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विविध गीत

4 January 2024

1 देखल गइल 1

(१)

अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥

मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥

केथिये में करवों कोरा रे कगजवा, केथिये में करवों मसीनिया ।। रे निरमोहिया ० ॥ ३ ॥

अँचरा त फारि फारि कोरा रे कगजवा, नैन कजरवा मसीनिया ।। रे निरमोहिया० ।। ४ ।। आरे पासे लिखिहो सर रे सनेसवा,

• बीचे कैयाँ बरहो बियोग ।। रे निरमोहिया •

बाढ़ ऐ बटोहिया तुहँ मोरा भइया, हमरो सनेसवा लेले जइह ॥ रे निरमोहिया ० ।। ६ ।। 

हमरो सनेसवा बलमुआ से कहिह, तोर धनी बिरहे बेआकुल ।। रे निरमोहिया ० ॥ ७ ॥ 

तोहरा बलमुआ के चिन्हलों ना जनलों, केकरा से कहवों सनेस ॥ रे निरमोहिया ० ॥ ८ ॥

ठीक दुपहरिया नवाव कचहरिया, ताहि वीचे बइठे सामी मोर ॥ रे निरमोहिया ॥ ९ ॥ 

हथवा बढ़ाई सामी चिठिया लिहलनि, बचलनि पाती धनी लिखेले वियोग ।। रे निरमोहिया० ।। १० ।।

'आम में बौर आ गये। महुआ टपक गये। हा! में प्रियतम के पास किसके हाथ सन्देश भेजूं ? प्रोषित पतिका वसन्त ऋतु में कह रही है- है! निर्मोही ! तू नौकरी छोड़ दे' ॥१॥

'मेरे पिछवारे भीखम नाम का कायस्थ रहता है। ऐ भोखम ! एक चिट्ठी मेरे लिए लिख दो- हे निर्मोही नौकरी छोड़ दो' ॥२॥

'कायस्थ ने पूछा-अरी स्त्री ! मैं किस चीज का कागज बनाऊँ। किस चीज को स्याही बनाऊँ ? (मेरे पास तो कुछ नहीं।)' ।।३।।

'स्त्री ने तुरन्त अपना अंचल फाड़कर और भीगी आँखों से काजल ले कर कायस्थ को देते हुए कहा- अञ्चल फाड़कर के तो तुम कोरा कागज बनाओ। और मेरो इन आँखों के इस अंजन को स्याही तैयार करो और लिखो-रे निर्मोही नौकरी छोड़ दे' ।।४।।

'ऊपर नीचे तो तुम यहाँ का समाचार और मेरा सन्देशा लिखना; पर बीच स्थान में मेरे बारहों वियोग की (वर्ष के बारह मासों के वियोग की अनुभूति) लिखना। रे निर्मोही तू नौकरी छोड़ दे' ॥५॥

'हे बाट से जानेवाले बटोही तुम मेरे भाई हो। तुम मेरा सन्देश मेरे प्रियतम के पास लेते जाना। उससे कहना कि रे निर्मोही नौकरी छोड़ दे और मेरा यह भी सन्देश बालम से सुनाना कि तुम्हारी स्त्री विरह से व्याकुल हो रही है। तुम निर्मोही नौकरी छोड़ दो' ।।६, ७।।

'पयिक ने कहा- मैंने तुम्हारे पति को न कभी देखा न उसके सम्बन्ध में कुछ सुना ही किससे मैं तुम्हारा सन्देश कहूंगा कि मेरे निर्मोही नौकरी छोड़

विरहिणी ने तुरन्त उत्तर दिया। पता तो उसे कुछ ज्ञात नहीं था। नाम भी अपने मुख से ले नहीं सकती यों (हिन्दू प्रयानुसार स्त्री पति का नाम शिष्य गुरु का नाम नहीं लेता) उसने संकेत बता दिया-ठोक दोपहर को वहां के नबाब के कचहरी के बीच में मेरे स्वामी बैठते हैं। वहीं उनको पत्र दे देना। और कहना कि रे निर्मोही नौकरी छोड़ दे ॥९॥

'पति ने हाय बढ़ाकर पत्र लिया। उसे पढ़ा। और कहा पत्र में स्त्री ने अपना वियोग लिखा है ॥१०॥

इस गीत को ह्रफ फ्रेजर ने 'फाकलोर फ्राम ईस्टर्न गोरखपूर' शीर्षक से जी० ए० प्रियर्सन साहब के सम्पादकत्त्व में इन्डियन एन्टीक्वीटी में प्रकाशित किया था।

( २ )

चैतार ( विहागड़ा )

मानल सैयाँ रुसि गइलनि बौरी कोइलि हो तोरी बोलियन ।। (ए, री) आधी रात अगली पहर राति पिछली कोइल हो तोरी बोलियन मानल सैया० ॥

'रो पगली कोयल ! मेरा प्रसन्न हुआ पति भी तुम्हारी बोली सुनकर रूठ गया। अर्थात् अभी जो उसको मैंने किसी तरह सन्तुष्ट कर संयोग के लिए आषित किया था, सो वह फिर तेरी बोली सुनकर रूठ गया।'

( ३ )

ननदी सैयाँ नाहीं अइलें ।।

अमवा मोजरि गइले लगले टिकोरवा डाल पात झुकि मतवरवा ॥ ननदी सैंया० ॥ १ ॥

चोलिया से जोबना बहरभइलन ननदी कइसे करि के छिपावों ।॥ ननदी संया० ॥ २ ॥ 

'हे नलद, मेरे स्वामी नहीं आये। वसन्त ऋतु आई भी और बीत भी चली। देखो नवौर आ गये। टिकोरे (छोटे फल) भी निकल आये। उसकी डालों के झरे हुए पत्ते भी निकल आये। अब आम वृक्ष डाल पात से लहलहा कर मारे आनन्द के मतवाला हो रहा है। हे ननद संाँ आज तक नहीं आये ॥१॥

'कंचुको से मेरे कुच बाहर हो रहे हैं। मैं इन्हें कैसे छिपा कर रखूँ। है ननद ! स्वामी नहीं आये' ॥२॥

कितना सुन्दर मादक और करुण यह चैतार है। इसी भाव को लेकर 'विदेशिया गाना' में एक सुन्दर पंक्ति मुझको सुनने को मिली। इसके बाद के चरण नहीं मिल सके। वह पंक्ति यों है-

अमवा मोजरि गइले लगले टिकोरवा । से दिन पर दिन पियराय रे विदेसिया ।।

'विरहिणी कह रही है- अरे विदेशी, तुम नहीं आये। यहाँ आम में मंजरी लग गयी! फिर उसमें टिकोरे भी लग गये। हा अब वे टिकोरे (छोटे फल) धूप और जलाभाव से सूखकर पीले पड़ रहे हैं। (हा वैसे ही में भी विरह-ताप से तुम्हारे प्रेम-जल के अभाव में सूख-सुखकर पीली पड़ रही हूँ।) इसी छन्द में बाबू रघुबीरशरणजी ने कई पुस्तिकाएँ राष्ट्र भाव को लेकर 'बटोहिया', 'परदेसिया' इत्यादि लिखी हैं। बटोहिया की पंक्ति है-

भारत सुभूमि भैया भरत के देसवा से मेरो प्रान बसे हिम खोह रे बिदेसिया ।

एक ओर घेरे रामा हिम कोतवलवा से तीनि ओर सिन्धु घहाय रे बटोहिया ।।

पाठक इस गीत में देखेंगे कि मोजरि (मंजरी) संज्ञा को यहाँ क्रिया बनाया गया है-मंजरी आने के अर्थ में। 

भिखारी ठाकुर को रचना

भिखारी ठाकुर जाति के नाई, शाहाबाद जिले में कुतुबपुर धुसरिया गाँव के रहनेवाले हैं। अब इस गाँव के गंगा की बाढ़ से कट जाने से कुछ जमीन तो शाहाबाद में रह गयी है और कुछ सारन में पड़ी है। ये अपढ़ हैं; पर बड़े प्रतिभा के कवि हैं। इनका 'भिखारिया' नाम सारे भोजपुरी प्रान्त में प्रसिद्ध है। इनको बीसों रचनाएँ हैं, जो प्रकाशित भी हो चुकी हैं। वे खुद प्रकाशित कर बेच लेते हैं। १० वर्ष पूर्व एक बार मुझे वे करीब आधी दर्जन पुस्तकें 'बेटो वियोग' 'भिखारी बहार' आदि दे गये थे, जो सब मेरे स्कूल में विगत अगस्त के आन्दोलन में अंग्रेजी सिपाहियों द्वारा आग लगा दिये जाने के कारण जल गयीं। 'कुछ गोत मेरे 'भोजपुरी भाषा और उसका साहित्य सौन्दर्य' नाम लेख में उद्धृत थे, वे ही मुझे इस समय मिल सके, जो यहाँ उद्धृत हैं। भिखा- रो ठाकुर ने अपने परिचय में भी अनेक छन्द कहे हैं, उनमें से चन्द यहाँ उद्धृत हैं-केवल कवि की जानकारी के हेतु गीत तो बाद में दिये ही जायेंगे।

'भिखारी-बहार' में वे लिखते हैं-

नाम भिखारी, काम भिखारी, रूप भिखारी मोर । ठाट पलान मकान भिखारी, भइल चहुँ दिस सोर ।। ना पाटी पर पढ़ली भाई, नाम बहुत दुरि पहुँचल जाई । कहे भिखारी लिखलीं थोर, विद्या से बानी कमजोर ।। हित अनहित से हाथ जोरि के, मागत भिखारी भीख । राम नाम सुमिरन कर, तुही गुरू हम सीख ।।

( भिखारी ठाकुर की 'बेटी-वियोग' नामक पुस्तिका से)

(

)

छछनवल जिअरा बावु मोर ।। रस से बस मतवाल भइल मन, चढ़ल जवानी मोर ।।

दिन राति कवों कल ना परत का, गनत गुनत होता भोर ॥ १ ॥ छछनवल जिअरा० ।।

बाल वृद्ध एक संग कइ दोहल, पयल के छाती वा तोर ।। कइत भिखारी जवानी काल बा, मदन देला झकझोर ॥ २ ॥ छछनवल जिअरा० ।।

'वृद्ध से विवाहिता जवान कन्या बिलख बिलख कर कह रही है- है बाबू ! (पिताजी) तुमने मेरे मन को छछना कर रख दिया (रुला कर छोड़ दिया) अर्थात् मुझे (अपनी सारी कामनाओं को सदा असन्तुष्ट रखने और स्वयं शंखते रहने के लिए विवश कर दिया) ।'

'रस के वशीभूत होकर मेरा मन मतवाला सा हो रहा है। मेरी जवानी चढ़ी हुई है। दिन रात कभी भी मुझे चैन नहीं पड़ती। सोचते सोचते सवेरा हो जाता है ॥१॥

'तुमने बाल और वृद्ध को एक साय कर दिया। तुम्हारी छातो पत्यर की थी। भिखारी दास कहते हैं कि कन्या रो-रोकर कह रही है कि हे पिता ! मेरी चढ़ी हुई जवानो का यह समय है। मदन मुझ अबला को झकझोर झकझोर कर रख देता है ॥२॥

'हे पिता तुम्हारे कारण मुझे बहुत रोना पड़ा। कितनी मर्मभेदी अभिव्यक्ति है।'

( ५ )

(विवाह में जो परिछन का रस्म होता है उसका गीत।) चलनी के चालल दुलहा सूप के झटकारल है । दिअका के लागल पर दुआरे बाजा बाजल है ।। आँवाँ के पाकल दुलहा झाँवाँ के झारल हे । कलछुल के दागल बकलोल पुर से भागल हे ।। 

सासु के अंखिया में अनपटवा छावल है। आइ कर देख वर के पान चवुलावल हे ।। आम लेखा पाकल दुलहा गाँव के निकालल है । अइसन बकलोल बर चटक देइ का भावल है ।। मउरी लगावल दुलहा जामा पहिरावल है । कहत भिखारी हवन राम के बनावल है ।।

'वृद्ध दुल्हे को व्यंग्य करके गाया हुआ यह गोत, मंगल गाली है। अरे यह चलनी का चाला हुआ (बहुत महीन) ओर सूप का फटका हुआ (बहुत हलका) दुलहा है। यह दोमक का खाया हुआ है, अर्थात् इसका मुख तमाम चेचक के दाग से गढ़ेदार हो रहा है। फिर यह बाजा बजाकर विवाह करने आया है।'

'वृद्धावस्था के कारण इसका रंग के आवाँ में यह पका दिया गया हो कर धो डाला गया हो।' ऐसा हो गया है। जैसे कुम्हार ओर झाँवा से खूब रगड़-रगड़

'अरे इसके शरीर में जगह-जगह काले निशान पड़ गये हैं, मानो कलछुली तप्त करके उससे यह दाग दिया गया हो। यह दुलहा ऐसा मूर्ख ज्ञात होता है, मानो बकलोलपुर (बेवकूफों के नगर) से भाग कर यहाँ आ रहा है।'

'अरे कन्या को माँ क्या अन्धी यो कि उसने ऐसा वर पसन्व किया? वह कहाँ हैं? आकर इस दूल्हे का बेदांत के मुंह से पान चबाना तो देखें।'

'अरे यह आम के ऐसा पका हुआ और अपने गाँव से निकाला हुआ बेवकूफ दुलहा, किस तरह से चटक मन वाली कन्या की माँ

को भाया है।'

'इसके माथे पर मौर है। शरीर पर जामा है। भिखारी ठाकुर कहते हैं कि यह दुलहा साक्षात् भगवान् द्वारा हो बनाया गया है।' 

( ६ )

भइ गइली काल हम, पुरुव में कवन कसूर कइली बावूजी ।। जेहि लागि आजु हम दुनियाँ से भइलीं कम, वर देखि घर ना सोहात बाटे बाबूजी ॥

सिकुरल चाम जइसे सुखल चुचेला आममुहवा,

हटे बाबूजी ।।

फटलका लेदरवा

आँखि से सूझत कम हर दम घींचत दम, मथवा के बारवा चॅवरवा हटे बाबूजी ।।

मुँहवा में दाँत नाही गाले मुँहे लार चूए बोलली, पर भीतर सड़ल बदबू बाबूजी ।।

पति कर देखि गति पागल भइल मति रोइ रोइ, करीला बिहान मोर बाबूजी ।।

पयदा भइली जग फयदा मिलल इहे छतिया, में जरत बा मसाल मोर बाबूजी ।।

हुकुर हुकुर छाती करत वाटे दिनराती अधजीव, दुलहा पसन कइल बाबूजी ॥

घड़ी घड़ी होत झड़ी सीक से भरल बा नरी, नरक विगत दिन बीती मोर बाबूजी ।।

पति के बुढ़ाई देखि मन के गइल सोखी धनवा, भइल कलपनवा हो बाबूजी IF

रोअत बानी सिर धुनि इहे छछनल सुनि बेटी, मति बेचे दीह केहू के हो बाबूजी ।।

कहत भिखारी त खरारी के इआदि करके फेनि, मति करीह अइसन काम मोर बाबूजी ॥

रतिया के छतिया में बतिया जरेला मोरा, अगुआ अलम तुरि दिहलसि ए बाबूजी ॥ 

अइसन दुखवा जे मुख से कहात नाहीं जानत वाटे, हिरदय हमार मोरे बाबूजी ।।

विपति सेवत बानी हमरा का परेसानी बेटी नाहीं, जमली सतुरवा हो बाबूजी ।।

हरिहरनाथजी का चरन में नाके माथ करत, भिखारी परचार मोर बाबूजी ।।

जाति के हजाम मोर कुतुबपुर ह मोकाम छपरा, से तीन मील दिभरा में बाबूजी ।। पुरुव का कोना घर गंगा के किनारे पर, जाति पेसा बाटे विद्या नाही बानी बाबू जी ॥ १ ॥

'हे पिताजी, मैंने आपका पूर्वजन्म में कौन-सा ऐसा अपराध किया कि इस जन्म में मैं आपको काल के समान हो गयो।'

धुन पूर्वी

(श्री भिखारी ठाकुर कृत 'बड़ा बिदेसिया नाटक' से 'प्यारी विलाप' बटोही से)

( १ )

पिया मोर गइले परदेस ए बटोही भइया । राति नाहीं नींद दिन तनीं ना चयनवाँ ए बटोही भइया ।। सहतानी बहुत कलेस ए बटोही भइया । रोअत रोअत हम भइली पगलीनियाँ ए बटोही भइया ।। एको नाहीं भेजले सनेस ए बटोही भइया । नाहक जवानी हमें दिहले विधाता ए बटोही भइया ।। कुछ दिन में पाके लागी केस ए वटोही भइया । कहत भिखारी तोहरा गोड़वा क लउड़िया ए बटोही भइया ।। करीह तू पिया के उपदेश ए बटोही भइया । 

(२)

• (प्यारी वचन बटोही से)

X

हमरा बलमुजी के बड़ी बड़ी अँखिया से, चोखे चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया ।।

X

ओठवा त बाड़ें जइसे कतरल पनवा से, नक्रिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया ।। दंतवा ऊ सोभे जइसे चमके विजुलिया से, मोछियन भँवरा गुंजारे रे बटोहिया ।।

मथवा में सोभे रामा टेड़ी कारी टोपिया से, रोरी बुना सोभे ला लिलार रे बटोहिया ।।

( ३ )

(बटोही वार्ता विदेशी से)

X

पछिम के हई हम बारे रे बटोहिया, पुरुब करीले रोजगार रे विदेसिया ॥

तोरी घनी बाड़ी रामा, अॅगवा के पातर से, लचकेली छतिया के भार रे विदेसिया ।। केसिया त वाड़े जइसे लोटे रे नगिनियाँ से, सेनुरा से भरल लिलार रे विदेसिया ॥ अँखिया त हउवे जइसे अमवा के फॅकिया से, गलवा सोहेला गुलेनार रे विदेसिया ।। बोलिया त बाड़ी जइसे कुहुँके कोइलिया से, सुनि हिया फाटेला हमार रे विदेसिया ।। 

मुँहवा त हउवे जइसे कमल के फुलवा से, तोहि बिनु गइले कुम्भिलाई रे बिदेसिया ।। अइसन तिरिअवा के सुधि विसरवले से, तोहरा के हवे धिरीकार रे बिदेसिया ।।

यह गोत और इसके पूर्व वाले गीत में नायक-नायिका का कितना सुन्दर ओर जोवित वर्णन हुआ है। भिखारी ठाकुर अपढ़ प्रामीण कवि हैं। फिर भी उनको शब्द-योजना और वर्णन की प्रौढ़ता तथा उपमा और प्रसाद गुण को सुन्दरता किसी भी शिक्षित कवि से कम नहीं कही जायगी। रस परिपाक में तो वे इतने सफल हैं कि कुछ दिनों तक इस नाटक के ड्रामे में भी खेले जाने की पुलिस द्वारा मनाही थो। कितनी नवयुवतियाँ इस नाटक से प्रभावित होकर लोकलाज तक त्याग देने पर उद्यत हो जातो थीं।

( ४ )

X

प्यारी विलाप

X

X

पिया पिया कहिले सखिया पिया नाही रे हितवा, गइले बिदेसवा । हो गइले बिदेसिया सइयाँ भेजे ना रे सनेसर्वा । सँगही के सखिया सब भइलीं लरकोरिया, बिहरे ला छतिया । हो बिहरेला छतिया मोरा तलफे जोबनवाँ । पिया पिया कहत रामा पीअर भइली बिदेसिया । पिया नाहीं अइले कासे कहवि दिल के बतियाँ । मोरा लेखे नइहर सखिया बसे जमुरजवा । लहरे करेजवा हो लहरे करेजवा देखि सइयाँ के रे भवनवाँ । सवके बलमुआ सजनी अइलें रे भवनाँ । छवले बिदेसवा हो छवले बिदेसवा रामा पापी मोर बलमुआ । एक मन करे रामा होइतीं रे जोगिनियाँ । 

घुइयाँ रमइतों र छाड़ि सइयाँ के भवनवाँ । कहे नाव सरन मोरा हियरा धरे ना धिरिजवा मिलिते । बलमुआ हो मिलिते बलमुआ बाड़े राजा के नोकरिया ।

यह नाथ सरन कवि भी भिखारी नाटक मण्डली के शायद कवि हैं, तभी यह गीत 'बड़ा विदेशिया' नाटक में सम्मिलित है।

( ५ )

प्यारी विलाप

X

सइयाँ मोरे रहिते त धइ बान्हि मरिते से ।

केकरा से कही कर जोरि रे बिदेसिया ।।

सावन भदउआ के निसि अॅधिरिया से ।

सोइ गइले टोलवा परोस रे बिदेसिया ।।

हमरो अभागिन के फुटलो करमवा से ।

सहि नाहीं जाला ई कलेस रे विदेसिया ।।

पइती कटरिया आपन जिया हतितीं से ।

मिटि जइतें बरहो विरोग रे बिदेसिया ।।

नायिका का यह विलाप उस समय का है, जब रात्रि में उसका पति विदेश से आकर घर का द्वार खोलना चाहता है और नायिका उसे चोर डाकू समझकर मारे भय के अपने प्रियतम को स्मरण करके रोती है और आत्म- हत्या करना चाहती है।

( ६ )

श्री भिखारी ठाकुर कृत 'बड़ी प्यारी सुन्दरी वियोग' यानी 'परदेसिया' नामक पुस्तिका से, जिसकी सन् १९३२ ई० में ८००० प्रतियाँ चीया संस्करण गोरखपुर प्रिंटिंग प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित हो चुकी थीं। इधर कितने संस्करण छपे, लेखक को ज्ञात नहीं। आज भी इस पुस्तिका को लोकप्रियता वैसी ही बनी है।

रंग महल बइठल सोचे प्यारी धनिया से,

विरह सतावे जिया बीच परदेसिया ।। गवना कराइ छयला हमें छाड़ि दोहले से, अपने गइले परदेस परदेसिया ।।

चढ़लों जवनियाँ बएरन भइली हमरी से, मदन सतावे जिय माहि परदेसिया ।।

मदन बिरह जिया भइले मतवलवा से, के हो मोरा हरिहें दरद परदेसिया ।।

घेरी त आवे रामा, कारि हो बदरिया से, विजुली चमके धन बीच परदेसिया ।।

बिजुली चमक जिया सनक समइले से, केहू ना हमरो संग साय परदेसिया ।।

मोरवा के बोलिया सुनत छतिया घड़के से, पपिहा त करेला पुकार परदेसिया ।।

केकरा से भेजों रामा प्रेम के पतिया से, केकरा से सर ई सनेस परदेसिया ।।

जब सुधि आवे सइयाँ तोही सुरतिया से, लहरे स्रवन त चाहे राजा तोरी नयनर्वा करेजवा हमार परदेसिया ।। कुसलतिया से, दरसवा तोहार परदेसिया ।।

तोहरा कारन राजा खकिया रमइहों से, धरिहों जोगिनिया के भेस परदेसिया ।।

कवले लवटिहईं पापी मोरे बलमुआ से, मोरे बिरहनियाँ के भाग परदेसिया ।। 

हमरी त सुधि राजा तुहउ विसरउले से,

सवति भईली तोहे पिआरी परदेसिया ।।

हाय रे वेदरदी ! दरदिया नाहीं आवे तोही,

पत्थर की छतिया तोहार परदेसिया ।।

दिनवां त बीते तोरी इन्तजरिया से,

रतियाँ नयनवां न नींद परदेसिया ।।

घरी राति गइली राम पिछली पहरवा से,

लहरे करेजवा हमार परदेसिया ॥

अमवा वउरि गइले लागल सरिसइया से,

दिन दिन होला तयार परदेसिया ।।

एक दिन अइहें राजा जुलुमी वयरिया से,

डार पात जइहें रे नसाई परदेसिया ।।

बगिया भइलि तइयार निरमोहिया से,

प्रेम जल बिनु कुम्भिलाय परदेसिया ।।

सुखतीं चहत इहे प्रेम के जे बिरवा से,

रहि जाई फुलवा त खिलले गुलबवा कि मन पछताइ परदेसिया ।। कलिया से,

जात रहल अजव बहार परदेसिया ।।

अइली सुरति पिया चढ़लीं अटरिया से,

चितईला नयना उठाइ परदेसिया ।।

कतहूं ना देखीला पिआरे के सुरतिया से,

गिरिला पछरवा मैं खाय परदेसिया ॥

कछु देर माहि मोर जियरा सचेत भइले,

भइलीं खिरिकिया पर ठाढ़ परदेसिया ।।

प्रस्तुत गीत भी भिखारी ठाकुर को हो रचना है। इसमें विर- हिणी का कितना करुण और सजीव चित्रण किया गया है! यह गीत

भी गाये जाते समय श्रोता को मोह लेता है। प्रकृति-वर्णन भी कम सुन्दर नहीं है। इस गोत की लोकप्रियता भोजपुरी भाषियों में कितनी है, यह इस पुस्तक की उपर्युक्त कथित संस्करण-संख्या से पता चलता है।

(७)

(बटोही वचन परदेशी से)

जात तो रहली में पतरी डगरिया से,

कलपे खिरिकिया पठाढ़ विरहिनियां ।।

नयन टपकि परले हमरी चदरिया से,

चितई ला नयना उठाय परदेसिया ।।

अँगवा के पतरी त हई प्यारी धनिया,

कि देखते बटोहिया जिया जात परदेसिया ।।

गलवा त हउए जइसे खिलेला गुलववा से,

अँखिया मिरिगवा के नाई परदेसिया ।।

बोलिया त बोले जइसे सबद कोइलिया से,

लेली ऊत करेजवा निकासि परदेसिया ।।

टिकुली त साटे उहे रस ही बेंदुलिया से, इंगुरा त देले ऊ लिलार परदेसिया ।।

मथवा पर देले ऊ त माथ के बेंदुलिया से,

नकिया झुलनिया झोंकेदार परदेसिया ।।

अइसन तिरअवा के तूहो तजि दीहला से, तेकर गजववा के घार परदेसिया ।।

मुँहवा त हवे प्यारी कॅवल के फूलवा से,

तोहरे बिना गइले कुम्हलाइ परदेसिया ।।

हाय, निरमोहिया फटे ना छतिया से,

सुनत वियोगवा के बात परदेसिया ।।

एतना वचन राजा सुनही ना पवले से,

गिरले मुरुछवा उ खाई परदेसिया ।। 

ब्रजभाषा के शिक्षित कवियों के दूतो और दूतों के अनेक संवादों को पाठक सुन चुके हैं। इस अपढ़ प्रामोण कवि दूत का संवाद भी आज पढ़ हो लिया। क्या आप कह सकते हैं कि इस दूत ने विरहिणी का संवाद सुनाने में अपेक्षाकृत कोई भूल को ? विरहिणोका रूप कितनी सुन्दर सूक्तियों में उसने परदेशो नायक के सामने चित्रित किया कि वह सुनते ही मारे शोक के मूछित हो गया। तभी तो भोजपुरी में विरहिणी का यह विरह-विलाप इतना लोकप्रिय बना।

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लेख
भोजपुरी लोक गीत में करुण रस
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"भोजपुरी लोक गीत में करुण रस" (The Sentiment of Compassion in Bhojpuri Folk Songs) एक रोचक और साहित्यपूर्ण विषय है जिसमें भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोक साहित्य का अध्ययन किया जाता है। यह विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र की जनता के बीच प्रिय लोक संगीत के माध्यम से भोजपुरी भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। भोजपुरी लोक गीत विशेषकर उत्तर भारतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समृद्ध हैं। इन गीतों में अनेक भावनाएं और रस होते हैं, जिनमें से एक है "करुण रस" या दया भावना। करुण रस का अर्थ होता है करुणा या दया की भावना, जिसे गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। भोजपुरी लोक गीतों में करुण रस का अभ्यास बड़े संख्या में किया जाता है, जिससे गायक और सुनने वाले व्यक्ति में गहरा भावनात्मक अनुभव होता है। इन गीतों में करुण रस का प्रमुख उदाहरण विभिन्न जीवन की कठिनाईयों, दुखों, और विषम परिस्थितियों के साथ जुड़े होते हैं। ये गीत अक्सर गाँव के जीवन, किसानों की कड़ी मेहनत, और ग्रामीण समाज की समस्याओं को छूने का प्रयास करते हैं। गीतकार और गायक इन गानों के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुनने वालों के साथ साझा करते हैं और समृद्धि, सहानुभूति और मानवता की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। इस प्रकार, भोजपुरी लोक गीत में करुण रस का अध्ययन न केवल एक साहित्यिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी भोजपुरी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की अद्भुत अभिवृद्धि को संवेदनशीलता से समृद्ध करता है।
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18 December 2023
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जगदेव का पवाँरा जो बुन्देलखण्ड में गाया जाता है, जिसका संकेत भूमिका के पृष्ठों में हो चुका है- कसामीर काह छोड़े भुमानी नगर कोट काह आई हो, माँ। कसामीर को पापी राजा सेवा हमारी न जानी हो, माँ। नगर कोट

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भोजपुरी लोक गीत

18 December 2023
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३०० वर्ष पहले के भोजपुरी गीत छपरा जिले में छपरा से तोसरा स्टेशन बनारस आने वाली लाइन पर माँझी है। यह माँझी गाँव बहुत प्राचीन स्थान है। यहाँ कभी माँझी (मल्लाह) फिर क्षत्रियों का बड़ा राज्य था। जिनके को

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राग सोहर

19 December 2023
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एक त मैं पान अइसन पातरि, फूल जइसन सूनरि रे, ए ललना, भुइयाँ लोटे ले लामी केसिया, त नइयाँ वझनियाँ के हो ॥ १॥ आँगन बहइत चेरिया, त अवरू लउड़िया नु रे, ए चेरिया ! आपन वलक मों के देतू, त जिअरा जुड़इती नु हो

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राग सोहर

20 December 2023
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ललिता चन्द्रावलि अइली, यमुमती राधे अइली हो। ललना, मिलि चली ओहि पार यमुन जल भरिलाई हो ।।१।। डॅड़वा में वांधेली कछोटवा हिआ चनन हारवा हो। ललना, पंवरि के पार उतरली तिवइया एक रोवइ हो ॥२॥ किआ तोके मारेली सस

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करुण रस जतसार

22 December 2023
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जतसार गीत जाँत पीसते समय गाया जाता है। दिन रात की गृहचर्य्या से फुरसत पाकर जब वोती रात या देव वेला (ब्राह्म मुहूर्त ) में स्त्रियाँ जाँत पर आटा पीसने बैठती हैं, तव वे अपनी मनोव्यथा मानो गाकर ही भुलाना

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राग जंतसार

23 December 2023
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( १७) पिआ पिआ कहि रटेला पपिहरा, जइसे रटेली बिरहिनिया ए हरीजी।।१।। स्याम स्याम कहि गोपी पुकारेली, स्याम गइले परदेसवा ए हरीजी ।।२।। बहुआ विरहिनी ओही पियवा के कारन, ऊहे जो छोड़ेलीभवनवा ए हरीजी।।३।। भवन

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भूमर

24 December 2023
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झूमर शब्व भूमना से बना। जिस गीत के गाने से मस्ती सहज हो इतने आधिक्य में गायक के मन में आ जाय कि वह झूमने लगे तो उसो लय को झूमर कहते हैं। इसी से भूमरी नाम भी निकला। समूह में जब नर-नारी ऐसे हो झूमर लय क

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२५

26 December 2023
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खाइ गइलें हों राति मोहन दहिया ।। खाइ गइलें ० ।। छोटे छोटे गोड़वा के छोटे खरउओं, कड़से के सिकहर पा गइले हो ।। राति मोहन दहिया खाई गइले हों ।।१।। कुछु खइलें कुछु भूइआ गिरवले, कुछु मुँहवा में लपेट लिहल

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राग कहँरुआ

27 December 2023
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जब हम रहली रे लरिका गदेलवा हाय रे सजनी, पिया मागे गवनवा कि रे सजनी ॥१॥  जब हम भइलीं रे अलप वएसवा, कि हाय रे सजनी पिया गइले परदेसवा कि रे सजनी 11२॥ बरह बरसि पर ट्राजा मोर अइले, कि हाय रे सजनी, बइठे द

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भजन

27 December 2023
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ऊधव प्रसंग ( १ ) धरनी जेहो धनि विरिहिनि हो, घरइ ना धीर । बिहवल विकल बिलखि चित हो, जे दुवर सरीर ॥१॥ धरनी धीरज ना रहिहें हो, विनु बनवारि । रोअत रकत के अँसुअन हो, पंथ निहारि ॥२॥ धरनी पिया परवत पर हो,

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भजन - २५

28 December 2023
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(परम पूज्या पितामही श्रीधर्म्मराज कुंअरिजी से प्राप्त) सिवजी जे चलीं लें उतरी वनिजिया गउरा मंदिरवा बइठाइ ।। बरहों बरसि पर अइलीं महादेव गउरा से माँगी ले बिचार ॥१॥ एही करिअवा गउरा हम नाहीं मानबि सूरुज व

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बारहमासा

29 December 2023
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बारहो मास में ऋतु-प्रभाव से जैसा-जैसा मनोभाव अनुभूत होता है, उसी को जब विरहिणी ने अपने प्रियतम के प्रेम में व्याकुल होकर जिस गीत में गाया है, उसी का नाम 'बारहमासा' है। इसमें एक समान ही मात्रा होती हों

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अलचारी

30 December 2023
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'अलचारी' शब्द लाचारी का अपभ्रंश है। लाचारी का अर्थ विवशता, आजिजी है। उर्दू शायरी में आजिजो पर खूब गजलें कही गयी हैं और आज भी कही जाती हैं। वास्तव में पहले पहल भोजपुरी में अलचारी गीत का प्रयोग केवल आजि

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खेलवना

30 December 2023
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इस गीत में अधिकांश वात्सल्य प्रेम हो गाया जाता है। करुण रस के जो गोत मिले, वे उद्धत हैं। खेलवना से वास्तविक अर्थ है बच्चों के खेलते बाले गीत, पर अब इसका प्रयोग भी अलचारी को तरह अन्य भावों में भी होने

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देवी के गीत

30 December 2023
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नित्रिया के डाड़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूलो झूली ना, मैया ! गावेली गितिया की झुली झूली ना ।। सानो बहिनी गावेली गितिया कि झूली० ॥१॥ झुलत-झुलत मइया के लगलो पिसिया कि चलि भइली ना मळहोरिया अवसवा कि चलि

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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विवाह क गात

1 January 2024
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तर वहे गंगा ऊपर बहे जमुना रे, सुरसरि बहे बीच घार ए । ताहि पर बाबा रे हुमिआ जे करेले, चलि भइले बेटी के लगन जी ॥१॥ हथवा के लेले बावा लोटवा से डोरिया, कान्हावा धोती धई लेलनि रे । पूरब खोजले बावा पच्छिम ख

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पूरबा गात

3 January 2024
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( १ ) मोरा राम दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। दूनू भैया से बनवा गइलनि ना ।। भोरही के भूखल होइहन, चलत चलत पग दूखत होइन, सूखल होइ हैं ना दूनो रामजी के ओठवा ।। १ ।। मोरा दूनो भैया० 11 अवध नगरिया से ग

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कजरी

3 January 2024
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( १ ) आहो बावाँ नयन मोर फरके आजु घर बालम अइहें ना ।। आहो बााँ० ।। सोने के थरियवा में जेवना परोसलों जेवना जेइहें ना ॥ झाझर गेड़ वा गंगाजल पानी पनिया पीहें ना ॥ १ ॥ आहो बावाँ ।। पाँच पाँच पनवा के बिरवा

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रोपनी और निराई के गीत

3 January 2024
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अपने ओसरे रे कुमुमा झारे लम्बी केसिया रे ना । रामा तुरुक नजरिया पड़ि गइले रे ना ।। १ ।।  घाउ तुहुँ नयका रे घाउ पयका रे ना । आवउ रे ना ॥ २ ॥  रामा जैसिह क करि ले जो तुहूँ जैसिह राज पाट चाहउ रे ना । ज

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हिंडोले के गीत

4 January 2024
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( १ ) धीरे बहु नदिया तें धीरे बहु, नदिया, मोरा पिया उतरन दे पार ।। धीरे वहु० ॥ १ ॥ काहे की तोरी वनलि नइया रे धनिया काहे की करूवारि ।। कहाँ तोरा नैया खेवइया, ये बनिया के धनी उतरइँ पार ।। धीरे बहु० ॥

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मार्ग चलते समय के गीत

4 January 2024
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( १ ) रघुवर संग जाइवि हम ना अवध रहइव । जी रघुवर रथ चढ़ि जइहें हम भुइयें चलि जाइबि । जो रघुवर हो बन फल खइहें, हम फोकली विनि खाइबि। जौं रघुवर के पात बिछइहें, हम भुइयाँ परि जाइबि। अर्थ सरल है। हम ना० ।।

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विविध गीत

4 January 2024
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(१) अमवा मोजरि गइले महुआ टपकि गइले, केकरा से पठवों सनेस ।। रे निरमोहिया छाड़ दे नोकरिया ।॥ १ ॥ मोरा पिछुअरवा भीखम भइया कयथवा, लिखि देहु एकहि चिठिया ।। रे निरमोहिया ।॥ २ ॥ केथिये में करवों कोरा रे क

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पूर्वी (नाथसरन कवि-कृत)

5 January 2024
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(८) चड़ली जवनियां हमरी बिरहा सतावेले से, नाहीं रे अइले ना अलगरजो रे बलमुआ से ।। नाहीं० ।। गोरे गोरे बहियां में हरी हरी चूरियाँ से, माटी कइले ना मोरा अलख जोबनवाँ से। मा० ।। नाहीं० ॥ झिनाँ के सारी मो

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एगो किताब पढ़ल जाला

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