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थोरे में निबाह

31 October 2023

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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सरकार के ध्यान गइल । अपना गरीबी में बढ़त ईहाँ के ए लोगन के सम्हारत, ई गाँव आगे बढ़ल ह। एह गाँव के आस-पास कुछ नामी नामी जगह जरूर बा तीन कोस दूर देवरहा बाबा के कर्मस्थान बा, जाँवा उनका जीते जी हिन्दुस्तान के सब रथी-महारथी पधरले होई, अपना उत्थान के आ अपना दुश्मन के विनाश के योजना बनवले होई। डेढ़ कोस दूर घाघरा नदी पर बसल भागलपुर, जहाँ से पुरातन काल में कवनो ऐतिहासिक चीनी बौद्ध यात्री गुजरल रहे, उहाँ एगो पुरातन मंदिरो वा अप्रतिम मंदिर, बाकिर आज अपना दुर्दशा पर रो रहल बा । घाघरा के पानी से कट कट के एकर देवार इहि रहल बा, कुछुए साल में इहो मंदिर घाघरा के पानी में विलीन हो जाई भागलपुर में बी.डी.ओ. रहेले, कहाँ औरियो सरकारी दफ्तर बा कलक्टरो महोदय के एकरी मरम्मत खातिर दरखास्त दीहल गइल बाकिर केहू के कान पर जूं नाहीं रेंगल अलबत्ते, हमरा गाँव में एगो शंकर भगवान के मंदिर बा, पोखरा के किनारे ई मंदिर हमार बाबा पंडित केदारनाथ अपना मित्र दर्जी जमुनालाल साधे मिलके बनवले, बाकिर ईहो मंदिर आज मरम्मत बिना गिरला के नजदीक आ गइल बा। एके बनववला के कोशिशो भइल, शर्त ई रखल गइल कि मंदिर के बनवाई के आधा पइसा गाँव वाला जुटावें, आधा पइसा के इंतजाम बाहर से हो जाई। बाहर के पइसा त आ गइल, बाकिर गाँव के पइसा ना जुट पावल, मंदिर के काम जहाँ के तहें रहि गइल, अब कइसे मान लिहल जा कि गाँव के लोगन के घरम-करम में बहुत आस्था होला ? अब त अइसन लागे लागल कि उमा भारती भा बसुन्धरा राजे की तरह कवनो महिला लखनऊ के राजगद्दी पर बइठहें तवे गाँवन के जीर्ण मंदिरन के उद्धार होई। वइसे हमरा गाँव के मुसलमान भाई धर्म के प्रति निष्ठा के अद्भुत उदाहरण पेश कइले कुछुए घर मिलि के चंदा इकट्ठा क के एगो सुन्दर मस्जिद बनना दिहलें आ ओकरे रख-रखाव पर जेतना पइसा लागेला ऊ ओके सहर्ष देला लोग।

अम्मा से पुछला पर कहो अंदाज से बतावें कि देस की आजादी के बाद के हमार जनम ह, केतना साल बाद, ऊ ना बता पायें। दादी कहें कि गान्हीं महात्मा के मुअला के बाद जनम भइल, गाँधी जी के संदर्भ अइला पर ऊ ई जरूर कहें कि गान्ही अइले त आन्हो ले अइलें, अइसन बा ए गाँधी बाबा के महातम! बड़ बढ़, लरिका, जवान सबकी जबान पर ई नाँव चढ़ि गइल रहे। दादी के आजादी के समय के औरी कवनो नाँव मालूम ना रहे। इहो बात काबिलेतारीफ बा कि मंदिर जीर्णोद्धार के जवन नाकामयाब कोशिश भइल ओकरा खातिर जवन चंदा इकट्ठा भइल ओमें हर मुसलमान परिवार से सहर्ष चंदा आइल | का बतिआई एकरी आगे केहू हिन्दू-मुस्लिम एकता के बाति ! आजुओ गाँवे गइला पर जब कौनो मुसलमान भाई मिलिहें त रामे राम बोलि के अभिवादन करिहें।

बलिया जिला के सिकन्दरपुर कस्बा में दूगो मंदिरे के बहुते मान्यता बा। एह 'जलपा ' आ 'कलपा' मंदिर में हमार पूर्वज, घर में कवनो मांगलिक कार्यक्रम के पहिले पूजा करे आ आशीर्वाद लेवे जात रहलन। बिना 'जलपा' आ 'कलपा' के पूजा के कवनों कारे सम्पन्न ना होखे लड़कइँए से हमरे मन में ई उत्सुकता रहे कि एकर रहस्य का बा? का 'जलपा' आ 'कलपा' हमार कवनो पूर्वज रहलिन? का हमन के मूल निवास पचास-साठ किलोमीटर दूर सिकन्दरपुर रहे? अगर रहे त हमार पूर्वज कवने नाते महलिया आ के बसलन?

एह रहस्य के खोललन सिकन्दरपुर के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य श्री जनार्दन मिश्र जी । ऊ बतवलन कि सिकन्दर लोदी अपने राज्य विस्तार के क्रम में इहँवा बावन बीघा जमीन में किला बनवावत रहल, लेकिन दिन में दीवाल के चुनाई होखे आ राति होते दीवाल गिर जाय। एसे ओके बड़ा चिन्ता भइल। ओकर हरकारा एगो बड़हन ज्योतिषी के पकड़ के ले आइल । ज्योतिषी उपाय बतवलन कि अगर कवनो कुँवार ब्राह्मण कन्या के बलि दिया जाय त दीवाल ना गिरी। कुँवार ब्राह्मण कन्या जोहाय लागल त कुछ लोग सलाह देल कि काहे ना ज्योतिषिए जी के बेटी के बलि दे दिआय ज्योतिषी जी के ज्योतिष के बजर उनहीं पर गिरल । एगो गड़हा खोन के कलसा-ओलसा ध के उनुका बेटी जलपा से कहाइल कि पीयर बस्तर महिर के फल-फूल लेके गड़हवे में जाके पूजा क ल लइकी उतरल त उपरे से गड़हा बन क दियाइल किला के पूरबी दीवार के नीचे असहीं एगो दुसाध के बेटी 'कलपा' के चुनवा देल गइल रहे।

एही लइकिन के शाप परल कि इहाँ के कवनो ब्राह्मण परिवार में कुँवार कन्या के रहते केहू सुखी ना रह सकी। एकरा से बाँचे खातिर कुछ परिवार इहाँ से भागिए जाय में भलाई समझल, जे रहल से तबाह हो गइल ।

एही पलायित ब्राह्मण परिवारन में से कुछ लोग एह महलिया गाँव के बसावल । एही महलिया गाँव में हमार जनम भइल कवना साल आ तारीख के ई अब तक हमें नाहीं समझ में आइल। बहुत जोड़-घटाना कइला पर ई अंदाज बा कि 1948 साल के जनम है। वइसे स्कूल के मुताबिक जनम तारीख पहली जनवरी 1949 हउए। पहली जनवरी से गाँव के पढ़ल लिखल लोगन के विशेष प्रेम होला। ओह समय के पढ़ल लिखल बापे के लड़िका अधिकतर पहिलिए जनवरी के पैदा होखें, केहू ओहू लोगन से होसियार जरूरे ई सिखवले होई कि पहली जनवरी के जनम तारीख लिखवले से भविष्य में बहुत फायदा होई । बहरहाल, जनम तारीख के लेके हमें कबो कौनो दिलचस्पी नाहीं रहे। जब बाद में शुभचिन्तक लोग जनम दिन के बधाई में पुष्प गुच्छ, फूलमाला देवे लागल, त मना लिहल जाय, लेकिन कवनो उत्सुकता वगैरह नाहीं होखे। समझ में नाहीं आवे कि जनम-दिन, धूमधाम से काहे मनावल जाला। वइसे देखल जाय त ए दिने जिनगी के एगो साल कमे हो जाला। बाकिर अपना घर में ई फलसफा नाहीं चल पावेला । जब पत्नी के जनम दिन भोर परि जाला, जनमदिन मुबारक कहल आ जनमदिन के कवनो उपहार ले आइल भुला जालों त कम-से-कम एक हप्ता घरे में कोहराम मचल रहेला ।

हमार पालन-पोषण आ देख-भाल बहुत छोह आ दुलार से भइल। बहुत दिन के बाद घर में लरिका के जनम भइल रहे, एहलिए हर ओर खुशहाली रहे। ओइसे परिवार भरल-पुरल रहे, परिवार में दू गो चाचा, चार फूआ रहली, सब केहू एतना नेह छोह दे कि ई मालूम ना पड़े कि के पिता है के माता। गाँवन में परिवारन के छिन्न-भिन्न होत देखला पर अब मन बहुत अफसोस करेला आपसी नेह छोह अब कलह आ झगड़ा झंझट में बदल गइल बा । बियाह भइल ना कि पहिला काम अलगे-बिलगे भइला के होत बा। जब मारवाड़ी परिवारन के देखीलें, जवना में अब्बो एकत्र परिवार के भावना सुदृढ़ बा, त ई लागेला कि अपनी संस्कृति में कवनो कमी त नाहीं रहि गइल कि एतना जल्दी आपन रहन- सहन आ पारिवारिक धर्म आदमी भुला देत बा ! कहल जाला कि गरीबी में आदमी एक लगे जुटे आ पइसा अइला पर अलगा हो जालें । लेकिन मारवाड़ी समाज में त पारिवारिक एकजुटता एतना सम्पन्नता के बादो बनले बा । का कइल जा जेसे अपनियो समाज में पहिले के चैन, पारिवारिक एकजुटता, आपसी स्नेह वापस आ जा? चारो तरफ बढ़त गरीबी के रोकथाम में एकत्र परिवार अहम भूमिका निभा सकेला, इकट्ठा रहला से जमीनी के बँटवारा से परिवार बच जाइत आ खेतीबारी खातिर सबके सामूहिक धन दिहल जाइत । परिवार टुटला से खेतन के आकार एतना छोट हो गइल बा कि ढंग से खेती होइए ना सकेला । चकबन्दी के कवनो फायदा गाँव नाहीं उठा पावऽ ताड़े स

हमार शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गाँवही में भइल । अम्मा बतावें कि छोटेपन से हमार पढ़ाई-लिखाई में रुझान रहे। छोटपन के एगो बात अबो याद आवेला गाँवे के मुंशीजी ( पटवारी) के चाचा के लगे काफी आवाजाही रहल। ऊ आपन लाल पत्रा के रजिस्टर अक्सर ले आयें, हमार पढ़ला में दिलचस्पी देख के ओही रजिस्टर में से ललका पत्रा फाड़ के हमके दीहल करें। सादा पत्रा मिलला पर केतना खुशी होखे ! मुंशी जी हमरा के खूब मानें, एक दिन जब हम अठन्नी फीस खातिर रोअत रहली त याद आवेला कि ऊ अपना तरफ से 'आठ आना' निकाल के दिहले आ हमार फीस भराइल। ओह समय सबसे बड़हन इच्छा रहल कि पढ़ि-लिख के हमहूँ एक दिन मुंशीजी के तरे बनव ।

स्कूल में दाखिला बहुते छोट उमिर में हो गइल। स्कूल में दू तरह के लरिका रहलें, एक बड़का गोल आ दुसरा हमनी के तरे छोटका गोल। बड़का गोल के ज्यादातर लरिकन के पढ़ला लिखला से कवनो मतलब ना रहे। इस्कुले में अइसन लइका खाली मारपीट करे खातिर गइल करें। छोटका गोल के लइकन के तरह-तरह से सतावें आ यौन संबंधी बतियन में आपन समय बितावें। गाँवन के स्कूलन में आचार-विचार के बारे में जोर दौहल बहुत जरूरी बा उहाँ के लड़िका छोटपने में यौन संबंधी बातिन में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी लीहल शुरू क देलs सन

स्कूल के एक-एक बात मन परेला एही से बुझाला कि स्कूलन के केतना बड़हन असर हमनी पर पड़ेला। आज जब मराठी में देवनागरी लिपि में लिखल इश्तहार, निबंध, नोटिंग इत्यादि पढ़ेके परेला त बुझाला कि स्कूले के शिक्षक बाबू साहब के हमनी ऊपर केतना उपकार बा। मराठी में एको वाक्य शुद्ध लेखन ना हो सकेला एइसन गलती जवन हम सपनो में ना क सकैं तवन लोग सरेआम करेला दूध के दुध, मूल के मुल, हार्दिक के हार्दीक शुभ के शुभ नवीन के नविन इत्यादि लिखल त आम बात हउए एही से बाबू साहब के छड़ी जवन अशुद्ध लेख पर जोर से गिरे, अब आनन्ददायक लागेला ।

स्कूल में तरह-तरह के छात्र पढ़ाई करे आवें। ओहो में रहलें रामबड़ाई । ऊ पहुँच गइल आपन पटरी गेल्हि ले के पढ़ाई करे। उनके सिखावल रहे कि मास्टर लोग जइसे कही वइसे कहिह, पढ़े के समय आइल त पंडीजी रामबड़ाई के बोलाके कहले 'कहु क'। रामबड़ाई के याद आइल कि पंडीजी जवन कहिहें उहे कहे के बा। एहलिए ऊहो कहले 'कहु क' पण्डीजी के गुस्सा आइल, ऊ कहले 'कहु सारे क' रामोबड़ाई बड़ी श्रद्धा से कहलें 'कहु सारे क'...। ओकरी बाद रामबड़ाई के एतना धुनाई भइल कि ऊ फेरु स्कूले ना गइल। स्कूल में छड़ी के मार याद आवेला, वइसे पढ़ाई खातिर त बहुत कमे मार खइले होखब। चौथी कक्षा के बोर्ड के परीक्षा खातिर सब लइकन के इम्तहान के तीन महीना पहिलहीं से स्कूल में राति के आके सुते पड़े कि सुबह सुबह पढ़ाई शुरू हो जाई । एक दिन पढ़ाई शुरू करा के बाबूसाहब नहाए खातिर भागलपुर निकल गइलें। बस का, जइसहीं उनकर पीठ पीछे भइल की कपड़ा के गेना से 'गेनामारी' शुरू हो गइल, पता नाहीं बाबूसाहब के का सूझल ऊ आधे रास्ते पर से लवटि अइलें, लवटि के देखत हउवें कि एक्को लरिका क्लासे में नाहीं रहें, सब खेले भागि गइल रहलें, ए बस का बा, सब के बोला के लाइन में खड़ा कइल गइल आ छड़ी से खूब धुनाई भइल। तब के स्कूले के पढ़ाई आ अबके पढ़ाई-लिखाई में केतना फरक आ गइल बा। तब स्कूल के शिक्षक लोग केवल मास्टर ना रहे, अभिभावको की तरे रहे। उनपर एके धुन सवार रहे कि कइसे हमरी कक्षा के रिजल्ट अच्छा होई, कइसे हमार छात्र अच्छा से अच्छा करिहें, लरिकन के जिनिगी बनवला में जेतना त्याग कइल जा सकेला, ऊ सहर्ष करे के तइयार रहें। काहे ई भावना अब गाँव के स्कूलन से बिला गइल? मास्टर लोगन के तनख्वाह पहिले से त केतना गुना ज्यादा हो गइल बा ! तब्बो कवनो मास्टर 11 बजे के पहिले ना पहुँचें आ दू तीन घण्टा के बाद स्कूल छोड़ि के बाहर चलि दी। लड़का सीखें भा उफ्फर परें! हैं, एक बात जरूर रहे कि हमनी के स्कूल में पढ़ाई-लिखाई के अलावा अवरी कवनो गतिविधि ना होखे । पी.टी. में ओ क्षेत्र में स्कूल सबसे पीछे रहे बाद-विवाद, नाटको गायन वगैरह में सबसे पीछे एहलिए गाँव के कवनो लड़िका अच्छा वक्ता ना निकल पावल, ना अच्छा खिलाड़ी हो पावल

लइकन के सर्वांगीण विकास में गाँवे के स्कूल सबसे पीछे बाड़ेसन, ए क्षेत्र में हमनी के समय से बहुत कुछ बदलाव नइखे भइल अब्बो कवनो लड़का लड़की के मंच पर खड़ा कर दिहल जा त न ऊ कुछ बोल पहें, ना गा पइहें, न कवनो नाटक में भूमिका क पइहें। नाटक के नाव से स्वर्गवासी शुकुलजी के नाव बरबस याद आ जाला । शुकुलजी पेशा से मास्टर रहले, लेकिन सही माने में लइकन के नेता उनके समय में गाँव में फुटबाल के अच्छा टीम रहे, आ हर साल नाटक होखे। नाटक में सब पात्रन के खूब जमके अभ्यास करवावें जेसे मंच पर कवनो गड़बड़ ना होखे। एक साल राणा प्रताप के नाटक होखे के तय भइल। राजमंगल, जे हमसे चार-पाँच साल बड़हन रहलें, जोर देके राणा प्रताप के पार्ट ले लिहलें । मास्टर साहब उनके बतलवलन कि राजमंगल, तू परदा के लगहीं रहिह5, जैसे कुछ भोर परि गइल त पीछे से बतलावल जा सके। राजमंगल जोस में छउकि के स्टेज का दुसरा किनारे पर पहुँचि गइलें, एतने में कवनो आदमी जोर से हँस दिहलसि आ राजमंगल दहलि गइलें, ड्रामा के सब लाइन भुला गइले आ बार-बार "रण बीच चौकड़ी भर-भरकर बोले लगलें देखनिहारन में हँसी के लहर फूटि गइल आ राजमंगल हीं- ही ही ही करत रहि गइलें मास्टर साहब के गुस्सा अपरम्पार हो गइल । उठवले एगो लमहर लग्गी आ जोर से राजमंगल के धकियवलें, राजमंगल स्टेज पर चारो खाने चित्त होके गिरि गइलें। मास्टर साहब कहले आवऽ तहार बहिन... अउर बनवऽ राणाप्रताप !

अइसन असंग फुटबाल के लेके कई बार भइल रहे। फुटबाल चंदा लगा के खरीदल जा। जब झगड़ा होखे आ सुलह के कवनो नौबत ना त फुटबाल के काटल जा, आ चंदा के बराबर बखरा लगा दीहल जा। गाँव छोड़ले हमके करीब 47 साल हो गइल, लेकिन मानसिकता में बहुत फरक नइखे आइल अवरी त अवरी अब त पाउच संस्कृति' आ गइल बा। लड़का कुल पाउच पर पइसा खर्च क दीहेंसन, लेकिन फुटबाल खरीदे के होखे त केहू बहरे से फुटबाल खरीद के दी तब्बे फुटबाल होई। हाल में अमरीका-भ्रमण में एकरी ठीक विपरीत नजर आइल भइया त्रिभुवन त्रिपाठी, जे धंधवार गाँव के हउएँ आ जे देवरिया में काफी दिन तक वकीली कइलें, उनकर लड़का, आलोक, अमरीका में करीब 20 साल से बाड़न । 'एक्टब', जवन न्यू इंग्लैंड की तरह जानल जाला, ऊहाँ ऊ रहेलें । असल में अमरीका के आजादी के लड़ाई 19 अप्रैल 1775 से एही जगहे से शुरू भइल रहे । उनकर दूंगो संतान एक लड़का आ एगो लड़की लड़की निधि, अब ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़े जालों । लरिका आठवीं कक्षा में इहवें पढ़ेलें, दूनू मेधावी छात्र, लेकिन जान के अच्छा लागल कि दूनू खेलहूँ में एतने उत्तम लरिका रोज शाम के फुटबाल खेले जाएवाला रहे। हमहू कौतूहलवश ओकरी साथै हो लिहलीं। आलोको अइलें ऊहाँ जाके देखलों एक बड़हन मैदान में जहाँ दू गो फुटबॉल के फील्ड हो जाई, करीब 30-35 लइका - लइकी जुटल रहलें। अचम्भा के बात ई कि 30 लड़कन की बीच में 40 से ज्यादा फुटबाल रहे। निधि आ उनकर मित्र सुरेश इकट्ठा होके एक-एक फुटबाल ले के खेलल शुरू कइल लोग। थोड़िके देर में आलोक, जे ओ लड़िकन के कोच रहले, आ एगो अउर कोच आके उन्हनी की साधे खेले शुरू क दीहल लोग एक घण्टा हर कोच लोगन के साथ प्रैक्टिस फुटबाल भइल। खेल के छोट-छोट बातन के बारे में कोच लोग हिदायत दे । आलोक की तरे, जवन दूसर अमेरिकन कोच रहे, ओहू के लइका टीम में रहे। बाद में आलोक बतवले कि ऊ जवना जगह रहेलें उहाँ के हर घर से एक आदमी के कोच मैनेजर भा अठरू कवनो भूमिका अदा करेके पड़ेला। हर घरे से खेल-कूद खातिर हर लड़का-लड़की पीछे 60 डालर (2600 रु.) चंदा देवे के पड़ेला। ओही पइसा से खेलकूद के सामान आवेला| अगर ए तरे के सामूहिक प्रयास रंग रूप वर्ण इत्यादि से ऊपर उठि के अमेरिका में हो सकेला, त इहे बात अपना गाँवन के परिवेश में काहे नइखे होत! का हमनी का एतना आत्मकेन्द्रित हो गइल बानी जा कि सामूहिक प्रयास कइए ना सकेली जा? केतना आसान बा हर गाँव में खेल के बढ़ावा दीहल! गाँव के हर घर अगर 50 रु. सालाना देवे पर तैयार हो जा त 1000 घर वाला गाँवे से 50,000 रु. सालाना इकट्ठा हो सकेला ए निधि से नवयुवकन खातिर केतना काम हो सकेला, अउर त अउर बड़का लोग अगर आपन साझेदारी समझ के लइकन के विकास में लग जा लोग त लइकन के संस्कार त बनबे करी, अपनो समय जवन बतकुच्चन आ एक-दूसरा के सोरि उखड़ला की यंत्रणा में बीतेला ओकरो सदुपयोग होई । अमेरिका में एही तरे लोग नाहीं भागत रहेला ई नाहीं कि सब समय लोग आफिस के कामे से बझल रहेला सनीचर आ अतवार के कुछ न कुछ अपना परिवार आ समुदाय खातिर काम करत रहेला पश्चिम के देशन के हर चीज के नकल कइला के कत्तई जरूरत नाहीं बा, लेकिन उनके अच्छाई के त जरूर अनुसरण कइल जा सकेला|

अउरी सामान्य गाँवन की तरे हमरिओ गाँव पर शहरी सभ्यता के बहुते बाउर प्रभाव पड़ल। आपसी लेन-देन में चीजन के आदान-प्रदान से जवन काम चलत रहे ऊ सब अब पइसा के जरिए होखे लागल बा । छोटपन पर, इयाद आवेला कि पइसा के बहुत कम चलन रहे, केहू के सीधा के जरूरत रहे त ऊ माँग के ले जा। ओतने सीधा आ चाउर लौटा के दे दे। एही तरे रोजमर्रा के चीजन के आसानी से आदान-प्रदान होखे लालटेन जरावे के आ बत्ती बारे के माटी के तेल ना रहे त दूसर घर से मँगा जा, बाद में ओके वापस क दीहल जाउ ई आदान-प्रदान एकदम बिना रक-झक के होखे अइसन ना रहे। उजरका माटी के तेल माँग के ले जा लोग आ बदला में ललका तेल, जवना के कीमत कम रहे, वापस कइला के होशियारी खूब रहे एही के लेके मारपीट के नौबत आ जाउ। धीरे-धीरे ई सब कुछ बदले लागल। शहर में नौकरी कइला के रेवाज खूब बढ़े लागल। एहीलिए गाँव जवन स्वयं पूर्ण रहे ओकर पतन होखे लागल आ कला आ हुनर खतम होखे लागल। खटिया बनवावे के होखे, टूटल बर्तन बनवावे के होखे, बढ़ई के काम करेके होखे त केहू के बाहर नाहीं जाये के पड़े। कहार लोग एतना सुघर बर्तन गढ़ि दे लोग, बरई लोग एतना बढ़िया पत्तल बना दे लोग... शहर ई सब कुछ उजाड़ क दिहलस । अब त दाढ़ियो लोग बाहर जाके बनवावता ।

ए सब परिवर्तन में लोक कला के गिरावट सबसे दुखदाई लागेला । जिउतिया के दिने अम्मा बइठ के 'ए बरियार का बरियार जाके रामचन्द्रजी से कहि दिहे कि फलाना के महतारी जिउतिया भूखल बाड़ी" कहत जा आ देवारी पर एतना सुन्दर भित्ति चित्र बना दें। दीवाली आ त्योहारन पर सब देवाल एतना सुन्दर चिकन से रंगा जा, अब क मन- लुभावन कला कहवा देखे के मिलता ! जाँत चलावत फूआ लोग एतना सुन्दर गीति गावे लोग! सावन में हर घर में झूला पड़ि जा आ सब मेहरारू लोग सुरीला कंठ से लोगन के मंत्रमुग्ध क दे लोग घर की दुआरे पर गोड़ऊ नाच होखे, रामनगीना के धुधुका आ ओसे निकलल "एकल पंच के सीताराम" अबो इयाद आवेला घर-घर फरी नाच होखे आ कई गो त केतना बड़हन नाचे वाला रहे लोग! होली में हिन्दू-मुसलमान सब केहू मिलि के कवीरा गावे । नेवू राय फरजन जेनका के करइली कहिके हमनी का रिगावल क जा अब कहाँ मिलिहैं! अब कइसे समझाई कि नेबू राय अपनी कबीत से जवन आनंद हमके दें ऊ का कुमार सानू, सोनू निगम वगैरह सिनेमा के गाना गावे वाला लोग देई ! नेवू राय गाँव के भाँट रहले आ वियाहे में जब शिष्टाचार होखे त उनके आगे क दीहल जा। चाचा के बियाह इयाद पड़ेला, उहाँ हमनी की तरफ से नेबू राय आ दूसर ओर से उनकर भाट खड़ा भइले ऊ तपाक के कहले, "सुन्दरी को हाथ कैसे जरो" आ कबित्त पूरा करेके कहले अब नेवू राय कबो ई कबित्त सुनले होखें तब न आगे बढ़ि पायें लगलें पैंतरा बान्हे। तबले हमनी का ओर से सुझाव भइल कि कबीत पूछे के पहल बेटा वाला लोग के तरफ से होखे के चाहीं । पहिले नेबूराय के कवित के जवाब दिहल जा फेरू हमनियो का जबाब दौहल जाई। लड़की वालन के बाति माने के पड़ल। लेकिन केकरा मालूम रहे कि नेबूराय के टपाक से जबाब मिलि जाई, आ ऊ बगल झाँकत रहि जइहें नेबूराय एगो घिसल-पीटल कबीत पुछले "अँइसी की सॉंग पर ऊँट कइसे नाची" उलटा गोल के आदमी तुरते जबाब दे दिहलसि

जब सूरज पूरब से पश्चिम उगे मीन जल छोड़ि के आईना में नाचे तब भइसी की सींग पर ऊँट नाचे हमनी के हार माने के पड़लि ए हारियो के बाद नेबूराय के वजन गाँव में कवनो

आ कम ना भइल, हार त एक तरह से होते रहेला। बड़ो भइला पर गाँव जब जब जाईं नेबूराय दौड़ के मिलें आ कबित्त सुनावें। बाद में अवरी कबित्त कई गो सीख लेले रहलें । जात- जात कहें-

चमकत रहे चोला, जीव रहे अनमोला बाबू की कमाई में हमरो कुछू होला

उनके हम हमेशा खुश कइके भेजीं। एक दिन पता चलल कि नेबूराय ना रहलें, ओह दिन मन खिन्न हो गइल आ काम से छुट्टी ले लिहलीं।

गाँवे में सब अमन-चैन आ शांति रहे। मारि-पीटि होखबे ना करे, अइसनो ना रहे। छोट-छोट जमीन क टुकड़ा खातिर लाठी, भाला बल्लम निकल जा, छोटी-छोटी बाति खातिर तू-तू मैं-मैं होखे लगे, आ बाति पहुँच जा अदालत तक कई गो परिवार कोस्ट- कचहरी में लड़त लड़त बरबाद हो गइल, बाकिर मोंछि की लड़ाई अइसन कि सुलहा करेके कवनो प्रयास ना होखे। गाँव में लड़ाई-झगड़ा के स्वरूप अब बदलि गइल बा। गाँवनो में राजनीति बुरी तरह से ढुकि गइल, अब जाति-पांति के लड़ाई उग्र रूप ले लेले बा । हरिजन परिवार अब सामूहिक जीवन से एकदम अलगा हो गइल बा घरे में रोटी मिले- ना मिले ई लोग कतई दूसरे इहाँ काम ना करी छोटपन पर इयाद बा कि घरे पर सबसे ज्यादा बैल, आ हरवाह हमरिए इहाँ रहलें। तोता, जंगली, रामबचन, शिववचन, ए तरह से 15 हरवाह घरे रहलें । बुझइबे ना करे कि ऊ लोग कवनो दुसरा कुटुम्ब के लोग है। चाचा, दादी अम्मा ओह लोगन के पूरा खयाल रखे लोग जबले ओ लोग के पनपियाव ना होखे तबले घरे में केहू खाना ना खा ऊहो लोग चाचा के 'मालिका' के नाम से पुकारे आ सबसे मोट-छोट के बर्ताव करे। अब ई सब समीकरण बदलि गइल बा । अब त हरिजन परिवार से बोलवलो पर केहू ना आवेला राजनीति अब बिलकुल जाति पाँति पर आधारित हो गइल बा गाँव में जवनी बिरादर के ज्यादा घर बा ऊहे पंचाइत जोती, काबिलियत होखे भा नाहीं। ओइसे देखल जा त ई समस्या कबो-ना-कबो त उठहीं के रहे। इयाद परेला कि जेके नान्ह जाति कहल जाला उनकर छुअलो खइला से बरजल जा रात बेराति जब गाँव में जायके पड़े त हमरा छोट उमिर के बावजूद खटिया पर सुतल मनई उठि के राम- राम करें। ओ समय समझे में नाहीं आवे कि हमसे उमिर में एतना बड़हन लोग काहें उठि के राम-राम करें! आजादी के बादो गाँवन के व्यवस्था में कवनो परिवर्तन ना आ पवले रहे। जमीदारी कहे खातिर त खतम भइल रहे, बाकिर न जमीन के बँटवारा भइल, न गरीब परिवारन के परिस्थिति में सुधार भइल, ना मालिक, हरवाह, नोकर-चाकर के आपसी संबंध में बदलाव भइल। ओही समय थोड़ा सामाजिक परिवर्तन पर ध्यान दिहल गइल रहित आ गरीबन खातिर योजना बनावल गइल रहित आ जाँति पाँति के भेदभाव मेटावे के कोशिश कइल गइल रहित त आज के ई नफरत भरल परिस्थिति ना बनल रहित गाँवन के खुशहाली खातिर ई जरूरी बा कि फेर से सब समुदाय के इकठ्ठा ले आवल जा आ बनावटी नफरत के दूर कइल जा

गाँव के आर्थिक ढाँचा में कवनो खास सुधार त ना भइल है, ई जरूर बा कि पहिले के भयावह गरीबी ना रहल। इयाद आवेला कि गाँव के आधा परिवार दूनो समय के भोजन ना जुटा पावे। करीब रोज 8-10 लोग घरे उधार सीधा माँग के आवे। लइकन के कपड़ा पहिरे के ना मिले ऊ भगई पहिरि के काम चलावें। जब केहू के रिंगावे के होखे त लइका कुल तुकबंदी करें "फलाना तिवारी, उनका लइका ना बारी, उनकर लोग पइसा खाला, उनकर भगई बसाला" जब खाए के ना जुटे त फल-फूल के का बात बा? हमके अब्बो इयाद आवेला जब केहू के घरे केला आ जाए त ओ लोगन के खइला के बाद दूसर लइका कुल्हि छिलका में से गुद्दा निकालके खूब चाव से खायें। शादी बियाह में त केतना परिवार बिलकुल बिला जा दहेज के कुप्रथा ओहू समय आजुए के तरे प्रभावी रहे। दहेज आ शादी- बियाह के खचा करे खातिर कई लोगन के खेत बन्हकी घरा जा। धीरे-धीरे सूद के बोझ एतना बढ़ि जाए कि सब खेत छोड़ देवे के परे गाँव में जवन समृद्ध परिवार रहले ऊ खूब ढेर दर से पइसा दीहल करें। थोड़ही दिन में उहे पइसा बढ़ि के एतना ज्यादा हो जाए कि या त खेत बेचे के पड़े नाहीं त ओह परिवार के बंधुआ मजदूर के तरे काम करे के पड़े। खेतों से विशेष कुछ होखे ना, शासन के सगरी योजना कागजे पर रहे। एको सरकारी मुलाजिम गाँव में विकास के कामन खातिर ना आवे उत्तम बीज भा खेती के तौर-तरीका के बारे में के बतावे ना आवे सरकारी नौकर तकाबी वसूले जरूर आवें। ओह दिने, इयाद पड़ेला, घर के घर खाली हो जा, लोग घर छोड़ के भाग जा कि गायब भइला से लगान वसूली रुकि जाई, बाकिर सरकारी लोगन के त आपन ड्यूटी बजावे के रहे। ऊ बारी आ बगइचा सब जगह रहे लरिकाई में सबसे आरामदायक समय बारिए में बीते दिने में खूब ओल्हा पाती होखे वइसे पेड़े पर चढ़ला में हम हमेशा कमजोर रहला । बार-बार हमरे के चोर बने के पड़े। कई गो बारी साझे में रहे, एहलिए बहुत समय हमनी के ईहे फरियावे में बीति जा कि ई आम हमरी फेड़े के ह, ऊ उनकी लइकन, बूढ़ सबके एक-एक आम के बारे में मालूम रहे दूर से देखले पर समझ में आ जाउ कि ई सेनुरिहवा पेड़ के है। फुरसत मिले त दिन भर ताश के खेल होखे कोट पीस आ ट्वेन्टी नाइन खेलत- खेलत साँझ क दे लोग आ तबो खेल खतम ना होखे ओ समय गरीबियो में गजब के सुख-शांति रहे, अब त सब बारी आ बगइचा कटि गइला से बारी अगोरल आ बारी में दिन बितावल इतिहास हो गइल बा ई ना कि बारी काटि के ओकरी जगह पर कवनो उपजाऊ खेत तैयार हो गइल होखे बारी के जमीन ओही तरे ऊसर परल बा, नाहीं त थोड़ा बहुत उपज पैदावार बढ़ि जाइत लोग के मानसिकता अचानक बदलि गइल, अब बजारे से लंगड़ा, दशहरी आ कपूरी मिले लागल त बीजू आम के खाई? इयाद पड़ेला, सुबह-सुबह खाँची भर आम दुआरे पर चलि आवे आ बाल्टी के पानी में डुबा के एक बइठका में 20-20 गो आम आदमी खा जा, अब त आम के एक-एक फाँकी से काम चलावे के पड़ता। पेड़-पौधा जंगल इत्यादि लगवले में शासन केतना कमजोर पड़ल ई बात आम के अलोपि भइला से स्पष्ट हो जाता। जहाँ शासन नाकामयाब भइल उहें गाँव के पढ़ल- लिखत नौजवानो लोग कवनो नेतृत्व ना दे पावल एक बार पढ़-लिख के नौकरी खातिर जवन गाँव छूटल कि फेर नाते तूर दीहल गइल । पइसा कमइले की चक्कर में जगहे जगह चिमनी लागि गइल आ ओकरी गर्मी से सारा वायु-मंडल बदलि गइल। अब त पेड़न पर आम मुस्किले से लागता इहे बाति कटहर, अमरूद, जामुन, सिरफल, गुल्लर के पेड़न के भइल। अब गाँव के लइका थोड़े दिन में इहो ना बता पइहें कि कइती का होला आ का गुल्लर होला !

लोग के केहू ना मिले त गोरू बछरू लेके चल जा लोग ए तरे कंगाली में आटा गोला हो जा आ लोगन के आर्थिक परिस्थिति बद से बदतर हो जा। साधन आ पइसा के अभाव में खेती से उपज खूबे कम होखे आ ज्यादातर खेत पलिहरे रहऽसन, ऊ त जमीन आ पानी के कमाल कि बिना ज्यादा मेहनत कइलहू थोड़ा-बहुत उपज होई जा। तरकारी के मामला में त अउरी खराब हालत रहे। बरसाती तरकारी छोड़के अवरी कवनो तरकारी मुस्किले से मिले। खाना में तरकारी जब केहू मेहमान आवे तब्बे मिले। मैथिलीशरण गुप्तजी के गाँव जरूरे कवनो आदर्श गाँव होई काहें कि हमरा त "काशीफल कुष्माण्ड कहीं है, कहीं लौकियाँ लटक रही हैं" ई चित्र त नाहिए मिलल ह। थोरे में निवाह इहाँ बा, ई जरूर बा।

एह बाति के वैज्ञानिक विश्लेषण हम कइ ना पाईलें कि सब कुछ जवन एतना सुन्दर रहे एकाएक कइसे बदलि गइल। गाँवे के जवन पोखरा, गड़ही, तालाब रहल सब पाटि दिहल गइल, छोटपन पर पोखरा पर हमहन के केतना समय बीते। गाँव के केतना लोग नहाए आ कपड़ा फींचे खातिर रोज पोखरा पर पहुँच जा गड़ही में गर्मी के तीन महीना पहिलही से टाप लेके मछरी मारल शुरू कै दे, सब तरह के मछरी मिले- गिरई, सीधरी, बरारी, रोहू...। ओमें अब त बरारी खोजले पर मुश्किल से मिलेले ।

हमरी गाँवे के कवनो जिकिर फुन्नी बाबू के लिखला बगैर पूरा ना हो पाई। फुन्नी बाबू रिस्ता में चाचा लगिहें पट्टीदार हवें । उमिरी में 6-7 साल बड़हन बचपने से उनमें अद्वितीय प्रतिभा रहे। कवनो चिरई बझावे के रहे, कहीं मछरी मारे के रहे, कवनो पेड़ पर चढ़े के रहे भा कवनो इनारे में उतरे के रहे त गाँव के लोग फौरन फुन्नी काका के इयाद करे। फुत्रिओ काका घर के मारि आ गारी के खयाल कइला बिना चल दें लोगन के बोलवला पर इनारे में से केतना लोगन के गिरल लोटा आ बाल्टी उ निकरले होइहें। एक बार के बात है, पुत्री काका पेड़े पर चढ़ि के सुग्गा उतारे गइले । ओइसे उनका सब मालूम रहे कि कवने पेड़े पर कवने खोता में सुग्गा बिआइल बा। बहुत आत्मविश्वास से ऊ पेड़े पर चढ़ि गइले आ चिरई पकड़े खोड़िला लगे चलि गइले, संयोगवश आपन हाथ खोढ़िला में ना डलले आ झाँक के देखे के कोशिश कइलें, जइसही उनकर मुँह खोढ़िला के ऊपर गइल कि एगो गोहुअन साँप फुफकरलस अब का, पुत्री काका के सिट्टी-पिट्टी गुम । पेड़े से हाथ छुटि गइल, धड़ाम से नीचे गिरले एक महीना तक घरहीं बिस्तरा पर पड़ल रहले। कवनो तरे चिरई के एक महीना तकले जान बचल फुन्नी बाबू के हुशिआरी पढ़ले लिखले में कबो ना दिखाई पड़ल, हाई स्कूल में 6 बार फेल भइले आखिर में तरस खाके सातवाँ बेर पेपर जाँचे वाला लोग पास करा दिहले, हमेशा उत्तर-पुस्तिका में परचवे छापि के चलि आवें। ओसे आगे बढ़े त कहें कि आँखी के बरवनी नोचला से बार टूटि गइल ह... नाहीं त... एही तरे उत्तर देके चलि आवें। ओ समय गनीमत रहे कि परीक्षा के स्तर आज काल्हि की तरे नाहीं गिरल रहे । अब त फुत्री बाबू की तरे के लोग प्रथम श्रेणी में पास होके चलि आवडता इम्तहान अब मजाक हो गइल बा, इम्तहान के समय हाल में किताब लेके गइला से रोकला के केहू हिम्मत ना करी। कई गो धुरंधर अइसन बाने कि साल भर कितबिए ना खोलले होइहें त अन्दर किताब ले जाके का करिहें। लइका अगर पढ़ाई में एकदमे कमजोर होखे त ओकरी जगह पर दूसरा आदमी के बइठा दिहल जाई आ का मजाल कि केहू आके रोकि दे, आखिर ओहू के त जान के मोह बा, इम्तहान में चोरी पकड़े के केहू कोशिश कइल त भाई- बाप आ दोस्त लोग मास्टर के अइसन धुनाई करी कि फेर-फेर ऊ मास्टर इम्तहान लेवे वापस ना अइहें अइसन प्रतिभासम्पन्न फुन्नी बाबू के जोगाड़ नाहीं. लग पावल प्रशासन आजादी के एतना साल बाद तक गाँवन के पूरा नजरअन्दाज कइलस, अगर गाँवे के पहिले वाला परम्परा चलत रहित आ सब ऐक्टिविटी शहरे में ना सिमट गइल रहित त फुत्री बाबू आ उनकी तरे केतने नौजवानन के कवनो ना कवनो पेशा मिल गइल रहित केहू ए में से बढ़िया सोनार, केहू बढ़िया लोहार होइत, केहू अच्छा घर बनावे. वाला केहू के छोट मोट कामे खातिर शहर में भागे के नौबत ना आइत। अपनी गरीबी से आजिज आके पुत्री बाबू के कलकत्ता शहर में आवे के पड़ल स्कूल पास कइला के पहिलहीं उनका बाबूजी के मृत्यु हो गइल । इयाद पड़ेला कि उनके कवनो विशेष बीमारी ना रहे लेकिन सही डाक्टर आ दवा-दारू ना मिलला से 40 साल के उमिर में उनकर बाबू जी, जिनके हमनीका लाला बाबा कहीं जा, चलि बसलें। ओइसे आजुओ गाँवन में अकाल मृत्यु होता टी. वी., टाइफाइड, मलेरिया आदि भइला पर कवनो प्रकार के सहायता सरकारी अस्पतालन से नइखे मिलत सरकारी दवाखाना जगह-जगह बनि त गइलऽसन लेकिन ओमें डॉक्टर लोग भुलाइयो के ना आइल, सरकार से मरीजन खातिर बाँटे के दवा जवन मिलेला ऊ सीधे बाजार में चलि जाला। अस्पताल में ना विजुली वा ना जनरेटर के व्यवस्था वा । अगर राति के साँप बिच्छू काटि दिहलस, आदमी अचानक बीमार पड़ गइल त ऊ अपनिए भागि से बची काहे कि दिया बाती की अभाव में डाक्टरों का करिहें! पोलियो उन्मूलन, टी.वी. उन्मूलन, अन्धता उन्मूलन अबो ज्यादातर कागजे पर बा। टी.वी. के मरीज आजुओ गाँवन में कतार के कतार मिली जइहें। मोतियाबिन्द त बुझाता कबो कन्ट्रोले में ना आई ई त गनीमत कि कुछ स्वयंसेवी संस्था ई काम शुरू क देले बा । अब आँख के आपरेशन खातिर सरकारी अस्पताल में ना जाय परेला, सब केहू जब कैम्प

लागेला त ओहिजा जाला । बात होत रहे फुन्नी बाबू के कलकता गइले के, उहाँ जाके उनके गांधी आश्रम में कपड़ा ढोवे वाला छोट मोट नौकरी मिलि गइल रहे खातिर कबो एइजा त कबो ओइजा । ए तरे उनकर दू तीन साल गुजरल ए समय ऊ ज्यादेतर हमनिए के साथ रहें सोचि के अब बुझाला कि केतना उदार अंतःकरण हमरी माई के रहे। हमनियों के कवनो पक्का ठेकान रहे के ना रहे, तबो तकलीफ सहि के जबले फुन्नी काका के इन्तजाम ना हो गइल तबले उनका के अपनी लइका के तरे पालन-पोषण कइलस पुत्रिओ काका अम्मा पर जान दें। भाभी उनका खातिर देवी-देवता की समान रहली। बाद में ऊ चाली में रहे चलि गइले । एक कमरा में करीब दस आदमी गुजारा करे। न ठीक से रहला के ठेकान न शौच- स्नान के ठीक व्यवस्था। लेकिन वापस गइला के सारा रास्ता बन्द हो गइल रहे। ओही 100 रु. के नौकरी में घर, माई, छव- सात भाई-बहन के खर्च चलावे के परे । आमदनी बढ़ावे खातिर फुत्री बाबू के ट्यूशन पढ़ावे के लगावल गइल । थोरे दिन में विद्यार्थी के समझ में आ गइल कि मास्टर साहब के ज्ञान ओकरा से थोड़ही ज्यादा बा। एहीलिए किताबी से गणित के कठिन से कठिन सवाल ऊ पूछे लागल, लेकिन ओ ससुर का का मालूम कि पुत्री बाबू सबके कान काटि दीहें। उ तपाक से कुंजी से उत्तर देखि लें आ सवाल के पीछे से झूठ-साँच के के लगा दें। एक दिन एगो दुष्ट मास्टर अइसन सवाल पूछे के लगा दिहलस जवने के उत्तर नाहीं मिलत रहे। पुत्री बाबू सकता में आ गइले लेकिन हारि मानि के ऊ उल्टे लड़कवे से एह पाठ के बारे में पूछल शुरू कइलें आ लड़का के अइसन पिटाई कइले कि ऊ सवाल पुछले बन्द क दिहले फुत्री बाबू के हमरी व्यक्तित्व पर बहुत छाप बा, सब बात के लेखा-जोखा लिहले के समय नहीं बा।

पुत्री बाबू के ई दर्दनाक कहानी केतना गो परिवार के बा। नौकरी के तलाश में करीब- करीब हर घर के एगो दूगो सवांग गाँव से कटि के अलग हो गइल आ शहर में आके सबसे निम्न स्तर के जीवन जी रहल बा बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता आदि शहरन में जेतना मलिन बस्ती बाड़ीसन ओमें ज्यादेतर अपनिए गांव की ओर के लोग बाटे। उनकर रोज के जिन्दगी एतना कष्टदायक वा कि ओकर बेयान ना हो सकेला रोज सुबह-सुबह उठि के शौच खातिर लाइन, नहइला खातिर लाइन, फेरू पानी भरे खातिर लाइन। शौच व स्नान के व्यवस्था एतना फूहड़ आ बदबूदार कि ओइजा नाक दबाइए के जाइल जा सकेला| ओकरी बाद दिनभर देह तूरि के मेहनत के बाद खचाखच ट्रेन में सवार होके घरे आइल आ खाना बनावे के तैयारी। साइते केहू होई जे 6 घण्टा से अधिका सुति पावत होई आ उहो एक ही कमरा में 10-12 आदमी भर के ई देखला पर सवाल ई उठेला कि एतना कष्ट आ जिल्लत के जिन्दगी आदमी काहे जियत वा एसे बढ़िया गाँवे के जिनगी नाहीं बा? एतना मेहनत गाँव के खेत में आदमी करित त एसे निमने तरे जी सकित। गाँवे से पलायन के कारण न त आदमी खुदे ठीक से जियत बा आ ना जे लोग गाँव में रह गइल बा उहे सुख से रहि पावता आदमी लोगन के जवन सृजन करे वाला समय वा ऊ त शहरे में बीति जाता त गाँवे के उन्नति कइसे होई! हृष्ट-पुष्ट नौजवान के बहरा चलि गइला से अब बहुत लोगन के खेतवो नइखे जोतात। जहाँ अउरी जगह साल में तीन-तीन गो फसल कटाता उहें हमरी इहाँ खेत पलिहर रखल जात बा । अब त सचहूँ अइसन समय आ गइल कि केहू आगे आवे आ आन्ही अस एगो मूवमेन्ट शुरू करे 'चलो गाँव की ओर'।

करीब ढाई साल पहिले हमरे जीवन में सुनहरा दिन आइल आ जिनगी देखे के हमार नजरिया बदलि गइल । ऊ समय रहे हमरी नाती वेदान्त के जनम कवनो लइका अब आन की तरे ना बुझालन स। अब त हमनी के संस्था लइकन खातिर कईगो प्रोजेक्ट शुरू क देले बा । मुम्बई में सड़क पर रहे वाला लइकन के देख-भाल कइल ए संस्था के ध्येय ह हप्ता भ ओ लइकन से भेंट ना भइला से कुछ अधूरा अस लागेला ऊ लइकवो बेचैन रहेले सन उनकी पढ़ाई-लिखाई, रख-रखाव, दवा-दारू के सब इन्तजाम संस्था करेले । कुछ अइसने काम गाँवों पर शुरू करे के इरादा बा। गाँव के नौजवानन के बीच रहिके गाँव के उत्थान करे के उत्कट इच्छा था। अब ई डर ना लागे कि केहू हमार बात ना सुनी त लोगन के बीच हँसाई होई, अगर मुम्बई में हमनी के मूवमेन्ट आगे बढ़ि सकेला त अपने गाँव में हमार प्रयास काहें असफल रही! महाराष्ट्र में अन्ना हजारे, बाबा आम्टे, विकास

आ प्रकाश आम्टे, अन्नू ताई जइसन लोग गाँव में आमूल परिवर्तन ले आ सकेला त हमरी

इहाँ, जहाँ गाँवन में प्राकृतिक सम्पदा कहीं ज्यादा बा, काहे नाहीं परिवर्तन आ सकेला!

गाँवे में जहाँ परमहंस त्रिपाठी जो (हमार पिता, गांधीवादी आ जे अपना काम खातिर अँखिया

वाला बाबा कहालें), फुत्रीबाबू जेकर जिकिर कइली, मथुरा प्रसाद (मास्टर आ जिनका

में संगठन के अद्भुत क्षमता बा), जय बहादुर मल्ल (जे अपनी बाति से पानियों में से

घीव निकाल सकेले), हैदर (जवन हिन्दू मुसलमान के फरक बुझवे ना कइले ) - अइसन

तमाम लोग बा, उहाँ कवनो तरह के परिवर्तन आ सकेला, जरूरत वा थोड़ा समय निकालके

आ समर्पित भावना से काम कइला के भगवान से इहे प्रार्थना वा कि अइसन शक्ति आ

उत्साह हमके मिले।

अउरी कॉमिक्स-मीम किताब

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लेख
हमार गाँव
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भोजपुरी के नयकी पीढ़ी के रतन 'मयंक' आ 'मयूर' के जे अमेरिको में भोजपुरी के मशाल जरवले आ अपने गाँव के बचवले बा
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इमली के बीया

30 October 2023
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लइकाई के एक ठे बात मन परेला त एक ओर हँसी आवेला आ दूसरे ओर मन उदास हो जाला। अब त शायद ई बात कवनो सपना लेखा बुझाय कि गाँवन में जजमानी के अइसन पक्का व्यवस्था रहे कि एक जाति के दूसर जाति से सम्बंध ऊँच-न

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शिवप्रसाद सिंह माने शिवप्रसाद सिंह के गाँव

30 October 2023
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हमरा त आपन गँठए एगो चरित्र मतिन लागेला जमानिया स्टेशन पर गाड़ी के पहुँचते लागेला कि गाँव-घर के लोग चारो ओर से स्टेशनिए पर पहुँच गइल बा हमरा साथे एक बेर उमेश गइले त उनुका लागल कि स्टेशनिए प जलालपुर के

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घर से घर के बतकही

30 October 2023
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राप्ती आ गोरी नदी की बीच की कछार में बसल एगो गाँव डुमरी-हमार गाँव। अब यातायात के कुछ-कुछ सुविधा हो गइल बा, कुछ साल पहिले ले कई मील पैदल चल के गाँवे जाय के पड़े। चउरी चउरा चाहे सरदार नगर से चलला पर दक्

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हिन्दी भुला जानी

30 October 2023
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पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ,  और दिल्ली न आए बीच में क्या है कोई उपाय !                                                -'गाँव आने पर जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी के संगम बा, ओसे हमरे गाँव के

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का हो गइल गाँव के !

30 October 2023
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गाजीपुर जिला के पूर्वी सीमान्त के एगो गाँव ह सोनावानी ई तीन तरफ से नदी- नालन से आ बाढ़ बरसात के दिन में चारो ओर से पानी से घिरल बा। एह गाँव के सगरो देवी देवता दक्खिन ओर बाड़न नाथ बाबा आ काली माई आमने-स

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कब हरि मिलिहें हो राम !

31 October 2023
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गाँव के नाँव सुनते माई मन परि जाले आ माई के मन परते मन रोआइन पराइन हो जाला। गाँव के सपना माइए पर टिकल रहे। ओकरा मुअते नेह नाता मउरा गइल। ई. साँच बात बा, गाँव के माटी आ हवा पानी से बनल मन में गाँवे समा

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भागल जात बा गाँव

31 October 2023
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भारत के कवनो गाँव अइसन हमरो गाँव बा। तनिएसा फरक ई वा कि हिन्दी प्रदेश के गाँव है। आजकाल्ह पत्रकार लोग हिन्दी पट्टी कहत बाने एगो अउर फरक बा। हमार गाँव बिहार की पच्छिमी चौहद्दी आ नेपाल देश की दक्खिनी

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जेहि सुमिरत सिधि होय

31 October 2023
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साकिन जीवपुर, पोस्ट देउरिया, जिला गाजीपुर। देवल के बाबा कीनाराम के परजा हुई। गाँव में राज कॉलिन साहेब के जरूर रहे, उनकर नील गोदाम के त पता नाहीं चलल, लेकिन हउदा आजो टूटल फूटल हालत में मिल जाई बिना सिव

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थोरे में निबाह

31 October 2023
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छोटहन एगो गाँव 'महलिया' हमार गाँव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के सलेमपुर तहसील में बसल ई गाँव । कवनो औरी गाँव की तरे, न एकर बहुत बड़हन इतिहास न कवनो खास खिंचाव । एहीलिए न एकर कबो खास चर्चा भइल, ना सर

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इयादि के धुनकी के तुक्क-ताँय

1 November 2023
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हमार गाँव दुइ ठो ह दोहरीघाट रेलवई के पीछे उँचवा पर एक ठे गाँव ह 'पतनई'- घाघरा के किनारे ओहीं जदू से बलिया ले नहर गइल है। जात क राही में नील के खेती क पुरान चीन्हा मिले। एक ठो नाला बा आ ओकरे बाद खेत रह

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पकड़ी के पेड़

1 November 2023
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हमारे गाँव के पच्छिम और एक ठो पकड़ी के पेड़ बा। अब ऊ बुढ़ा गइल बा । ओकर कुछ डारि ठूंठ हो गइल बा, कुछ कटि गइल बा आ ओकर ऊपर के छाल सूखि के दरकि गइल बा। लेकिन आजु से चालीस बरिस पहिले कहो जवान रहल। बड़ा भा

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जइसन कुलि गाँव तइसन हमरो

1 November 2023
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ग्राम-थरौली तप्पा बड़गों पगार परगना-महुली पच्छिम तहसील सदर जिला- बस्ती। एक दूँ दूसरको नक्सा बाय ब्लाक-बनकटी आ अब त समग्र विकास खातिर 'चयनित' हो गइल गाँव । चकबंदी में बासठ के अव्वल रहल, अबहिन ओकर तनाजा

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मिट- गइल - मैदान वाला एगो गाँव

1 November 2023
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बरसात के दिन में गाँवे पहुँचे में भारी कवाहट रहे दू-तीन गो नदी पड़त रही स जे बरसात में उफनि पड़त रही स, कझिया नदी जेकर पाट चौड़ा है, में त आँख के आगे पानिए पानी, अउर नदियन में धार बहुत तेज कि पाँव टिक

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गहमेर : एगो बोढ़ी के पेड़

2 November 2023
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केहू -केहू कहेला, गहमर एतना बड़हन गाँव एशिया में ना मिली केहू -केहू एके खारिज कर देता आ कहेला दै मर्दवा, एशिया का है? एतना बड़ा गाँव वर्ल्ड में ना मिली, वर्ल्ड में बड़ गाँव में रहला क आनन्द ओइसहीं महस

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बनै बिगरै के बीच बदलत गाँव

2 November 2023
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शंभुपुर शुभ ग्राम है, ठेकमा निकट पवित्र ।  परम रम्य पावन कुटी, जाकर विमल चरित्र ।।  आजमगढ़ कहते जिला, लालगंज तहसील |  पोस्ट ऑफिस ठेकमा अहे, पूरब दिसि दो मील ।।  इहै हौ 'हमार गाँव', जवने क परिचय एह

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कवने गाँव हमार !

2 November 2023
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सभे लोगिन अइसन आज कई दिन से हमरा अपना गाँव के बारे में कुछु लिखे आ बतावे के मन करता । बाकी कवना गाँव के आपन कहीं, इहे नइखे बुझात। मन में बहुते विचार आवडता एह विचारन के उठते ओह पर पाला पड़ जाता। सोचऽता

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बाबा- फुलवारी

2 November 2023
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ई बाति 1971 के है रेडियो पर एगो गीति अक्सर बजल करे-'मैं गोरी गाँव की तेरे हाथ ना आऊँगी।' तनी सा फेर- -बदल कके एगो अउरी स्वर हमरी आगे पीछे घूमल करे- 'मैं गौरी गाँव की, तेरे हाथ ना आऊँगी।' बाति टटका दाम

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हींग के उधारी से नगदी के पाउच ले

3 November 2023
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बहुत बदलि गइल बा हमार गाँव। कइसे? त देख शहीद स्मारक, शराबखाना, दू ठे प्राइमरी स्कूल, एक ठे गर्ल्स स्कूल, एक ठे मिडिल स्कूल, एक ठे इंटर कालेज, डाकखाना आ सिंचाई विभाग के नहर त पहिलहीं से रहल है। एक ठे छ

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शहर में गाँव

3 November 2023
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देवारण्य देवपुरी। देवरिया। बुजुर्ग लोग बतावे कि देवरिया पहिले देवारण्य रहे। अइसन अरण्य, जेमें देवता लोग वास करें। सदानीरा यानी बड़ी गण्डक के ओह पार चम्पारण्य, एह पार देवारण्य उत्तर प्रदेश आ बिहार के

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जइसे रे घिव गागर प्रकाश उदय

3 November 2023
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जे गाँव के गँवार हम दू गाँव के, हम डबल गँवार।  कि दो ओहू से बढ़ के पढ़े के नाँव प गाँवे से चल के जवना शहर कहाय वाला आरा में अइलीं तवन गाँवो से बढ़ के एगो गाँव। अगले बगल के गाँवा गाँई के लोग- बाग से ब

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एगो किताब पढ़ल जाला

अन्य भाषा के बारे में बतावल गइल बा

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