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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023

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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के हवा कुछ कह रहल बा आ ऊ एगो ललित निबन्धों लिख देलन 'हवा कुछ कह रही है। हमार परेशानी ई बा कि का कहीं आ का छोड़ीं। पहिलवा साल में दू-चार वे चल जाई त घर-दुआर- -देयाद- गोतिया पटिदार सबसे मिलल जुलल हो जात रहल बाकिर जबे से शरीर कुछ भारी भइल, पैदल सीवानो लाँघल भारी हो गइल बाकिर गउवा जब चुम्बक अस खींचेला त अबो जनाला जइसे तीन-चार मील त हम चलिए सकला आजकाल्ह त गाँवे जाय खातिर रिक्शो-तांगा होइए गइल बा।

आजकाल्ह त जनाता कि शहर वालन खातिर गाँव के बतियों बेचात बा हमरा गाँव में आधा से अधिक लोग अइसन वा जे बा त उमिर में हमरा से छोटे, बाकिर नाता में हमार चाचा- बाबा लागेला बड़ा बाउर लागेला कि हमरा पवलग्गी करे से पहिलहीं ऊ लोग हाथ जोड़े लागेला। हमरा त ना कवनो बड़ भाई ना बहिन हमरा के जमराज डरे ना छुअले काहे कि हम त अपना भाई बहिन अस छत्री रहीं ना। हम त एक पसेरी धान प सुरेवा दुसाधिन के हाथ बेचा गइल रहीं, दुसाध हो गइल रहीं। जमराज धोखा खा गइले । आजो सुरेबा माई के लइका पतोह परिवार खतिरा हम भइए बच्चे हुई। पहिला बे कलम उठवली त सुरेवा माई के नमस्कार लिखलों लोग-बाग कहेला कि तू छत्री - जमींदार के लड़का, ई कुल्ह का लिखत रहेलऽ दलित-नान्ह के कथा-कहानी! एकर कवनो जबाब हमके लउकत नइखे, सिवाय एके कि हमरे बखरी के सामने से जवन रस्ता गाँव के बहरी काली माई के मन्दिर और जाला तवने बँटवारा के लाइन ह, एहर बाबू लोग, ओहर दुसाध- चमार त हम आधा गाँव प का लिखीं। अपना देयादी पट्टी के ओनहन प जुलुम हमके कबो सहाइल ना आ देख के रहाइल ना।

हमार माई बहुते कहनी सुनावे। जादेतर चिरई चुरुंग के ओमें से एगो त बेर-बेर सुनलीं कि एगो नन्हीं चुकी चिरई के कुलही राजा चोरा लेलस चिरईया रोजे राजा के बँड़ेरी पर वइट जाय आ गावे रजवा गरीब भइल, कुलही चोरा लेलस। राजा कुलही लवटा देले। 

चिरइया फेरू गावे लगल-रजवा डेरा गइल कुलही लवटा गइल...। राजा बहेलिया के

बोलवले आ कहले कि चिरईया पकड़ ले आव नदी किनारे के पेड़ से बहेलिया ओके

फसवलस आ ले चलल । चिरईया फेर शुरू कइलस हमके व्याध लेले जाला, बहेली लेले

जाला, नदिया किनारे रहिया ताकत होइहें बचवा... बाकिर बेयाध काहेके कुछ सुने जाय।

ऊ राजा के देलस, राजा दे देलस रसोई में पकावे खातिर चिरई के काट-कूट के चूल्हा

प रखाइल चिरंइया तबो ना चुपाइल- हमरा तेल लागत बाटे, मसाला लागत बाटे, छुनुर -

मुत्रुर होत बा....। पका के रजवा खा गइल बाकिर ऊ चिरई त अमर रहे। रजवा के पेटवों

में लागल दोहरावे नदिया किनारे रोअत होइहें मोर बचवा...। रजवा बड़ी मुश्किल से

ओकरा के बहरी निकललस। होशियारी ई कइलस कि दू ठे सिपाही लेके बहरी अलंग

गइल आ चेता देलस कि चिरई के निकलते मार देल जाय। ईहे भइल, बाकिर चिरई त

फुर्र से निकल गइल, रजवा के... कट गइल... हम एह अदम्य चिरई के साथ मानत रहल

हई आ आजु ले ओकरे के लिखत जात बानी एगो अउर कहनी हमार माई सुनावै। सुनावै

त के जाने कतना दो। ...पिड़िया के बरत के कथा कि रनिया के लड़का मर जाय, चेरिया

के जीए। बड़ा दुलार के रनिया आके चेरिया से पुछलस कि काहे तोर जियाछ भइल, काहे

मोर मराछ भइल। अछरे अछरे माई के बोली- बानी कि तू राजा के रनिया, खटिया से

उठलू, मुँह जुठिआइ लिहलू, पान फल काटे लगलू, हम त चेरिया एक नेमी एक घरमी,

गोबरा पार्थी त उहें कहनिया सुनलीं, नहाय गइलीं तबो ऊहे कहनिया सुनली एही से मोर

जियाछ भइल तोर मराछ भइल...।

एक ठे अउर कहानी सुनावें, ऊहो नइखे भुलात गा-गा के सुनावै कि एक दिन राजकुमार एक ठे परी देख लिहलन, ओही के नीने सूतस ओही के नीचे जागस। उनुके दशा ना देखल गइल परी से त ऊ उनसे कहली कि इनर के सभा में अइहs कहिह जइसन नाच ओइसन बाजा नइखे तीन-चार वे कहबड त बजनहरू कँउच जइहें, कहिहें कि तूहीं बजावS | हम तहरा मिरदंग प अँगुरी छुआ देव सुनके इन्नर सभा मोहा जाई । इन्नर कहिहें कि जवन चाहीं तवन माँग ल तू कहिहऽ कि हमके त परी चाही। असही असहीं भइल।- अँइसे जब भइल, जब इन्नर से राजा कहले कि हमके त परी चाहीं त इन्नर कहले कि ई परी त हमार उरबसी है। एकरे के हम तोके खलिसा बारह बरिस बदे देब राजा त अतने में मगन दिन जात देर ना लागल बारह बरिस बीत गइल। राजा परी के अँचरा प सुत्तल रहन। इन्नर पुरुब दिशा के भेजलन कि जा आपन भैने उरबसिया के ले आवs | पुरुब दिशा पहुँच के कहले कि सुनु-सुनु भैने, लागू तोरे गोहने, पुजले बारह बरीस रे...। उरबसिया कहलस कि कइसे के उठीं मात, कइसे लागू गोहने, अँचरा सुतल मोरे राजकुंअर...। चारो दिशा लोग असहीं आ-आके ले जाय के कोशिश कइले बाकिर पत बेर ईहे जबाब मिले। हार दाव देके इन्नर खुदे अइले कहलें कि अँचरा के कैंची से काट द आ चल चलs | 

..ऊहे अँचरा के टुकवा लेके राजकुँवर रोवत- रोवत बन बन खोजले उनुकर दुख देख के पेड़न के पत्ता झर गइल जइसे ऊहो रोवत होख स

माई से सुनल ई कहनिया, बाद में देखली बेदो में बा माई बेद कहाँ पढ़ल? संस्कृत त संस्कृत, ओकरा त हिन्दियो ना आवे सुबहित त ई बताई कि भोजपुरी में ऋग्वेद कहाँ से आ गइल ?

माई त बड़ी-बड़ी कथा कहनी सुनावे, सब सुनाई त पार ना पाइब एगो नया सुनीं। एक बे पटना गइलीं। श्रोता लोग में एगो दुसाध रहन कहलन कि डॉक्टर साहेब रउआ हमरा जात के महान बना दिहलीं। हम कहलीं कि ल हमार त माइए रहली सुरेबा दुसाधिन त दुसाध छोट कइसे होई भाई कहलीं कि देखs, ओमें हम लिखले बानी कि जवन काम सँउसे सेना ना करे पावे ऊ करे खातिर एगो कोतल सेना होला। ओके संस्कृत में दुस्साधिक कहल जात रहे। जवन केहू से ना सधे ओके जे साधे ऊ दुसाध । त बड़ तू पहिलहीं से बाड़s भाई एमें हमार कवन बड़ाई ।

बड़ा मुश्किल बा कि हम बनारस में रह के कुछ लिखोला त समझला कि गाँवे केहू का पढ़ी एके, बाकिर एक वे गाँवे गइलों त बड़ा फेरा में परलों बहुत दिन बाद इसबदार धोबी आ गइले आ कहले हि ए बचवा, हम जियते बानी आ तू हमके मार देलऽ? हम कहलों कि हम काहे के मारों तोके हो? कहले कि ल, कितबवा में अपना तूहीं न लिखले हउअ कि इसबदार धोबी लूक लगले से मर गइले हम कसहूँ-कसहूँ इसबदार के समुझवली. कि तू जिय भाई, ऊ इसबदार घोबी कवनो दोसर रहले जाते-जात कह कइले कि ठीक तू बा, बाकिर आगे अइसन काम मत करिह ।

हमरे गाँव में एक-से-एक उत्साही लोग बाड़न एक बे गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी कहलन कि का हो, जमानिया चलब? कहनी कि का बा ओइजा, त कहलन कि बड़ा भारी काम करे जा तानी, कनोकेसन होई। कनोकेसन क के आ 'साटिकफिटिक' बाँट- ओट के जब ऊ हमरा सँगे इसकुलवा के बहरी अइलन त देखलन कि 50-60 आदमी गोजी-डण्डा लेके ठाढ़ बाड़न ऊ लोग हमरा से बतिआवे लागल त गुरुजी पुछलन कि ई लोग के है। बतवलीं कि हमरा गाँवे के ओहू लोग के बतवलीं कि हमार गुरुजी हवन । कहे के देर रहे कि ऊ लोग अड़ गइल कि बचवा तूहूँ चलs गाँवे आ अपना गुरुजी के ले चलs, बड़ा भाग से त....। गुरुजी के चेहरा प चिन्ता चिन्हासी देखके हम ओ लोग के कहलीं कि आहों, आजकाल त नहरिया कटल होई, छवरिया में पानी बहत होई। गुरुजी के गड़िया जाई कहसे? त बाबू कलिका सिंह बोललन कि बचवा, हमहन बाँसे लगा के जब अँडसन के ए पार से ओ पार क देनी जा, त का गड़िया के ना क देल जाई? द्विवेदी जी लगलन माथा खजुआवे । हम आखिरी लंगो लगवलीं कहलीं कि सब त ठीक बा बाकिर गाँव में मर मैदान खातिर त बहरा जाय के परी, अवरू कवनो इन्तजाम त बा ना, त गुरुजी के त बड़ा तकलीफ होई...। ई बात ओ लोग के बुझा गइल। कहल लोग कि ठीक बा, ऊ कुल्ह बन जाय द बचवा, बाकिर बन जाय त गुरुजी के लिवा के जरूर अइहs अब त खैर ऊहो कुल्ह इन्तजाम गाँव में हो गइल, बाकिर अब त पण्डिए जी नइखन !

हमरा गाँव में सबसे बढ़िया महीना चइत के होला। काली जी के मंदिर प एगो छोटे-

मोटे मेलो लाग जाला, दंगल होला । सबेरे रोट आ पियरी चढेला काली के । खस्सियो-

ओस्सी कटाला, बड़ा खराब लगेला । लोग गाधी मारेला कि मलेच्छ घरे ई विभोषन जनमल

बा बाकिर हमके त इहे लोगेला कि माँस खा के माँस बढ़ावे से घास खा के मर गइल

अच्छा। बाकिर एसे कबो-कबो घटो हो जाला। अबकी गाँवे गइलों त कवन दो हल्ला

क देलस कि ई खलिसा सागे रोटी खाले । अब भइल तमाशा घरे-घरे से सागे-रोटी बनके

आ गइल कहली कि भागऽ ए गाँव से...।

बाकिर साँच त ई बा कि बड़ा मोह उपजेला गाँव गइले पर गँउआ एक ठे जिन्दा

जनावर मतिन लागेला ऊ साँस लेला त पेड़ के पत्ता झरेला ऊ साँस छोड़ेला त कल्ला

फूटेला ऊ करवट बदलेला त मौसम बदल जाला। क हँसेला, ऊ रोएला त बाढ़ आवेला,

कुल्ह खेत डूब जाला, फसल गल जाला। सँउसे के सँउसे गाँव एगो अइसन जिगरी इयार

मतिन लागेला कि ओकरे सामने शहर धरमशाला लागेला। मन के बात मने में रह जाला ।

के जाने का कहले प के हँसी के रोई। हम त अपना गाँव प लिखे लागों त दस ठे किताब

हो जाई। लोग कहेला कि आत्मकथा लिखा। हम डेराइलां कि कइसे छुई। एक वे जो लोर

के बान्ह टूटल त ई सगरो जवन कुछ वा ऊ बहा जाई। आज ले जतना लिखले बानी झूठ

ह, सही खलिसा इहे बा कि गाँव ना रहित त शिवप्रसाद सिंह ना रहतन इम अतने जानऽ

तानी कि शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव ।

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हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

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