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विवाह क गात

1 January 2024

5 देखल गइल 5

तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम खोजले रे नाहि मिले पढ़ल पुरान रे ॥२॥

खोजत खोजत बाबा गइलन एक देसवा रे, उहे मिले पढ़ल पुरान रे । काहे बीनु वावा हो जउरी ना सीझे ले, काहे बिनु हुमवो ना होइ रे ।।३।।

केइ बीनु बाबा हो जग अँधियारी, केइ बीनु धरम ना होइ रे । दूध वीनु बेटी हो जउरी ना सीझे हो, घीव बीनु हुमिओ ना होइ हो ।।४।।

एक पुतर बोनु जग अँधिआरिऊ, थिया बीनु घरम न होइ हो । कवन गरहह्नवा वावा साँझहि लागे ला, कवन गरहनवा भीनुसार जी ॥५॥

कवन गरहनवा बाबा मॅड़वन्हि लागेला, कब दोनी उरगह होइ जी । चन्नर गरहह्नवा बेटी साँझहि लागेला, सुरुज गरहनवा भिनुसार जी ।।६।।

'घीया गरहनवा बेटी मंड़वलि लागेला, कब दोनी उरगह होई जी । कांपे ला कुसवा रे काँपे ला डमवारे, काँपे ला कुसवा के डार जी ।।७।। 'घीआ लेइ कॉपी ले बाबू हो कवन राम, कब दोना उगरह होइ जी ।।८।।

'नोचे गंगा बहती हैं। ऊपर यमुना बहती हैं। बीच में सरस्वती बहती हैं। उसी स्थल पर बाबा मेरे हवन करते हैं। वहीं से बेटी के लग्न (वर) खोजने के लिए वे निकल पड़े। उन्होंने हाथ में लोटा डोरो और कन्धे पर घोती को घर लिया' ।॥१॥

'बावा ने पूरब दिशा में वर खोजा, पश्चिम दिशा में वर खोजा; पर कहीं भी पुराण जानने वाला वर उन्हें नहीं मिला। तब वर खोजते-खोजते बाबा एक देश में गये। वहीं उन्हें पुराण पढ़ा हुआ वर मिला' ।॥२॥ 

'बाबा घर आये, तो कन्या ने पूछा- हे बावा, खोर किसके अभाव में नहीं चुरती? और किस वस्तु के अभाव से हवन नहीं होता? किसके बिना संसार अधेरा रहता है और किसके न होने की वजह से धर्म नहीं होता ?' ॥१॥

'बाबा ने कहा- हे बेटो, दूध के बिना खोर नहीं चुरती और घो के बिना हवन नहीं होता। एक पुत्र के अभाव में संसार अंधेरा रहता है और बिना कन्या के धर्म नहीं होता ।'।।४।।

'कन्या ने पुनः पूछा- हे बाबा, कौन-सा ग्रहण सन्ध्या को लगता है और कौन ग्रहण प्रातःकाल लगता है। हे बाबा, और मंडप में कौन ग्रहण लगता है और उसका उग्रह कब होता है ?' ॥५॥

'पिता ने कहा- हे बेटी, चन्द्रग्रहण सन्ध्या समय लगता है और सूर्य ग्रहण प्रातःकाल लगता है। और कन्या का ग्रहण मंडप में लगता है। उसका उग्रह कब होगा कौन कहे ?' ॥६॥

'कुस का पौधा काँपता है। उसके कोंपल काँपते हैं। और कन्या को लेकर उसका अमुक पिता काँप रहा है और कह रहा है कि अब उग्रह होगा। अर्थात् कब कन्या का विवाह होगा' ।।७।।

(२)

आँगन लीपेलि दहादही, माड़व छाइ ले ताहि चढ़ि मइया निरेखे ले बहिनी चलि आवेली ए ॥१॥

बहिनी आवत भइया भितरइले बहिनी चलि आवे लो आवतारी बाबा के दुलरुई गरभ जनि बोलहु जी ॥२॥

आवहु ए ननदी, आवहु मोरी चउधिराइन बइठहु बाबा चउपरिया मंगल एक गावहु जी ।।३।।

गाइवि ए भउजी गाइवि गाई सुनाइबि, हमरा के का देवू दान रहँसि घरवा जाइबि जी ।।४।। 

मागहु ए ननदो मागहु माँगि सुनावहु, जे तोरा हियरा समाय से हो कुछ मांगहु जी ।।५।।

अपना के लाली चुरिया बलकवा के हंमूली, प्रभुजी के चढ़न के घोड़वा रर्हसि घरवा जाइवि जी ॥६॥

काहाँ पइवों लाली चुनरिया बलकवा के हंसूली, कहाँ पड़वों चढ़न के घोड़वा नऊजी रउरा गाइवि जी ।।७।।

रोवति जाले ननदिया बीलखात भयनवाऊ, हंसइत जाले ननदोइया भले दरपा तुरलसि जी ॥८॥

चुप होलू ए बनी चुप होखु जनि रोइ मरतु हम जाइवि राजा के नोकरिया दरव लेइ आइवि जी ॥९॥

तोहरा के लाली चुनरिया वलकवा के हँसूली, अपना चढ़न के घोड़वा नइहर विसरावहु जी ।।१०।।

आगि लगइवों चुनरिया-वलकवा के हँसूली बजर परइवों घोड़वा नइहर नाहीं विसराइवि हो ।।११।।

'आँगन को लीप-पोतकर ऐसा साफ किया कि चम-चम चमक रहा है। उस पर मंडप छाया गया और उसी मंडप पर बैठे हुए भाई ने अपनो बहन को आते हुए देखा। बहन के आते हो भाई भोतर घर में घुस गया। अपनी स्त्री से कहने लगा कि बहन आ रही है, पिताजो को प्यारी कन्या आ रही है, गर्वपूर्वक मत बोलना' ।।१,२।।

'भावज ने कहा- हे ननद, हे मेरो चोधरानो आओ। पिता के चौपाल बैठो और एक मंगल गोत गाओ। ननद, ने कहा- मैं गाऊँगी और गाकर अवश्य सुनाऊंगी। पर भावज, बताओ मुझको कीन ऐसा दान दोगी कि मैं प्रसन्न होकर घर जाऊंगी।' ॥३, ४।।

'भावज ने कहा-माँगो, हे ननद दान माँग कर कम-से-कम सुनाओ तो सही। जो कुछ तुम्हारे हृदय में आवे उसे माँगो । ननद ने कहा- अच्छा मुझे तो लाल चूंदर चाहिये। बच्चे को हंसुलो (गले का भूषण विशेष) देना और मेरे स्वामी को चढ़ाने के लिये घोड़ा देना। बस मैं इतने ही से प्रसन्न मन घर लौट आऊंगी।' ।।५, ६।।

'भावज ने कहा- मैं लाल चूंदर कहाँ पाऊँगी। तुम्हारे बालक को देने के लिये हंसुली कहाँ से लाऊंगी। और तुम्हारे स्वामी को चढ़ने के लिए घोड़ा मुझे कहाँ मिलेगा ? तुम गोत भले न गाओ । रोती हुई ननद ससुराल जा रही है। बालक भी बिलखता हुआ जा रहा है! पर ननदोई हँसता हुआ जा रहा है और मन में कहता जाता है कि अच्छा दर्प तोड़ा' ।।७,८।।

'उसने कहा- हे धनि, अब चुप रहो। न रोओ, मैं राजा की नौकरी करने जाऊँगा और द्रव्योपार्जन कर लाऊँगा। तुमको लाल चूंदर लाऊँगा बालक को हंसुली और अपने चढ़ने के लिये घोड़ा लाऊँगा। तुम मायके की चिन्ता छोड़ो।'

'स्त्री ने कहा- मैं उस चूंदर में आग लगा दूंगी। बालक को उस हँसुली और तुम्हारे घोड़े पर वज्ज्र गिराऊंगी; पर मायके को न भुलाऊंगी।' ॥९, १०॥

( ३ )

निविया रे करुआइन सितलि बतास वहे हो, ताहि तर ठाढ़ कवन दुलहा नैनन नीर ढारे हो ।। किया वावू ! आजन वाजन थोर भइले, साजन धूमिल भइले हो ।। किया बाबू ! हमरो गुनहिया भइले, काहे मन धूमिल बाड़ हो ।। नाहीं वावा ! आजन वाजन थोर भइले साजन ना धूमिल भइले हो ।। नाहीं बाबा ! राउर गुनहिया भइले नाहीं मन धूमिल बाड़े हो ।। लाड़ील भइया अनजान सेहू नाहि जवरे अइले हो ।।

'नोम करुआ गई। शीतल पवन बह रहा है। उसके नीचे खड़ा खड़ा अमुक... दुलहा आँखों से नीर गिरा रहा है। ससुर ने पूछा- ए बच्चे, क्या तुम्हारे बाजा गाजा में कमी हुई, या तुम्हें बारात में भद्र पुरुष नहीं मिले, या मेरी कोई गलती हुई कि तुम मन धूमिल किये हो ?'

'दूल्हे ने कहा- हे पिता, बाजे गाज में कोई कमी नहीं हुई और न भद्र पुरुषों को हो कमो हुई ! और न हे पिता, आपको ही कोई गलती हुई है कि जिससे मेरा मन दुखित हुआ हो। मैं दुखित नहीं हूँ। मेरा प्यारा भाई है। वह साथ नहीं आया, इसी से मन धूमिल है अर्थात् चिन्तित है ।'

( ४ )

माई अलारि पूछे, बहिनी दुलारि पूछे हो, बाबू काई पवल दान दहेज त ओहि ससुरारी देसवा हो ।। सेर जोखि सोना पवलों पसेरी जोखि रूपा पवलों हो, अम्मा बरहो बरद घेनु गाई त एक नाही बेनी पवलों हो ।। जनि बाबू हहरहु जनि बाबू झहरहु हो बाबू कइ देबों दूसर बिआह त ओही घरे बेनी पाइव हो ।।

'माता ने प्रेम करके पूछा और बहन ने दुलार कर के पूछा कि हे बाबू आपने उस ससुराल में क्या वान दहेज पाया ?'

'पुत्र ने कहा- मुझे एक सेर जोख कर स्वर्ण के आभूषण मिले। एक पसेरो तोलकर चाँदी के गहने मिले। हे मा, बारह बैल और धेनु गाय मिलो । परन्तु एक अलबेली नारि नहीं मिली।'

'माता ने कहा-पुत्र, अधिक इच्छा न करो। न उसकी पूति के लिये झगड़ा ही करो। मैं तुम्हारा दूसरा विवाह कर दूंगी। उसी घर में अलबेली नारि मिलेगी।'

'हहरहु हहरना=सन्तोष न करके जो मिला, उससे अधिक चाहता। झहरहु झगरह झगरना। किसी वस्तु को प्राप्ति के लिये लड़ाई करना। बेनी चोटी। पर यह अलबेली का अपभ्रंश ज्ञात होता है। देनी के अर्थ से भी मतलब लगाया जा सकता है। अर्थात् स्त्रो तो सुन्दर है; पर उसके बाल वेनो गूंथने लायक नहीं हैं। बहुत छोटे हैं।' 

( ५ )

लिखि चिठिया जनकजी भेजेलें, बाँचि रहेलें सीरी राम हो । राम विआहन जनकपुर चललें, भली भांति सजेलें वराति हो ।।१।। हाथिन साजीले घोड़न साजी ले, साजी ले भरथ भुआल हो । रामजी के घोड़वा भले भाँति साजीले, सोता के सोरहो सिगार हो ।।२।। जब बरिअतिआ दुअरवा अइली हो, मागे दुअरवा के नेग हो ।

घर में के भांड़ि देहरी देइ पटकलनि, सत्र के धिया जनि होइजी ।।३।।

कलसा का ओते ओते वेटो बिनती करे, बावा से अरज हमार हो । गाड़ल गड़आ उखारो मोरे बाबा, राखीं जमीदारे के नाँव जी ॥४।। ई धिअवा मोर वएरनि भइली, भइली करेजवा के मूल हो । इहे रे बिटिअवा मोर गजना करवलसि साजन लोग बइठाइ हो ।।५।।

से सामी मोरे सभवा बइठले, केहू नाही उतरिया देइ हो । से सामी मोरे कर जोरि बिनवेले, नई नई करे ले सलाम हो ।॥६॥

'जनक ने पत्र लिखकर भेजा। श्री राम ने उसे पढ़ कर रख दिया। राम जनकपुर को ब्याह करने चले और पूर्ण रूप से बारात साजने लगे। हायो घोड़ा साजे गये और भरतजी स्वयं सजकर तैयार हुए' ॥१॥

'रामचन्द्र का घोड़ा भली भाँति सजाया गया और इधर सोता जो का भो सोलह श्रृंगार किया गया' ।॥२॥

'जब बारात दरवाजे पर पहुंची, तब राम ने दुआरचार का नेग माँगा, जनक ने घर के भीतर रखा हुआ अन्न का खाली भाण्ड देहरी पर ला पटका और व्यग्र होकर कहा- शत्रु को भी कन्या न उत्पन्न हो ॥३॥

'कलश को ओट से कन्या ने विनय किया कि पिताजी से मेरो एक प्रार्थना है। हे पिता, अपना गड़ा हुआ माल (गड़वा जो गाड़ा गया हो ।) उखाड़िये और अपने जमीन्दार होने का नाम निभाइये ' ॥४॥  

पिता ने कहा- अरे यह कन्या मेरी बेरिन हुई और हमारे कलेजे का शूल बन गयी। इसी पुत्री ने मेरी ऐसी गजना (फजीहत) इपने सज्जनों को दरवाजे पर बैठा कर कराई' ॥५॥

'उधर माता कह रही थी- अरे मेरे स्वामी, सभा में बैठकर बिनतो कर रहे हैं और कोई (बारात वाला) उत्तर तक नहीं देता। अरे मेरे ऐसे स्वामी (जो कन्या तक को अपनी इज्जत के सामने शत्रु समझते थे) हाय जोड़-जोड़ कर बिनती करते हैं और झुक झुक कर सब को प्रणाम करते फिरते हैं' ।।६।।

( ६ )

लिखि लिखि पतिया भेजेले जनक राजा, देहु दसरथजी के हाथ जी ।।

से पाती बांचे ले राजा दसरथ जी, सभवा में सभ के सुनावें जी ।।

हमरे घरे बाड़ी बारी सीता धिया, तोहरे घरे राम कुंआर जी ।।१।।

अगहन दिनवा कुदिन राजा, जनक आवे देहु जेठ बइसाख जी ।।

पण्डित बोलाइबि लगन सोचाइबि, रामहि कराइबि बिआह जी ।।२।।

गाई के गोवर अँगना लिपावल, गज मोती चउक पुरायो जो ।।

अलस कलस पुरह्य ले धरावल, मानिक दिअरा बरावल जी ।।३।।

भइले बिआह चलेले राम कोहवर, सरहज छेकेली दुआरि जी ।।

हमार नेग जोग दीहीं वर सुन्नर, तव रउरा कोहबर जाई जी ॥४।।

बाड़ा सवेरे में विदा जे सुनीला, जीअवि ए सखि कइसे जी ।।

माता जी ए सखी ओइसे जे रोवेली, जइसे समुद्र के धार जी ।।५।।

माता मीलवि पिता जीव मीलवि, भउजी मीलवि धाई के ।।

बड़ा प्रेम से बहिनी मोलवि, अवना आइवि भव सागर जी ।।६।।

'राजा जनक ने पत्र लिख कर भेजा और आज्ञा दी' वह राजा दशरथ के ही हाथ में दिया जावे। उस पत्र को राजा दशरथ ने अपनी भरी सभा में सभी सज्जनों को सुना करके पढ़ा। उसमें लिखा था, 'मेरे घर सोताजी कुंवारी है। आप के घर में रामचन्द्र कुंआरे हैं। उन्होंने उत्तर दिया है 

राजा जनक, विवाह के लिए ठीक समय नहीं है। अगहन, चेत, बैसाख आने दोजिये, पण्डित बुलाकर लग्न शोध कराऊँगा और राम का विवाह सीता से करूंगा' ।।१, २॥

'गाय के गोबर से आँगन लिपाया गया। उस पर गजमुक्ताओं का सुन्दर चौक बनाया गया। उस पर पुरह्य यानी चावल रख कर कलस वगैरह रखाया गया और उन पर माणिक दीप आदि जलाये गये' ।।३।।

'तब विवाह हुआ और राम कोहबर (सुहाग भवन) चले। वहाँ सरहज ने दरवाजा रोक कर कहा- हे सुन्दर वर, मेरा नेग दे दोजिये, तब आप सुहाग भवन में प्रवेश करें ।॥४॥

'उधर सीता रो-रो कर अपनो सखियों से कह रही हैं- हे सखो! सुनती हूँ कि बड़े तड़के विदाई होगी, मैं किस तरह घर छोड़कर जोऊँगो । हे सखो ! मेरी माँ इस तरह रो रही हैं, जिस तरह समुद्र को धार बहती हो' ।।५।।

'हे सखी, मैं माताजो से और पिताजा से मिलूंगी। भावज से दौड़ कर मिलूंगी। और बड़े ही प्रेम से अपनी बहन से मिलूंगी। हे सखो, अब फिर इस भवसागर में नहीं आऊँगी' ।।६।।

( ७ )

बेटी, जाहि दिन जनम तोहार भदउओं के राति परीवा, रामजी काहे लागी जनमेली मोर विटिया । हँसुआ खोजी त बेटी पसँघो ना मीले, सितुहे छिलवलो तोरे नार बिटिया ।। रामजी काहे लागी जनमेली मोर बिटिया ॥१॥ पुरुप खोजलों में बेटी पछीमो खोजलों, खोजलों सहर गुजरात बिटिया ।। राम० ॥२॥ तोरे जोग बेटी हो बर नाहीं मिलले, कइमे करबि कन्यादान बिटिया ।। राम० ।।३।। पुरुब गइलों बेटी पछीमों त गइलों, गइलों ओरीसा जगरनाथ विटिया ।। राम० ।।४।। 

तोरे जोग बेटी हो बर एके मिलले, मीलेले राज कुंआर बिटिया ।। राम० ।। रामजी एहाँ लागो जमलो मोरि बिटिया ॥५॥

अछत काँपे ला चन्नन कापे ला, कॉपे ला कुसवा के डाढ़ि बिटिया ।। राम० ॥६॥ बोच मड़उआ बाबा मोर कांपी ले, जांघ बइठवले आपन बिटिया ।। राम० ।।७।। जनि कांपहुँ अच्छत जनि कांपहु चंनन । जनि कांपु कुसवा के डाढ़ि बिटिया ।। राम० ॥८॥ जनि काँपु बावा हो जाँघे लेले धिअवा, भले करव कन्यादान बिटिया ।। रामजी एही लागी जनमेली तोरि बिटिया ॥९॥

'हे कन्या, जिस दिन तुम्हारा जन्म हुआ, उस दिन भादों की रात थो और तिथि यो परिवा। हे भगवान ! किस लिये मुझे तूने बेटो का जन्म दिया। मैं नाल काटने के लिये हँसिया खोज रहा था; पर वह नहीं मिलो । आग जलाने को लकड़ी भी (पसंघी लकड़ी का वह कुन्दा, जो सौर गृह के दरवाजे पर धीमी आंच जलता रहता है)। नहीं थो। हे कन्या, सोप से मैंने तेरा नाल कटवाया। हे भगवान् ! किस हेतु मेरे घर कन्या का जन्म दिया ? ॥१॥

'अरो कन्या मैंने तेरे लिये वर पूर्व दिशा में खोजा, फिर पश्चिम दिशा में तलाशा और गुजरात शहर में दुलहा खोजा; पर तेरे योग्य वर मुझे कहीं नहीं मिला। हा, मैं कैसे कन्या दान करूंगा। दंव, तूने किस हेतु मेरो कन्या का जन्म दिया ? ॥२, ३॥

'हे बेटो, मैं पूर्व गया और पश्चिम भी गया और अन्त में ओरोसा में जगन्नाथपुरी तक पहुँचा। वहीं तुम्हारे योग्य वर राजकुमार मिला। हे बेटी, इसी विवाह के ही लिए बेटी का पिता के घर जन्म होता है' ।।४,५।। 

मंडप में अक्षत कांप रहा है। चंदन कांप रहा है। और उबर कुश को डाल भो काँप रहीं है। ओर बीच मंडप में अपनो कन्या को जांध पर, कन्या दान के लिए बंडाये हुए, पिता कांप रहे हैं। हा देव, किस हेतु आपने मेरे घर कन्या का जन्म दिया ?' ।।६,७।।

'हे अक्षत, काँपो नहीं। चंदन, तुम भी न कांवों। हे कुश को डाल तू भो भय न कर। हे पिता, जांघ पर कन्यादान हेतु कन्या को बैठाये हुए तुम भी न काँपो, शुभ विधि से भलो-भाँति कन्यादान कर दो। डरो मत। ईश्वर, ने इसीलिये तुमको कन्या दो' ।।८, ९।।

यहाँ कन्या के जन्म से लेकर विवाह तक गरोब पिता को कठिनाइयों और विपदाओं तथा चिता का सजोव करुण चित्रण कितना सुन्दर उतरा है। कन्यादान करते भी पिता यज्ञ के निविघ्न पार हो जाने को कामना से भयवश थर-थर काँप रहा है और यहीं तक नहीं, मंडप के निर्जीव अक्षत, चंदन और कुश भी कांप रहें हैं। कन्या का विवाह हिंदू समाज में कितना विघ्न, बाधापूर्ण और जिम्नेदारों का कत्र्तव्य समझा जाता है, यह इस गीत से साफ प्रकट होता है। फिर भी समाज की कुरीतियाँ और दहेज को प्रया हमारे कितने घरों को आये दिन बिगाड़ रही है।

( ८ )

बेरिहि बेर तोहि बरजों ए बेटो हो, सुरुज के जोते जनि जाडु ए ॥ सुरुज के जोतिये चनरमा छपित होखे, कही तू तए बेटा ! तमुआ तनइतों हो, चन्द्र बदन कुम्भिलाई ए ।। कहितू त छत्र गढ़ड़तों ए ।। काहे लागी बाबा ! हो तमुआ तनइव, काहे लाग। छत्र गड़इब ए ।। आजू के राति वावा तोहरे मड़उआ, काल्हि सुबुध वर के साथ हो ।। अव त भइली पर गोत्री ए बाबा ! तोहरे धियवा अब ना बानी हो ।। खोवरनि खोरवे हो बेटी! दुधवा पीअवलीं, वेटा से अधिका दुलार हो ।। दुधत्रा के नेकी नाहीं दोहलू हो बेटी ! लगलू पराया बर के साय हों ।। दुधवा के नेकी दोहें भइआ हो कवन भइया, हम पर गोत्रो तोहार हो ।। 

पिता ने कन्या से कहा- मैं बार-बार तुम से मना करता रहा कि सूर्य को ज्योति में न जाओ। सूर्य को ज्योति के कारण से चन्द्रमा छिप जाता है, तुम्हारा भी चंद्रवदन कुम्भला जायगा। हे बेटो, कहतो तो मैं तुम्हारे लिये लेमा खड़ा कर देता और यदि कहो होतो, तो छाता बनवा दिया होता।'

'इस पर कन्या ने उत्तर दिया- हे पिता, क्यों खेमा खड़ा कराओगे और क्यों छाता हो बनवाओगे। आज की रात में तुम्हारे मंडप में हूँ; कल बुद्धिमान वर के साथ होऊंगो। अब तो मैं परगोत्रो बन गई। तुम्हारो कन्या अब नहीं रही।'

'पिता ने दुःखो होकर कहा- हे बेटी, मैंने तुम्हें कटोरा भर-भर कर दूध पिलाया और अपने पुत्र से अधिक तुम्हारा दुलार किया। सो हे बेटी, उस दूध को नेको तूने नहीं निभाई; बल्कि मुझे भूल कर पराये वर के साथ लग गयी।'

'कन्या ने उत्तर दिया- हे पिता, उस दूध को नेको मेरा अमुक भाई देगा। मुझे तो तुमने अपन। परगोत्री बना दिया ।'

यह गोत उस समय का ज्ञात होता है, जब विवाह कन्या के सामने ऐसी लज्जा की वस्तु हो समझा जाता था और उसकी सम्मति के साथ ठोक होता था। अतः कन्या उस संबंध में लज्जावश कुछ बोलती ही नहीं हो, सो बात नहीं थी। लाड़ से पाली गई कन्या से पिता ने किस तरह सच्ची-सच्ची बातें कहीं है। इससे यह भी प्रगट है कि कन्याओं में समय के अनुसार अपने को बना लेने की कैसी अद्भुत शक्ति है ।

( ९ )

वावा ना देखों बाग वगइचा, बावा ना देखों घनी फुलवारी । कहाँ दल उतरी ।।

बेटी ला देवों बाग बगड्चा, बेटी ला देवों घनी फुलवारी । मड़उआ दल उतरी ।। 

वेटी ! किया तोर दान दहेज थोर, बेटी किया तोर नायक छोट ।

काहे रे मन बेदिल ।।

वावा ! ना मोरे दान दहेज थोर, बावा ना मोरे नायक छोट ।

नाहीं मन बेदिल ।।

बावा! एकहि बाते रउरा चुकली, वावा हम गोरिया वर साँवर ।

ओहो रे मन वेदिल ।।

बेटी ! साँवर साँवर मति करू, वेटी सांवर श्री भगवान ।

उहे रे वर सुन्दर ।।

बेटी ! बरवा के माई बड़ी फूहर, बेटी लावेली तोसिआ के तेल ।

त घमवा सुतावे ओही रे वर साँवर ।।

बेटी तोहार मयरिया बड़ी गिहिथिन, बेटी लावे ली तेल फलेल । त छहवाँ सुतावेलो ओही रे बेटी सुन्दर ।।

बेटी रगर छिया भरि चन्नत, बेटी लावना समधिन के बेटा ।

उहे बर सुन्दर ।।

'कन्या पिता से पूछ रही है- हे पिता, मेरी दृष्टि में कोई ऐसा बाग या बगीचा या कोई धनी फुलवारी नहीं दीखती, जहाँ बारात ठहराई जाय। बारात कहाँ ठहरेगी ?'

'पिता ने कहा- हे बेटी, मैं बाग बागोचा लगा दूंगा। घनो फूलवारी भी लगा दूंगा। पर बारात तो मंडप में हो उतरेगो।'

'हे बेटी, तुम्हारा मन बेदिल देख रहा हूँ। सो क्यों ? क्या तुम्हारा दान दहेज मैंने कम दिया, या तुम्हारा वर छोटा है कि मन तुम्हारा गिरा हुआ है ?'

'कन्या ने उत्तर दिया - पिताजी, न तो मेरा दान दहेज हो कम है, न मेरा नायक हो छोटा है। और न मेरा मन ही बेदिल है। परन्तु हे पिता, आप एक ही बात में चूक गये और वह यह है कि मैं गोरी हूँ और बर 'सांवर' वर्ण है। इसी से मेरा मन कुछ गिरा हुआ है।'

'पिता ने कहा-बेटी साँवर सांवर, न कहो। सांवर वर्ण तो श्री भग- वान हैं और वे हो वर सबसे सुन्दर भी हैं। बात असल यह है कि वर को माता बड़ी फूहर है। अरी बेटी, वही वर को तीसी का तेल लगाती थी और धूप में सुलाती थी। उसी से वर का रंग साँवला हो गया; परन्तु तुम्हारो माता गृहकार्य-कुशल है। वह अपनी कन्या को तेल-फुलेल लगातो रही और धूप में न सुलाकर छाया में सुलाती रही। इसी से उसको कन्या सुन्दर है। तुम भी थाल भर चन्दन रगरो और समधिन के पुत्र को लगाओ, तब देखो वही बर सुन्दर दोखेगा।'

यह गीत तो तब का है, जब कन्या की राय भो विवाह में लो जातो थो। स्वयंबर प्रथा के टूटने के बाद जब ब्राह्मण विवाह क्षत्रियों में प्रारम्भ हुआ, उस समय का यह गीत ज्ञात होता है; क्योंकि पिता कन्या से और कन्या पिता से बिना संकोच भाव के विवाह के प्रबन्ध के सम्बन्ध में, बर के पसन्द और ना पसन्द होने के सम्बन्ध में खुलकर बातें कर रहे हैं!

आमवा

( १० )

मोजरी गले, कोइलरि बसेर ले ली हो ।

ताहि तरे बनिया उतरि गइले मोती सारी छानि देले हो ॥१॥

घरवा से निकले ली कवनि बेटी, कीनि नादीं बाबा मोती सारी हो ।

बाबा, कहेवे बेटी हम निरधन, कहाँ पड़वों मोती सारी हो ॥२॥

अतना बचन जब सुनली त चलि भइली ससुरवा देसे हो ।

अंतरर्राह भेंटे ले कवन दुलहा कइसे

सुगवा चलि अइलू हो ॥३॥

आमवा मोजरी गइले, कोइलरि वसेर ले ली हो ।

ताहि तर बनिया उतरि गइले, मोती सारी छानि दे ले हो ।।४।।

बाबा कहे ले बेटी हम निरवन, कहाँ पइवों मोती सारी हो ।

ए चुप होखु धनिया ! तू चुप होखु, पटोरवे लोर पोंछ हुए ॥५॥

ए हम जइनों राजा का नोकरिया त मोती सारी वेसाहि देवों हो ।

मांनी मारी पेन्ट्रेकी कवन बेटी, देख बाबा मोती सारी हो ।।६।।

भूगुनहु हो बेटी ! भगुतहु, मोती सारी भुगतहु हो ।

हम तोरा माई बाप निर्धन, तोर सुख देखि विहसवि हो ॥७॥ 

आम में बार लग गये। कोयल बसेरा लेने लगी अर्थात् आ गयो ।

उसके नीचे बनिया ने आकर अपनी सारी और मोतो को दूकान छान दो।

घर से अमुक कन्या बाहर निकली और अपने पिता से बोलो- हे पिता, मुझे सारी और मोती खरोद दो!' पिता ने कहा- हे बेटी, में निर्धन आदमी ठहरा, सारी और मोती कैसे पाऊँगा ?' ।।१,२।।

'इतनी बातें सुनकर अमुक कन्या अपने ससुर के देश चल निकलो । वहाँ अन्दर जनानखाने में एकान्त स्थान में अमुक दूल्हा से उसको भेंट हुई। दूल्हे ने पूछा- हे सुन्दरी, तुम कहां और कैसे चलो आई ?' ॥३॥

'कन्या ने कहा--मेरे मायके में आम में मंजरी लग गयो। कोयल आ आकर उस पर बसने लगीं। और उसो वृक्ष के नीचे बनियों ने देशावर से आकर मोती ओर सारी को दूकान छान दो। पर मेरे पिता कहते हैं कि हे बेटी मैं निर्धन हूँ। मैं मोतो ओर सारो कहाँ पाऊंगा? इस पर दूल्हे ने सान्त्वना देते हुए कहा कि, हे धनि, चुप हो, चुप हो। वस्त्र से आंसू पोंछो। मैं राजा के यहाँ नौकरी करने जा रहा हूँ, तुमको मोतो और सारी खरोद दूंगा।'

'इस तरह अमुक कन्या ने सारो ओर मोती पहनकर प्रसन्न हो अपने पिता से कहा- हे पिता! मेरी सारो और मोती देखो ॥४,५,६।।

'इस पर पिता ने प्रसन्न होकर कहा- हे कन्ये, सारो और मोतो का तुम भोग करो। तुम्हारे माँ-बाप निर्वन हैं। तुम्हारे सुख को देखकर वे प्रसन्न होते हैं' ।।७।।

इस गोत में सही-सही घटना को कन्या ने गाकर अपने मन को भाव- नाओं का स्वाभाविक चित्रण किया है। दिहाती मूर्ख कन्या काव्य को बारीकियाँ क्या जाने कि उसे अलंकारों से विभूषित करके उक्ति-चमत्कार दिखावे ? उसको समझने के लिए हमें उसके अनुसार अपने मन को बनाना पड़ेगा। तभी हम उसके दुख-दर्द को और कामनाओं तथा उनकी पूति के आह्लाद को समझ सकते हैं। पर इस गीत में काव्य न हो, सो बात नहीं है। प्रथम चरण में कितना सुन्दर प्रकृति-वर्णन है। साय हो आम के मोजरने और कोयल के बसेरा लेने से बसन्तागमन को सूचना ओर स्त्रो के मन में सुकुमार भावनाओं को जाग्रति का होना भो कैसे सुन्दर रूप से व्यंजना द्वारा व्यक्त हुआ है।

( ११ )

अमत्रा से मीठ इमिलिया ए बावा, बावा महुआ में लागि गइले कोंच-

साजन गढ़ घेरि अइलनि हो ।।१।।

कोठवा उठवली अटरिया हो वावा, बाबा खिरिकिन लवली केवाड़-

साजन गढ़ घेरि अइलनि हो ॥२॥

पइसि जगावेली बेटी हो कवन बेटी, बाबा काहे रउरा सोई निरभेद-

साजन गढ़ घेरि अइलनि हो ।।३।।

कुछ रे जागीले बेटी कुछ रे सुतीले, बेटी कुछू रे दहेजवा के सोच--

साजन गढ़ घेरि अइलनि हो ।।४।।

गइया में देला भइँसिया में देलों बेटी, देलों बरहों बरध घेनु गाय-

साजन गढ़ घेरि लेलनि हो ।॥५॥

गड्या रउरा भइसिया हो बाबा, बाबा बरहो वरध धेनु गाय--

साजन गढ़ घेरि लेलनि हो ।।६।।

बावा छूरी लागि रूसेले ससुरा के पुतवा बाबा मइआ भइली उदास--

साजन गढ़ घेरि लेलनि हो ।।७।।

सोनवा वेसाहि वावा छूरिया बनवले, वावा रूपे छाने लागि गइले मूठ--

साजन गढ़ घेरि अइले हो ।।८।। जबरे कवन दूलहा हाथे छुरी, लिहले, रहँसी चलेली बरिआत--

साजन गढ़ छोड़ि दिहले हो ।।९।।

यह गीत भी इतना पुराना है, जब कन्या अपने विवाह में पिता के साथ प्रबन्ध आदि का काम करती थी। पर हाँ, दहेज की प्रथा तब भी जारी हो चुकी थी ।।

'कन्या अपने पिता से कह रही है- हे पिता, आम से मीठी इमली ही होती है; क्योंकि उसमें खटास मिश्रित मिठास है। हे पिता, महुआ में कोंच (महुआ के फल) लग गये। अर्थात् बैसाख जेठ का दिन आ गया जब ब्याह होता है। दूल्हा हमारा गढ़ घेरकर बाहर आ पहुँचा। हे पिता, आपने मेरे लिए कोठा बनाया, अटारी उठायी और खिड़कियों में मजबूत किवाड़ लगवाया, पर तब भी साजन को मेरो सुरक्षता के ऊपर विश्वास नहीं हुआ। प्रियतम, गढ़ घेरकर मेरी विदाई के लिए पहुंच हो गया' ॥१,२॥

'उस अटारी के ऊपर अन्दर जाकर अमुक कन्या पिता को जगाकर कहतो है -

हे पिताजी, आप क्यों प्रगाढ़ निद्रा में शयन कर रहे हैं? साजन गढ़ घेर कर आ पहुँचे। पिता ने कहा- बेटो, मैं तो जग रहा हूँ ओर कुछ सोता हूँ और कुछ मुझे दहेज को चिन्ता हो रही है, कि दूल्हा ने गढ़ घेर लिया । हे बेटी ! मैंने गाय दी, भैंस दो ओर बारह बारह बैल तथा धेनु गाय भो दे दो फिर भी दूल्हे ने क्यों गढ़ घेर लिया ? ॥३,४,५॥

'कल्या ने कहा- हे पिताजो, आपने गाय और भंस तो दो, बारह बैल और धेनु गाय भी दान दो, फिर भी साजन ने गढ़ घेर लिया। सो हे पिता, छूरी के लिए आपके दामाद रूसे हुए हैं, और उससे मेरी माताजी उदास है। दूल्हा गढ़ घेरकर बाहर आ गये हैं' ।।६,७।।

'इस पर सोना खरीद कर पिता ने छुरी बनवाई और चांदी को उसमें मूठ लगवायी। हा दूल्हे ने गढ़ घेर लिया' ॥८॥

'हे पिता, जब अमुक दुलहा ने हाथ में छुरी ली, तब प्रसन्न होकर बारात रवाना हुई और इस तरह साजन ने गढ़ छोड़ दिया' ।।९।।

यह गीत भी बहुत पुराना है। उस समय दुलहे रुपये पंसे के लिए नहीं रूसा करते थे, बल्कि वे रूसते थे हथियार के लिए, छुरी कटार आदि के लिए । धन मवेशी पाकर भी तब तक वे सन्तुष्ट नहीं होते थे, जब तक उन्हें अस्त्र- शस्त्र नहीं मिलते थे। इस गीत से यह भी पता चलता है कि कन्या को विदाई में पिता के आनाकानी करने पर वर सशस्त्र चढ़ाई करके विदाई करा लेता था।' 

अवध नगरिया से अइले बरिअतिया, भइले जनकपुर सोर । परिछन चलेली छैल छविलिया, चारू तुरंग अनमोल ।। परिछि के दोही ले हम आगे अगुअनियाँ, अत बड़ भागि हमार । सिर के पगरिया भुइयाँ डासि दोहोले कहाँ बर दोहीं जनवास ।। मॅड़वा छववलीं कलसा धरवलीं, करवली लगनवा विचार । मोता लेइ बइठवलें चऊक पर सोताजी के राम से विआह ।। बीदाई के त कुछुओ खबर नाहीं, सुनतानी बिदा वाटे काल्हू । रोवत बाड़ी सखिया कहि कइसे जिअबि हम सीता बिनु आजु ।। मांड़ावा के बाँस घइले जनकजी बोलत बानी सुनु सीता बाति हमार । तोहारी सासुइआ सीता, जगत के ऊपरा मान ताड़े सकल संसार ।। सेहू सासु पारी गारी हमरा के दोह जनि उनकर जवाब । कलसा का ओते ओते बोले ली मंदागिनि सुनीं रउरा सीता जी के बाप ।। हमरा सीता के नाथ रउरा आनि दीहीं तवे रहिहें प्रान हमार । मड़ावाँ के बांस घइले बोलेले जनक सुनी सीताजी के माय । जेकर सीताजी हई सेही ले ले जाला बात ना रहिहें हमार ।।

'अवघ से बरात आई ! जनकपुर में शोर हुआ। सुन्दर अनमोल 'घोड़े पर सवार वर को बटोरने के लिए छेल-छबीली अपने-अपने घर से निकलीं। वे वर का परछिन कर अगवानी के बाद कहती हैं कि हमारे भाग्य अत्यन्त बड़े हैं। राजा जनक अपने सिर की पगड़ी को जमोन पर पावड़ बिछा देते हैं और प्रसन्न मन कहते हैं कि मैं राम को कहाँ ठहराऊँ कि उन्हें तकलीफ न हो। उन्होंने मण्डप को छवाया, वहाँ कलश रखवाये और तब लग्न मूहूर्त का विचार कराया और सीताजी को लेकर चौक पर मण्डप में जा बैठे। अहा ! शोभा देखो, सीताजी का रामजी से आज ब्याह है।' 

"सखी सहेली यह कहती हैं कि हमें विदाई को कोई खबर नहीं। सुनती हूँ कि विदाई कल ही होगी। हाय हम सोता के बिना कैसे जोयेंगी। रो रही हैं।'

'उधर मंडप का बांस पकड़े जनकजो सीता को समझा कर कह रहे हैं- हे सीता ! मेरी बात सुनो। तुम्हारी सास संसार ऊपर है। संसार ऐसा ही मानता है। वह हमको गाली देंगो; पर तुम उनका उत्तर न देना' ।

'यह सुनकर कलश की आड़ में खड़ी खड़ी सीता की माता, मंदाकिनी, जनक से कहती हैं- 'हे सीताजी के पिता सुनिये, आप मेरी सोता को वापिस ला दें। तब तो मेरे प्राण बचेंगे। अन्यथा नहीं।'

'मण्डप का बाँस पकड़े हुए जनक उत्तर देते हैं- हे सोता को माँ सुनो। सोता जिसकी है वह उसको लिये जा रहा है। मेरी बात वहाँ नहीं रहेगी।

( १३ )

सावन सुगना ! गुर घोव खीअवलीं चइत बूंट के दाल । अब सुगना ! तू भइल सेअनवा बेटी के वर खोजे चाटु ॥१॥ उड़ल उड़ल तू जाइयो रे सुगना ! बइठेहु सवद ओनाय । डढ़िये ओनायेहु पखना फुलायेहु चितयेहु नजरि घुमाय ॥२॥ जे बर सुगना ! तू देखीह सूनर हो जेकर चाल गम्भीर । जेहि घर सुगना तू सम्पति पइह वोही घर रचिहै बिआह ॥३॥ हेरली वर मैं सजुग सुलच्छन भहर भहर मुँह जाति । साठि बरद में चरनी देखलीं वोहि घर रचेंली बिआह ।।४।।

'हे सुआ ! मैंने तुमको सावन में घी और गुड़ तथा चैत में चने की दाल खिलाकर पाला। अब तुम सयाने हो गए। जाओ, मेरो कन्या के लिए बर ढूँढ़ लाओ' ॥१॥

'हे सुआ ! तुम उड़ते-उड़ते चले जाना और शब्द सुनकर बैठ जाना। डाल पर बैठे-बैठे तुम चुपचाप शब्द सुनकर और नजर घुमा-घुमाकर पंख फुला-फुला कर इधर-उधर देखते रहना। हे सुआ ! जिस वर को तुम सुन्दर देखना और जिसको चाल गम्भीर पाना और हे सुआ ! जिसके घर में तू सम्पत्ति देखना उसो के यहाँ विवाह ठीक करना' ।।२,३॥

'सुग्गे ने कहा- मैने अच्छे लक्षणों वाला ओर सदा सजग रहनेवाला बर ढूंढ़ लिया है। उसके मुख को ज्योति दमकती हुई सदा उसके मुख पर चमका करती है। उसको चरनी पर मैंने साठ बैल बंधे पाये। उसी के घर विवाह

ठोक किया' ।।३।।

वर की तलाश आज हिन्दू समाज में बड़ी कठिन समस्या हो गई है। जिस दिन कन्या जन्म लेती है, उसी दिन से पिता-माता को उसके विवाह को चिता लग जाती है। माता के लिए तो सदा वर की बातें सोचते रहना नित्य को दिनचर्या हो जाती है। सभी काम में उसके मन में यही भावना बैठी रहती है कि कन्या के लिए कंसे अच्छा वर मिल जाय। यही बात इस गीत में माता अपने पाले हुए तोते को वर खोजने के लिए भेजकर सिद्ध कर रही है। भारत से यह दहेज कुप्रथा जो कन्या के जन्म को घर में अभिशाप बना रही है, कब उठेगी।

( १४ )

बावा जे चललनि मोर वर हेरन पाट पटम्मर डारि । छोट देखि वावा करवे ना करिहें बड़ नाहीं नजरि समाय ।। १ ।। आरे आरे वावा सुघर वर हेरहि हम बेटी तोहरी दुलारि । तीन लोक में हम भइली सुन्नरि हँसी ना करइह हमार ।। २॥ उमरे में गोड़ि गोड़ि ककरी बोअवलों ना जानो तीत कि मीठ । देसवा निकसि बेटी तोर बर हेरलों ना जानों करम तोहार ।। ३ ।। पूरव खोजली पछिमों में खोजली खोजलीं में दिली गुजरात । तोहरे जोग बर कतहूँ ना पवलीं अब बेटी रहहु कुंआरि ॥ ४ ॥ पूरब खोजल पछिमां खोजल खोजल दिली गुजरात । चारि डेग भुइँ नगर अजोधिया दुई बर हउँए कुंवार ॥ ५ ॥ 

ऊ वर मांगे बेटी घोड़ा ओ हाथी मागे मोहर पचास । ऊ वर मांगे बेटी नीलख दायज मोरे वते देई न जाय ॥ ६ ॥ जेकरा नाही बाबा हाथी ओ घोड़ा नाहीं होने मोहर पचास । जेकरा ना होखे बाबा नौलाख रुपया ते वर हेरे हरवाह ।। ७ ।। हर जोति आवे कुदारी गड़िभाँजि आवे बइडे मुँह लटकाय । उनही के तिलका चड़इह मोरे बाबा ऊ वर तिलका न लेय ।। ८ ।।

आमन देखि बावा डासन दीह मुख देखि दीह बीरा पान । अपनी संपत्ति देखि दायज दोह बर देखि दीह कन्यादान ॥ ९ ॥

'रेशमी वस्त्र और पोताम्बर अॅढ़कर मेरे पिता मेरे लिए वर खोजने चले हैं। छोटे वर से तो वे मेरा बिवाह करेंगे हो नहीं और बड़ा वर उनको आँख में समायगा ही नहीं ॥१॥' कन्या ने पिता से कहा--

'हे पिता ! सुन्दर वर ढूँढ़ना। मैं तुश्हारी दुलारी बेटी हूँ। तीनों लोक में मैं सुन्दरी हूँ। देखना मेरी हंसी न कराना' ।।२।।

'इस पर टुक खोझकर पिता ने कहा- ऊसर को गोड़-गोड़ कर मैने ककड़ी बोआई है। पर नहीं कह सकता, ककड़ियाँ मीठी होंगी कि तोता। देश-विदेश निकलकर हे बेटी! मैं तुम्हारे लिए वर खोजता हूँ। नहीं जानता तुम्हारे भाग्य में क्या है। वर अच्छा मिलेगा या बुरा ! '॥३॥

'मैंने पूर्व दिशा में वर तलाशा, पश्चिम भी खोजा, दिल्ली- गुजरात भी वर खोजने से बाज नहीं आया? पर हे बेटो, कहीं भी तुम्हारे योग्य वर नहीं मिला। अब तुम कुँवारी ही रहो' ।।४।।

'कन्या को यह बुरा लगा। उसने कहा- हे पिता, तुमने वर के लिए पूरब भी ढूंढ़ा और पश्चिम भी ढूंढ़ा डाला। दिल्ली और गुजरात में भी वर ढूँढ़ ही लिया। पर चार कदम पर अयोध्या नगरों है - यहाँ जो दो वर क्वाँरे हैं' ? ॥५॥

इससे पिता को और चोट लगी उन्होंने कहा- हे बेटी, वे वर घोड़ा- हायी, पचास मोहरें तया नौ लक्ष रुपया मांगते हैं। मेरो हिम्मत तो इतना बहेज देने को नहीं है ॥६॥

'इस पर कन्या ने व्यंग्य करके कहा- हे पिताजी, तब जिसके पास हायो-घोड़ा न हो, पचास मोहरें न हों, ओर जो नौ लाख रुरये का दहेज न दे सके, तो वह फिर हर जोतनेवाला हो वर ढूंढ़े ? जो हल जोतकर और खेत में कुदाल से काफो खेत गोड़कर जब घर आवे तो मुँह लटका कर बैठा रहे। हे पिता, तो तुम भी ऐसे हो वर को तिलक चढ़ाना। वे वर दहेज नहीं लेंगे' ।।७,८।।

इस वाक्य से कन्या ने दहेज कुप्रया को तो कोसा हो है साय हो पिता पर भी व्यंग्य किया है कि केवल दहेज भय से हो जो अच्छा वर खोजने से डर कर मुझे आजन्म क्वारी रहने को सलाह देते हो, तो अच्छा है हलवाहे से ही मेरा ब्याह कर दो। वहीं दहेज नहीं मांगेगा। किन्तु आवेश में आकर पिता के क्वारी रहने के ताने का उसने जबाब तो दे दिया पर तुरत अपने को संभाल भी लिया। कहा--

हे पिता, जैसा आसन हो वैसा हो उस पर डासन बिछाना भी उचित है। मुंह देखकर हो पान का बीड़ा खिलाना अच्छा है। सो पिताजी, आप अपनी सम्पत्ति देखकर ही दायज देना; पर कन्या के योग्य वर देख कर हो कन्या दान देना, उसमें भूल न करना अर्थात् धन सम्पत्ति का विचार तुम अपनो सम्पत्ति और धन के अनुसार करना; पर वर के विचार में कन्या के यग्य वर होने का ख्याल अवश्य रखना ।'

इस गोत में पाठक देखेंगे कि कन्या निःसंकोच होकर अपने विवाह के बारे में पिता से तर्क-वितर्क कर रही है और अपनी रुचि प्रकट करना भो नहीं भूलती। साथ हो पिता को अपनी स्थिति का भो खयाल रखने का आदेश करती है, पर वर के चुनाव में वह किसी तरह को त्रुटि नहीं चाहतो । धन आदि का विचार पिता अपनो सम्पत्ति के अनुसार सोच-विचार कर कर ले, पर वर कर तो उसे कन्या के अनुकूल हो योग्य, सुन्दर ओर उचित बयस बाला चुनना चाहिए । 

कवन गरहनवाँ बाबा साँझ जे लागेला कवन गरहनवा भिनुसार । कवन गरहनवाँ बाबा औघट लागे कब दोनों उगरह होइ ।। १ ।। चन्द्र गरहनवाँ बेटी साँझि जे लागे सुरुज गरहनवा भिनुसार । धीअवा गरहनवा बेटी औघट लागेले कब दोनों उगहर होइ ।। २ ।। काँपइ हाथों रे कॉपर घोड़वा काँपइ नगरा के लोग । हथवा में कुस लेले रहमइ हाथी रे कांपे ले बाबा कब दोनों उगरह होइ ।। ३ ।। रहँसइ घोड़ा रहँसइ सकल बराति । मॅड़वे मुदित मन समधी रे विहसइ भले घर भइल बिआह ।। ४ ।। गंगा में पइठि बाबा सुरुज गोड़े लागे मेरि बूते धिया जनि होय । धिअवा जनम जव दीह हो विधाता जब घरे सम्पत्ति होय ॥ ५ ॥

इस गोत के प्रायः सभी चरण कुछ उलट-फेर के साथ गोत नं० १ विवाह के गीत, में आ गये हैं। 'ग्राम गीत' में भी इसके सभी चरणों के सम्पन्न इतने हो चरण का एक गोत है। जिसका भाव इसो गोत के समान है। पर भाषा सुलतानपुर जिले की भाषा-सो ज्ञात होती है। पर गीत नं० १ में जो इससे बहुत बड़ा है, रस को पुष्टि अधिक हुई है।

'कन्या पूछती है- हे पिता, कीन ग्रहण रात में लगता है ओर कौन दिन में ? कोन ग्रहण असमय लगता है और उसका उग्रह कब होता है' ॥१॥

'पिता कहता है- हे बेटो, चन्द्रग्रहण रात में लता है। और सूर्य ग्रहण दिन में। कन्या ग्रहण का कोई ठिकाना नहीं है कि कब लगे ओर कब छटे ॥२॥

'हाथो कांप रहे हैं। घोड़े काँप रहे हैं। नगर के लोग सब काँप रहे हैं। और हाय में कुश लिए हुए पिता जी काँप रहे हैं। न मालूम कब उस कन्या विवाह से छुट्टी मिलेगी' ॥३॥

'हाथी प्रसन्न हो रहे हैं, घोड़े प्रसन्न हो रहे हैं, सारी बारात प्रसन्न है, । 

मण्डप के नीचे बैठा हुआ समधी भी प्रसन्न है कि अच्छे घर में मेरे पुत्र का विवाह हुआ' ।।४।।

'पर विवाह होने पर पिता गंगा में पंडकर सूर्य भगवान् को नमस्कार कर विनती कर रहे हैं कि हे विधाता, मेरे बल पर कन्या न देना। कन्या का जन्म तभी हो, जब घर में सम्पत्ति हो' ।॥५॥

कन्या-विवाह के कष्ट तथा इस गोत के अर्थ को वे हो पाठक भलो- भाँति हृदयंगम कर सकेंगे, जिन्हें अपनी कन्या का विवाह करना पड़ा हो।

( १६ )

पुरुत्र पछिम मोरे बावा क सगरवा पुरइनि हालर देई । तेहि घाटे दुलहा धोतिया पखारमु पूछेइँ दुलहिन देई बात ॥ १ ॥

केकर हव तूं नतिया से पूतवा कवने वहिनिया के भाय । कवना बनिजिया चलले बर सुन्नर केकरे सगरा नहाउ ।। २ ।।

अजवा कवन सिंह के नतिया रे पुतवा कवनी कुँअरि के भाय । सेनुरा बनिजिया चलीला हम सुन्नरि ससुरा के सगरे नहाऊँ ।। ३॥

एतना बचन सुनि दुलही कवन कुंवरि धाइ मइया लगे जाँय ।

जे वर रउरा मइया ! नगर कूड़ाई से वर सगरे नहाय ॥ ४॥ राम रसोइया भऊजी कवन कुंवरि धाइ भऊजी लगे जाइँ । जे वर भऊजी रउरे नगरा कूड़ाई से आवहु ननदोइया पलंग चड़ि बइठहु अपना कमिनिया के डडियाँ फनावहु ले बर सगरे नहायें ॥ ५॥ कूंचहु मगही पान । जाहु वएरनि हमार ।। ६॥ की भऊजी तोरा नूनवा चोरवली की तेल दीहों ढरकाइ । को भऊजी तोग भइया गरिअवलीं कवने गुना बएरनि तोहार ।। ७ ।। ना ननदी मोरा नूनवा चोरवलीं ना तेल देलू ढरकाय । ना ननदी मोरा भइया गरिअवलू बोली गुना बएनि हमार ॥ ८॥ 

'पूर्व पश्चिम तक लम्बा मेरे पिता का तालाब है। उसमें पुरइन (कमल के पत्ते) लहरा रहे हैं। उसी तालाब के घाट पर दुलहा धोतो पछार रहा है। उससे दुलहिन बात पूछती है' ।।१।।

'तुम किसके नाती हो और किसके हो पुत्र ? तुम किस बहह्न के भाई हो ? हे सुन्दर वर, तुम किस वस्तु का व्यापार करने घर से बाहर निकले हो ? और किसके तालाब में स्नान कर रहे हो' ? ॥२॥

'वर उत्तर देता है- अमुक सिंह मेरे पितामह हैं और अमुक देवी का मैं भाई हूँ। हे सुन्दरी, सिन्दूर का व्यापार करने के लिए हम निकले हैं और अपने स्वसुर के तालाब में स्नान कर रहे हैं' ।।३।।

'यह बात सुनते हो अमुक कन्या अपनी माँ के पास दौड़कर गई और कहने लगी-माँ, जिस वर को आप नगर भर में ढूंढ़ती रहीं, वह वर तो तालाब पर स्नान कर रहा है' ।।४।।

'कन्या को भावज अमुक कुँअरि रसोई घर में थो, कन्या वहाँ दौड़कर गई और कहने लगी- हे भावज ! जिस वर के लिए माँ ने सारा नगर ढूँढ़वा डाला, वह वर इसो तालाब पर स्नान कर रहा है' ।।५।।

'भावज ने कहा- हे ननदोई, आओ पलंग पर बैठो और महोबे का पान खाओ। अपनी स्त्री के लिए पालकी सजाओ और मेरी इस बैरिन को घर ले जाओ' ।।६।।

'इस पर ननद ने कहा- हे भौजी, तुम मुझे वैरिन क्यों कहतो हो ? क्या मैंने तुम्हारा नमक चुराया है या तेल गिरा दिया है? या हे भावज, क्या मैंने तुम्हारे भाई को गाली दी है कि तुम मुझे वैरिन कहती हो' ? ।।७।।

'भावज ने कहा-ननदजी, न तुमने मेरा नमक चुराया न तेल ही ढुलकाया और न मेरे भाई को गाली हो दी। केवल तुम्हारी बोली के कारण हो मैं तुम्हें बैरिन कह रही हूँ' ।॥८॥

इस गोत पर टिप्पणी लिखते समय श्री पं० रामनरेश त्रिपाठीजी ने ऐतिहासिक खोज की अनेक बातें कहीं हैं, जो इसके अर्थ को समझने में गड़बड़ी उत्पन्न कर देती है। कन्या की अवस्था के प्रौढ़ होने का जो कुछ प्रमाण वे देते हैं, वह भी ठीक नहीं जंचता। और वर कन्या को देखने के लिए आया है, यह भी उनको गलत हो धारणा है। इस अयं से गीत का रस हो फोका पड़ जाता है। गोत में जो कन्या की वर से अकस्मात् तालाब पर भेंट कराई गई है, उससे बातें कराकर उसके आने का कारण पुछवाया गया है, वह कन्या की अवस्था प्रौढ़ नहीं सिद्ध करता। फिर वर से जो परिचय दिलाकर स्वसुर के तालाब पर स्नान करने की बात और सिन्दूर का व्यापार करने निकलने का व्यंगोत्तर दिलाया गया है, यह वर के युवा होने का प्रमाण है। फिर कन्या का माँ और भावज के पास दौड़ी जाकर वर के आने को बात कहना, तो कन्या को मुग्धावस्याओं अज्ञात-ज्ञात-यौवना होने के निविवाद प्रमाण हैं। गरीब वर द्विरागमन कराने के लिए ससुराल अकेले आया है। स्वसुर के तालाब पर स्नान करने में उसे देर हो गयो। वाञ्छनीय समय पर उनके न पहुंचने से कन्या के घर में चिता हुई! उसकी मां ने वर को गाँव में खोजवाया कि कहीं वह आकर ठहरा तो नहीं है। पर कहीं पता नहीं चला। माँ दुखित थी। भावज भी सारी तैयारी करके दुखित हो यो। मुग्धा कन्या अकस्मात् तालाब पर खेलती हुई पहुंची, तो बर को देखकर उसे शंका हुई कि यही वर तों नहीं है। क्योंकि पूर्व परिचय तो था नहीं। और तब वार्ता हुई इस के साथ अयं समझने में गीत का पूरा रस और सच्चा चित्र सामने आ जाता है। बर का सिदूर का व्यापार करने के लिए निकलने का बहाना करना बिलकुल स्वाभाविक है। ससुराल में एक किशोरी कन्या उससे उसका पता पूछकर आने का हेतु पूछ रही है। उसके उत्तर में परिहास के साथ उसका वह उत्तर कितना सुन्दर उतरा है।

( १७ )

राजा जनक अइले नहाई के मनहीं उदासल हो । कवन चरितर आजु भइलें धनुष तर लीपल हो ।। १ ।। हम नाहीं जानी ला ए हरी पूछिल सीताजी से हो । सीता के सखिया बहुतहुतीं जनकजी के आँगन हो ॥ २॥ 

जनकजी सीता के बुलाईले जाँघ बड़ठाईलें हो ।

बेटी कवने हाथ धनुप उठवलू कवने हाये लीपलू हो ।॥ ३ ॥ बांये हाथे धनुहा उठाईला दहीने हाचे लीपोला हो । इहे चरितर आजु भइले धनुहातर लोपल हो ॥४॥

जनक मने पछितावेले मने में दुखित होयें हो। अब सीता रहली कुंवारी जनम कइसे बीतहि हो ॥ ५॥

काहे के बावा पछिताल त मन में दुखित होल हो । अब हम पूजवों भवानी तू राम बर पाइबि हो ॥ ६॥

कंचन थरिया गड़ावेली आरती चलू न सत्री फूलवरिया त पूजी सजावेली हो । भवानी हो ॥ ७॥

घुमरि घुमरि सीता पूजेली पूजेली परसन होई न भवानी त पूरई भवानी हो । मनोरथ हो ॥८॥

देवी जे हॅसेली ठठाइ के बड़ा रे परसन से हो । पुजिहें मन के राम बर पावेलू हो ॥९॥ मनोरथ

'राजा जनक स्नान करके उदास मन घर आये। पूछने लगे कि आज यह क्या अद्भुत काम हुआ कि धनुष के नीचे लोपा हुआ है ॥१॥ 'जनक को रानी ने कहा- हे नाय, मैं नहीं जानती। सोताजी से पूछिये आपके आँगन में सीता की बहुत-सी सखियाँ भी हैं ॥२॥ 'जनक ने सोता को बुलाकर प्यार से जांच पर बैठाया। और पूछने लगे-बेटो किस हाय तूने धनुष उठाया और किस हाय से लोपा ?' ॥३॥ 'सोता ने उत्तर दिया- मैंने बायें हाथ से धनुष उठाया और दाहिने हाय से धरती को लीपा । यही अद्भुत् बात आज हुई कि धनुष के नीचे

पृथ्वी लोपी गई है।' ॥४।।

'जनक मन-ही-मन पछताने लगे और इस बात से दुखित हुए कि अब सोता कुमारी रहेगी। उसका जीवन कैसे बोतेगा ।' ॥५॥ 

इस पर सीता ने कहा, 'हे पिता, पछताते क्यों हो और मन में दुखित भी क्यों होते हो ? अब मैं भवानी की पूजा करूँगी और राम को वर प्राप्त करूंगी।' ।।६।।

'सीता ने सोने को यालो बनवायो, उस पर आरती सजायो और अपनी सखियों से कहा- चलो फुलवारी में चलें और भवानी पूजा करें।' ।।७।।

'सोता घूम-घूम कर (परिक्रमा करके) भवानी की बार-बार पूजा करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि हे देवी, प्रसन्न होइये, मेरे मनोरथों को पूर्ण कोजिए ।' ॥८॥

'देवी बहुत प्रसन्न हो ठट्ठा मार कर हंस पड़ीं और बोलीं-बेटी तुम्हारे मन के मनोरथ पूर्ण होंगे। और तुमको राम वर मिलेंगे ।' ॥९॥

( १८ )

नीले नीले घोड़वा छयल असवरवा कुरखेते कुरखेते हनइ निसान । खिरिकी उघेरि के अम्मां जी निरखीं धिआ दस आउरि होइ ।। १ ।। भइल बिआह परल सिर सेनुर नव लख दायज योर । भितरों क भांड़ि बहर देइ मरली सतुरू के धिया जनि होय ॥ २ ॥

नीले घोड़ों पर जो छैल सवार है, वह ऐसा वीर है कि मानो कुरुक्षेत्र के रणस्वल में वह विजय पताका फहरा रहा हो या शत्रु का निसान (झंडा) विध्वंस्त कर रहा हो। उसको जब खिड़की खोलकर माँ देखती है, तब उसका जी हुलसता है और वह चाहती है कि मुझे दस कन्याएँ और होतीं कि ऐसे बोर जामाता मिलते' ।।१।।

'परन्तु जब कन्या का विवाह हो गया, उसके मांग में सिन्दूर पड़ गया और नौलक्ष का दहेज भी वर पक्ष से थोड़ा हो समझा गया; पर यहाँ घर खाली हो चुका था- माँ बेचारी ने भीतर का बरतन-भाण्ड सब बाहर लाकर पटक दिया और पछता कर कहा- - शत्रु को भी कन्या न हो ॥२॥ 

किस तरह दहेज को कुप्रया के कारण आज आये दिन कितने घर नष्ट हो रहे हैं ओर उनके माता-पिता कन्या को अभिशाप केवल इसलिए समझने पर बाध्य हो जाते है कि इनके जरिये उनके घर गिरस्ती का हो मटियामेट हो जाता है।

( १९ )

ऊँच ऊँच बखरी उठावे मोरे बाबा ऊँचे ऊँचे राख मोहार । चान सुरुज दूनो किरनी बसत हे निहुरे न कन्त हमार ।। १ ।। अम्मर सेनुरा मगाव मोरे बाब पिया से भराव मोरी माँग । सूघर बभना से गठिया जोरावहु जनम जनम अहिवात ॥ २ ॥ अम्मर डॅड़िया फनाव मोरे बावा विदवा कराव हमार । सात परगवे संगे चलि के हो बावा अब हम भइलीं पराइ ।। ३ ।।

'हे पिता, ऊंचे-ऊँचे मकान बनाओ और उनमें ऊँचे-ऊँवे दरवाजे रक्खो जिससे चन्द्रमा और सूर्य दोनों की किरणें अन्दर प्रवेश करके कुछ देर रह सके और मेरे स्वामी को प्रवेश करते समय झुकना न पड़े ॥१॥

'हे पिता, अमर करनेवाला सिंदूर मॅगाओ और पति से मेरी माँग भराओ । सुन्दर ब्राह्मण से मेरा गठबंधन कराओ, जिससे जन्म-जन्मांतर तक मेरा अहवात बना रहे' ।।२।।

'हे पिता, अमर करने वाली पालको सजाओ और मेरो विदाई करो । पर हे पिता, शोक है कि सात पग (पराये) साथ चलकर मैं अब दूसरे को हो गयी। तुम्हारी नहीं रही।' ।।३।।

कन्या को विवाह की महत्वाकांक्षा तभी तक रही, जब तक उसने पिता-विछोह को बात नहीं सोबी थी; पर बिदा को बात सोचते ही उसका हृदय फटने लगा और उसे आश्चर्य हुआ कि सप्तपद चलकर ही मैं पराये को हो गई और पिता माता से मेरा संबंध छूट गया। कितना संक्षेप में कितना मर्मान्तक वाक्य कहा गया है। कन्या की मनोकामना भी कितनी स्वाभाविक है। 


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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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भोजपुरी भाषा का विस्तार

15 December 2023
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भोजपुरी भाषा के विस्तार और सीमा के सम्बन्ध में सर जी० ए० ग्रिअरसन ने बहुत वैज्ञानिक और सप्रमाण अन्वेषण किया है। अपनी 'लिगुइस्टिक सर्वे आफ इण्डिया' जिल्द ५, भाग २, पृष्ठ ४४, संस्करण १९०३ कले० में उन्हो

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भोजपुरी काव्य में वीर रस

16 December 2023
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भोजपुरी में वीर रस की कविता की बहुलता है। पहले के विख्यात काव्य आल्हा, लोरिक, कुंअरसिह और अन्य राज-घरानों के पँवारा आदि तो हैं ही; पर इनके साथ बाथ हर समय सदा नये-नये गीतों, काव्यों की रचना भी होती रही

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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड

18 December 2023
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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड में गाया जाता है, जिसका संकेत भूमिका के पृष्ठों में हो चुका है- कसामीर काह छोड़े भुमानी नगर कोट काह आई हो, माँ। कसामीर को पापी राजा सेवा हमारी न जानी हो, माँ। नगर कोट

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भोजपुरी लोक गीत

18 December 2023
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३०० वर्ष पहले के भोजपुरी गीत छपरा जिले में छपरा से तोसरा स्टेशन बनारस आने वाली लाइन पर माँझी है। यह माँझी गाँव बहुत प्राचीन स्थान है। यहाँ कभी माँझी (मल्लाह) फिर क्षत्रियों का बड़ा राज्य था। जिनके को

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राग सोहर

19 December 2023
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एक त मैं पान अइसन पातरि, फूल जइसन सूनरि रे, ए ललना, भुइयाँ लोटे ले लामी केसिया, त नइयाँ वझनियाँ के हो ॥ १॥ आँगन बहइत चेरिया, त अवरू लउड़िया नु रे, ए चेरिया ! आपन वलक मों के देतू, त जिअरा जुड़इती नु हो

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राग सोहर

20 December 2023
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ललिता चन्द्रावलि अइली, यमुमती राधे अइली हो। ललना, मिलि चली ओहि पार यमुन जल भरिलाई हो ।।१।। डॅड़वा में वांधेली कछोटवा हिआ चनन हारवा हो। ललना, पंवरि के पार उतरली तिवइया एक रोवइ हो ॥२॥ किआ तोके मारेली सस

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करुण रस जतसार

22 December 2023
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जतसार गीत जाँत पीसते समय गाया जाता है। दिन रात की गृहचर्य्या से फुरसत पाकर जब वोती रात या देव वेला (ब्राह्म मुहूर्त ) में स्त्रियाँ जाँत पर आटा पीसने बैठती हैं, तव वे अपनी मनोव्यथा मानो गाकर ही भुलाना

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राग जंतसार

23 December 2023
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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भूमर

24 December 2023
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झूमर शब्व भूमना से बना। जिस गीत के गाने से मस्ती सहज हो इतने आधिक्य में गायक के मन में आ जाय कि वह झूमने लगे तो उसो लय को झूमर कहते हैं। इसी से भूमरी नाम भी निकला। समूह में जब नर-नारी ऐसे हो झूमर लय क

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26 December 2023
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खाइ गइलें हों राति मोहन दहिया ।। खाइ गइलें ० ।। छोटे छोटे गोड़वा के छोटे खरउओं, कड़से के सिकहर पा गइले हो ।। राति मोहन दहिया खाई गइले हों ।।१।। कुछु खइलें कुछु भूइआ गिरवले, कुछु मुँहवा में लपेट लिहल

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राग कहँरुआ

27 December 2023
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जब हम रहली रे लरिका गदेलवा हाय रे सजनी, पिया मागे गवनवा कि रे सजनी ॥१॥  जब हम भइलीं रे अलप वएसवा, कि हाय रे सजनी पिया गइले परदेसवा कि रे सजनी 11२॥ बरह बरसि पर ट्राजा मोर अइले, कि हाय रे सजनी, बइठे द

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भजन

27 December 2023
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ऊधव प्रसंग ( १ ) धरनी जेहो धनि विरिहिनि हो, घरइ ना धीर । बिहवल विकल बिलखि चित हो, जे दुवर सरीर ॥१॥ धरनी धीरज ना रहिहें हो, विनु बनवारि । रोअत रकत के अँसुअन हो, पंथ निहारि ॥२॥ धरनी पिया परवत पर हो,

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भजन - २५

28 December 2023
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(परम पूज्या पितामही श्रीधर्म्मराज कुंअरिजी से प्राप्त) सिवजी जे चलीं लें उतरी वनिजिया गउरा मंदिरवा बइठाइ ।। बरहों बरसि पर अइलीं महादेव गउरा से माँगी ले बिचार ॥१॥ एही करिअवा गउरा हम नाहीं मानबि सूरुज व

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बारहमासा

29 December 2023
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बारहो मास में ऋतु-प्रभाव से जैसा-जैसा मनोभाव अनुभूत होता है, उसी को जब विरहिणी ने अपने प्रियतम के प्रेम में व्याकुल होकर जिस गीत में गाया है, उसी का नाम 'बारहमासा' है। इसमें एक समान ही मात्रा होती हों

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अलचारी

30 December 2023
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'अलचारी' शब्द लाचारी का अपभ्रंश है। लाचारी का अर्थ विवशता, आजिजी है। उर्दू शायरी में आजिजो पर खूब गजलें कही गयी हैं और आज भी कही जाती हैं। वास्तव में पहले पहल भोजपुरी में अलचारी गीत का प्रयोग केवल आजि

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खेलवना

30 December 2023
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इस गीत में अधिकांश वात्सल्य प्रेम हो गाया जाता है। करुण रस के जो गोत मिले, वे उद्धत हैं। खेलवना से वास्तविक अर्थ है बच्चों के खेलते बाले गीत, पर अब इसका प्रयोग भी अलचारी को तरह अन्य भावों में भी होने

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देवी के गीत

30 December 2023
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नित्रिया के डाड़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूलो झूली ना, मैया ! गावेली गितिया की झुली झूली ना ।। सानो बहिनी गावेली गितिया कि झूली० ॥१॥ झुलत-झुलत मइया के लगलो पिसिया कि चलि भइली ना मळहोरिया अवसवा कि चलि

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

3 January 2024
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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

3 January 2024
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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

4 January 2024
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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

4 January 2024
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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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