के कवनो राग-रागिनी में बान्हल जा सकेला!

लइकाई में आपन गाँव अइसन बुझा जइसे कवनो गाय के अच्छे-अच्छे जनमल बछरू ह गाय अइसन सोझ, पवित्र आ बछरू अइसन चंचल आ जीवन से भरल अलगे अलगे टोला रहे, जइसे लँगड़ी, बड़की, खास लेकिन सबके कुलनाम- अइसन आगे देवरिया लगल रहे। हमार टोला खास कहा, कुछ लोग लँगड़ी कहे, कुछ बड़की। तीनो टोलवा त एके रहे लेकिन लोग ओकरे मुँह, पेट आ गोड़ में बाँट के तीन नाम से बोलावे।

लेकिन एहू के एगो कहानी कहल जाला। तीन भाइन में बँटवारा भइल। बड़का भाई के मिलल पच्छिम वाला हिस्सा, माँझिल के पूरब वाला आ छोटकू के दक्षिण वाला। जायदाद, बँटवारा के बाद लंगड़ हो गइल, एसे लोग ओके लँगड़ी देवरिया कहे लागल | चूँकि ऊ मूल हिस्सा रहे आ बड़का भाई परशुराम के मिलल रहे एसे ऊ खास देवरिया आ बड़कियो देवरिया के नाम से जानल गइल। अजुओ ई तीनो नाम प्रचलन में बा। मँझिलका बासदेव तिवारी के हिस्सा बाँसदेवरिया आ छोटकू रामनाथ के हिस्सा रामनाथ देवरिया के नाम से।

गाँव के सिवाने लोग दिशा-मैदान खातिर जा लौटत के ढेंकुल पर बाकी नित्यकर्म पूरा होखे रस्ता में रामचन्नर बाबा के घर परे। ऊ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कश्मीर के जेल में बंद रहलें। गाँव के नेता, अविवाहित, ब्रह्मचारी आ आर. एस. एस. के स्वयंसेवक। कबो जेल में रहें, कबो रैली में, कबो नेता लोगन के साथे हमेशा जतरा पर रहें, लेकिन कब्बो टिकट ना कटावें। उनके दूनो आँख में फुल्ली रहे एसे लोग उनके सूरदास समझे। गाड़ी में चेकिंग होखे तो टीटिए से टकरा जाँ। ऊ इनके देखेत कहे, 'ए सूरदास, एहर नाहीं, ओहर जाके बइठs... आ हाथ पकरि के सीट पर बइठा दें। पइसा ना रहला पर कब्बो- कल्बो भजन गावे लागे त लोग रुपया पइसा दे दें, खियाऊ दें।

बाबा के सटले भुअर भगत के घर रहे। भुअर भगत पल्लेदार रहलन। अतियन के इहाँ बोरा ढोवें आ लौटें त ताड़ी पी के सूति जाँ एकदम भोरहरिये उठें आ विभोर होके रामचरित मानस के पाठ करें। करिया अच्छर चीन्हे भर के पढ़ले रहें। बुझा पाठ नइखन करत, थरिया में चाउर बीनत बान5 ऊ चउरे अइसन गीताप्रेस के गुटका में से एक-एक अच्छर बीनें... 'र..र..घु.. घु..कु. कु. ल. ल. री री री... ती... ती... ती...। बीच-बीच में अपने लइकन के गोहरावें, मेहरारू के बोलावें आ कहें 'हई गोबरा के फेंकी, तोर बाप?"

रघुनाथ गोसाईं अपने छत पर से चिल्ला के बोलें, 'ए भुअर रमायन बाँचऽ, गोबरा ओकरे वादो फेंका जाई।'

भुअर हँस के फेर बाँचे लागें आ पूरा एक घण्टा में चार लाइन बाँचिये के उठें। गोसाईं उनके समउरिया रहलन। हमेशा परेसान रहें देश आ विदेश के राजनीति से जेही मिले ओसे पूछें, 'का हो ई अयुववा (अयूब खाँ पाकिस्तान के तब के राष्ट्रपति) का करे जात बा ? फेरू हमसे लड़े के विचार वा का? उनके 'हम' के मतलब हिन्दुस्तान रहे। चीन के आक्रमण भइल त गोसाईं मुहल्ला भर के सुना के कहें, 'हम त कहते रहली कि ई चढ़वा (चाऊ एन लाई) चाई है। एक दिन धोखा देई। लेकिन हमार बात के सुने? न नेहरुआ सुनलस, न मेननवा । आखिर हमरे ऊपर घात हो गइल न?"

गोसाईं के उमर पचास साल के रहे। दू-तीन महीना चेलाही में रहें, फेर एक महीना घरे । चेलाही से आवें त बुझा कवनो सामान से लदल ठेला आवत बा। दूनो काँधे में लटकल बड़का बड़का झोरा, कपारे पर बड़की मोटरी, कमर में लपेटल तीन-चार गो चदरा एक बेर चेलाही से लवलटन त समाने के साथे एगो कनियो रहे, सोरह सत्रह बरिस के लाल गुलाब अइसन मह मह करत जब ऊ गोसाई के अंगना में पहुँचल त गोसाइन पूछली, 'ई के ह?" गोसाई कहलन, 'तुहरे सेवा खातिर ले आइल बानीं तोहार छोट बहिन बन के रही आ सबके सेवा करो।'

गोसाइन अवहिन खुश होखही जात रहली कि बम फटल, दउरी ले के आवऽ... नयी दुलहिन के ससुरारी अइले पर ओकर पहिलका डेग दउरी में परे के चाहीं । गोसाइन दउरी कहाँ से ले आयें? दउर के एक लात गोसाईं के मरली आ दुसरका नयकी के। उनके कोश में से धराऊ-धराऊ गारी तीर अइसन निकल के दुलहा दुलहिन के बेधे लागल।

दुसरे दिन पंचायत जुटल। गोसाई सफाई में कहे लगलन, 'सास्तर कहेला कि गरीब- गुरबा के मदद करे के चाहीं जे सरन में आ जा ओकर रच्छा करे के चाहीं । केहू चेला दच्छिना देत ओके ठुकरावे के ना चाहीं एगो चेला आपन कनिया हाथ में देके संकल्प क दिहलस त ओके ठुकरावल महापाप होइत । हमनिए ना कइल जाइ त के सास्तर के रच्छा करी?"

पंचाइत अबहिन कवनो फैसला सुनावत कि गोसाइन करिखही हाँड़ी ले के निकलली आ जबले केहू सोचे सोचे कि तबले, घड़ाऽऽम पंच लोग भूत बनि के भाग चलल

हमरे घरे के सामने बरात आइल रहे। गैसबत्ती, नचनियाँ कई गो आकर्षण रहे लइकन खातिर हम एड़ी उठा के दुलहा देखत रहलीं कि अचानके अन्हार हो गइल आ हम पाताल में जाये लगलीं। लोगन के शोर सुनात रहे कि 'लइका इनारे में गिरला बचाव'। पानी में तीन-चार बेर नीचे ऊपर भइलों कि एगो मजबूत हाथ हमके थामि लेहलस | अचानक जोर से धक्का लागल आ हम हाथे से छूटि के फेर पानी में चल गइलों । पानी में भीतर चार गो हाथ हमके छान के बहरा ले अइलन कुँआ में सीढ़ी परल आ हमके निकालल गइल । गोसाई हमार पेट दबा दबा के पानी निकलन।

दुसरे दिन पता चलल कि हरिचन आ पूर्नमासी काका कुँआ में ना कूदल रहतन त हमार जान नाहीं बचत पूर्णमासी काका दक्खिन टोला में रहें आ गाँव भर के जीयन- मरन में नगाड़ा बजावें। गाँव भर के लड़के, चाहे ऊ कवनो जात बिरादरी के रहें, उनके काका कहें। हरिचन के दुसरका घर जेल रहे छव महीना जेल में रहें, छव महीना घरे बड़हन घरे चोरी करें, छोटकन में बाँटें एक बेर पुलिस वाला लोग उनके बोला के सेन्हि काटे के कला के बारे में बहुत कुछ सीखल जानल सेन्हि आ जेब एतना सफाई से काटें। कि जेब आ दीवाल के कम से कम नुकसान होखे आ रुपया आ गहनागुरिया गायब हो जा। पुलिस वालन खातिर ऊ चोर त रहबे कइलन, कलाकारो रहलन।

हमके कुँआ में गिरत हरिचन देखलें त हमार जान बचावे खातिर तुरंते ओमें कूद गइले आ हमके अपने दुनों हाथे में छान लिहलन। जब हल्ला भइल त पुर्नमासी काका कुदलें आ सीधे गिरलन हरिचन के पीठ पर हमके त ढेर चोट नाहीं लागल लेकिन हरिचन के पीठ पर कई महीना ले शराब के मालिश भइल। हमरे गाँव के बसावट देखि के लागेला कि एकर रचना विश्वकर्मा के कवनो सहायक कइले होई । उत्तर में आम के विशाल बगइचा, दक्खिन में ओहू से गझिन शीशम, जामुन, आम के पेड़ पूरब में बड़का पोखरा, पश्चिमो में विशाल पोखरा जल आ वनस्पति के चारदीवारी । सात आठ घर ब्राह्मण, बाकी पिछड़ा (आज के भाषा में) आ दलित कुछ घरन के छोड़ के बाकी सर्वहारा, मजूर। दिन भर हाड़-तोड़ मिहनत के बाद साँझ के चूल्हा जरे एकरे बादो हियरा सुख के अँजोर से दप-दप। लेकिन एह सुख के आँख नाहीं, देख सकेला| अनन्त दुःखन के भार के गठरी लोग कइसे ढो पाइत अगर ई सुख नाहीं रहित? फटल पुरान कपड़ा पहिरले मेहरारू खेत में काम करत गा रहल बाड़ी, पता नहीं रात में पेट में दाना गइल कि नाहीं-

जइसे दूध में पानी मिलेला वइसे मिला तेरे साथ जइसे उड़े अकास में चिरइया वइसे उड़ों तेरे साथ संवरिया रे, काहें मारै नजरिया मारै नजरिया, जगावै पिरितिया, सँवरिया रे .....

.. मोती बरई अकेले रहें। जीवन में कब्बो उनके देही हरदी ना चढ़ल एसे ऊ हरदी से घिनायें दुगो टिक्कर आ आलू के चोखा उनके बारहमासी भोजन रहे। दिन भर में एतने भर के कमाई हो पावे। खा-पी के रात के आठ बजे अपने झोपड़ी के बहरा बोरा बिछा के बइठ जाँ आ काने पर हाथ दे के बिरहा गावें। बिरहा के बिरह उनके गला में अइसन उतरि आवे कि सुनवइया के आँख से लोर बहे लागे। मोती लगे सात-आठ कट्ठा जमीन रहे जवन प्रेमचंद के 'रंगभूमि' के सूरदास के जमीन अइसन गाय-गोरू के चरे के काम आवे। जब हमार गाँव शहर में बदले लागल तब कुछ लोग जाल बट्टा के के ओपर कब्जा करे के फेर में परल लेकिन मोती लाठी ले के परती में खड़ा होके ताल ठोंके लगलन... जे अपने माई के दूध पियले होखे ऊ एमें आपन डेग डारि दे...'। अपने माई के दूध त धरती पकड़ लोगो पियले रहे लेकिन ए धरती पुत्र के चुनौती केहू स्वीकार ना कइल

गाँव के उत्तर कोरया के जंगल रहे लोग दिशा-मैदान जा आ ओकरे आड़ में सघन गगन के नीचे बइठ के चिन्तन करे। एकरे अलावा ओह जंगल के कवनो उपयोग ना रहे- ओकर फल-फूल लकड़ी न चढ़ावे के काम आवे, न जरावे के सबेरे निपटान वालन के अड्डा रहे, दुपहर में प्रेम-रोगिन के आ रात के चोरन के। जब केहू के घरे चोरी होखे त चोर कोरया में खोजल जा। प्रेमिन के एकांत कोरया में मिले। सबसे पहिले ओ अभेदय वन के भेदलस बिजली विभाग चार सौ चालीस वाट के लाइन दठरावे खातिर खंभा गड़े के भइल त इंजीनियर लोग बीचोबीच ओकर सीना चीर के बड़का बड़का खम्भा गाड़ि दिहलन दु फाड़ होते जंगल लुटाये लागल। दुइए तीन साल में उहँवा अइसन सपाट मैदान हो गइल कि लोग मैदान जाये में सरमाय लागल।

पश्चिमे के ओर से हमरे गाँव पर औद्योगिक हमला भइल। थापर घराना के लोग एगो चीनी मिल लगावे खातिर जमीन के सर्वे करत-करत हमरे बाबा लगे अइलन जवन जमीन उनके पसंद आइल ऊ हमार आ हमरे पट्टीदारी के जमीन रहे। जमीन खातिर पइसा आ लइकन के नौकरी-सभे तइयार हो गइल । साले घर में, जवने जमीन पर पीयर फसल लहराय ओपर चिमनी के करिया करिया धुआँ छा गइल। मिल बनते गाँव गन्हाये लागल।

गाँव में जब शहर घुसेला त सबसे पहिले ऊ परम्परा के मारेला आ लोगन से कुछ रिश्तन के छीन लेला गाँव अपने आप में एगो परिवार होला। सब एगो मजबूत रिश्ता में बन्हल होला आ रिश्ता के डोर जाति-धर्म-सम्प्रदाय-अमीर-गरीब से बहरा बन्हल रहेला एह गाँव-परिवार के सदस्यन के बीच एतना समझ होले कि ऊ जानेलंड कि गाँव कवने बात पर भड़केला, कवने में रस लेला, केपर रोवेला आ सबसे ज्यादा ई कि केपर हँसेला? गाँव में जब शहर घुसेला त सबसे पहिले ओकर हँसी गायब होले आ धीरे-धीरे समझ ।

मोती के जमीन पर एगो सेठ के कब्जा हो गइल। ऊ फर्जी कागद-पत्तर बनवा के अपने नामे चढ़वा लेहलन। एह डकैती में सहयोग मिलल मोती के दु पट्टिदारन के। उनसे निर्गुन भुला गइल। रोज सबेरे-साँझ नियम से सेठ के दुआरि पर जाँ आ एक से एक घराऊं गारी से उनके असीसें कई बेर सेठ आ गुण्डन से बतियावल गइल लेकिन गारी के उठवना बंद ना भइल । पइसा रुपया पंचायत सब बेकार, बेअसर अपने गाँव नाहीं, आसो पास के गाँव जानि गइल कि सेठवा चोर है। -

अब खाली पर्व-त्योहार पर ई गाँव गाँव लागे। फगुआ, पचइयाँ, नागपंचमी जब आवे तब शहर के टोपी उतार के ई फेर गाँव हो जा। फगुआ दुपहरिया से खेलल जा ओकरे बाद लोग बंसी बाबा के घरे ढोल-झाल ले के जुटे गारी, अबीर, गड़ी-छोहाड़ा, इत्र देत, खात, लगावत लोग एक-एक घरे पहुँचे आ गावें सदा अनन्द रहे एहि द्वारे, जीये से खेले होरीss...। - -

गंगाशरण मउसा प्राइमरी स्कूल में अध्यापक रहलन। कवनो संतान ना रहे लेकिन गाँव भर के ऊ मउसा रहलन आ कुल लड़का उनके बेटा-बेटी! स्कूल में जब कवनो लड़का के कुछ ना आवे त मउसा ओकर ढोंढ़ी जोर से अईंठ के कहें, साबड़गिल्ले.... साबड़गिल्ले...। न छड़ी, न मुक्का न लात-लेकिन लइका राम सोझ हो जाँ मठसा, फगुआ के चैम्पियन रहें। आपन सीनियारिटी बतावे खातिर हर साल ऊ फगुआ गायन के शुरुआत 'सुराजी फगुआ' से करें जवने के टेक रहे 'भारत छोड़ो अंगरेजो'। लोग कहे कि अंगरेज अब कहाँ बानं कि एके गावत बाड़s ? मउसा कहें, 'ईहे बतावे खातिर गाई लां कि लोग जाने कि अंगरेजवा कुल भारत छोड़लन नाहीं, उनके छोड़े के परल। आ गान्ही बाबा छोड़वलन। हमहूँ उनके एगो सिपाही रहल आ एही होरी के बंदूक से अंगरेजन पर फायर 'करों।'

आखिरी घरे पहुँचत पहुँचत रात हो जा। होली मण्डली के लोगन के पहिचान मिट जा आ सब एक तरह के लडके। जेकरे घरे में ताला बंद रहे ओकरे दुआर पर गुलाल छिरिक दोहल जा । मउसा कहें, 'बाबू, होली के श्रृंगार एही में ह कि सबके पहचान खो जा सब एक अइसन लड़के।' ऊ कन्हैया के गोपी बना दें आ उनके माँग सँवार के रोरी से भर के कहें, 'लला, फिर आइयो खेलन होरी।'

बसंत आवे त पूरा गाँव महके लागे फूल आ आम के मौर के बंदनवार सजे आ होली आ चैती के धुन पर सब थिरके लागे एक बेर मउसा से पुछलीं कि 'फाग आ चैता के गीतन में लय के एतना उतार-चढ़ाव काहें आवेला?"

मउसा बतावे लगलन, 'ए बाबू! बसंतवा गाँठ आ पुल दुनो हउवे। आधा पिछला संवत् में, आधा नयका संवत् में फइलल रहेला। आधा में पतझर होला, आधा में कुसुमन आ पल्लवन पुरनका सृष्टि के पहिले ऊ पेड़न के दूँठ बनावेला, फेर ओकरे गाँठ-गाँठ में नया कल्ला फूटेला आ पूरा पेड़वे कली आ फूल से भर जाला । पुरान आ नया के बीच ई पुल बनेला एकर आधा भाग ज्वार है, आधा भाटा। एही से फाग आ चैता के लय में एतना उतार-चढ़ाव आवेला नयका संवत के यज्ञ में पहिलका आहुति बसंते देला । गर्मी में घी जइसन पिघलेला आ जाड़ा के आरम्भ के सृष्टि के यज्ञ में आहुति बन के जरेला। देखs बाबू, फागुन आ चइत उतपाती महीना ह-एमें जेतना आपन होला, निजी होला- ऊ सब झरे लागेला । पत्ती कुल पेड़े के छोड़ देलें। कब्बो समुद्र के किनारे गइल हउवऽ?

'देखवs बाबू, समुद्र में जब ज्वार आवेला त कुल लहर एक हो जाली आ जब भाटा आवेला त पछाड़ खाते हर लहर अकेल रहि जाले फागुन बसंत के ज्वार ह आ चैत ओकर भाटा। होली में सब दूँठ बन के एक जइसन हो जाला, जे ना होला ओहू के लोग रंग पोत के अपने जइसन बना लेला आ चैत में? हर डाल पर अलग-अलग रंग के फूल खिलेला आ पूरा बगड़चा कई रंगन के नशा में झूमे लागेला । 

हमरे याद आवेला कि सम्मत (होलिका) जरे त अम्मा बुकवा लगावे खातिर परेशान हो जाँ। जब हम बड़हन हो गइलीं तब्बो ऊ बुकवा (उबटन) लगावे के कहें आ हमरे मना कइले के बावजूद गोड़ के एक अंगूठा में लगा के अनुष्ठान पूरा करें। कहें, 'एकरे साथै साल भर के मइल छूट जाई आ ओके बटोर के सम्मति में जरा देहले के बाद तोहार देहिया नया हो जाई।' आज बुझाला कि अम्मा के बोध में केतना सहजता रहे कि पुरान साल के मइल बाहर हो जा, ओके गाँव भर के कूड़ा-कचरा के साथ सम्मति में डार के जरा दोहल जा, तब्बे कुछ नया शुरू हो सकेला|

हमरे गाँव में एगो कविजी रहें, अरविन्द जी। ऊ नियम से रोज एगो कविता लिखें। साल में तीन सौ पैंसठ कविता के विश्व रिकॉर्ड उनही लगे रहे। कविता के लाठी से ऊ पूरा सृष्टि के संचालन करें। उनके कविता न कहीं छपे, न केहू उनके सुनल चाहे, तब्बों अपने कारखाना में ऊ रोज कविता के प्रक्षेपास्त्र बनावें आ मौसम, त्यौहार, आदमी सब पर दागे। बरसात पर उनके एगो कविता 'आज' अखबार में छपि गइल 'गड़गड़गड़ गड़ाम, सूख गइल घरती के प्रान! शेष रहल दू दिन अषाढ़ ...।' जब केहू ई कविता सुनावे के कहे तब अरविन्द जी बिगड़ के कहें, 'तोहरे त खेतबारी बटले नाहीं बा फटकचंद गिरधारी हवs तू । अबे ई कवितवा सुना दीं त बरखा बरसे लागो त खरिहाने के का होई? अनजा भींज के सरि जाई त नुकसान के भरी? तोहार बाप?"

चइत के महीना में मउसा, गोसाई, राम चन्नर बाबा के टोली चैता के धुन छेड़े-

जियरा जरत रहत दिन रैन ए रामा

जरत रहत दिन रैन

अमवा के डरिया कोयलिया बोले

तनिको न आवत चैन, हो रामा

जरत रहत दिन रैन...

हम सोच कि चइत फसल तइयार भइले के महीना है। पकल खेत धूप में सोना अइसन चमके लागेला । पकल गेहूँ के गंध के साथ बउराइल आम के गंध मिल के अइसन सुबास फइला देले कि तन-मन अत्र धन देखि के बउरा जाला । अइसन मस्त समय में जब संतोष आ तृप्ति के स्वर फूटे के चाहीं, तब चैती के स्वर एतना उदास काहे हो जाला? उल्लास में उदासी काहें?

अरविन्द कवि से पुछलों त ऊ कहलन, 'ए बाबू, उत्सव के बाद अवसाद आवेला ई फागुन के उत्सव के बाद के अवसाद है। बिआह बितले के बाद के अवसाद है, ई। फाग के गीतन में चुनौती होला, सबके पानी उतार देवे के चुनौती स्नेह के बल पर सबके साथ ले चले के, सबके रंग में सराबोर करेके सबके आदमी से रंग बना देवे के चुनौती। चड़ती के दर्द आपन नाहीं, सबके होला चइतो सुधी के गीत लागेला लेकिन ह बेसुधी के गीत! उत्सव के बाद के उदासी में अपने खुदी के खो देवे वाला गीत।'

आज बुझाला कि अरविन्द बाबा सही कहें होली के दिन अपने वर्तमान पर विश्वास करे वाला दिन होला। ओह वर्तमान में आपन अतीत जेतना छन के आ गइल बा, ऊहे आपन है। जवन पतई पेड़ से झरि गइल, उ त झरते पराया हो गइल, ओकरे खातिर का रोवल? पेड़ के रग-रग में उभरल संकल्प के देखे के चाहीं जवन नस-नस के पुलक से भरि देला आ एह पुलक के गमगमात फूल से भर देला आ जगा देला फूल के फल भइले के आशा होली के कोख से ई आशा जन्मेले आ चइत के कोख से फूल पहले के सम्भावना । के फल

हमरे गाँव में साँझ होखे त 'गोधूलि' कहल जा आ भोरहरी के पहचान 'सुकवा' उगले पर होखे। सूरज भगवान जब कपारे पर सवार होखे त दुपहरिया खिले अब ई सब बिसरत बा। आदमों के प्रकृति से जवन रिश्ता होला, ओकर पहचान जब बिसरि जाले व ओही के साथ माई, बाबू जी, काका, मामा, चाचा, फूफा, मठसा, मठसी, चाची, मामी, सास-ससुर, भटजी भइया, जेठ-जेठानी, देवरानी, ननद जइसन अनगिनत रिश्तन के नामों बिसरत जाला आ आदमी लहर न बन के लकीर बन जाला। गाँव लहर बनावेला, शहर लकीर।

अजुओ हमरे गाँव के सोवाने पर हनुमान मंदिर बा। ओकरे आगे काली माई आ डीह बाबा के थान। दशहरा आवे त पूरा गाँव मंदिरे पर जुटे। उहँवा नीलकण्ठ के दरसन होखे, चुकों में जी के बाल बन्हाय, रावण हमरे इहाँ दशहरा के नाहीं, पूर्णमासी के जरे। काली जी के थाने पर दूनो नवरात्र में खूब जगमग होखे अब त काली जी के थान चारो और मकानन से घेरा गइल वा पहिले चारो ओर खूब फइलहर मैदान रहे। नवमी के दिने असंख्य चूल्हा जरे आ गाँव भर के मेहरारू सोहारी आ हलुवा बना के माई के चढ़ावें । आम, कैथा, आवला के पेड़, कनेर आ बेला के झाड़ी, जूही आ चमेली के लतर से सजल काली माई के दरबार में सब बेटा बनि जा सौ साल के रहे भा एक साल के पण्डित जी मंत्र पढ़ें- 'जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ।

दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।'

जई चुरकी में बान्हत के पण्डित जी जब ई मंत्र बाँचें त बुझा जइसे जई के रूप में माई के आशीर्वाद माथे पर बरसत बा। शक्ति के सूत्रपात होला अपना के उत्कृष्ट सिद्ध कइले में, लेकिन उत्कर्ष सिद्ध होके रहि जाय ई शक्ति के गतिरोध ह। उत्कर्ष के माने होला मंगलमय भइल, दुसरा के कल्याण खातिर शक्तिमान भइल। जे दुसरा के मंगल खातिर युद्ध भूमि में उतरेला, ओके अमंगलकारी लोगन के विनाश खातिर कालरूप बने के परेला। काली अमंगल के विनाश अमंगलकारी के कल्याण के भाव से करेली। कालो काली के आराधना करेला काल के स्वभाव ह मिटावल कालियो के कार ह संहार। लेकिन काली के संहार भद्र के भूमि के रचना करेला एही से काली के भद्रकाली कहल जाला।

समय के साथ हमरो गाँव धीरे-धीरे बदले लागल। पहिले चीनी मिल आइल, फेर टाउन एरिया, फेर नगरपालिका, फेर तहसील आ बाद में जिला जिला होते कुल गाँव मोहल्ला हो गइल आ गाँव के होली दीवाली, दशहरा, पंचमी, सावन-भादो, कुआर, कातिक, फगुआ चैती सब ओमें समा के बिला गइल। जबले ई गाँव रहे बसंत पंचमी के दिन घर-घर में सरस्वती के पूजा होखे। ब्रह्मा माने ध्वनि आ सरस्वती माने गति। ध्वनि जब गतिशील भइल तब एह सृष्टि के रचना भइल एसे सरस्वती सृष्टि के इच्छा त हइए हई, सृष्टि ओकर नया प्रस्तुतियो हई । पण्डित जी पूजा करें आ श्रीपंचमी के महातम बतावें । एक बेर हम पुछली कि बसंत पंचमी के रउरे श्रीपंचमी काहे कहेली? पण्डित जी के जबाब अब्बो हमके याद बा । ऊ बतवलन, नीरन बाबू, श्री लक्ष्मी के नाम ह आ एह घरतियो के, जवन हमनी के धारण कइले बा । आज के दिन सरस्वती, लक्ष्मी आ धरती तीनो के सम्पुट बनेला, एसे एके श्रीपंचमियो कहल जाला।' - "

माघ आवत-आवत हरियर चादर ओढले धरती फुलाय लागेला, गमक के गुनगुनाय लागेला । खेत सरसों के रंग में रंगा के पीयर पीयर हो जाला। ओही रंग के कपड़ा पहिर के जब आदमी सरस्वती के पूजा करेला त देबी, साधक, धरती सबके रंग एक हो जाला- पीयर पीयर ! ईहे गाँव के असली रंग होला। सत, रज, तम तीनो गुण मिलि के गाँव के रचना करेला । सत के रंग सफेद होला, रज के केसरिया राग जब सत के आराधना करेला तब ऊ सात्विक राग हो जाला, आसुरियो रंग सफेद से मिलि के पीयर हो जाला ।

गाँव के ई स्वभाव है कि ऊ सुविधा के बात ना करेला, ऊ आपन बात करेला आ ओहू से ज्यादा दुसरा के सुनल चाहेला, भर मन सुनल चाहेला गाँव के स्वभावे ह, सुनल। संस्कृत में सेवा खातिर शब्द ह, 'सुश्रुषा'- जवने के अर्थ ह सुनले के इच्छा सुने के मन होखे तब्बे सेवाभाव आवेला । 

शहर बनले के बाद सब बदल गइल के सुने, के सुनावे? कुल गाँवन अइसन हमरो गाँव एगो सात्विक राग रहे, जेके सब मिलि के गावे फागुन में, चइत में, सावन में, पीड़ा में, उल्लास में, पतझर में मधुमास में सबके अलग-अलग रंग रहे। लेकिन सब मिलि के एक रंग होजा-पीयर बसंत के रंग। अब के सुने, के के सुनावे? सब रंगन के सोख लिहलस शहर गाँव जब मिट के शहर बनेला तब दुइए रंग रहि जाला- करिया आ लाल । करिया में समा के कुल रंग करिया हो जाले आ ओसे लड़ेला लाल रंग लेकिन धीरे- धीरे उहो करिया हो जाला।

पंचमी अब्बो आवेला, लेकिन ओमें बसंते गायब बा। शहर के नाते बाहर के बसंत त विदे हो गइल, भितरो ना बचल गाँव रहित त बचाइत। अब के बचाई ?

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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